पांच-छह साल पहले अचानक ऐसा हुआ कि हिंदी की सबसे अच्छी चीजें ब्लॉग पर ही पढ़ने को मिलने लगीं। कंटेंट और भाषा, दोनों स्तरों पर इतनी ताजगी कि जादू सिर चढ़ कर बोलता था। उन्हीं दिनों देखादेखी मैं भी लिखने वालों में शामिल हुआ। बिल्कुल स्पॉन्टेनियस ढंग से कुछ चीजें लिखीं और इसमें भी उतना ही मजा आया, जितना पढ़ने में आता था। फिर कुछ नौकरी-चाकरी के, कुछ पारिवारिक और कुछ शारीरिक झंझट शुरू हुए और मेरा ब्लॉग लिखना कम होते-होते बंद ही हो गया। लेकिन याद पड़ता है कि इससे पहले ब्लॉग पढ़ना बंद हुआ था, क्योंकि यहां नई चीजें लाने की मेहनत कम और व्यर्थ का, छूंछा वितंडा ज्यादा दिखने लगा था।
एक राय यह है कि ऐसा ब्लॉग के कमर्शियल स्पेस बनने की वजह से हुआ। वितंडा खड़ा करने पर ज्यादा हिट्स मिलते थे और ऐड इनकम बढ़ जाती थी। ऐसा कुछ मित्रों ने पूछने पर बताया- इसे साबित करने के लिए कोई प्रमाण मेरे पास नहीं है। एक वैकल्पिक वजह यह भी हो सकती है कि अच्छे ब्लॉगरों का कंटेंट कम पड़ने लगा हो और उनका लिखने का सारा मजा ही जाता रहा हो। जो भी हो, खराब सिक्के ने आम दुनिया की तरह हिंदी के ब्लॉगिंग स्पेस में भी अच्छे सिक्के को चलन से बाहर कर दिया और फिर खुद भी कबाड़ में चला गया।
पिछले साल के मध्य में थोड़ा-बहुत सोशल साइटें देखने की फुरसत और हिम्मत मिली तो दिखा कि खेल का मैदान बदल चुका है। जिन भी ब्लॉगरों के लिंक मेरे पास थे, उनपर नई चीजें बहुत ही कम आ रही थीं। उन्हें फिर से पढ़ पाने की चाहत में फेसबुक पर गया, जहां उनकी सक्रियता की खबरें मिल रही थीं। टेक्नोसैवी मैं हूं नहीं, लिहाजा देख पाने की सीमा है, लेकिन पता नहीं क्यों फेसबुक के साथ मेरी रसाई बिल्कुल ही नहीं हो पाई है।
ब्लॉग से फेसबुक की तरफ ऐसा टेक्टॉनिक शिफ्ट अंग्रेजी में नहीं है। वहां ट्विटर और फेसबुक जैसी चीजों का जो रोल है सो है, लेकिन अच्छे ब्लॉग भी लिखे जा रहे हैं। हालत यह है कि लगभग सभी नामी अखबार और पत्रिकाएं अपने ऑनलाइन एडिशन में चर्चित लेखकों को ब्लॉगर की शक्ल में ही पेश कर रही हैं- हालांकि जेनुइन ब्लॉग कंटेंट के आसपास भी ये नहीं पहुंचते। जानना चाहता हूं कि क्या हिंदी ब्लॉगिंग अब खत्म हो चुकी है। अगर हां तो ऐसा क्यों हुआ। और नहीं तो इसे पहले की ही तरह, बल्कि उससे भी ज्यादा जीवंत बनाने के लिए क्या किया जा सकता है।
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Friday, March 15, 2013
Monday, January 28, 2008
यह जुड़ना भी क्या जुड़ना
क्या तुलसीदास, प्रेमचंद या महादेवी वर्मा आपकी रिश्तेदारी में आते हैं? चलिए, कौन जाने आते ही हों। लेकिन क्या विलियम शेक्सपीयर, चार्ल्स डिकेंस, एमिली ग्रांट या फिर जेम्स हैडली चेज, इब्ने सफी बीए और गुलशन नंदा के घर-परिवार में भी कभी आपका आना-जाना रहा है? अगर नहीं, तो ये सारे लोग या इनमें से कुछ आपको अपने सगे या फिर चचेरे-ममेरे-मौसेरे-फुफेरे भाई-बहन की तुलना में अपने दिल के ज्यादा करीब क्यों लगते हैं?
क्या किसी से लगाव होने के लिए उससे नजदीकी जान-पहचान या रिश्तेदारी होना जरूरी है? उलटकर पूछें तो यह सवाल कुछ इस तरह बनेगा कि क्या किसी भी तरह की जैविक या सामाजिक नजदीकी आपके लिए किसी रचना या रचनाकार के साथ उच्चतर लगाव बनने में बाधक हो जाती है?
गैब्रिएल गार्सिया मार्खेज ने 'वन हंड्रेड ईयर्स ऑफ सॉलीच्यूड' पर फिल्म बनाने की इजाजत हॉलीवुड के सबसे नामी निर्माता-निर्देशकों को भी आखिरकार नहीं ही दी। अब से पंद्रह साल पहले तीन करोड़ डॉलर तक की पेशकश किए जाने के बावजूद। वजह पूछने पर बताया कि वे चाहते हैं, उनके हर पाठक को इस किताब का हर पात्र अपने घर के किसी सदस्य जैसा लगे, ऐंजेलिना जोली या ब्रैड पिट जैसा नहीं। जो जितना ठोस दिखता है, उतना ही दूर चला जाता है- कहां यह सोच, और कहां खोज-खाजकर रिश्तेदारी जोड़ने, परिचय निकाल लाने की अपनी समझ, जिसके जरिए हम हर रचे हुए और रचने वाले को अपनी ही छोटी-सी तराजू में तौलकर उसे दो कौड़ी का बना डालते हैं।
यह हमारी कोई निजी या ठेठ भारतीय किस्म की समस्या है, यह मानने के लिए मैं तैयार नहीं हूं।, जैविक या सामाजिक जुड़ाव से इतर लगाव के कुछ अलग मायने भी होते हैं- इसे सहज रूप में स्वीकारने के लिए शायद कोई भी तैयार नहीं होता। इस काम में संस्कृति हमारी मदद करती है, माहौल मदद करता है, आलोचक मदद करते हैं। लेकिन लिखित अक्षरों के जरिए, पर्दे पर या कैनवस पर उकेरी गई छवियों के जरिए, यहां तक कि सुनी गई ध्वनियों के जरिए भी जो नए तरह के लगाव बनते हैं, वे आपको उस चीज के करीब पहुंचाते हैं, जो आप हो सकते हैं, या शायद हो सकते थे।
यूरोपीय समाजों ने अपने नवजागरण के दौर में इस नए तरह के लगाव के मायने समझे। साथ ही यह भी जाना कि अपने परिवेश से एक हद तक अलगाव बनाए बगैर उसके साथ इस तरह का लगाव हासिल नहीं किया जा सकता। कौन जाने भारतीय समाज में भी यह बात कभी समझी गई हो, और फिर भूलते-भूलते पूरी तरह भुला ही दी गई हो। समस्या यह है कि यह समस्या दिनोंदिन घटने के बजाय बढ़ती जा रही है।
तुलसी को अपने जीवनकाल में जमाने भर की लातें खानी पड़ीं। फिर पहलवानों की संगत और हनुमानगढ़ियों की स्थापना उनके काम आई। 'बारे ते ललात बिललात द्वार-द्वार दीन, चाहत हौं चारि फल चारि ही चनक को' वाली नियति से निकलकर ठेठ बुढ़ापे में अपने रचनाकर्म का थोड़ा-बहुत यश उन्हें मिल ही गया। लेकिन आधुनिक युग में कमोबेश तुलसी के ही कैंड़े के कवि निराला और मुक्तिबोध तो इतने भी भाग्यशाली नहीं रहे।
मरने से पहले तक निराला पढ़े-लिखे हिंदी समाज के लिए एक 'अधपगले बाभन' बने रहे, जिसने 'ये कान्यकुब्ज कुल-कुलांगार, खाकर पत्तल में करें छेद' जैसी 'पगलेटपन भरी' बातें लिख डालीं, और मुक्तिबोध लगातार बीड़ी पीते रहने वाले एक सटके हुए बकबकिया, जिससे कोई बात शुरू करने के बाद उसे किसी खंभे के किनारे खड़ा करके चुपचाप सटक लो तो भी पूरी रात आपसे बतियाता ही रहे। (इनमें से एक बात मैंने लिखित रूप में पढ़ी है और दूसरी एक विद्वान के मुंह से सुनी है।) आश्चर्य नहीं कि बड़ी बुरी मौत इन दोनों कवियों के हिस्से आई। इलाहाबाद में रहते हुए महादेवी वर्मा और रघुपति सहाय 'फिराक' जैसे जीनियसों के बारे में सुनी गई कुत्सित बातें यहां दोहराने का कोई औचित्य नहीं है।
हमारे समाज में परिचय का अर्थ अभी बिल्कुल इकहरा है। इस बात का एहसास पूरी शिद्दत से होने में शायद हमें सौ-दो सौ साल और लगें कि किसी से रचनात्मक लगाव के कुछ अलग ही मायने होते हैं और इसके बनने में परिचय अक्सर मददगार होने के बजाय दीवार बन जाता है।
औरों की क्या कहूं, मैं खुद अपनी इस दुष्प्रवृत्ति का भुक्तभोगी हूं। अपनी मित्र और पत्नी इंदिरा राठौर की कविताओं से मैं खुद को एकबारगी कभी नहीं जोड़ पाया। हमेशा किसी और से चर्चा सुनकर, उनके बारे में कहीं लिखा देखकर दूसरी, तीसरी बार उन्हें पढ़ने की जरूरत पड़ी- और इनमें से हर दो बार के बीच कई-कई साल का फासला रहा। लोग-बाग उनकी कविताएं खूब पसंद करते थे लेकिन मुझे लगता था कि ऐसा वे उनसे परिचित होने या सिर्फ उनके लड़की होने के चलते कर रहे हैं। मेरे इस इनडिफरेंट नजरिए के चलते एक बहुत बड़ा नुकसान हो गया। इंदु का कविताएं लिखना कम होते-होते लगभग बंद ही हो गया- जिसका पूरा नहीं तो कुछ न कुछ दोष मुझपर भी आता है।
सार्वजनिक दायरे में ही नहीं, निजी दायरे में भी सचेत ढंग से लगाव और अलगाव बनाना, इन दोनों के बीच एक अपने ही ढंग का संतुलन साधना हमें कभी न कभी तो सीखना ही होगा। इसके बगैर अपने लोगों से रचनात्मक जुड़ाव हमारा कभी नहीं बनेगा। जीतेजी बेभाव की आह-वाह से लेकर लत्तम-जुत्तम तक का, और मरने के बाद लंबी-लंबी भावभीनी श्रद्धांजलियां ठेलने का खेल अलबत्ता इसके बगैर भी अपनी सुंदर लयात्मकता के साथ चलता रह सकता है।
क्या किसी से लगाव होने के लिए उससे नजदीकी जान-पहचान या रिश्तेदारी होना जरूरी है? उलटकर पूछें तो यह सवाल कुछ इस तरह बनेगा कि क्या किसी भी तरह की जैविक या सामाजिक नजदीकी आपके लिए किसी रचना या रचनाकार के साथ उच्चतर लगाव बनने में बाधक हो जाती है?
गैब्रिएल गार्सिया मार्खेज ने 'वन हंड्रेड ईयर्स ऑफ सॉलीच्यूड' पर फिल्म बनाने की इजाजत हॉलीवुड के सबसे नामी निर्माता-निर्देशकों को भी आखिरकार नहीं ही दी। अब से पंद्रह साल पहले तीन करोड़ डॉलर तक की पेशकश किए जाने के बावजूद। वजह पूछने पर बताया कि वे चाहते हैं, उनके हर पाठक को इस किताब का हर पात्र अपने घर के किसी सदस्य जैसा लगे, ऐंजेलिना जोली या ब्रैड पिट जैसा नहीं। जो जितना ठोस दिखता है, उतना ही दूर चला जाता है- कहां यह सोच, और कहां खोज-खाजकर रिश्तेदारी जोड़ने, परिचय निकाल लाने की अपनी समझ, जिसके जरिए हम हर रचे हुए और रचने वाले को अपनी ही छोटी-सी तराजू में तौलकर उसे दो कौड़ी का बना डालते हैं।
यह हमारी कोई निजी या ठेठ भारतीय किस्म की समस्या है, यह मानने के लिए मैं तैयार नहीं हूं।, जैविक या सामाजिक जुड़ाव से इतर लगाव के कुछ अलग मायने भी होते हैं- इसे सहज रूप में स्वीकारने के लिए शायद कोई भी तैयार नहीं होता। इस काम में संस्कृति हमारी मदद करती है, माहौल मदद करता है, आलोचक मदद करते हैं। लेकिन लिखित अक्षरों के जरिए, पर्दे पर या कैनवस पर उकेरी गई छवियों के जरिए, यहां तक कि सुनी गई ध्वनियों के जरिए भी जो नए तरह के लगाव बनते हैं, वे आपको उस चीज के करीब पहुंचाते हैं, जो आप हो सकते हैं, या शायद हो सकते थे।
यूरोपीय समाजों ने अपने नवजागरण के दौर में इस नए तरह के लगाव के मायने समझे। साथ ही यह भी जाना कि अपने परिवेश से एक हद तक अलगाव बनाए बगैर उसके साथ इस तरह का लगाव हासिल नहीं किया जा सकता। कौन जाने भारतीय समाज में भी यह बात कभी समझी गई हो, और फिर भूलते-भूलते पूरी तरह भुला ही दी गई हो। समस्या यह है कि यह समस्या दिनोंदिन घटने के बजाय बढ़ती जा रही है।
तुलसी को अपने जीवनकाल में जमाने भर की लातें खानी पड़ीं। फिर पहलवानों की संगत और हनुमानगढ़ियों की स्थापना उनके काम आई। 'बारे ते ललात बिललात द्वार-द्वार दीन, चाहत हौं चारि फल चारि ही चनक को' वाली नियति से निकलकर ठेठ बुढ़ापे में अपने रचनाकर्म का थोड़ा-बहुत यश उन्हें मिल ही गया। लेकिन आधुनिक युग में कमोबेश तुलसी के ही कैंड़े के कवि निराला और मुक्तिबोध तो इतने भी भाग्यशाली नहीं रहे।
मरने से पहले तक निराला पढ़े-लिखे हिंदी समाज के लिए एक 'अधपगले बाभन' बने रहे, जिसने 'ये कान्यकुब्ज कुल-कुलांगार, खाकर पत्तल में करें छेद' जैसी 'पगलेटपन भरी' बातें लिख डालीं, और मुक्तिबोध लगातार बीड़ी पीते रहने वाले एक सटके हुए बकबकिया, जिससे कोई बात शुरू करने के बाद उसे किसी खंभे के किनारे खड़ा करके चुपचाप सटक लो तो भी पूरी रात आपसे बतियाता ही रहे। (इनमें से एक बात मैंने लिखित रूप में पढ़ी है और दूसरी एक विद्वान के मुंह से सुनी है।) आश्चर्य नहीं कि बड़ी बुरी मौत इन दोनों कवियों के हिस्से आई। इलाहाबाद में रहते हुए महादेवी वर्मा और रघुपति सहाय 'फिराक' जैसे जीनियसों के बारे में सुनी गई कुत्सित बातें यहां दोहराने का कोई औचित्य नहीं है।
हमारे समाज में परिचय का अर्थ अभी बिल्कुल इकहरा है। इस बात का एहसास पूरी शिद्दत से होने में शायद हमें सौ-दो सौ साल और लगें कि किसी से रचनात्मक लगाव के कुछ अलग ही मायने होते हैं और इसके बनने में परिचय अक्सर मददगार होने के बजाय दीवार बन जाता है।
औरों की क्या कहूं, मैं खुद अपनी इस दुष्प्रवृत्ति का भुक्तभोगी हूं। अपनी मित्र और पत्नी इंदिरा राठौर की कविताओं से मैं खुद को एकबारगी कभी नहीं जोड़ पाया। हमेशा किसी और से चर्चा सुनकर, उनके बारे में कहीं लिखा देखकर दूसरी, तीसरी बार उन्हें पढ़ने की जरूरत पड़ी- और इनमें से हर दो बार के बीच कई-कई साल का फासला रहा। लोग-बाग उनकी कविताएं खूब पसंद करते थे लेकिन मुझे लगता था कि ऐसा वे उनसे परिचित होने या सिर्फ उनके लड़की होने के चलते कर रहे हैं। मेरे इस इनडिफरेंट नजरिए के चलते एक बहुत बड़ा नुकसान हो गया। इंदु का कविताएं लिखना कम होते-होते लगभग बंद ही हो गया- जिसका पूरा नहीं तो कुछ न कुछ दोष मुझपर भी आता है।
सार्वजनिक दायरे में ही नहीं, निजी दायरे में भी सचेत ढंग से लगाव और अलगाव बनाना, इन दोनों के बीच एक अपने ही ढंग का संतुलन साधना हमें कभी न कभी तो सीखना ही होगा। इसके बगैर अपने लोगों से रचनात्मक जुड़ाव हमारा कभी नहीं बनेगा। जीतेजी बेभाव की आह-वाह से लेकर लत्तम-जुत्तम तक का, और मरने के बाद लंबी-लंबी भावभीनी श्रद्धांजलियां ठेलने का खेल अलबत्ता इसके बगैर भी अपनी सुंदर लयात्मकता के साथ चलता रह सकता है।
Monday, January 14, 2008
जिजीविषा और मौत की चाह
विल ड्यूरां की 'स्टोरी ऑफ फिलॉस्फी' में अर्से पहले पढ़ी गई परिचयात्मक टिप्पणी को छोड़ दें तो दावे के साथ कह सकता हूं कि मैंने बर्गसां पर, या उसका लिखा कुछ नहीं पढ़ा। कुछ समय पहले इलाहाबाद में अपने मित्र प्रणय कृष्ण की अज्ञेय पर की गई रिसर्च पढ़ते हुए पहली बार मुझे पता चला कि बर्गसां मनुष्य की बुनियादी प्रेरणाओं में जीने की इच्छा के समानांतर मरने की चाह को भी रेखांकित करते हैं। प्रणय ने अज्ञेय की कविताओं पर किए गए अपने शोध में साबित किया है कि उनके यहां ये दोनों प्रेरणाएं बर्गसाईं शक्ल में लगभग ज्यों की त्यों मौजूद हैं। दुर्भाग्यवश अज्ञेय का भी मैंने सिर्फ गद्य-गद्य पढ़ा है, वह भी ज्यादा नहीं। लिहाजा मौत की चाह नाम की इस अजीबोगरीब चीज को बुद्धि या संवेदना के धरातल पर समझने का मौका मुझे बिल्कुल ही नहीं मिला।
अभी तक मैं मृत्युभय को जिजीविषा के ही एक लगभग समानार्थी शब्द के रूप में समझता आया हूं, हालांकि आम धारणा इन्हें विलोम शब्दों के रूप में देखने की रही है। जिजीविषा का विलोम मरणेच्छा जैसी कोई चीज भी हो सकती है, यह बात अबतक मेरी समझ से परे है।
प्रणय ने अज्ञेय की जिन कविताओं को दृष्टांत के रूप में बरता है वे अंग्रेजी के तीनों बड़े रोमांटिक कवियों शेली, बाइरन और कीट्स की छाया लिए हुए लगती हैं, जिनमें 'ओ वर्ल्ड, ओ लाइफ, ओ टाइम- ऑन हूज लास्ट स्टेप्स आई क्लाइंब' जैसी पंक्तियों में मृत्यु को नजदीक से निहारते कवि जब ऊंचाई पर होते हैं तो यह कहते हुए से लगते हैं कि जीवन से जुड़ी चीजों का डर दिखाकर तुम उन्हें झुका नहीं सकते, और जब नीचाई पर होते हैं तो अपनी प्रेमिका या स्नेही जनों को मर जाने का भय दिखाकर खामखा डराते हुए से नजर आते हैं।
संसार की विभिन्न भाषाओं में उनसे प्रेरणा लेने वालों, या यूं कहें कि उनके नक्कालों में उनकी ऊंचाई के दर्शन नहीं होते, अलबत्ता उनकी नीचाई कभी-कभी बड़ी कमीनी शक्लों में दिखाई दे जाती है।
लेकिन रूमानियत की व्याख्या क्या मरणेच्छा जैसे किसी बौद्धिक उपकरण के जरिए भी की जा सकती है? या रूमानियत को छोड़ ही दें। अमेरिकी दार्शनिक हेनरी बर्गसां अंग्रेजी के रूमानी युग के ठीक सौ साल बाद अपने उरूज पर पहुंचते हैं, जब प्रथम विश्वयुद्ध की हताशा दुनिया भर के जहीन लोगों को परेशान किए हुए थी। यह अस्तित्वगत हताशा का दौर था, जिसकी तात्विक अभिव्यक्ति इलियट की 'वेस्टलैंड' में हुई थी। लेकिन इसकी मूल प्रेरणा भी अबतक मैं एक झटके में इतनी अकाल मौतें देख चुकने के बाद पैदा हुए जीवन के व्यर्थताबोध को मानता आया हूं। यह मरणेच्छा नाम की चीज फिर भी काव्यात्मक प्रेरणा के रूप में मेरी समझ से बाहर ही रह जाती है।
अपनी समझ में मैं जिजीविषा जितना ही वजन मृत्युभय को भी देता हूं, हालांकि एक बांग्ला गीत का हिंदी अनुवाद- 'मृत्युभय को जीतकर, तूफानों से टकराकर, बढ़ते चले हैं- कामरे...ड ' मेरे सबसे प्रिय गीतों में एक रहा है। मेरे लेखे मौत से डरना कायरता नहीं है। कायर लोग मौत से नहीं, जीवन से डरते हैं। लेकिन मौत की चाह रखने वाले लोगों की तो कोई शक्ल ही मेरे सामने नहीं बनती- यह कैसी प्रेरणा होती है? 'मरणेच्छा' मुझे निरर्थक शब्द जैसी तो नहीं लगती, लेकिन जिन लोगों में यह होती होगी, वे कैसे होते होंगे?
अभी तक मैं मृत्युभय को जिजीविषा के ही एक लगभग समानार्थी शब्द के रूप में समझता आया हूं, हालांकि आम धारणा इन्हें विलोम शब्दों के रूप में देखने की रही है। जिजीविषा का विलोम मरणेच्छा जैसी कोई चीज भी हो सकती है, यह बात अबतक मेरी समझ से परे है।
प्रणय ने अज्ञेय की जिन कविताओं को दृष्टांत के रूप में बरता है वे अंग्रेजी के तीनों बड़े रोमांटिक कवियों शेली, बाइरन और कीट्स की छाया लिए हुए लगती हैं, जिनमें 'ओ वर्ल्ड, ओ लाइफ, ओ टाइम- ऑन हूज लास्ट स्टेप्स आई क्लाइंब' जैसी पंक्तियों में मृत्यु को नजदीक से निहारते कवि जब ऊंचाई पर होते हैं तो यह कहते हुए से लगते हैं कि जीवन से जुड़ी चीजों का डर दिखाकर तुम उन्हें झुका नहीं सकते, और जब नीचाई पर होते हैं तो अपनी प्रेमिका या स्नेही जनों को मर जाने का भय दिखाकर खामखा डराते हुए से नजर आते हैं।
संसार की विभिन्न भाषाओं में उनसे प्रेरणा लेने वालों, या यूं कहें कि उनके नक्कालों में उनकी ऊंचाई के दर्शन नहीं होते, अलबत्ता उनकी नीचाई कभी-कभी बड़ी कमीनी शक्लों में दिखाई दे जाती है।
लेकिन रूमानियत की व्याख्या क्या मरणेच्छा जैसे किसी बौद्धिक उपकरण के जरिए भी की जा सकती है? या रूमानियत को छोड़ ही दें। अमेरिकी दार्शनिक हेनरी बर्गसां अंग्रेजी के रूमानी युग के ठीक सौ साल बाद अपने उरूज पर पहुंचते हैं, जब प्रथम विश्वयुद्ध की हताशा दुनिया भर के जहीन लोगों को परेशान किए हुए थी। यह अस्तित्वगत हताशा का दौर था, जिसकी तात्विक अभिव्यक्ति इलियट की 'वेस्टलैंड' में हुई थी। लेकिन इसकी मूल प्रेरणा भी अबतक मैं एक झटके में इतनी अकाल मौतें देख चुकने के बाद पैदा हुए जीवन के व्यर्थताबोध को मानता आया हूं। यह मरणेच्छा नाम की चीज फिर भी काव्यात्मक प्रेरणा के रूप में मेरी समझ से बाहर ही रह जाती है।
अपनी समझ में मैं जिजीविषा जितना ही वजन मृत्युभय को भी देता हूं, हालांकि एक बांग्ला गीत का हिंदी अनुवाद- 'मृत्युभय को जीतकर, तूफानों से टकराकर, बढ़ते चले हैं- कामरे...ड ' मेरे सबसे प्रिय गीतों में एक रहा है। मेरे लेखे मौत से डरना कायरता नहीं है। कायर लोग मौत से नहीं, जीवन से डरते हैं। लेकिन मौत की चाह रखने वाले लोगों की तो कोई शक्ल ही मेरे सामने नहीं बनती- यह कैसी प्रेरणा होती है? 'मरणेच्छा' मुझे निरर्थक शब्द जैसी तो नहीं लगती, लेकिन जिन लोगों में यह होती होगी, वे कैसे होते होंगे?
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