Showing posts with label कवितायेँ. Show all posts
Showing posts with label कवितायेँ. Show all posts

Thursday, March 19, 2020

यह हरामी मुकाम

दुनिया हरेक पल एक हरामी जगह से
दर हरामी जगह में बदलती जा रही है
कोई संतोष है इस बीच तो सिर्फ इतना
कि इसके महिमामंडित किरानियों के बीच
जब-तब कुछेक ऐसे बंदे भी दिख जाते हैं
जो आकांक्षा का फंदा गले से निकालकर
अकेले में उससे साबुन के बुलबुले फुलाते हैं
शक्ति और श्रद्धा के सभी केंद्रों के साथ ही
ईश्वर-अल्ला के नाम पर भी पिच्च से थूकते हुए
कोई सड़ी सी गाली मुंह ही मुंह बुदबुदाते हैं-
जो कुछ तुम्हें देना था दे दिया, लेना था ले लिया
एक जान बची है, ले लोगे तो क्या हो जाएगा?
देखना ही रह गया है, जो देखना होगा, देखेंगे
सुनने वाला कौन है? जो कहना होगा, कहेंगे
यह कोरोना-कोरोना का चालीसा मत बांचो
बांचने को इतना कुछ है, कहां कोई बांचता है
तुम्हारे आकाओं के ही करम से जा रही है
उनके बचाए एक दिन भी नहीं बचने वाली
इस दुनिया को कुछ दिन और चलना ही हुआ
तो सिर्फ बहिराए हुए बंदों के कंधों पर चलेगी

बड़बड़ाना

बौखलाहट में गद्य ही हो पाता है
गर्दन झुकाए खुद से बड़बड़ाना
जिनसे घनिष्ठता है वे पूछ बैठते हैं-
‘अकेले बैठे तुम्हारे होंठ हिलते हैं
उंगलियां कोई नक्शा सा खींचती हैं
कौन सा कबित्त बांचते रहते हो?’
जवाब में अचकचाना भर हो पाता है
काश, यह वरदान मुझे हासिल होता
हर तरफ से गालियां बरस रही हों
जवाब में कोई कविता निकल रही हो
ऐसा हो सकता है, बशर्ते मन मान ले
कि गरियाया जाने वाला कोई और है
मुझसे तो ऐसा कभी हो नहीं पाएगा
जिस ताना-भरनी से मैं बुना गया हूं
उसमें किसी भले इंसान पर पड़ी लाठी
सोते-जागते मुझ पर कई बार पड़ती है
मन ठहरने के लिए प्रतिकार चाहिए
जो कहीं से भी नहीं आता, नहीं आता
अपने हिस्से की राहत मुझे नहीं चाहिए
अपने हिस्से की हवा, पानी और जमीन
न ऐसा कुछ होता है, न मुझे वह चाहिए
इस धरती की सारी खुशियां, सारा दुख
इस पर जन्मे हर शख्स के लिए साझा है
पूरा का पूरा, सारा-समूचा वह मेरा भी है
इस पूरेपन से ही मेरी कविता आती है
चाहे वह सिर्फ दो लाइन की क्यों न हो
कबूतर की उड़ान पर भी लिखूंगा कभी
तो यह सोचते हुए कि बिलरियागंज में
औरतें क्यों मार भगाई गईं रात दो बजे
जानते हुए कि यह खुद से बड़बड़ाना है

मन का वायरस

'वूहान च्या योऊ'
'दीए में तेल जरा और बढ़ाओ वूहान'
शाम आठ बजे एक-दूजे को आवाज देता
लड़ रहा है उत्तर-पूरब में वह अकुलाया शहर
डिब्बाबंद, पूरी दुनिया से छिनगाया शहर
एक नई-नकोर, लाइलाज महामारी से
जिसका सिर-पैर अभी डॉक्टर भी नहीं जानते
हम भी लड़ रहे हैं एक लंबी, कठिन लड़ाई
कुछ और खौफनाक अपनी ही एक बीमारी से
जो हमीं से निकल कर हम पर राज कर रही है
रोज हमारे आगे जो एक शत्रु खड़ा करती है
और हमारे मन का एक हिस्सा बंजर कर देती है
रोज लोग सोचते हैं, इतने शत्रुओं से घिरे हम
आखिर बचे कैसे रह गए इतने हजार साल!
गलियों चौबारों में, टीवी पर, अखबारों से
बिंदास झांकते हैं हाथ जोड़े चटक चतुर चेहरे
मुस्कुराते हुए समझाते हैं, देश खतरे में है जी
फिर बेझिझक हर तरफ बारूद बिछाने लगते हैं
काश, रोज शाम ढले हम भी खिड़कियां खोलकर
इस कठिन लड़ाई में एक-दूजे का हौसला बढ़ाते,
पर मन का वायरस क्या कभी हमें यह करने देगा?

Thursday, January 23, 2020

बुरा वक्त

वक्त का क्या कहूं?
यह पानी पर बना चेहरा है
एक बूढ़े आदमी का बेरौनक चेहरा
जिसकी कोई रग लिजलिजे भेड़िए की है
तो कोई हूबहू मेरी अपनी भी है
बनने को चेहरे बादलों में भी बनते हैं
मगर यह पानी पर बना चेहरा है
लिथड़े हुए पानी पर बना गंदा चेहरा
जिसे देख ठिठका हुआ मैं, खुद को
गंदगी में ढला महसूस कर रहा हूं
‘नए गगन में नया सूर्य जो चमक रहा है
यह विशाल भूखंड आज जो दमक रहा है
मेरी भी आभा है इसमें...’
काली आभा? किसकी? बेशक मेरी!
वक्त का क्या कहूं?
चक्कू की नोक पर नाचता नटराज है
जूझ रहे थे हम नीम-अंधेरे में बरस रही
एसिड की बोतलों, नकाबपोश रॉडों से
एसएस, गेस्टापो और खाकी निक्कर से,
जख्म लेकिन हमारे भीतर ही फट पड़ा
वक्त को लेकर इतना और कि
सिर्फ बाहर-बाहर वह कभी नहीं आता
जहरीले फूल उसके हवा में गमकते हैं
पर जड़ें उसकी हमारे अंदर होती हैं
जरा-मरण अपनी मुट्ठी में लिए हम,
जो खुद को भविष्य का भ्रूण मानते हैं

Thursday, December 26, 2019

पॉर्न क्रांति

सदन में विराजे हुए माननीयों से लेकर
सौ नंबर गश्ती दल के आरक्षियों तक
सभी मोबाइल फोन पर गंभीर कार्य में
अति व्यस्त हैं सो उन्हें तंग न किया जाए
शीघ्र ही वे आपसे संपर्क अवश्य करेंगे
यह देश एक पॉर्न क्रांति से गुजर रहा है
आप तो चुपचाप सड़क से गुजर जाइए
बिना यह सोचे कि भले लोग आपको
किन नजरों, किन खयालों से देख रहे हैं
बंद जगहें खतरनाक हैं बरखुरदार
पर खुली जगहें और भी खतरनाक हैं
देश एक पॉर्न क्रांति से गुजर रहा है
और रेप पॉर्न की डिमांड चरम पर है
सन 2002 के गुजरात दंगों के बाद
जारी ‘धार्मिक पर्चे' क्या आपने पढ़े हैं?
कुछेक तो ‘गौरव यात्रा’ में भी बंटे थे
काश, उस वक्त भी रहे होते स्मार्ट फोन
तो पर्चे याद कराने का काम ही नहीं था
हिंदुत्व का उभार और मोबाइल पॉर्न क्रांति
दोनों के एक-दो ब्यौरे आगे-पीछे होते हैं
वरना ये एक ही ट्रेन की दो पटरियां भर हैं
समानधर्मा और बहुत हद तक समकालीन
आप विरोध करें, सड़क पर मुर्दाबाद बोलें
लेकिन आएगा वही, छाएगा वही वही वही
यह ताकत का तर्क है जी, मारे जो सो मीर
कोने में, अंधेरे में, अकेले में भंभोड़ खाएगा
ऊपर से वीडियो बनाकर पैसे भी कमाएगा
दोषी कौन है, किसको कितनी सजा मिलेगी
शिकार और शिकारी के नाम से ही तय होगा
जरूरी हुआ तो दोषी के लिए जुलूस निकालेंगे
वर्ना सारे मिलकर शाम को कैंडल मार्च करेंगे
इसलिए जो दिल करे वह करें, पर सजग रहें
एक अदृश्य मशीन के अनगिनत कंटीले दांत
हर कमजोर के इर्दगिर्द आठो पहर घूम रहे हैं
आपके कपड़े का एक कोना फंसने की देर है
कटने तक आप अपने गुनाह भी जान जाएंगे

Monday, October 29, 2018

यादें

शुक्रगुजार हूं यादों की इस खास गढ़न का
कि इसी के बल पर अब तक जीता आता हूं
कि कड़वा-करख्त धुआं और पसीने से चिपचिप धूल 
दोनों यादों में झर-झर झरते मेहों से धुल जाते हैं
और दफ्तरी यकसारियत जब दिल को दबोचती है
तो इंद्रजाल से महमह अमिया बौर मदद को आते हैं
ऐसी ही चटख यादें अगर चीरफाड़ के डॉक्टर, 
दारोगा, वकील, लाश और बासी खून की भी होतीं
या पूरे साल एक बंद कमरे में अकेले रहने की यातना
अपने असाध्य पीलेपन में वैसी ही टटकी रह आती
और जरा सी कोशिश पर पलटकर आंख में आ जाती
तो जिंदगी के हल्ले से बंदा अर्सा पहले फारिग हो लेता
शुक्रगुजार हूं मेरी और सबकी कहानी लिखने वाले का
कि कहानी जैसा कोई मर्ज उसे बिल्कुल नहीं लगा
कि अच्छी तरह पता है उसे कि गुर्दा, लीवर, तिल्ली
दिल, दिमाग, आंतें और फेफड़े सुख-दुख के हर रचाव से
इतने ज्यादा जरूरी हैं कि कोई घालमेल इनमें नहीं चलेगा
सो मन के कबाड़ में पड़ी छोटी यादें लौट-लौटकर आती हैं
और स्वयं को गढ़ने वाली लंबी-चौड़ी बस घूरे में जाती हैं

Wednesday, August 29, 2018

रतजगे की दास्तान

1.
कैसे सो रहे होगे कृष्णाजी, जवान बेटे की मौत के बाद
फोन पर तुमसे बात करने की हिम्मत अब तक नहीं जुटा पाया
घटना की वजह तो खैर बातचीत के बाद भी नहीं पूछ पाऊंगा
बीतती हुई रात में नींद, सपने और रतजगे के बीच
क्या सोचती होगी सात गोलियों से बिंधकर निकले सुफियान की बहू
शायद यही कि जिस सैलून से बच्चों का गुजारा होता है
वह अगला चुनाव बीतने तक सलामत रह पाएगा या नहीं
कुछ भी कहना, अच्छी धज में कहना, कविता में कहना
मेरे लिए कितना मानीखेज होगा, तुम्हीं लोग बताओ
जब इतनी सी जद में भी कुछ साफ-सुथरा देखना मुझसे नहीं हो पा रहा
2.
उमस से लदी अगस्त की रातें वैसे भी सोने कहां देती हैं
और अगर तुम दो-चार दिनों के लिए परदेस में हो
फिर तो मजे देखो सीपी की तरह हर ओर से घेरे मटमैले अगस्त के
अचानक नींद टूटी बाहर बेतरह मच रहे किसी शोर से
इतना हल्ला क्यों? कोई जुलूस निकला है, या रेड पड़ गई है?
हड़बड़ा कर बाहर निकला तो तड़ातड़ पड़ती बूंदें दिखीं
सोडियम लैंप की पीली रोशनी में भीगते दिखे होटल के घने पेड़
पीछे विशाल अंधियारा तट, आगे कमर तक चढ़े गन्ने के खेत
और समुद्र के स्वप्न देखती बया जैसी चिड़ियों के घोंसले
जिनमें यहां की फुरसत के मुताबिक दो-दो कोठे हुए करते हैं
घड़ी देखी तो साढ़े चार बज रहे थे, सुबह होने को ही है
लेकिन धत्तेरे की, साथ जुड़ा है डेढ़ घंटे का टाइम लैग
यह मॉरीशस है मेरे मालिक, अभी तो यहां रात के तीन बजे हैं
चुपचाप उठंगे हुए झेलो कमसकम ढाई घंटे का थकान भरा रतजगा
3.
गिरगिट एक सुंदर जानवर है, रंग बदलना उसकी जरूरत है
लेकिन इंसान को अपनी जेहनियत में भी ऐसा क्यों होना चाहिए
हां, छुपकर रहना या खुद को ज्यादा जाहिर न करना
एक अलग चीज है, जो हमेशा से मुझे खींचती रही है
जंगल में अपने धब्बों या धारियों या चित्तियों के साथ
खुद को जरा भी बदले बगैर अदृश्य रहना, यही मेरा काम्य है
इसलिए नहीं कि घात लगाकर पेट भर खाऊं और चैन से सोऊं
बल्कि इसलिए कि इतने विशाल तारों, ग्रहों-उपग्रहों के बीच
सब कुछ भोगने और देखने की जो सलाहियत
मुझे बख्शी गई है, वह सारी की सारी व्यर्थ न चली जाए
तो किनारे खड़ा होकर नहीं, तमाशा हमेशा घुसकर देखता हूं
बाहर जब भगदड़ मची हो तब भी किसी चतुर बच्चे की तरह
जहां-तहां पड़ी चीजों और भागती टांगों के बीच से निकल जाना
यह मेरी नौकरी नहीं, मिजाज है और यही मुझे अच्छा लगता है
4.
और उस दारुण दुख का क्या, जो यहां तक मेरे हिस्से आया है?
बहुत सारे मुझ जैसे लोग इसकी भरपाई सुख से करना चाहते हैं
मेरे लिए तो बस इतना कि दुख मुझे सीपी से बाहर जाना सिखाता है
‘मुझे तुमसे कुछ भी न चाहिए, मुझे मेरे हाल पे छोड़ दो’
यह गाना मैं मन ही मन मुकेश की दर्दीली आवाज में नहीं
किशोर कुमार की ओडली-ओडली-ओए के साथ गाता हूं
खासकर अभी, इस टेढ़ी-मेढ़ी बरसाती रात में साढ़े तीन बजे
जब बाहर अंटार्कटिका से सीधे जाकर जुड़ा स्याही का समंदर
ठहाक-ठहाक की तालों के साथ पहले ही सुर में सुर मिला रहा है
5.
बस थोड़ी ही देर में अगस्त की एक और सुबह सामने होगी
वही अगस्त, जिसमें 71 साल पहले हिंदुस्तान से लेकर मॉरीशस तक
बंट गए थे न जाने कितने मंझे हुए मछेरे नूरुद्दीन और विनय कुमार
जिन्हें कुछ ही घंटे पहले मैंने साथ-साथ समंदर में कटिया डाले देखा था
वही मछली का कांटा अभी मेरे हलक में फंस गया है कृष्णाजी
बात तो तुमसे नहीं कर पाऊंगा, पर लिखकर इतना बोलूंगा
कि कलेजा फाड़ देने वाली इस तकलीफ में भी तुम जब-तब
सुफियान के बच्चों का हाल-चाल लेने जरूर जाना
इतने दिन हमने साथ में काम किया है तो जानते हैं
कि गले से लेकर दिल तक चुभा हुआ कांटा इससे निकले, न निकले
पर आराम जो भी थोड़ा-बहुत आना है, इसी तरह आएगा

Monday, August 13, 2018

ओ मेरी मां

पचीस पार करने से पहले ही
औरों की मां को अपनी मां समझने लगा
और गजब यह कि मुझसे पहले
वे ही मुझे अपना बेटा मानने लगीं।
इलाहाबादी रेल मजदूरों का क्वार्टर
भोजपुरिया पल्लेदारों की झोपड़ी
मानसा के बटाईदारों के खुरदुरे डेरे,
इतने सारे घरों में इतनी सारी मांएं।
एक को तो मेरे कुवांरे मरने के अंदेशे पर
मुंह फेरकर अपनी आंखें पोंछते
मैंने खुद अपनी आंखों से देखा था,
अकेली पड़कर मरी हुई ओ मेरी मां!
कैसे समझाऊं कि घिस-पिट कर
इतना जरा सा तुम्हारे पास लौटना
मेरे लिए कितना मुश्किल था,
कितने तो मेरे जैसे कभी लौटे ही नहीं।
खैर, अब जान गए हैं हमारे लोग
कि हमारा वह कृत्य अभारतीय था।
कि अगर हम धर्म का पूरा ध्यान रखते
और जाति की यूं अनदेखी न करते
तो हमारा जनम अकारथ न जाता।
कभी तो मुझे तुम तक लौटना था
लेकिन इस हद तक नाकामी में नहीं
कि खुली आंखें लिए अंधेरे में बैठी तुम
मेरी ढिबरी की लौ खोज रही थीं,
जब एक झिरी से मैंने तुम्हें जाते हुए देखा।

Friday, August 3, 2018

बाप

आगे की तरफ कुछ देर
पूरे जलाल पर कौंधता तारा
जो मद्धिम पड़े बगैर
अचानक ऐसे गायब होता है
जैसे कभी था ही नहीं
जब तक वह करीब होता है
चमक आंख को चुभती है
गर्दिशें उसकी दिखतीं नहीं
कि अपनी गर्दिशों से ही
कोई छूट कहां मिलती है
फिर उसके जाने के अर्से बाद
किसी चौकस चटख दोपहरी में
मार-तमाम अंधियारी रातें
हर ओर से जब तुम्हें घेरती हैं...
तब यह सोच कर तुम
सुकून महसूस कर सकते हो
कि यह पीछे आने वालों के लिए
कुछ देर क्षितिज का तारा बनकर
नीचे ढुलक जाने का वक्त है...
जैसे गए दिनों के आकाश में
कोई तुम्हारे लिए टंगा रहता था
और जिसके दफा हो जाने से
राहियों की राह नहीं रुक जाएगी

Friday, July 27, 2018

क्या?

कोई-कोई वक्त होता है
जब बाथरूम की छत टपकने लगती है
कई-कई बार ठीक कराने के बाद भी 
टोटके की तरह टपकती ही जाती है


कोई-कोई वक्त होता है
जब कौए आस-पास मंडराने लगते हैं
कभी गाड़ी से टकराकर टपक जाते हैं
कभी सिर पर बीट टपका जाते हैं
कोई-कोई वक्त होता है
जब सारे दोस्त-मित्र, सभी नजदीकी जन
घनिष्ठतम बातचीत या शायद सपने में भी
'मैं-मैं और केवल मैं' बुदबुदाने लगते हैं
कोई-कोई वक्त होता है
जब पैरों के नाखून काटते हुए
कच्च से उंगली कट जाती है
और हफ्ता दस दिन पंद्रह दिन
खून धीरे-धीरे रिसता ही रहता है
ऐसे नामुराद लम्बे गंदे वक्त
कहती-सुनती तो बहुत कराते हैं
पर जो भी इनके ककून में कैद हो
उसकी समझ में कहां आते हैं?
अनजान लोगों से बातें करना
बचपन से ही अच्छा लगता था
झगड़े के डर से अब नहीं करता
टीवी पर खबरें देखना छोड़ दिया है
अखबार भी कल से नहीं पढूंगा-
रोज ठानता हूं रोज भूल जाता हूं
चोरी-डाका हत्या-बलात्कार दंगा-फसाद
पीटते-पीटते किसी को मार ही डालना
इस सबसे खास परेशानी कभी रही नहीं
यह मेरी दुनिया है, यही रोजी-रोटी है
इससे भाग कर जाऊंगा भी तो कहां?
इस बेदर्द बेहिसी के बावजूद
दिन-रात जो मुझे उलझाए हुए है
जान नहीं पाता कि वह चीज क्या है
किसी और तरह के दौर की आहट?
जिससे होकर गुजरना तो दूर
जिसके आने का ढब समझना भी
मेरी समझ के बूते से बाहर है?
झल्लाहट का एक अदृश्य रोडरोलर
अंदर-बाहर के नक्शे पर दौड़ रहा है
शिनाख्त जिसकी मेरे जैसों के भीतर
स्नायुरोग हृदयरोग सिफलिस मनोरोग
या खुजली की शक्ल में ही हो पाती है
सवाल मेरे सामने यह है कि
भीतर-बाहर एक साथ चल रहे
इस जानलेवा घपले को मैं क्या कहूं
सुदूर अंतरिक्ष से आया एलियन इनफेक्शन?
या बड़ी पूंजी की खुली लूट का जरिया बनी
बहुसंख्यकवादी राजनीतिक गिरोहगिरी?
या 'टिपिंग ओवर' के बाद की ग्लोबल वार्मिंग?
या सबको फंसा लेने वाला कोई मोहनी मंत्र?
जो भी कहूं पर समझ में घुसता नहीं
यह आता हुआ दौर, यह नामुराद वक्त
‘क्या धोऊं क्या निचोड़ूँ’ वाला यह बाथरूम
जिसकी छत लगातार टपकती ही जाती है

Saturday, July 14, 2018

डरो

कोयले से डरो राख से डरो
सड़क किनारे पड़े फटे जूते से डरो
अपने ठिकाने से हंकाले जाने के बाद
कहीं भी टिक पाने में नाकाम रहे
उजड़े-बिखरे सनकैल इंसान से डरो
दहशत खाओ मैली दिखने के करीब
हल्के हरे रंग की साड़ी पहने औरत
और उसकी उंगली पकड़े चल रहे
दाढ़ी-मूंछ वाले मंदबुद्धि बालक से
कि ये चीजें बहुत धीरे-धीरे चलती हैं
ताकत की चढ़ाई चढ़ते हुए शातिर लोग
जब अपनी गाड़ी का पांचवां गियर लगाते हैं
तो अपने पीछे धूल और तालियों के अलावा
ऐसी चीजों का अंबार भी छोड़ते जाते हैं
और कई बार उन्हें पता भी नहीं होता
कि जो धीमा रुदन रात में आंख लगते ही
उनके सुसज्जित साउंडप्रूफ शयनकक्ष में
सुनाई पड़ता है, वह उनके ही
किसी ज्ञात-अज्ञात कर्म का नतीजा है
हे जननायक, सुख-दुख के दायक
दूर-दूर तक लगी मेटल डिटेक्टरों
और स्टेनगनों की बाड़ के बावजूद
यह इत्मीनान हो पाना नामुमकिन है
कि इन्हीं में से कोई चीज
किसी दिन जमीन से उछलकर
सीधे तुम्हारा गला नहीं पकड़ लेगी
इसे लेकर तुम ज्यादा हतक भी मत मानो
क्योंकि इंसान को उसके अतीत से बचा सके
ऐसा कोई कवच अबतक रचा नहीं जा सका है
तुम्हारी हंसी पूरी दुनिया को लुभाती है
लेकिन बहुतों को उस घड़ी का इंतजार है
जब तुम्हारे ही बनाए हुए इतने सारे भूत
मौका ताड़कर तुम्हारे सामने आएंगे
और इस जगत-विजयिनी हंसी की
लंबी स-स्वर यात्रा तत्काल पलट कर
बाहर से भीतर की ओर हो जाएगी

Monday, April 30, 2018

स्वप्न मुक्तक

मालिक बनकर हुकुम चलाना
यूं ही बिना बात चिल्लाना
सबको घूम-घूम गरियाना
किसका स्वप्न नहीं होता है?
पढ़ना-लिखना बहुत कठिन है
गुरुजन भाव नहीं देते हैं
अक्सर सिर दुखने लगता है
बातें भी सुननी पड़ती हैं
इस झंझट में फंसे बिना ही
ऊंचे बैठ ग्यान गुर्राना
वेद-शास्त्र की धौंस दिखाकर
लपक-झपक सबको जुतियाना
किसका स्वप्न नहीं होता है?

हिंदी उर्दू तमिल बांग्ला
असमी उड़िया और मराठी
सबकी अपनी झंकृतियाँ हैं
जिनमें अपना मन बसता है
लेकिन अगले थर्राते हों
कुर्सी छोड़ उछल जाते हों
यस्सर-यस्सर बर्राते हों
इनमें वैसी बात कहां है?
अपने बच्चे इंग्लिश बोलें
धरती को जूतों पर तोलें
नौकर आगे-पीछे डोलें
झुक-झुक कर दरवाजे खोलें
जाने भी दो रहने भी दो
हम भी सुर में मिसरी घोलें
देसी अनुभावों में लेकर
वैश्विक भावों की विनम्रता
लंडन से सिडनी तक जाएं
डरबन से दुबई तक आएं
वाशिंग्टन से वैंकूवर तक
हर गोरे का माथा खाएं
दुनिया के जोकर कहलाएं
किसका स्वप्न नहीं होता है?

जीने का सामान चाहिए
भोजन वस्त्र मकान चाहिए
इज्जत से हम-आप रह सकें
ऐसा नया विधान चाहिए
लेकिन कोई ऐन सामने
हाथ जोड़ गिड़गिड़ा रहा हो
मारें उसको या कि छोड़ दें
यह दुविधा भी आकर्षक है
इस दुविधा से रोज गुजरना
मानव हूं मैं या कि देवता
ऐसा प्रश्न हृदय में धरना
माफ़ी की महिमा अपार है
इस महिमा में जीना-मरना
फ्रायड जी के ग्रंथ बांचकर
अपने मन के भेद खोलना
कोई उंगली करे बीच में
कहना- 'की मैं झूठ बोलणा?'
किसका स्वप्न नहीं होता है?


Monday, April 16, 2018

स्थगित नैतिकता

कोई कहे कि ऐसा क्यों कहा तो कह देना, बच्चे पालने थे
ऐसा एक बौद्धिक ने मुझसे बहुत पहले कहा था
उसके बच्चे अच्छी तरह पले और उसने कुछ ऊंचे पदों की शान बढ़ाई
हालांकि हर लाइन में शीर्ष पद उसकी पहुंच से बाहर ही रहा
बात उसकी बहरहाल समझ में मेरी न तब आई थी न अब आ सकी है
जो कुछ भी मुझे कहना होता है, अपने ही लिए कहता हूं
और उसका ताप अपनी खुद की चमड़ी पर महसूस करता हूं
बच्चे पालने के नाम पर या पारिवारिक जातिगत धार्मिक
वैचारिक राजनीतिक जरूरतों के नाम पर किसी भी बात का
औचित्य बताने या उसे नीचे सरकाने का कोई किस्सा कभी बना ही नहीं
गलत लोगों, गलत चीजों को मैंने कभी सही न बताया हो, ऐसा नहीं है  
कई बार बताया है, लेकिन अक्सर नासमझी में
दोष मेरा ऐसे मामलों में इतना ही था कि किसी रौ में बह गया
सच को जानने के लिए दिमाग का जो खुलापन जरूरी है
कुछ देर के लिए उसको किसी और के पास गिरवी रख दिया
ऐसी गलतियों के लिए आज भी मेरा मन छटपटाता है
किसी मजबूरी में नहीं, किसी जरूरतवश नहीं
एक सचेत फैसले के तहत एक दिन तय किया
कि मैं गोबर फेंकूंगा, ठेला खींचूंगा, तकियों पर बेलबूटे काढ़ूंगा
लेकिन कोई भी हवाला देकर किसी व्यभिचारी का बिस्तर नहीं बनूंगा
यह एक मामूली जीवन का मामूली फैसला था
ऐसे फैसलों का कोई आभामंडल नहीं होता, और होना भी नहीं चाहिए
आप काम के लिए घर से निकलते हैं और काम करके घर आ जाते हैं
इस भोली उम्मीद में कि ऐसा करके सच बोलने का हक कमा रहे हैं
अपने सारे दोस्तों से भी यही कहता हूं कि एक-दूसरे पर नजर रखो
जिसे तुम विरोधी मानते हो, उसकी तरफ से हुई कोई भी गलती
अगर अपनी तरफ से होने पर तुम्हें सही लगे तो उसे बारीकी से देखो
तुम्हें अगर लगता है कि तुम कोई सच की लड़ाई लड़ रहे हो
तो चुनी हुई या स्थगित नैतिकता के सहारे इसे कभी मत लड़ो
क्या पता, जब तुम्हें इसका पता चले तब तक बहुत देर हो चुकी हो!

Wednesday, September 28, 2016

छोटी कविताएं

1. ओस
गौर से देखने पर दिखती है
वरना जैसे लपक कर आती है
वैसे ही झपक कर चली भी जाती है
क्वार महीने की नन्ही सतरंगी ओस

2. सपने
जिंदगी जो पत्थर तुड़वाती है
नींद की गधागाड़ी उसपर खड़भड़ करती जाती है
फिर बाज की तरह झपट कर सपने आते हैं
और पंजों में दबाए कहीं के कहीं उड़ जाते हैं

3. प्यार
नफरत इतनी
कि धड़कनों से भी तेज चलता था
चाकू वाला हाथ
कुछ दिन पहले साथ में सेल्फियां लेते वक्त
क्या इससे ज्यादा रहा होगा प्यार?

4. कविताएं
फिर शुरू हुआ भूलने, सनकने
बीस बातें सुनकर चुप रह जाने का दौर
कविताएं कहीं आसपास हैं

5. भाषाजाल
गुस्से में मारो प्यार में मारो
ऊब रहे हो तो यूं ही उठो और मारो
फिर अच्छा सा कुछ बोल कर मना लो
आखिर स्त्रियों के लिए ही बना है यह भाषाजाल

Tuesday, August 4, 2015

आता रहूंगा तुम्हारे पास

आ रहा हूं आ रहा हूं
आता रहूंगा तुम्हारे पास

लहरों की तरह तरंग में उड़ती
असंख्य पीली तितलियों पर
पेट के बल पसरा हुआ
नीचे फैली जन्नत निहारता

या कालिख पुती शक्ल में
काने गधे पर बिठाकर
जहन्नुम की हद तक
खदेड़ा जाता हुआ

सारे अतिरेकों और अतिवादों पर
सरपट सवारी करता 
तुम्हारे ही पास आऊंगा

और यह कोई बताने की बात नहीं
कि मेरी बांसुरी
सिर्फ तुम्हारे लिए बजती है

फूल जब मेरी आंखों के सामने होते हैं
उनका खिलना उनकी गमक
उनकी सारी की सारी खामोश तानें
तुम्हारे ही लिए होती हैं

इस दुनिया की गिचिर-पिचिर से
बाहर जाने के जो भी दरवाजे
नजर वालों के लिए खुलते हैं,
तुम्हारी मेहरबानी से
मुझ नाचीज की पहुंच भी
उन तक अपने आप बन जाती है

इन दरवाजों से होकर
मुझे और कहीं नहीं जाना
मेरी पहली और आखिरी मंजिल
तुम हो

और सुनो,
इस बियाबान से निकलने का
कोई जरिया मुझे नहीं मिला
तो भी मैं ज्यादा देर भटकूंगा नहीं

अपनी थकी हुई पीठ
किसी अंधियारे पेड़ से टिकाकर
चैन से आंखें मूंद लूंगा
और उंगली तक हिलाए बगैर
तुम तक पहुंच जाऊंगा

आ रहा हूं आता रहूंगा
इस तरह
और न जाने किस-किस तरह
तुम्हारे पास 




Saturday, July 25, 2015

इलाहाबाद

आधी रात में सिर के बगल से
कोई हांक लगाते गुजरा-
‘इलाहाबाद...इलाहाबाद
आ रहा है... आ गया है
उतरेगा कोई इलाहाबाद?’
नींद खुलने से पहले ही
भीतर कोई बुलबुला सा फूटा-
‘वह तो कब का पीछे छूट गया
न जाने कितने साल
न जाने कितने जनम’
झनझन-थरथर की भुतही गूंज में
जमुना के खामोश पानी पर
हौले-हौले कदम बढ़ाती
दिल्ली-हावड़ा राजधानी
रह-रह कराह रही थी
जैसे बिजली से हंक रहा
हजार टन वजनी यह
लोहा काठ और प्लास्टिक
असल में मेरा लुटा-पिटा दिल हो
अजनबियों की तरह
चोरी-चुप्पे इस अजीज़ शहर के
इतने करीब से गुजरता हुआ



Saturday, May 24, 2014

खेल

एक खेल वह है जो लगभग बराबर की ताकत वाले
खुले मैदान में एक-दूसरे के साथ खेलते हैं
लेकिन गौर से देखो तो यह सिर्फ एक ख्वाहिश है-
अन्यायी दुनिया में न्याय के साथ जीने की ख्वाहिश

हकीकत के खेल कभी वैसे नहीं होते
जैसा हम उनके बारे में जानते-समझते हैं
काश, हर पल हमारे चौगिर्द चला करने वाले
इन खेलों को भी हम खुली आंखों देख पाते

चीनी कहते हैं- खेलना हो तो तीन बातें पहले तय करो
खेल के नियम, दाव का आकार और हटने का वक्त
ये तीनों बातें शायद महाभारत के जुए में भी तय रही हों
लेकिन खेल का नतीजा कैसा रहा, सभी जानते हैं

अच्छी तरह पकड़ में आ गए चूहे के साथ
बिल्ली कैसे-कैसे खेल दिखाती है, इसका अंदाजा
टीवी पर मिकी माउस या टॉम एंड जेरी देखकर
बड़े हुए लोग आसानी से नहीं लगा सकते

इससे भी बेरहम खेल चीजें हमारे साथ खेलती हैं,
और यह कोई फिलॉसफी वाली बात नहीं है

जरा भी कमजोर पड़ने का मतलब है
किसी को खुद से खेलने का मौका देना
और तुम हमेशा, हर जगह, हर मामले में
मजबूत ही तो नहीं बने रह सकते

फर्श पर पड़ी पेंसिल तक तुम्हें कमजोर पाकर
तुम्हारे साथ कितनी बेदर्दी से पेश आ सकती है,
यह एहसास एक भी दिन मेरा पीछा नहीं छोड़ता

बुरी तरह टूटने के बाद जैसे-तैसे जोड़े गए हाथ से
जितनी बार इसे उठाने की कोशिश करता हूं,
दांव देकर दुष्ट हर बार कहीं और चली जाती है

और तो और, कमजोर पलों में
इंसान का मन ही उसके साथ खेलने लगता है
निराशा की कोई वजह नहीं, फिर भी खोज लाता है
जैसे यही उसके होने की सबसे जरूरी शर्त हो

ऐसे-ऐसे लोग, जिनके बारे में सोचकर लगता था कि
आशा के गीत गाने के लिए ही वे इस धरती पर आए हैं,
अपने ही मन के हाथों बेमौत मारे गए

लिहाजा, खेलना है तो अपनी ताब अपनी सरकशी से खेलो
वजह चाहे कुछ भी हो, किसी की बेकसी से क्यों खेलो

और अगर कभी तुम्हारा मुकाबला किसी राक्षस से हो
जैसे किसी असाध्य रोग, अन्यायी व्यवस्था
या समझ न आने वाली अपनी ही किसी दुश्चिंता से
तो छल-छद्म समेत हर संभव हथियार लेकर उससे लड़ो

काफी समय तक बराबर की टक्कर देने के बाद
तुम उसे हरा सकते हो या उसकी पकड़ से दूर जा सकते हो
लेकिन जीत की घोषणा जब तक हो सके, टाले रखो

लड़ने वाले जानते हैं कि युद्ध के कुछ दौर बीतने के बाद
दुश्मन की पीठ का एक बाल दिख जाने पर भी
जीत के नारे मुंह से फव्वारों की तरह फूटते हैं

लेकिन तुम अगर असली लड़वैये हो तो
जीत की छांह में जीवन गुजारने के लद्धड़ सपने छोड़ो
और लंबी लड़ाई की पेचीदगियों का आनंद लो

बिल्कुल संभव है कि बीच में तुम्हें थोड़ी राहत देकर
राक्षस तुम्हारे साथ चूहे-बिल्ली का खेल खेल रहा हो
और ऐन मौके पर तुम्हारी खुशी ही उसकी खुराक बन जाए

ऐसे न जाने कितने निर्मम खेलों से भरा है हमारा जीवन
जहां बड़े से बड़ा खिलाड़ी भी किसी न किसी मोड़ पर
खुद को एक साबुत या टूटा हुआ खिलौना पाता है

इसलिए दर्शक होने की गुंजाइश सदा अपने पास रखो
जब भी मौका मिले, देशकाल की अभेद्य दीवार में
दांतों और नाखूनों से अपने लिए कोई छेद बनाओ
जहां से औरों के साथ-साथ अपने भी खेल दिखते रहें

और अगर किसी असावधान क्षण में
तुम्हारा मन ही तुमसे खेलने को झपटे
तो घूर कर उसे देखो और दपट कर कहो कि
यह खेल तुम्हें बिल्कुल पसंद नहीं

Saturday, May 3, 2014

अट्ठारह साल का लड़का

सींग कटा कर कुलांचें भरने वालों की यह रंगारंग पार्टी
बस थोड़ी ही देर में अपने शबाब पर पहुंचने वाली है

ऐसे सुहाने, नाजुक मोड़ पर कौन यहां से हिलता है
फिर भी, फुरसत मिले तो जरा आस-पास घूम कर देखना
गंवईं सा दिखने वाला एक अट्ठारह साल का लड़का
अपना दिन का ठिकाना छोड़ कर यहीं कहीं टहल रहा होगा

लेकिन अभी, रात के बारह बजे
तुम कैसे उसे ढूंढोगे, कैसे पहचानोगे ?

वह कुछ भी पहने हो सकता है,
जैसे काठ की खटपटिया पर पीली धोती और नीली टीशर्ट

उसकी चाल का चौकन्नापन गली के गुंडे जैसा
आंखों की तुर्शी झपट पड़ने को तैयार बनैले जानवर जैसी है,
हालांकि यह हुलिया न उसे मजाकिया बनाता है, न खौफनाक

वह सिर्फ एक फुटकर किस्म का डॉन क्विग्जॉट है,
ब्रेड पकौड़ों और पावर ब्रोकरों के शहर में
अंडे बेच कर एडीसन बनने आया है 

लेकिन एक अनजान लड़के की ऐसी बेढब बारीकियां
इस चौंध भरी शहराती रात में तुम्हें दिखेंगी कैसे ?

*

साढ़े पांच फुट का वह ढीला ढीठ गठीला छोकरा
मोटे काले फ्रेम वाला चश्मा भी अभी नहीं लगाता होगा
कि सामने से आ रही गाड़ियों की पलट रोशनी से ही
सड़क पर उसके होने का कुछ अंदाजा मिल सके

पढ़ते वक्त आंखों में दर्द की शिकायत करता है
पर चश्मा अभी उसकी नजर से पंद्रह-बीस दिन दूर है,
और उसकी दाईं आंख पर कटे का निशान भी अभी नहीं है

वह चोट तो उसे पांच साल बाद लगेगी, तेईस की उम्र में

यहां तुम उसे देर रात तक खुली किसी चाय की दुकान पर
पागल कर देने वाली बहसों में भी उलझा हुआ नहीं पाओगे
यह जानी-पहचानी चीज अभी उसकी पहुंच से काफी बाहर है

असल बात यह कि इस वक्त जहां हम-तुम बातें कर रहे हैं,
वह आजमगढ़ या  इलाहाबाद का कोई स्टुडेंट जोन नहीं
साउथ दिल्ली का एक भुतहा सा नाइट क्लब है...
दुनिया की सारी बहसें जहां पहुंचने के पहले ही हल हो चुकी होती हैं

* 

उसे पहचानने के लिए शायद तुम्हें उससे कुछ सवाल करने पड़ें
जैसे यह कि इतने शातिरपने के साथ, फिर भी इतनी शाइस्तगी से
आंखें ऊपर किए बिना लड़कियां वह कैसे ताड़ लेता है,
और यह कि जिंदगी भर ताड़ता ही रहेगा या कभी आगे भी बढ़ेगा

लगता नहीं कि इन सवालों का तुम्हें कोई जवाब मिलेगा
लेकिन इस अटपटेपन के आकर्षण से कहीं तुम उसके दोस्त बन गए
तो बिना कुछ सोचे-समझे कलेजा निकालकर तुम्हारे हाथ पे धर देगा

उससे कहना कि कोशिश चाहे जितनी भी कर ले, कामयाब उसे नहीं होना
कि ग़मे-रोजगार का कैसा भी चमकीला इलाज उसके लिए नहीं बना है
कि हालात चाहे जैसे भी हों, पर अभी की चिंताओं में इतना गर्क न हो
क्योंकि आगे और भी बड़ी चिंताओं का दरिया उसे डूब कर पार करना है

अकाल मौतों के तूफान झेलने हैं, दुनिया बदलने की राजनीति करनी है
फाके की मजबूरियों का मजा डेली अडवेंचर की तरह लेना है
बाड़ेबंदियों के पार जाकर एक पूरा और कुछ अधूरे इश्क करने हैं 
पुलिस की पिटाई खानी है, जेल को घर समझकर जीने का मन बनाना है

और यह सब करके एक दिन अचानक
गृहस्थी और स्वप्नभंग के झुटपुटे में
छोटी से छोटी नौकरी के लिए दफ्तर-दफ्तर भटकना है

*

तुम रेड वाइन का कड़वा घूंट भरते हो,
मुंह बिचकाते हो, कहते हो- ‘लाइफ हैपेंस’
लेकिन इस पल्प फलसफे की बघार से तुम
मुझे बहलाने की कोशिश न करो

मुझे पता है कि सड़क पर पहली ही मुलाकात में
किसी को आने वाली जिंदगी के ऐसे करख्त ब्यौरे देना
अपने लिए बैठे-बिठाए जूते खाने की व्यवस्था करने जैसा है

इसलिए मैं तुम्हें एक आसान रास्ता बताता हूं-
इसी ऊंघती गंधाती हालत में, आंखें आधी मूंदे आधी खोले
तैरते हुए से तुम उस तक जाओ और भुलावा देकर उसे मेरे पास लाओ

उससे कहो कि शक्ल-सूरत में उससे बहुत मिलता-जुलता एक शख्स
जो इसी शहर में कहीं बारह से सात की रेगुलर नौकरी बजाता है,

नीची नजर से लड़कियां ताड़ने और हर हाल में मगन रहने का
अपना आजमाया हुआ हुनर बेध्यानी के बक्से में डाल कर
अट्ठारह साल के ही अपने बेटे के किसी राह लग जाने की फिक्र करता है,

अपनी चोटिल दाईं आंख ही नहीं, अपने वक्त के रिसते घावों को भी
तरह-तरह के चश्मों के पीछे छिपा कर रखने का हुनर
जिसने दुनिया की सबसे ऊंची युनिवर्सिटी में सीख रखा है-

‘आलवेज एटीन’ की रंगारंग पार्टी में दिल से शामिल होने के लिए
सिर्फ दो मील और बत्तीस साल की छोटी सी दूरी पर
बाहें फैलाए उसका इंतजार कर रहा है



Tuesday, April 22, 2014

धीरे चलो

धीरे चलो
इसलिए नहीं कि बाकी सभी तेज-तेज चल रहे हैं
और धीरे चलकर तुम सबसे अलग दिखोगे
इसलिए तो और भी नहीं कि
भागते-भागते थक गए हो और थोड़ा सुस्ता लेना चाहते हो

धीरे चलो
इसलिए कि धीरे चलकर ही काम की जगहों तक पहुंच पाओगे
कई चीजें, कई जगहें तेज चलने पर दिखतीं ही नहीं
बहुत सारी मंजिलें पार कर जाने के बाद
लगता है कि जहां पहुंचना था, वह कहीं पीछे छूट चुका है

धीरे चलो
कि अभी तो यह तेज चलने से ज्यादा मुश्किल है
जरा सा कदम रोकते ही लुढ़क जाने जैसा एहसास होता है
पैरों तले कुचल जाना, अंधेरे में खो जाना, गुमनामी में सो जाना
इन सबमें उससे बुरा क्या है, जहां तेज चलकर तुम पहुंचने वाले हो?

Saturday, March 8, 2014

तीसरी बार खोना

रेगिस्तान में एक और दिन बीतने को है
रेत के ढूहों के बीच कुछ सुलगने जैसी गंध लिए
पारदर्शी रुई के ढेर सी बिल्कुल ठहरी हुई हवा
दम साधे किसी बुरी खबर का इंतजार कर रही है

सतह के नीचे सरसराते फुरसा सांप को
अपने अंडों की तरफ बढ़ते देख विशाल चिड़िया
कर्कश आवाज में कुछ बोलती है
एक पल भी देर किए बिना हम
निकल पड़ने का फैसला करते हैं

हमारे पीछे कोई गांव है
कहीं से लाकर रख दिया गया धूल भरा मटमैला गांव
पूक-पल्थी या सातो-नरैनी जैसा जोड़े वाला जिसका नाम
यहां हम किसी की शादी में आए थे
किसकी? कुछ याद नहीं पड़ता

तीसरे पहर स्कॉर्पियो से रवाना होना
ढलती शाम एक बाजार में पानी पीने उतरना
और सिर्फ पांच मिनट की अफरा-तफरी में 
वहीं पर सदा-सदा के लिए खो जाना

मेरे साथ में दो लोग और हैं
दिलदार दोस्त, जो फिर कभी नहीं मिलते
पता नहीं देर तक मुझे खोजकर वापस घर गए
या वे भी मेरी ही तरह खोए हुए हैं इसी बाजार में

मौसम का हाल यहां कुछ अलग है
दिन ढलने के साथ तपिश बढ़ रही है
गर्मी से बेहाल मैं तन पर चढ़े गर्म कपड़े उतारता हूं
और पाता हूं कि इस बीच मेरा मोबाइल कहीं गिर गया है

बौखलाया सा लोगों से अपना फोन खोजने को कहता हूं
जैसे मेरी सारी मुश्किलें इसी से हल हो जाएंगी

यह एक छोटा सा बाजार है
संझवाती के लिए यहां सिर्फ लैंप और लालटेनें हैं
टुटपुंजिए दुकानदार रात उतरने के साथ अपनी दुकानें बढ़ा रहे हैं
उनमें से कुछेक भले लोग अपने मोबाइल मेरी तरफ बढ़ाते हैं
कि परेशानी की कोई बात नहीं, आप इससे फोन कर लीजिए

इस बीच कई सारे फोन मैंने सड़क पर खोज डाले हैं
छोटे-बड़े अलग-अलग रंगों वाले चमकीले फोन
एक भी लेकिन इनमें मेरा नहीं है
नहीं है तो क्या- ये फोन मैं किसी को देने वाला नहीं
हालांकि दुकानदारों की पेशकश बेहिचक स्वीकार कर लेता हूं

मुश्किल सिर्फ एक है कि मेरे पास कोई नंबर नहीं है
लाख कोशिशों के बाद भी गिनतियों का ऐसा कोई क्रम याद नहीं आता
जिसपर कॉल करके किसी को अपना पता बता सकूं

लोग पूछते हैं आप कहां से आए हैं
जाना कहां है, इधर गए ही कहां थे आखिर
मेरे पास एक भी सवाल का कोई पक्का जवाब नहीं है

घर के नाम पर कुछ धुंधले ठिकाने याद आते हैं
इत्मीनान से बता सकूं, ऐसा कुछ भी नहीं

लोगों में संदेह जगाने के लिए इतना काफी है
उनके तितर-बितर होने के साथ ही समझ जाता हूं
कि यह मेरा तीसरी बार खोना है

क्या पहले दो मौकों की तरह इस बार भी मुझे खोज लिया जाएगा?
लेकिन अब तो मैं बच्चा भी नहीं हूं
कौन इस वीराने में मुझे खोजने की जहमत उठाएगा

अछोर रेगिस्तान में खुलती हुई रात
आंखों में चुभते चमकते हुए तारे
रेत में खोते धुंधले रास्तों से भरी
कुछ जलने की सी गंध लिए
एक अनपहचानी दुनिया है मेरे सामने

यहां जाना कहां है मुझे नहीं पता
और बताने वाला कोई नहीं है