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Thursday, January 15, 2015

ट्रेन से उतरे, डर साथ लाए

इस ठंड में सुबह पांच बजे कॉलबेल की कर्कश आवाज से नींद खुलना किसी के लिए भी अच्छी बात नहीं हो सकती। थोड़ी झल्लाहट स्वाभाविक थी। पता चला, ऊपर वाले पड़ोसी किसी विपदा में पधारे हैं। बेटा-बहू और नन्हा सा पोता लखनऊ से आ रहे थे। रास्ते में किसी से झगड़ा हो गया। उसने गाजियाबाद स्टेशन पर देख लेने की धमकी दी है। कई जगह फोन करके बंदे भी बुला रखे हैं। यूपी के एक धकियल मंत्री को फोन करने की बात भी कर रहा था। अकेले जाने में डर लग रहा है, अगर साथ में चल सकें तो....

जैसे-तैसे तैयार हुआ। गाड़ी  कितने बजे पहुंचेगी गाजियाबाद? पूछा तो कई सारे फोन और एसएमएस कर डाले। फिर बोले, उठा नहीं रहे हैं अभी लेकिन शिड्यूल साढ़े छह और सात बजे के बीच का है। कैसे चलना है, तो ऑटो देखते हैं। इतनी सुबह ऑटो शायद ही मिले। फिर कोशिश करके एक ड्राइवर अरेंज हुआ और खुदा-खुदा करके दोनों लोग गाजियाबाद स्टेशन पहुंचे। रास्ते में मेरे पड़ोसी भारतवर्ष में मुसलमानों की बढ़ती आबादी को लेकर चिंता व्यक्त करते रहे। यह भी कहा कि हिंदू बेचारे अपनी आबादी कैसे बढ़ाएं, इतनी व्यवस्था ही नहीं रह गई है अब। जबकि इन्हें तो अल्पसंख्यक होने के इतने सारे फायदे मिल जाते हैं।

मुझे लगा, साक्षी महाराज और साध्वी प्राची जैसे आध्यात्मिक व्यक्तित्वों की बात को देश में काफी गंभीरता से लिया जा रहा है। हमारे सीधे, सौम्य पड़ोसी का इसमें कोई दोष नहीं है। लेकिन गाजियाबाद स्टेशन के प्लेटफार्म पर पहुंच जाने के बाद पता चला कि जिस व्यक्ति से उनके बेटे का झगड़ा हुआ है, वह मुसलमान है। यानी मुसलमानों की बढ़ती आबादी पर इनकी चिंता तात्कालिक है, इसका कोई गहरा वैचारिक संदर्भ नहीं है।

जिसकी किस्मत खराब हो, वही सुबह-सुबह गाजियाबाद रेलवे स्टेशन जाए। पटरियों के करीब पहुंचते ही बदबू का इतना भयानक भभका आया कि लगा, गलती से किसी विशाल शौचालय में घुस गए हों। स्टेशन करीब आते ही लोगों में निवृत्त होने का उत्साह कुछ ज्यादा ही जाग उठता है क्या? एक के बाद एक, सारी पटरियां मल-मूत्र से तर-ब-तर। और यह हाल तब है जब रेलवे स्टेशनों की हालत सुधारने, उन्हें इंटरनेशनल स्तर का बनाने की बात इतने मंचों से, इतने ऊंचे स्वरों में कही जा रही है।

एक बार फिर तसल्ली करनी चाही कि गाड़ी कितने बजे आएगी। पड़ोसी ने फिर कई सारे नंबर डायल किए, एसएमएस मारे और अपने बेटे-बहू को गालियां दीं कि ये कभी अपने फोन की बैटरी चार्ज नहीं रखते। करीब आधे घंटे बाद पता चला कि गाड़ी अभी हापुड़ में है और रुकी हुई है। उन्होंने बड़ी चिंता के साथ पूछा कि रास्ते में उस बंदे ने कुछ किया तो नहीं। बेटे का जवाब नहीं में आया तो वे कुछ आश्वस्त हुए। मुझे लगा कि चिंतित होने का समय मेरे लिए आ रहा है। लेट होती हुई गाड़ी अगर नौ-दस बजे आई तो आज मेरा दफ्तर गया।

बताने-समझाने को कुछ था नहीं, लेकिन मैंने यूं ही उनसे कहा कि डराने वाला खुद डरा हुआ हो, ऐसा भी तो हो सकता है। वैसे, वह अकेला है या साथ में कुछ और लोग भी हैं? वे बोले, उसके साथ में सोलह-सत्रह साल की एक लड़की है, और यही असली चिंता की बात है। ये लोग झगड़ा तो करते ही हैं, साथ में ओछे आरोप भी लगा देते हैं कि हमारी लड़की के साथ ऐसा कर रहे थे। सरकारी नौकरी में ऐसी बातें कितनी खतरनाक हो जाती हैं, आपको शायद इसका अंदाजा भी न हो। उन्होंने बताया कि उनके कई मित्रों के साथ और एक बार तो खुद उनके ही साथ ऐसा हो चुका है। मार-झगड़ा किया और लड़की छेड़ने का आरोप लगा दिया।

यहां से मुझे समझ में आया कि शायद मेरी मौजूदगी इस तरह की संभावना को खत्म करने या काफी कम कर देने के लिए जरूरी समझी जा रही है। अखबार में काम करने वाला एक बंदा साथ में होगा तो कोई अनाप-शनाप इलजाम लगाकर यूं ही नहीं निकल जाएगा। लड़ाई-झगड़े में मेरी कोई विशेष भूमिका अब नहीं हो सकती, इस बात का पिछले तीन वर्षों में मुझे पूरा इत्मीनान हो चुका है। लेकिन अपनी नौकरी की वजह से लोगों के किसी काम आ सकता हूं, यह बात थोड़ा सुकून देने वाली थी।

बहरहाल, गाड़ी करीब साढ़े आठ बजे आ गई। जिन यात्रियों का इंतजार था, वे सही-सलामत उतर चुके थे। मैंने पूछा, जिससे झगड़ा हुआ था, वह कहां है। उन्होंने सामान उठाकर कदम बढ़ाते हुए बिना पीछे देखे जवाब दिया, वो क्या है, सीट पर सोया हुआ। ऊपर उसकी लड़की है। और वे लोग, जिन्हें इसने गाजियाबाद स्टेशन पर बुला रखा था? इस सवाल का न किसी के पास कोई जवाब था, न जवाब देने की कोई जरूरत थी।

लौटते वक्त मैने कहा, आप लोग इतने परेशान क्यों हो गए थे, ट्रेन में बैठते वक्त इस तरह के झगड़े मेरे पचासों बार हुए होंगे और उनमें सब के सब ट्रेन में ही खत्म हो गए। कुछ मामलों में तो सुबह की चाय भी झगड़ा करने वाले पक्ष से ही पी गई। पड़ोसी ने कहा कि आप नहीं जानते, यह सब सरकारी मामला है न। जरूर वह बंदा यूपी गवर्नमेंट का कोई मुसलमान अफसर होगा, आजम खां से कहकर कोई भी तिकड़म करवा देगा। फिर बेटे से पूछा, ‘कहीं ऐसा तो नहीं कि उसने चार्ट में तुम्हारा नाम देखकर तुम्हारी रिजर्वेशन डिटेल्स निकलवा ली हो?’  

Saturday, January 3, 2015

बछड़ा

आज सुबह आते-जाते दो-तीन बार उस पर नजर पड़ी। बुरी तरह भीगा हुआ था और जुगाली भी नहीं कर रहा था। इस घनघोर जाड़े की बरसात में पूरी रात ठरते हुए सीमेंट पर गुजार देना कहीं उसकी छोटी सी मासूम जिंदगी के लिए ज्यादा साबित न हो। हर बार यही सोचकर उधर गया कि शायद उस जानलेवा जगह से वह उठ गया हो और टहल-घूम कर थोड़ी गर्माहट अपने बदन में पैदा कर ली हो।

बमुश्किल आठ-नौ महीने का यह बछड़ा हर रोज मुझे एक अजब तकलीफ से भर देता है। कोई ऐसी चीज, जो सिर्फ उसकी नहीं, थोड़ी-बहुत मेरी भी है। कभी-कभी सोचता हूं, यह कठिन जीवन उसकी आजादी की जरूरी शर्त है। देर रात में तारों से गुंछे हुए आसमान और जमीन के बीच, जब तुम्हारा साथ देने के लिए हवा भी मौजूद न हो, जहां तक जी करे अकेले बिचरना...

इस एंगल से सोचने पर चीजें थोड़ी आसान हो जाती हैं।

करीब दो महीने पहले वह हमें दिखा था। तीखे मोड़ पर चीं-चूं करके ब्रेक लेती पगलाई गाड़ियों से सूत भर की दूरी से बचता, जमीन पर पड़ा हुआ राख जैसे रंग वाला एक छोटा सा गदबदा ढेर। यह तो गाय का बच्चा है, यहां कैसे आ गया? लगता है, बीमार है। क्या थोड़ी देर में कोई इसे खोजता हुआ आएगा?

कोई नहीं आया। न उस दिन, न तब से अब तक गुजरे पचास-पचपन दिनों मे से किसी भी एक दिन। दिल्ली और आसपास के इलाकों में गाय-भैंसों के नर बच्चे अब बोझ समझे जाते हैं। मौका मिलते ही लोग उनसे पिंड छुड़ाना चाहते हैं। ऐसा सुना था, लेकिन अपनी आंखों देखने का पहला मौका था।

मुझे याद आया, लगातार तीन बछियों के बाद गांव में जब मेरी गाय ने बछड़ा दिया था तो देखने आए सभी लोगों को गुड़ की भेलियां बंटी थीं। बड़ों को चार-चार, बच्चों को दो-दो। लेकिन यहां तो यह बड़ा होकर न खेत जोतेगा, न बैलगाड़ी में जुतेगा। और तो और, उपले पाथने के लिए भी जगह नहीं बची कि गोबर ही काम आ जाए। फिर बछड़ा आखिर कितना भी क्यूट क्यों न हो... किसके लिए, किस काम का?

सिर्फ छह महीने का होने पर मां का दूध छुड़ाकर इसे घर से निकाल दिया! सोचा होगा, बेकार के जानवर पर दोनों टाइम एक पाव भी दूध क्यों बर्बाद करें। रोजाना पचीस-तीस रुपये की बात है, कोई मुफ्त का खेला नहीं है कि साल-दो साल दयालुता दिखाते फिरें।

एक दिन भूखा-प्यासा गुजार लेने के बाद बछड़े को थोड़ी दुनियादारी समझ में आई। रात में किसी वक्त गाड़ियों की हड़हड़ कम होने के बाद वह हिलता-कांपता उठा और दो सोसाइटियों के बीच एक कोने जैसी नो मैंस लैंड में अपना डेरा जमा लिया। सोसाइटी वालों के लिए तो वह न्यूसेंस ही था, लेकिन सोसाइटियों के गार्ड, जो खुद भी किसान का बेटा होने का दंड भुगत रहे थे, ठरती हुई रात में उसके प्रति करुणा से भर उठे।

तब से अब तक उसे रोज ही कुछ न कुछ मिल जाता है। कभी कोई मटर के छिलके डाल जाता है, कभी रोटी खिला जाता है, कभी ओस में उसे कांपता हुआ देख फटा-पुराना बोरा ओढ़ा जाता है। रात में ट्रैफिक धीमा पड़ने के बाद एक-दो बार बछड़ा चौराहे तक या उससे थोड़ा आगे गश्त पर निकलता है। कहीं कुछ खाने को मिल जाए तो ठीक, वरना मुफ्त की सैर हो जाती है।

इस बीच  पहरेदार तापने के लिए आग जलाते हैं तो दूर से इतनी तेज दौड़ा हुआ आता है कि तापनहारों को उठकर भागना पड़ता है। आग पर आधा हक उसका, बाकी में सब। छोटा सा है, लेकिन उसके शरीर में आजादी का बल है। एक दिन उसे कुछ खिलाते हुए मैं थोड़ा आगे की तरफ बढ़ा, ताकि व्यस्त रास्ते से उसको दूर ले जा सकूं। इतनी बुरी तरह झपट कर चला कि लगा, मेरा टूटा हाथ एक बार फिर टूट जाएगा।

लेकिन पता नहीं क्यों, मौसम और गाड़ियों की बेरहमी देखकर हर तीसरे-चौथे दिन लगता है कि आज बछड़ा नहीं बचेगा। वह एक आजाद जानवर है। एक मायने में पहले से भी ज्यादा कि किसान जीवन की तरह अब उसे बधिया करके बैल नहीं बनाया जाएगा।

पर, पूस की ठंड में चौबीस घंटे बरसता मेह निचंट खुले में खड़े या बैठे  इस आठ-नौ महीने उम्र वाले सुंदर जानवर की जीवनी शक्ति का एक कतरा भी क्या उसके पास छोड़ेगा?

फर्श, छत और चार दीवारों की सुविधा से वंचित बेघर आदम जात की तरफ से मैं उसके लिए शुभकामना संदेश भेजता हूं। इस इच्छा के साथ कि यह धरती सबकी है और इसके हर सर्द-गर्म में सबका साझा होना चाहिए।  

Tuesday, July 14, 2009

सूखे में बारिश का इंतजार

पिछले पंद्रह दिनों से यही हाल है। कभी सुबह से ही ऐसा माहौल बनता है जैसे अभी जम कर बारिश हो जाएगी। लेकिन थोड़ी ही देर में बादल साफ हो जाते हैं या धुंधले पड़ जाते हैं। कभी शाम को बिजलियां कड़कती हैं लेकिन सारा किस्सा कहीं दूर का मालूम पड़ता है। हवा में लगातार इतनी उमस बनी रहती है कि घर में रहते दम घुटता है। पंखे के नीचे लेटिए तो शरीर में जितनी दूर हवा लगती है उतनी ही दूर राहत रहती है। उसके ठीक बगल में ही या नीचे जबर्दस्त पसीने से बिस्तर भीग रहा होता है। अब उम्मीद धीरे-धीरे जा रही है। लगता नहीं कि इस साल इतनी बारिश हो पाएगी कि धरती की तपन कम हो सके। सबसे बुरी बात है कि ऐसा मौसम न सिर्फ रचनात्मकता के लिए, बल्कि पूरे मानसिक स्वास्थ्य के लिए ही खतरनाक है।

मुझे उत्तर भारत में सूखे के दो हालिया सालों की याद है। कुछ घटनाएं इनसे जुड़ी हुई हैं, जिनका मौसम संभवतः जून-जुलाई का ही है। ये साल हैं 1995 और 2001 के। इन सालों की घटनाएं याद करके मुझे लगता है कि निर्मल वर्मा की कहानी सूखा की तरह बाहर का सूखा अक्सर लोगों के मन और उनकी अंतश्चेतना में और भी गहरा सूखा बनकर उतर आता है। 1995 में दिल्ली के कांग्रेसी नेता सुशील शर्मा का नयना साहनी तंदूर कांड और लखनऊ में मायावती का बीजेपी से समर्थन लेकर मुख्यमंत्री बनना लगभग आसपास की ही घटनाएं हैं। मुझे इन घटनाओं की याद एक खास तरह की न्यूरोसिस (मनोरोग) को लेकर है जिसने मुझे उस दौर में कोई महीना भर परेशान किया।

ऐसा कैसे हो सकता है कि कोई अपनी पत्नी के टुकड़े करके उसे तंदूर में भून दे और ऐसा कैसे हो सकता है कि मनुवाद को गालियां देते-देते कोई दलित धारा सबसे प्रखर मनुवादी पार्टी का हाथ थाम ले। पता नहीं कैसे उस दौर में मेरे लिए ये राजनीतिक घटनाएं आपस में जुड़ गईं और बाहरी न रह कर मेरे भीतर चली गईं। मैं हंसना भूल गया और बहुत ज्यादा चिड़चिड़ा हो गया। दोस्तों से मेरे झगड़े होने लगे और लिखना-पढ़ना सब कसैला हो गया। भौतिक इलाज के रूप में मेरा काम हफ्ते भर मशीन पर आंखों की कसरत और सुबह टहलने-घूमने की दिनचर्या दुरुस्त करके चल गया। लेकिन वह मेरी शादी के तीन-चार महीने बाद का समय था और संयोगवश उस समय की अपनी जो एक-दो तस्वीरें मेरे पास बची हुई हैं उन्हें देखकर मैं आज भी अपनी समस्या को याद कर सकता हूं।

कुछ ऐसा ही हाल सन 2001 में देखने को मिला था काला बंदर या मुंहनोचवा के रूप में। इन घटनाओं के पीछे शरारत चाहे जिसकी भी रही हो और नए-नए आए खबरिया चैनलों ने नमक-मिर्च लगाकर इसमें चाहे जितना भी योगदान किया हो लेकिन लगातार गर्मी और सुखाड़ से उपजी सामूहिक न्यूरोसिस का दखल इसमें बिल्कुल साफ नजर आता था। बाहरी दुनिया के समानांतर भीतरी दुनिया में भी तापमान और दबाव की एक ऐसी स्थिति, जब अफवाहें लोगों के सिर ज्यादा आसानी से चढ़ जाती हैं और दिमागी दशा सहज तर्क से कहीं ज्यादा भगदड़ के अनुरूप हो जाती है।

जैसे-जैसे बारिश का इंतजार तेज हो रहा है, माहौल में गर्मी और उमस बढ़ रही है, मुझे व्यक्तिगत और सामूहिक न्यूरोसिस का डर सता रहा है। ऐसे में कौन काला बंदर, कौन मुंहनोचवा कहां से उभर आएगा, कोई ठिकाना नहीं। मुझे लगता है कि ब्लॉग जैसी निरापद जगहें भी उसके उभरने के लिए काफी मुफीद हो सकती हैं। ऐसे माहौल में भीड़ और भीड़ की मानसिकता से दूर रहना चाहिए और जहां तक हो सके, खुद को हल्का रखने की कोशिश करनी चाहिए। वैसे बाहर का सूखा भीतर न आए, यह एक ज्यादा गहरी समस्या है और इसका कोई बहुत आसान रास्ता तो हो ही नहीं सकता।

Wednesday, June 24, 2009

मेरे नाम से भेजो

जिंदगी में आज पहली बार कोई मनीऑर्डर भेजा। अपने घर नहीं। वहां तो अब कोई रिसीव करने वाला ही नहीं है। इसकी डिलीवरी पलंगी के घर होगी। बंगाल के जलपाईगुड़ी जिले में चेनमारी टी गार्डेन की फागू लाइन में। पलंगी एक मेड एजेंसी के जरिए हमारे घर में डोमेस्टिक हेल्प के रूप में आई है। उसके पति एक चाय बागान में काम करते हैं और कुछ दिन पहले तक सीपीएम के ट्रेड यूनियन कार्यकर्ता भी थे। सोलह-सत्रह साल की उसकी एक बेटी है जो आठवीं में पढ़ती है। पलंगी की योजना बेटी को ऊपर तक पढ़ाने और नौकरी कराने की है।

उसी के लिए एक मोबाइल खरीदने को तीन हजार रुपये पलंगी ने घर भिजवाए हैं- अपनी गाढ़ी कमाई का पहला मनीऑर्डर।

यह काम बहुत खर्चीला है। तीन हजार भेजने में 150 रुपये देने पड़ते हैं- पूरे पांच प्रतिशत। समझ में नहीं आता कि खुद को गरीब समर्थक बताने वाली सरकारों को इसमें कोई अन्याय क्यों नहीं नजर आता। अमीर लोग एटीएम के जरिए देश में कहीं भी पैसा निकाल सकते हैं और मुफ्त में इसे कहीं से कहीं भेजवा सकते हैं लेकिन जिसे मनीऑर्डर का ही आसरा है वह रुपये में पांच पैसे तो यहीं गंवा दे। वहां पावती के वक्त डाकिया और डाकमुंशी लेता है सो अलग।

छह-सात महीने पहले जलपाईगुड़ी से दिल्ली आई पलंगी का यह दूसरा काम है। पहला काम नोएडा में मिला था जहां मैडम जी तो बहुत अच्छी थीं लेकिन साहब और उनका लड़का दोनों बदमाश थे। एजेंसी में शिकायत करने पर वहां से हटा लिया लेकिन चार-पांच महीने के पैसे का कोई हिसाब नहीं दिया। पता नहीं बाद में भी देता है या नहीं।

मनीऑर्डर का फॉर्म भरने के बाद मैंने पलंगी से पूछा कि क्या इसे अपने नाम से भेज दूं तो उसने कहा- नहीं, मेरे नाम से भेजो। पैसा सही जगह पहुंचे, इसके अलावा इस जवाब में यह खनक भी थी कि मेरी कमाई मैं अपने घर भेज रही हूं तो यह मेरे नाम से ही जानी चाहिए न।

बहरहाल, रसीद सही जगह वापस लौट आए, इसके लिए मैंने केयर ऑफ करके अपना नाम-पता भी डाल ही दिया। महानगरों में आकर मेड का काम करने की अपनी अलग यातना है। एजेंसियों की लूटमार का अपना ही तंत्र है और जिन घरों में काम मिलता है, उनमें भी हर किसी की अलग कहानी होती है। लेकिन यहां से गई कुछ नगदी अगर गांवों और छोटे कस्बों में बच्चों की पढ़ाई-लिखाई और उनकी जिंदगी बनाने के काम आ जाए तो इसके सात खून माफ किए जा सकते हैं।

Tuesday, December 16, 2008

लेखक का समर्पण उर्फ कस्मै देवाय हविषा विधेम

लेखक का कविता संकलन आने वाला है और उसकी दुविधा यह है कि वह इसे समर्पित किसे करे। अतीत में बताया जा चुका है कि यह लेखक क्या बला है और कहानी से कविता में उसका आगमन कैसे हुआ। फिर भी यह सोच कर कि पहलू ब्लाग की दुबारा शुरुआत ही एक जमाने बाद हो रही है, लेखक का परिचय दुहराना जरूरी है। लेखक एक आर्कीटाइप लेखक है, जैसे कभी हुआ करते थे। लिखने से न उसकी रोटी निकलती है, न करियर बनाने में कोई मदद मिलती है, न समाज में इससे उसका रुतबा बढ़ता है। यह सब हो तो उसे बुरा नहीं लगेगा लेकिन लिखने में इस सब का दखल उसे पसंद नहीं है।

लेखक ने कहा, यह संकलन वह अपनी दिवंगता पत्नी को समर्पित करने जा रहा है। संकलन में तीन-चार साल पहले स्वर्गवासी हुई पत्नी की स्मृति में लिखी कई कविताएं हैं, जिनमें कुछ अच्छी और कुछ बहुत अच्छी हैं। लेकिन पत्नी के नाम समर्पण को लेकर मेरा इंस्टैंट रिएक्शन यही था कि ऐसा बिल्कुल मत कीजिए। वजह यह कि कविता की नई ऊर्जा आपमें पत्नी के बजाय कुछ दूसरी जगहों से आई है। किसी और लड़की के प्रति प्रेम को पत्नी की आड़ देना खुजली पैदा करने वाली चीज है। खास कर तब तो और भी जब पत्नी अब इस दुनिया में न हों। प्रकटतः मैंने यही कहा कि संकलन को अगर बाबाजी की पेटी बनाना है तो जरूर इसे पत्नी के नाम समर्पित करें, वरना बिना समर्पण के ही किताब जाने दें।

लेखक ने शायद मेरी बात को कुछ ज्यादा ही गंभीरता से ले लिया। किताब में समर्पण जा रहा है लेकिन उसके प्रति, जिससे खुद को जुड़ा मान कर लेखक ने हाल में कुछ जबर्दस्त कविताएं लिखी हैं, लेकिन जो कोई ठोस उम्मीद जगने से पहले ही एक प्लेटोनिक भाप में विलीन हो चुका है। जाहिर है, इस समर्पण से बवाल मचेगा और शायद इससे किताब को कुछ पब्लिसिटी भी मिलेगी। लेकिन अगर इसे सही स्पिरिट में लिया गया तो शायद हिंदी समाज में चीनी कम से आगे की कुछ बात शुरू हो। वैसे उम्मीद इसकी नहीं के बराबर है।

अपने यहां हर इन्फेचुएशन को बहन, बेटी या किसी और रिश्ते का नाम देकर ढक देने का चलन है। रचनात्मकता के सबसे बड़े स्रोत की मौत तो ठीक इसी बिंदु पर हो जाती है। यहां से बेईमानियों के तमाम किस्से शुरू होते हैं लेकिन उनका जिक्र यहां रहने ही देते हैं। ईमानदार लोगों का हाल भी खास अच्छा नहीं है। कुछ बड़े लेखक अपनी रचना में व्यक्त हुई रूमानी ऊर्जा को किसी न किसी समाजग्राह्य रिश्ते का टाट ओढ़ा देते हैं। नतीजा यह होता है कि अक्सर उनके जीवन काल में उनकी बात ही पूरी-पूरी किसी के पल्ले ही नहीं पड़ती।

शमशेर की मृत्यु के कुछ साल बाद तक हम लोग टूटी हुई बिखरी हुई और अन्य कई घोर ऐंद्रिक प्रेम कविताओं को अपनी पत्नी की याद में लिखी गई रचना मान कर उनके प्रति दास्य भक्ति के भाव से सन जाया करते थे। फिर दूधनाथ सिंह की लौट आ ओ धार ने चीजों को एक संदर्भ दिया और शमशेर को नए सिरे से पढ़ने की दृष्टि भी। लौट आ ओ धार /टूट मत ओ दर्द के पत्थर हृदय पर/ लौट आ ओ फूल की पंखुड़ी/ फिर फूल से लग जा और तुम मुझे प्रेम करो ऐसे/ जैसे हवाएं मेरे सीने को दबाती हैं- जैसी अलौकिक पंक्तियां जिस रिश्ते से उपज सकती हैं, उसे महसूस करने के लिए पाठक के पास तथ्यों का कुछ तो अवलंब होना ही चाहिए।

दुर्भाग्यवश, शमशेर के इस रिश्ते के बारे में पता चलने तक देर हो चुकी थी। जब इस कवि को सचमुच पढ़ने की हालत बनी, तब तक सघन ढंग से उसे पढ़ने के लिए कई दूसरे जरूरी काम छोड़ने जरूरी हो गए थे लिहाजा शमशेर फिर कभी एजेंडा पर नहीं आए तो नहीं आए।

मध्यकालीन कवियों ने अपनी समझ और बुद्धि के मुताबिक नायिका भेद रचा। सात साल की कन्या से सत्तर साल की प्रौढ़ा तक का शरीर विन्यास और उसी के मुताबिक उनका श्रृंगारिक प्रेम भाव। यह दरबारी पुरुष कवियों की रची हुई स्त्री थी, या शायद स्त्री का कैरीकेचर। अपना इरादा यहां कोई नायक भेद रचने का नहीं है। लेकिन कुछ बात है, जिसे मैं यहां पकड़ने की कोशिश कर रहा हूं।

चरम अवसाद में चला गया एक मृत्युगामी बूढ़ा एक नवयुवती से जितनी हताशा, उम्मीद और आजादी के साथ प्रेम कर सकता है, वह मैंने लेखक में ही देखा है। रूमी की एक पंक्ति याद आती है (सही या गलत, अभय तिवारी बताएंगे) मी चू सब्जा बारहा रूईदः एम। सब्जे की तरह मैं बार-बार उग आता हूं। मैंने लेखक के मरे हुए मनोजगत को पिछले कुछ दिनों में सब्जे की तरह उगते, मुरझाते, चटख होते देखा है। काश, यह खुशनसीबी जीवन में कम से कम एक बार सबको हासिल हो। हालांकि जितनी तकलीफ यह अपने साथ लाती है, उसे झेलना सबके बूते की बात नहीं है।

Friday, April 25, 2008

मैं क्या-क्या हो सकता था

भाई अजित वडनेरकर से क्षमायाचना के साथ अपनी उल्टी खोपड़ी को लानत भेजता हूं जो, अपने साथ क्या-क्या हुआ से ज्यादा दिलचस्पी इस बात में लेने लगी है कि क्या-क्या नहीं हुआ। यानी वह, जो होना चाहता था, जिसके होने की स्थितियां भी पूरी थीं लेकिन किसी महीन-सी वजह से चीजें किसी और तरफ मुड़ती चली गईं।

याददाश्त में मेरी पहली महत्वाकांक्षा बिरहिया होने की आती है। खाली बैलगाड़ी में गाड़ीवान की जगह खड़े होकर कान में उंगली डालकर बिरहा गाना एक स्वर्गिक अनुभूति थी। इसके लिए मैंने बिरहा बनाना सीखा। तब के बनाए एक-दो छोटे-मोटे बचकाने किस्म के बिरहे अभी तक याद रह गए हैं। लेकिन यह देश-काल से कटी हुई महत्वाकांक्षा थी। शाम के वक्त गाड़ीवानों के इर्द-गिर्द पाए जाने पर घर में मार पड़ती थी और बैलगाड़ियों का वक्त भी जा रहा था क्योंकि उनकी जगह ट्रैक्टर लेने लगे थे।

क्रिकेटर बनना तो मेरे ख्याल से अस्सी के दशक में या उसके बाद जवान हुआ देश का हर व्यक्ति चाहता होगा। मैं भी चाहता था, लेकिन यह जानते हुए कि इसमें विकेटकीपर, ओपनर या स्पिनर, तीनों ही रूपों में अपना स्तर बहुत अच्छा नहीं है। लेकिन क्रिकेटर बनने का ख्वाब भी किशोरावस्था में मेरे लिए दोयम दर्जे का ही था। गांव में बहुत ज्यादा पैशनेट हो पाने की गुंजाइश उस समय किसी के लिए नहीं थी लेकिन मेरा पैशन जितना भी था वह वैज्ञानिक बनने का ही था।

अपना यह शौक पूरा करने के लिए मैंने बचपन और किशोरावस्था में बहुत सारे अजीब-अजीब काम किए, मार खाई, उल्टे-सीधे प्रयोगों की विफलता पर घंटों रोता रहा। एक बार तो रोते-रोते इस कदर आसमान सर पर उठाया कि मां ने पता नहीं कहां से खोजकर साढ़े तीन रुपये निकाल दिए कि मैं शहर जाऊं, वहां उस विज्ञान प्रदर्शनी को देखूं, जिसमें एक प्रयोग की नाकामी के चलते शामिल होने का मौका नहीं मिला, और वापसी में एक सर्कस भी देखता आऊं।

विज्ञान का यह पैशन काफी समय तक बना रहा, कुछ बदली शक्ल में आज भी बना हुआ है, लेकिन बी.एस-सी. आते-आते मुझे यह लगने लगा था कि अगर आपके पास पैसे नहीं हैं तो विज्ञान में सिर्फ कागज-पेंसिल से हो सकने वाला गणित ही आपके लिए खुला है, बाकी दरवाजे देर-सबेर बंद ही हो जाने हैं। इसके काफी करीब थोड़े समय के लिए एक हल्का सा झोंका फिलॉस्फर बनने का भी आया था, लेकिन फिर लगा कि एक स्वतंत्र शास्त्र के रूप में यह तो और भी बड़े आदमियों का खेला है।

लेकिन जरा ठहरिए, इससे पहले मैं निरंतर कलह से परेशान होकर एक दिन घर से निकल भागा और दिल्ली चला आया। यहां तो मैं कुछ भी बन सकता था। इच्छा तो ट्यूशन पढ़ाकर एडीसन किस्म की कोई चीज बन जाने की थी लेकिन वह न होता तो भी इस शहर में मैं कुछ न कुछ तो कर ही जाता। शायद मैं यहां भूख-प्यास से हलकान होकर कहीं मेहनत-मजूरी करने लगता और आज हर सुबह लंच का डिब्बा लेकर निकलने वाला फोरमैन जैसी कोई चीज होता। लेकिन दिल्ली में उस वक्त मेरी रिहाइश कुल मिलाकर बीस-बाइस दिन की ही रही, लिहाजा किस्सा आगे नहीं बढ़ा। भाई ने पढ़ाई के लिए बीच-बीच में कुछ पैसे भेजने का वादा किया और मैं कॉलेज से हटते-हटते फिर वहीं पहुंच गया।

बीस साल की उम्र सपने टूटने, शौक बिखरने और नए सिरे से जिंदगी के ठीहे तलाशने की थी। इस समय मैं कुछ भी हो सकता था। तीन महीने के अंदर मैंने बैंक की क्लर्की से लेकर आईएएस तक के इम्तहान दिए। फिर वजीफे के पैसे खत्म हो गए और ट्यूशनों के पैसे के बल पर ज्यादा कुलांचें नहीं मारी जा सकती थीं।

यहां से रास्ता राजनीति और होलटाइमरी की तरफ मुड़ा। फिर जनमत की पत्रकारिता से होते हुए ठेठ राजनीति तक पहुंच गया। शायद मैं सीपीआई-एमएल का कोई बड़ा राजनेता हो सकता था। 1992 में मैं पार्टी की बिहार स्टेट कमेटी के लिए चुना गया और कमेटी की तरफ से मुझे राज्य में सांस्कृतिक मोर्चे की जिम्मेदारी भी सौंपी गई। लेकिन कुछ महीने भी नहीं गुजरे और पता चलने लगा कि नेता स्तर की राजनीति महज कार्यकर्ता स्तर की राजनीति का विस्तार नहीं होती। इस अंतर्विरोध की बारीकियां समझने का ज्यादा वक्त नहीं मिला, लेकिन इस तरफ शायद मैं कुछ ज्यादा दूर तक जा सकता था।

मेरी इच्छा इस खाके के जरिए उन सारी संभावनाओं को संवेदना के धरातल पर जीने की है, जो मुझे अपना सकती थीं लेकिन या तो मैं उनके लिए अनफिट साबित हुआ या वे मेरे लिए।

Wednesday, March 19, 2008

कल्पना का खोजी

90 साल की उम्र में आर्थर सी. क्लार्क का जाना मेरे लिए एक अतिरिक्त अफसोस का विषय इस मायने में है कि मैंने उन्हें उनकी मौत के साल में ही पढ़ना शुरू किया। साइंस फिक्शन में अपनी पुरानी रुचि के चलते उनका नाम तो मैं काफी पहले से सुनता आ रहा था लेकिन इससे आगे उनके बारे में जो कुछ जाना, नकारात्मक ही जाना। 1996 में पहली बार उनपर संपादकीय लिखने का मौका उनपर लगे बाल यौनाचार के आरोपों की पुष्टि के बाद मिला। यूरोप-अमेरिका के वैज्ञानिक परिवेश से दूर श्रीलंका में रह रहे एक बाल यौनाचारी साई-फाई लेखक के काम में भला कितनी दिलचस्पी ली जा सकती थी। वह भी खासकर तब, जब सिर्फ स्याह-सफेद में सोच सकने वाली एक विचारधारा का जादू सिर पर सवार हो!

अभी नवंबर-दिसंबर में किसी दिन क्रॉसवर्ड में यूं ही टहलते हुए 'रांदेवू विद रामा' उठाकर पढ़ने लगा तो तीन-चार पेज पढ़ते-पढ़ते खोपड़ी घूम गई। मैं तो यह माने बैठा था कि भारत में अस्सी के दशक से ही निकल रही राम-रथ यात्राओं वगैरह के असर में 'बालप्रेमी' बुढ़ऊ ने चोखी कमाई देखते हुए राम पर एक किताब ठोंक दी होगी। लेकिन राम तो यहां सिर्फ अंतरिक्ष की किसी अनजान जगह से आए और बिना धरती से कोई वास्ता रखे सूरज को रगड़ते हुए अपनी ही राह चले जाने वाले एक स्पेसशिप का नाम था- कल्पना सन् 2130 की है, जब अंतरिक्षीय पिंडों को दिए जाने वाले ग्रीक पौराणिक चरित्रों का कोटा खत्म हो चुका है और इस काम के लिए भारतीय मिथकशास्त्र से जुड़े नामों का उपयोग होने लगा है।

धरती से इतर जीवन की परिकल्पना पर यह मेरी अबतक पढ़ी सबसे अच्छी किताबों में से एक है। रामा करीब पचास किलोमीटर लंबा-चौड़ा एक बेलनाकार पिंड है, जिसके भीतर किसी तारे के करीब पहुंचते ही सक्रिय हो जाने वाली जटिल यांत्रिक प्रणाली और कुछ छोटे बायो-रोबोट भी मौजूद हैं, लेकिन जीवन का कोई चिह्न उसमें लाख कोशिशों के बावजूद नहीं खोजा जा सका। सिर्फ वहां मौजूद चिरंतन ठोस, लेकिन सूरज के करीब पहुंचते ही अचानक द्रव हो गए बेलनाकार समुद्र में न्यूक्लियोटाइड्स जैसी कुछ जीवन-पूर्व संरचनाएं ही मिल पाती हैं- और एक जड़ीभूत 'म्यूजियम', जिसमें एक विचित्र सभ्यता से जुड़े अजैविक उपादानों की होलोग्राफिक छवियां कैद हैं।

सबसे दिलचस्प हैं एक स्वयं-संपूर्ण बेलनाकार खोखली दुनिया में बिताए गए समय के ब्योरे। इस दुनिया के घूर्णन अक्ष पर शून्य गुरुत्व का अनुभव करते हुए आप अधर में लटके रह सकते हैं, जबकि इसकी भीतरी दीवार पर पहुंचते ही आप अपने वास्तविक भार में वापस आ जाते हैं। इस दुनिया में एक जगह से दूसरी जगह आना-जाना एक अलग ही मुश्किल पेश करता है, क्योंकि जमीन से थोड़ा ऊपर जाते ही वहां गुरुत्वहीन आकाश शुरू हो जाता है!

जिस भी सभ्यता ने इस यान को बनाया है, उसमें 'तीन' को लेकर एक अद्भुत आग्रह मौजूद है- हर चीज तीन। होलोग्राम में जिस पोशाक की डिजाइन मौजूद है, उसमें तीन हाथों और तीन पैरों के लिए जगह बनी हुई है। जो बायो-रोबोट (बायोट) यान पर मिलते हैं, वे छोटी-छोटी तिपाइयों की तरह अपने तीन पैरों से चकरघिन्नी खाते हुए बड़ी तेज रफ्तार से दौड़ते हैं। सभ्यता के अवशेष के रूप में सिर्फ एक धात्विक फूल मिल पाता है, जो तोड़े जाने के थोड़ी ही देर बाद भुरभुरा होकर नष्ट हो जाता है।

इस किताब के नशे में काफी दौड़-भाग के बाद मैं इसका अगला खंड रामा-सेकंड (द्वितीय) ले आया, जिसे आर्थर सी. क्लार्क ने जेंट्री ली के साथ मिलकर लिखा है। ली हॉलीवुड के चर्चित स्क्रिप्ट राइटर हैं और किताब को फिल्मी बनाने के चक्कर में मुझे तो इसकी रेड़ पिटी हुई सी लग रही है। आधी पढ़ गया हूं और मजा बिल्कुल ही नहीं आया है। इस किताब की धारणा यह है कि साठ साल बाद, जब दुनिया मंदी और कई दूसरी आफतों से जैसे-तैसे उबर रही है, रामा जैसा एक और यान सौरमंडल में प्रविष्ट हुआ है।

इस बार दुनिया उसे शुक्र तक पहुंचते-पहुंचते घेर लेने की तैयारी में है, ताकि उसमें मौजूद सुरागों से उसकी निर्माता सभ्यता के बारे में कुछ तो जाना जा सके। अभी तक जितना पढ़ा है, उससे तो नहीं लगता कि 2192 में भी दुनिया अभी की अपनी मूरखताओं से जरा भी उबर पाई है, न ही इसका कोई इत्मीनान बन पा रहा है कि रामा सभ्यता के बारे में इसके खोजी रामा द्वितीय या उसके बाद की दो किताबों में ज्यादा कुछ जान पाएंगे। मेरा ख्याल है, जेंट्री ली का हॉलीवुड आर्थर सी. क्लार्क की कल्पनाशीलता के लिए भी कुछ ज्यादा ही भारी पड़ गया।

एच. जी. वेल्स और जूल वर्न जैसे अपने से पहले के साई-फाई लेखकों की तुलना में क्लार्क की खासियत यह थी कि वे अपने लेखन में वैज्ञानिक तर्कशीलता का दामन कतई नहीं छोड़ते थे। इसी लिए उनकी विधा में काम करने वाले फ्रेड हॉयल और कार्ल सागान जैसे खगोल विज्ञानी भी उन्हें किसी वैज्ञानिक जैसा ही सम्मान दिया करते थे।

दूरसंचार उपग्रह की परिकल्पना उन्होंने '2001- अ स्पेस ओडिसी' की मूलकथा 'द सेंटिनल' में ऐसे उपग्रहों के आने के पंद्रह-एक साल पहले ही पेश कर दी थी। उनकी एक और परिकल्पना- कृत्रिम उपग्रह से टंगी अंतरिक्ष को धरती से जोड़ने वाली एक सीढ़ी- भी कार्बन नैनोट्यूब्स पर चल रहे काम की रोशनी में साकार होने की कगार पर है। ऐसे कल्पना के धनी क्लार्क का जाना- भले ही 90 साल का होकर- उनके हर चाहने वाले के तकलीफदेह तो होगा ही।

Wednesday, February 13, 2008

एक घोषित वेश्यागामी की मौत

उजड्ड छवि का भी अपना कुछ आकर्षण होता है। वर्ना इस संस्थान में काफी पहले से काम कर रहे अनिल सिंह मेरे करीब भला क्यों आते। सुल्तानपुर के रहने वाले थे, लेकिन बगल के जिले आजमगढ़ का रहने वाला मैं भी हूं, इसका पता मेरे साथ सालोंसाल रहने वालों को भी नहीं रहता। वे हमारे अखबार में कंपोजिटर थे, हंसमुख आदमी थे और सतह के नीचे कुछ और भी है इसका एहसास कराने वाला एक कमीना लीचड़पन थोड़ा ही गौर करने पर उनके बुढ़ाते व्यक्तित्व से टपकने लगता था। हमेशा (मेरे ख्याल से नींद में भी) आगे की तरफ निकली हुई एक पीली या नीली टोपी लगाए रहते थे। और हां, इसी टोपी के नीचे हमेशा कंडोम का एक पैकेट भी मौजूद रहा करता था।

उनके बारे में अंतिम जानकारी मुझे अपने एक बुजुर्ग कहानीकार मित्र से प्राप्त हुई, जिसके जीवंत प्रदर्शन के लिए एक दिन अचानक पीछे से आकर उन्होंने अनिल सिंह की टोपी उठा दी। खरखराती हुई दो-ढाई इंच की एक छोटी सी चीज उनके कंधे से टकराती हुई नीचे गिरी। कोई आम आदमी शायद लपककर उसे उठाने का प्रयास करता। लेकिन वे आम आदमी नहीं थे। वे अनिल सिंह थे। आसपास मौजूद सारे लोग इस चीज को अच्छी तरह देख लें, इतना इंतजार करने का धीरज उनमें था। देखने वालों ने (जिनमें दोनों ही लिंगों के लोग शामिल थे) जब अफराकर नजर फेर ली तब उन्होंने वह निरोध का पैकेट उठाया और हे-हे-हे हंसते हुए दुबारा उसे सिर पर रखकर टोपी लगा ली।

मौका मिलते ही मैंने कहानीकार मित्र को हड़काया कि इस घिनौने इन्सान से अगर आगे भी उन्हें अपना रिश्ता जारी रखना है तो वे शौक से रखें लेकिन उसे लिवाकर कम से कम मेरी तरफ तो न आएं। थोड़ी दिक्कत इन साहब के साथ भी है। कुछ गतिविधियों के चलते संस्थान में उनका जिक्र कभी 'रंगीन मिजाज खूसट' के रूप में तो कभी 'दिल पचपन का उमर बचपन की' मुहावरे के जरिए किया जाता है। लेकिन ये सिर्फ ऊपरी बातें हैं। फैंटेसी में उनकी गति जबर्दस्त है। घनघोर अकेलापन उनकी आत्मा को अपनी गिरफ्त में जकड़े हुए है और रूमानी प्रेम के लिए उनका दिल बिल्कुल आखिरी बूंद पेट्रोल में चल रहे किसी स्कूटर की तरह उछालें मारता है।

उन्होंने कहा कि अनिल सिंह के साथ उनकी दोस्ती सिर्फ उन्हें एक कैरेक्टर के रूप में जानने-समझने के लिए है और उनकी बातें हमेशा ही इतने सच्चे दिल से कही गई होती हैं कि इस बात को फेस वैल्यू पर स्वीकार कर लेने में मुझे कोई परेशानी नहीं हुई। वैसे भी अनिल सिंह से मेरी चिढ़ उनके भदेसपन को लेकर थी। उनके कैरेक्टर से मुझे कोई अड़चन नहीं थी क्योंकि उनसे कहीं ज्यादा अड़बंग और घटिया लोगों के साथ लंबा-लंबा वक्त गुजारने का मौका मुझे पहले भी मिल चुका था।

वाकई अपने कहानीकार मित्र की समझ का कायल हूं। इतनी चिढ़ के बाद भी अनिल सिंह से नजदीकी की गुंजाइश उन्होंने नहीं बनाई होती तो वेश्याओं, कॉलगर्लों और रंडीबाजों की एक पूरी दुनिया शायद मेरे लिए 'लोला' से होते हुए 'देवदास' और 'प्यासा' तक चले आ रहे अतार्किक आक्रोश और रहस्यमय करुणा का विषय ही बनी रह जाती।

कंपोजिंग के सिवाय अक्षरों से और कोई रिश्ता न रखने वाले अनिल सिंह का पिछले सौ-डेढ़ सौ वर्षों से साहित्य में जमी रूमानी धुंध से कोई वास्ता नहीं था। इस अलग-सी दुनिया के बारे में धीरे-धीरे करके जो जमीनी बातें उन्होंने मुझे बताईं उनसे एक छोटी सी खिड़की मेरे सामने जरूर खुल गई, जिससे होकर मैं वक्त जरूरत इसे थोड़ा-बहुत देख सकता हूं।

जब हमने देह-व्यापार की नई प्रवृत्तियों पर 'सहारा समय' साप्ताहिक का एक अंक निकाला तो अनिल सिंह की बातों पर आधारित कई केस स्टडीज भी साथ में दीं। ये चीजें जयंती दत्त जैसे मनोचिकित्सकों की केस स्टडीज से कम रोचक और कम समझदारी भरी किसी मायने में नहीं थीं। अनिल सिंह से मैंने आग्रह किया कि इनके साथ वे अपना नाम जाने दें लेकिन इसके लिए वे तैयार नहीं हुए। आखिरकार ये टिप्पणियां एक रिपोर्टर की प्रस्तुति के रूप में देनी पड़ीं।

इस रास्ते पर अनिल सिंह कैसे बढ़े, इसके पीछे कोई रोने-धोने वाली कहानी नहीं है। दिल्ली में परिवार पालने का खर्चा उठा पाना उनके बूते के बाहर था। पहले मौज-मजे के लिए इधर-उधर गए, फिर तय कर लिया कि महीने में सौ-दो सौ रुपया खर्च करके अगर गांव के खेतिहर परिवार में हजार-डेढ़ हजार रुपये अबाध रूप से भेजे जा सकें तो इसमें बुराई क्या है। यह संतुलन साधने में वे पचपन साल की उम्र तक कामयाब रहे, लेकिन पता नहीं कैसे अंतिम दो-तीन वर्षों में यह अचानक गड़बड़ा गया।

उनके बेटे की शादी हुई और गौना आने के दो-तीन महीने बाद ही उसने खुदकुशी कर ली। लड़का बेरोजगार था और ससुराल की तानेबाजी उससे बर्दाश्त नहीं हुई। अनिल सिंह इस घटना से अचानक टूट-से गए और शायद अपने शौक पर उनका खर्चा भी इसके बाद कुछ ज्यादा ही बढ़ गया। एक घरबारू लेकिन पेशेवर महिला के बारे में वे काफी प्रेम से बताते थे जिसकी मांग उनसे महीने में पांच सौ रुपये की थी लेकिन मात्र दो-तीन सौ की ही व्यवस्था कर पाने के बावजूद उससे रिश्ते टूटे नहीं थे।

आखिरी दिनों में अनिल सिंह को हाई बीपी की शिकायत रहने लगी थी। हाल में वे घर गए थे। वापसी के लिए शाम को ट्रेन पर चढ़ने की सूचना भी दी थी। लेकिन अगले दिन उनके बजाय उनकी खबर ही यहां पहुंच पाई।

मैंने अपने जीवन के कुछ-कुछ दिन बलात्कारियों और अपनी बहू को जलाकर मार डालने वालों के साथ भी बिताए हैं लेकिन उनके इर्द-गिर्द मुझे हमेशा एक असह्य आपराधिक दुर्गंध सी फैली हुई मालूम पड़ती थी। अनिल सिंह के साथ ऐसा कभी नहीं महसूस हुआ। देह व्यापार पर उनका मात्र एक व्यापार की तरह चर्चा करना जुगुप्सापूर्ण जरूर था, लेकिन इसमें मानव शरीर के प्रति कोई हिकारत मौजूद नहीं थी।

इसके उलट वे घंटे-दो घंटे के लिए खरीदे गए अपने रिश्तों पर भी बड़े लगाव से बात करते थे। यह एक ऐसी बात है, जिसे पारंपरिक साहित्यबोध के जरिए समझना बहुत मुश्किल है। अपने एक अटपटे मित्र के प्रति इसे मेरी श्रद्धांजलि समझा जाए।

Tuesday, January 29, 2008

क्या चमचागिरी हमारी सभ्यता का जेनेटिक तत्व है?

जिस पेशे में मैं हूं, उसके प्रोडक्ट (अखबार, टीवी न्यूज वगैरह) देखने से लगता है कि देश में शुचिता और नैतिकता को बचाए रखने का ठेका उसके ही नाम पर उठा हुआ है। लेकिन इस पेशे को अपने कंधे पर उठाए हुए जिन लोगों के साथ मैं काम करता हूं, या करता आया हूं, उनका बरताव देखकर आज भी पहले दिन की तरह ही चकित हो जाया करता हूं। अच्छा-भला काम करने वाले समझदार लोग, परिश्रमी, साहसी और किसी झोंक में मौत तक से न डरने का दावा कर जाने वाले लोग बड़े प्रेम से ऊपर वालों को चाटते और नीचे वालों को काटते नजर आते हैं- भले ही इस बेढंगी कोशिश में उनके तन और मन, दोनों का ही पूरी तरह दिवाला ही क्यों न निकल जाए।

संपादक, या जो भी वरिष्ठ कुछ बनाने-बिगाड़ने की हैसियत में हुआ, वह लोगों का 'भाई साहब' हो जाया करता है। और भाई साहब भी वह ऐसा, जो पब्लिकली मां-बहन एक कर देने में कोई कोताही नहीं करता। एक बंदा तो मुझे इस पेशे में ऐसा भी मिला, जो चार लोगों के बीच बड़े गर्व से बता रहा था कि भाई साहब तो कभी मुझे नाम से बुलाते ही नहीं। फोन भी करते हैं तो यही कहकर कि अबे साले ऐसा कैसे हो गया, अबे साले वैसा कैसे होगा।

सचमुच के काबिल लोग इस पेशे में बिल्कुल हैं ही नहीं, ऐसी बात नहीं है। लेकिन आगे बढ़ने में काबलियत उनकी ज्यादा मदद नहीं कर पाती। तरक्की और इन्क्रीमेंट अक्सर करके इसी बात पर निर्भर करते हैं कि आप भाई साहब के कितने करीबी हैं। अगर आप इस कला में पारंगत नहीं हैं तो दूसरा रास्ता नौकरियां बदलने का है, लेकिन इस रास्ते के साथ एक ग्लास सीलिंग जुड़ी हुई है। जल्द ही भाई साहब लोगों के सर्किल में यह बात चल निकलती है कि फलनवां तो साला बड़ा काबिल बनता है, भरोसे का आदमी नहीं है। एक नौकरी बदलने के सिलसिले में मुझे एक-दूसरे से सख्त जलन रखने वाले दो भाई साहबों के बीच हुई इस तरह की बातचीत के बारे में पता चला था।

पहले मुझे लगता था कि ऐसा सिर्फ पत्रकारिता में, वह भी हिंदी पत्रकारिता में है, लेकिन अंग्रेजी पत्रकारिता का भ्रम भी जान-पहचान बढ़ने के साथ धीरे-धीरे टूटता गया। दोनों में फर्क सिर्फ एक है कि अंग्रेजी में पत्रकारिता बाकायदा एक सुचिंतित कैरियर है लेकिन हिंदी में यह आज भी हारे को हरिनाम जैसी चीज मानी जाती है। इसके अलावा जिस क्लास से अंग्रेजी के पत्रकार आते हैं, उसकी कड़ियां ताकतवर लोगों के साथ जुड़ती हैं। ऐसे में ऊपर बैठे लोग चार चमचे पालने, दो लड़कियां घुमाने की अपनी संचित अभिलाषा भिन्न तरीकों से पूरी करते हैं। वे ज्यादा डेमोक्रेटिक किस्म के भाई साहब दिखने का प्रयास करते हैं। जूनियर्स के साथ में हंसी-मजाक करते हैं, दारू भी पी लेते हैं, लेकिन फायदे पहुंचाने का उनका शास्त्र भी रत्ती भर अलग नहीं होता।

पत्रकारिता से गर्दन निकालकर थोड़ा-बहुत साहित्य के दायरे में झांकने का मौका भी मुझे मिला है, लेकिन वहां का हाल पत्रकारिता से ज्यादा बुरा है। दंतकथाओं से पता चलता है कि हिंदी साहित्य के ऊपरी सबलाइम दायरे में चमचागिरी अपेक्षाकृत हाल की चीज है। जो साहित्यिक पीढ़ी स्वाधीनता आंदोलन से जन्मी थी, उसकी अपने चेलों से चमचागिरी के अलावा कुछ बड़ी अपेक्षाएं भी थीं। चेलों ने कुछ हद तक इन्हें पूरा भी किया। लेकिन इज्जत, शोहरत और थोड़ा पैसा हाथ आ जाने के बाद सपनों में बसी एक छवि उनकी आंखों के आगे घूमने लगी। लंबी घुमावदार निगाली से हुक्का गुड़गुड़ाते, जांघ तक धोती खिसकाकर किसी लौंडे से पांव दबवाते, पंखा झलती छोटी ठकुराइन के हाथ से मुंह में दी गई गिलौरी दबाए, चार लगुओं-भगुओं की मूर्छनाभरी आह-वाह के बीच गालिब की गजल टेरती किसी मॉडर्न कस्बिन की अदाओं पर निछावर होते एक छोटे-मोटे जमींदार की मनोहारी छवि।

सारे सपने भला किसके पूरे होते हैं, लिहाजा पत्रकारिता और साहित्य के भाई साहबों का भी यह सपना अवचेतन में ही दबा रह जाता है। लेकिन ईश्वर ने जिस भी हद तक इसे पूरा कर पाने की हैसियत बख्श दी है, उस हद तक भी भला इसे पूरा क्यों न किया जाए। नतीजा यह होता है कि किसी ड्रैकुला की तरह वे अपने मातहतों की गर्दन पर अपने नुकीले दांत धंसाकर उन्हें भी ड्रैकुला बनने की राह पर धकेल देते हैं। नए लोग, पुराने सपने। जब बड़े भाई साहब कहीं और रहते हैं तो छोटे भाई साहबों के बीच चलने वाली दरबारी सियासत के दांव-पेच देखने लायक होते हैं। बड़े भाई साहब किसी सर्वज्ञ की तरह इसपर नजर रखते हैं और जब किसी छोटे भाई साहब के ज्यादा दांत ज्यादा नुकीले होने लगते हैं तो उनके ऊपर किन्हीं और छोटे भाई साहब को हुलकार देते हैं।

मैं नहीं जानता कि बुद्धि, ज्ञान और रचनात्मकता से जुड़े इन दोनों पेशों के अलावा बाकी पेशों में तरक्की और इन्क्रीमेंट का कौन सा शास्त्र काम करता है। लेकिन स्वतंत्र पेशों और बंधे-बंधाए ढर्रे वाली सरकारी नौकरियों को छोड़ दें तो अपने दायरे में आने वाले बाकी धंधों में भी हाल ज्यादा अलग नजर नहीं आता। मुल्क की तरक्की के साथ हमारे पास थोड़े पैसे आ गए हैं, उन पैसों से आने वाली स्लीक किस्म की तमाम मशीनें वगैरह आ गई हैं, लेकिन इन चीजों से जुड़े तमाम आधुनिक पाखंडों के बावजूद अपने मन के दायरों में हम आज भी पहले जैसे ही हैं। सर्वव्यापी चमचागिरी से बेहतर इस बात का प्रमाण और भला क्या हो सकता है?

Tuesday, January 15, 2008

ग्यारह गोलियां

कल शाम मन कैसा-कैसा हो रहा था। घर निकलने से पहले मित्र अरिहन जैन कैंटीन की तरफ लिवाते गए। वहीं एक अनजाने से नंबर से एसएमएस आया- 'अबरपुल के कॉमरेड सुफियान नहीं रहे। अपराधियों ने गोली मार दी।' पलटकर फोन किया तो लगातार इंगेज। ऐन स्कूटर स्टार्ट करते वक्त फोन बजा। उठाया तो पता चला सुनील हैं- नंबर कुछ और हो गया है। फिर उन्होंने विस्तार से बताया कि सुफियान अपनी दुकान के सामने कैरम खेल रहे थे, तभी नौशाद गैंग के लोगों ने आकर उनपर गोलियों की बारिश कर दी। स्पॉट डेथ हुई। पोस्टमॉर्टम में ग्यारह गोलियां बदन से निकलीं।

मोहम्मद सुफियान भोजपुर जिले के मुख्यालय आरा में लगभग अपने बचपन से ही सीपीआई-एमएल लिबरेशन के कार्यकर्ता थे। मेरे निजी मित्र तो वे थे ही। आरा में जब पार्टी का काम शुरू हुआ तो दर्जी यूनियन और बक्सा मजदूर यूनियन ही इसका आधार बनी। संयोगवश इन दोनों ही यूनियनों में बहुसंख्या मुस्लिम मजदूरों की थी। सुफियान के पिता खुद भी दर्जी थे, हालांकि उनके पास अपनी दुकान नहीं थे। वे और शहर में काम करने वाले ढेरों अन्य अनपढ़ बाल मजदूरों की तरह उनके अकेले बेटे सुफियान थोक में कपड़ा सिलने वाली एक दुकान पर काम करते थे। आंदोलन बढ़ा तो मजदूरों की कुछ मांगें मानी गईं, लेकिन इसका नेतृत्व कर रहे सारे लोगों को काम से हटा दिया गया।

तब से जीविका के लिए न जाने कितने छोटे-मोटे धंधे सुफियान ने किए। उनका आखिरी काम एक सैलून खोलने का था, जिसका फीता न जाने क्या सोचकर उन्होंने मुझसे ही कटाया था। उनके सैलून में बाल कटाने वाला पहला व्यक्ति भी मैं ही था। सुनील ने बताया कि इस बार आरा में हुए नगर निगम चुनाव में सुफियान अबरपुल इलाके के वार्ड कमिश्नर चुने गए थे। शायद यह उनका पहला ही चुनाव रहा हो, क्योंकि जबतक मैं आरा में था, तबतक तो यह कल्पना भी करना कठिन था कि सुफियान कभी चुनाव लड़ेंगे।

एक अद्भुत जुझारूपना सुफियान की पहचान हुआ करती थी। वे साथ हों तो किसी से भी भिड़ा जा सकता था- चाहे वह कोई उन्मादी भीड़ हो या अपनी अफसरी के गुमान में फूला कोई पुलिस अफसर। आरा के झोपड़िया स्कूल के सामने गद्दार विधायक श्रीभगवान सिंह का विरोध करते हुए अपने बीस साथियों के साथ मैं और सुफियान भी साथ-साथ जेल गए थे। वहां किसी बात पर झड़प के दौरान जेलर ने सुफियान को घुटना मार दिया था। इसके विरोध में और व्यवस्था से जुड़े कई मुद्दे उठाते हुए हम लोगों ने जेल में भूख हड़ताल की, जिसमें जेल के तीन चौथाई से ज्यादा लोग शरीक हुए।

एक बार चुनावी माहौल में अपनी पार्टी का टेंपो डाउन देख मैं दोनों हाथों में अपना सिर थामे बैठा था, तभी सुफियान आए और मुझपर बिल्कुल बरस पड़े। उन्होंने कहा कि ऐसा करके आप बिगड़ी हालत को और बिगाड़ रहे हैं। मुझे नहीं पता कि हर हालत में भिड़ने, मुकाबला करने की उनकी उस जिद और मस्ती का हाल अभी कैसा था। आखिर अब वे कोई बाल मजदूर नहीं, एक सैलून के मालिक और वार्ड कमिश्नर थे। लेकिन ऐन लोहड़ी की ठंडी रात सुफियान अपनी दुकान के बाहर कैरम खेलते हुए मारे गए, इससे लगता यही है कि बीच के चौदह सालों ने उन्हें भीतर से बहुत ज्यादा नहीं बदला था।

सुफियान को इस तरह याद करना मेरे लिए बहुत अटपटा है। समय की एक चौदह साल मोटी धुंधली दीवार मुझे अपने उस होने से अलगाए हुए है, जिसमें सुफियान और बहुत सारे ऐसे लोग थे, जिनके बिना अपना होना तब नामुमकिन लगता था। यह ध्रुवीय इलाकों में सफर कर रहे अभियान दल के लोगों के बरताव जैसा है, जो अपने पैरों की मर चुकी उंगलियां हथौड़े से तोड़कर आगे बढ़ जाते थे। सुफियान जैसा अपना टूटा हुआ सुन्न अंगूठा हजार मील दूर से निहारते हुए कहीं पहुंचने, कोई मुकाम सर करने जैसी कोई बात अगर अपने जेहन में होती तो लिखना शायद इतना अटपटा नहीं लगता।

Monday, January 7, 2008

आपने किसी को बेवजह रोते देखा है?

इससे ज्यादा एंबरासिंग सीन कोई हो नहीं सकता। एक वयस्क, बाल-बच्चेदार पुरुष को रोते हुए देखना। वह भी बिना किसी वजह के। कोई घटना नहीं, कोई बात नहीं, सिर्फ भीतर से रुलाई फूटती चली आ रही है। मेरे एक सहकर्मी के साथ आजकल ऐसा ही हो रहा है। डॉक्टर ने बताया, घनघोर डिप्रेशन है। फिजिकल लेवल पर चला गया है। महीने में ढाई-तीन हजार रुपया इलाज पर खर्च हो रहा है। घर में कमाने वाले अकेले और तनख्वाह कुल चौदह हजार रुपये। दुनिया में कौन-सी दवा ऐसी बनी है जो इस बीमारी का इलाज करेगी?

आमदनी का छठां हिस्सा अगर इलाज में चला जाए तो इस इलाज से ज्यादा बड़ी बीमारी भला और क्या हो सकती है? बीमारी मनोवैज्ञानिक है, लिहाजा कोई नॉन-केमिकल सपोर्टिव इलाज भी जरूरी है। लेकिन वह अगर बिना पैसे के संभव हो तो भी उसके लिए जरूरी इच्छाशक्ति कहां से आएगी? दसियों बार सुझा चुका, नियमित रूप से भ्रामरी प्राणायाम कीजिए। वे इसके बारे में जानते हैं, पहले करते भी थे, लेकिन अब कर ही नहीं पाते।

बहुत बचपन में मैंने अपने पहलवान पिता को रोते हुए देखा था। वह छवि आज भी दिमाग में ज्यों की त्यों छपी हुई है। नौकरी की कुत्तागिरी उनसे बर्दाश्त नहीं हो पाई थी। अपने बॉस की ही कुर्सी उठाकर उन्होंने उसकी कपाल क्रिया कर दी थी और 44 की उम्र में कुल आठवीं बार बेरोजगार होकर घर चले आए थे। यहां पहले मेरे ताऊ जी ने बड़े कायदे से उनकी मिजाजपुर्सी की, फिर रही-सही कसर मेरी माताजी ने निकाली।

कुछ महीने यह सब झेलने के बाद असहायता उनपर चढ़ दौड़ी, और जिसकी पिटाई से गांव के बड़े-बड़े बदमाश खौफ खाते थे, उसे एक सुबह मैंने अकेले बैठे अहक-अहक कर रोते देखा। उनके पूरे जीवनकाल में स्थितियां फिर कभी बहुत अच्छी नहीं हुईं। यूं कहें कि दिनोंदिन ये बिगड़ती ही चली गईं। लेकिन इसके समानांतर उनका अपना एक सपोर्ट सिस्टम भी जरूर बना होगा, क्योंकि उस एक घटना के बाद मैंने उन्हें कभी इस तरह हथियार डालते नहीं देखा।

मेरे ख्याल से पहलवानी और एक किस्म की धार्मिक आस्था ने पिताजी के लिए सपोर्ट सिस्टम की भूमिका निभाई थी। जिसे हम लोग आजकल दोस्ती कहते हैं, उस तरह की दोस्ती तो उनके साथ किसी की मैंने देखी नहीं, लेकिन जिले भर के एक से एक कनटुट्टे, अड़बंग किस्म के बिल्कुल अपढ़ पहलवानों के साथ उनकी घंटों-घंटों चलने वाली दंगल चर्चाएं मैंने सुनी हैं, उनका रस लिया है। खुद ज्योतिषी होने के बावजूद इस पेशे से जुड़े लोगों, पंडितों-पुजारियों से घुलते-मिलते उन्हें कभी नहीं देखा, लेकिन किसी खेत की मेंड़ पर टहल रहे अनजान-अजनबी आदमी के मुंह से रामचरित मानस की कोई चौपाई सुनकर आंखों में जल भरे, रुंधे गले से ओ-हो-हो-हो करते बहुत बार देखा है।

ऐसा कोई सपोर्ट सिस्टम न मेरे पास है, न मेरे मित्र-सहकर्मियों के पास। अपनी तीसरी नौकरी छूटने के दो-तीन महीने बाद एक दिन जब मुझे रुलाई फूटनी शुरू हुई तो अपने दो साल के बेटे की आंखों में ठीक वैसा ही 'शॉक ऐंड ऑ' वाला भाव मैंने देखा, जो अपने पिता को रोते देख आजतक मेरे मन पर छपा हुआ है। मैं नहीं जानता कि वह स्थिति अगर कुछ महीने और बनी रहती- कम तनख्वाह और कई साल पुराने ओहदे पर ही सही, लेकिन एक अदद नौकरी की व्यवस्था न हो जाती- तो उस असाध्य डिप्रेशन से मैं कैसे निपटता।

यह मेरी धूर्तता होगी, अगर कहूं कि मेरे भीतर और बाहर इससे निपटने का कोई सपोर्ट सिस्टम मेरे पास तब मौजूद था, या आज मौजूद है। ऐसा कुछ भी मेरे पास नहीं है- न पहलवानी, न धर्म, न दोस्ती, न साहित्य, न ही कुछ और।

मुझे लगता है कुछ रुखड़े मिजाज के, लेकिन भीतर से सहृदय, खुदाई खिदमतगार किस्म के लोगों के लिए अपने इर्द-गिर्द हमेशा एक स्पेस बनाकर रखना चाहिए। डिप्रेशन में, पतन और पराजय के क्षणों में ऐसे ही लोग मददगार होते हैं। चिकनी-चुपड़ी सहानुभूति अक्सर जहरीली साबित होती है- सामने भी, और पीठ पीछे तो और भी ज्यादा।

आपके मन के आसपास कुछ ऐसे लोग हमेशा होने चाहिए जो ज्यादा आकाश-पाताल की बातें न करें। आपको जमीन पर टिकाए रखें। अपनी बातों से नहीं, हरकतों से भरोसा दिलाते रहें कि इस धरती पर जैसे सारे जीव-जंतु इतनी विपरीत परिस्थितियों में जिंदा रह लेते हैं, वैसे ही आप भी जी लेंगे। आपकी उलझनें चाहे जितनी भी विकट हों लेकिन विशाल पृथ्वी और अनंत समय में उनकी हैसियत कुछ भी नहीं है। विपत्तियों और दुखों के उमड़ते ज्वार से डरिए नहीं- सिर झुकाकर उसकी तरफ पीठ कर दीजिए तो शायद वह ऐसे गुजर जाए, जैसे कभी था ही नहीं।

अपने परेशान दोस्तों के साथ अक्सर मैंने इसी अक्खड़ तरीके से पेश आने की कोशिश की है- बन पड़ा तो एकाध बार थोड़ा-बहुत हाथ बंटा लेने की भी। अफसोस कि कुछ मामलों में यह कारगर साबित हुआ है तो कुछ में रिश्ता ही टूट जाने की नौबत आ गई है। किसी महानगर में अगर आप न्यूनतम 15 हजार के खर्चे में जी रहे हैं और आपकी तनख्वाह 14 हजार रुपये है, जिसमें से ढाई हजार रुपये हर महीने आपके इलाज पर खर्च हो जाते हैं तो आखिर वह कौन-सा सपोर्ट सिस्टम होगा, जो डिप्रेशन को परास्त करने में शर्तिया तौर पर आपकी मदद कर पाएगा?

Sunday, December 9, 2007

ऋषि का जाना

'जनमत' का माहौल दाढ़ी के लिए जरखेज था। महेश्वर और रामजी राय जैसे पुराने दढ़ियलों के बाद संतलाल, प्रकाश चौधरी, संतोष चंदन और यहां तक कि इरफान ने भी कुछ दिन दाढ़ी रखने का असफल प्रयास किया। ऐसे माहौल में त्रिलोचन जी जैसे शाश्वत दढ़ियल का आगमन एक सुंदर परिघटना थी।

एक बार दाढ़ी पर अपना संक्षिप्त वक्तव्य जारी करते हुए त्रिलोचन बोले, 'कुछ लोग अपनी दाढ़ी-मूंछों का बहुत ख्याल रखते हैं। उनकी दाढ़ी पर आने वाला खर्चा शेव के खर्चे से कहीं ज्यादा होता है। लेकिन ये जो चीजें आप मेरे चेहरे पर उगी देख रहे हैं, इन्हें कैंची, उस्तरे या कंघी से कोई मतलब नहीं है। नहाकर एक बार हाथ फेर लेना ही इनकी कुल साज-संभार है।'

दाढ़ी-मूंछों की वही सहज व्यवस्था मैंने कल रात त्रिलोचन के मृत चेहरे पर देखी। हाल में अखबारों में छपे उनके चेहरे पर थोड़ी सूजन सी नजर आती थी लेकिन मौत के बाद वह बिल्कुल नदारद थी। थोड़ी मुरझाहट जरूर थी लेकिन चेहरा उनका अब भी ठीक वैसा ही था, जैसा पिछले चौदह वर्षों से मैं देखता आ रहा हूं। एक अदद जिंदगी छक कर जी लेने का जो सहज संतोष चिरंतन अभावों के बावजूद उनके व्यक्तित्व में हमेशा नजर आता था, वह सोते वक्त और भी प्रखर हो उठता था....मौत में शायद यह अपने चरम बिंदु पर पहुंच चुका था।

प्राण निकलने के कष्ट का उनके पूरे शरीर मे अकेला चिह्न सिर्फ निचले होठ के दाएं हिस्से में दिखता था, जिसमें नीचे की तरफ जरा सा बांकपन आ गया था। बाकी सारा कुछ वैसा ही था। आगे से पीछे की तरफ उड़े हुए भुए जैसे सफेद बाल, तीखी भौंहों के नीचे बंद पड़ी बड़ी-बड़ी आंखें, बिना झुर्रियों वाला सांचे ढला चेहरा, चौड़े कंधों और कसी हुई छाती वाली क्षत्रिय धजा। बिल्कुल सीधे लेटे हुए, जैसे सिर के पास किसी की आहट पाकर अभी जग पड़ेंगे और मुस्कुराते हुए तड़ से कोई चुस्त फिकरा जड़ देंगे।

नब्बे साल की उमर पूरी करने में त्रिलोचन मेरे जैसे कई हजार लोगों से मिले-जुले होंगे। दुनिया चाहे इस करवट से उस करवट हो जाए, इनमें से किसी के भी मन से उनकी याद आखिरी सांस तक नहीं जाने वाली। इसके अलावा उनकी रचनाएं हैं, जिन्हें उनके वक्त में भले ही ज्यादा न पढ़ा गया हो, लेकिन आने वाले वक्तों के गुनीजन उन्हें फिर-फिर पढ़ने की तमीज सीखेंगे।

इतनी शक्लों में जिंदा त्रिलोचन को पूरा-पूरा मारने में मौत के भी छक्के छूट जाएंगे। लेकिन नई-नई तकलीफों में जीने के नए-नए मजे ईजाद करने वाले त्रिलोचन का होना उनकी रचनाओं और उनकी स्मृतियों से बहुत बड़ा था। अफसोस, कि उससे साबका अब कभी नहीं पड़ेगा।

Sunday, November 18, 2007

बियाहुती को दे देना

करीब पांच पुश्त पहले के सभी पुरुषों के नाम मेरे गांव में ज्यादातर लोगों को पता होंगे, और उनमें से हर-एक से जुड़ा कोई न कोई किस्सा भी। लेकिन मेरी तीसरी ही पुश्त में पड़ने वाले एक सज्जन ऐसे हैं, जिनका नाम उनसे सीधा खून का रिश्ता रखने वालों को भी याद नहीं है। दरअसल, यह सहज विस्मृति का मामला नहीं है। गांव में उनका नाम सचेत ढंग से भुलाने की कोशिश की गई है, जो कानाफूसियों की निरंतरता के बावजूद पता नहीं कैसे कामयाब भी हो गई।

गर्मियों की आलस भरी दुपहरों में जब औरतों का जमावड़ा किसी के निंदारस में डूबा रहता तो कभी-कभी उनका जिक्र भी आ निकलता। लेकिन बातचीत में उनकी याद उनका नाम लेकर नहीं, किसी संबंध के जरिए- जैसे 'तिलकधारी पंडित के भाई' के रूप में की जाती। सोने के भारी गहने पहनने वाली एक औरत- तिलकधारी पंडित की मंझली बहू- बाकी औरतों के लिए खासी ईर्ष्या का विषय बनी रहती और उसी के बहाने औरतें 'उनको' भी याद कर लिया करतीं।

सुविधा के लिए उनका नाम हम बटेस्सर रख लेते हैं। बटेस्सर पंडित का बचपन और जवानी कैसी थी, वे कहीं नौकरी-चाकरी करते थे या खेती-बाड़ी में ही लगे हुए थे, इस बारे में अब कहीं कोई सूचना बाकी नहीं है। अपने तमाम हमउम्र लोगों की तरह उनका भी शादी-ब्याह हुआ था और उनकी पत्नी बुढ़िया होकर मेरे छुटपन में मरी थीं। उनकी शक्ल मैंने नहीं देखी क्योंकि काफी समय पहले से वे चार-पांच कोस दूर अपने मायके में रह रही थीं।

बटेस्सर पंडित की शादी हुई, गौना आया, और गौने के कुछ महीने बाद ही वे घर से लापता हो गए। इस भारी आपदा को पता नहीं क्यों उनके घर में काफी हल्के ढंग से लिया गया। उनके छोटे भाई तिलकधारी पंडित ने संस्कृत माध्यम से शास्त्री की परीक्षा पास की और आजमगढ़ शहर की क्षत्रिया पाठशाला में पढ़ाने लगे। चालीस-पचास के दशक में गांव में किसी के घर कुछ नकदी आमदनी आना खुद में बड़ी नियामत थी। लेकिन मास्टरी में इतने पैसे न तब मिलते थे, न अब मिलते हैं कि अचानक किसी की पहचान छोटे आदमी से बड़े आदमी की हो जाए।

तिलकधारी पंडित के साथ जब देखते-देखते ऐसा ही हो गया तो गांव में लोगों को इसका राज पता करने की धुन सवार हुई। उनकी यह कोशिश काफी समय बीत जाने के बाद रंग लाई, जब जैसे-तैसे करके तीजू कहार ने भेद खोला कि तिलकधारी पंडित की अमीरी की वजह उनके बड़े भाई बटेस्सर पंडित हैं।

तीजू एक दिन कहीं दूर के गांव में बहंगी पहुंचाकर लौट रहे थे और पड़ोस के बाजार में पानी पीने के लिए रुक गए थे। तभी दुकान में से किसी फुसफुसाती आवाज ने उनका नाम पुकारा। इधर-उधर देखकर उस तरफ नजर फेरी तो पाया कि घूंघट काढ़े, शाल ओढ़े एक पर्देदार औरत वहां बैठी हुई है। पहले तीजू ने उसे अनदेखा किया, फिर सोचा कि शायद गांव की ही कोई औरत हो और उनसे कुछ पूछना चाहती हो। पास गए, पूछा, 'दुलहिन कुछ कह रही हैं?'

एक अजीब सी जनखानुमा आवाज पर्दे से बाहर आई- 'तीजू, हम हैं, बटेस्सर '।

'अरे भइया, आप? ऐसे!'

बटेस्सर बोले कि अब ऐसे ही है। पता चला कि घर से भागे बटेस्सर पंडित ने कहीं जाकर अपना यौन परिवर्तन करा लिया था और हिजड़ों के साथ रहने लगे थे। तीजू से कहकर उन्होंने अपने छोटे भाई तिलकधारी पंडित को गांव से बुलवाया। वे बाजार आकर उनसे मिलने के लिए तैयार नहीं थे। आखिर वे एक शिक्षक थे और गांव-पुर में उनकी भी कोई इज्जत थी। लेकिन थके हुए तीजू ने एक ही दिन में बाजार का दूसरा चक्कर लगाकर जब उन्हें बताया कि बटेस्सर भइया उन्हें कुछ देना चाहते हैं तो जैसे-तैसे वे राजी हो गए।

तीजू गांव की प्रजा थे और उन्हें पता था कि पंडिताने की तरफ से साफ चेतावनी मिलने के बाद जुबान खुलने का नतीजा क्या होगा। लेकिन जुबान तो जुबान है, कुछ समय बीतने के बाद फिसलते-फिसलते फिसल ही गई।

तीजू का कहना था कि राधेश्याम हलवाई की दुकान के पिछवाड़े घूंघट काढ़े बैठे बटेस्सर पंडित का चेहरा उन्होंने अंत-अंत तक नहीं देखा। छोटे भाई को देखकर उन्होंने जो रोना शुरू किया तो हिचकियां रुकने को ही न आईं। अलबत्ता उनसे बात करते हुए तिलकधारी पंडित की आफत आई हुई थी। कोई देख न ले, किसी को पता न चल जाए, कहीं ये ऐसे ही बार-बार आने-जाने न लगें। दो हाथ दूर रूखे बैठे रहे, घर-परिवार की हाल-चाल तक नहीं बताई। बार-बार यही कहते रहे कि अब तुम्हारी अलग जिंदगी है, हमारी अलग।

चलते-चलते एक पोटली बटेस्सर पंडित ने तिलकधारी पंडित के हाथ में सौंपी और कहा- 'यह मेरी बियाहुती (ब्याहता पत्नी) को दे देना।'

तीजू ने अपने जीवन में सिर्फ एक बार, नशे की हालत में या भावुक मानसिकता में किसी एक आदमी को (पता नहीं किसको) यह किस्सा बताया था कि वह पोटली बहुत भारी थी। शायद उसमें कुछ सोना-चांदी रहा हो। पोटली अगर हल्की होती तो शायद बियाहुती के पास पहुंच भी जाती। भारी थी, सो कहां पहुंचनी थी। वह जमीन से उभरते हुए एक आदमी को और ज्यादा तेजी से उभारने के काम आ गई।

ससुराल में देवरों-देवरानियों के राज में दाने-दाने और सूत-सूत की मोहताज हुई बटेस्सर पंडित की ब्याहता अपना पहाड़ जैसा बाकी जीवन काटने मायके चली गईं, जहां बटेस्सर पंडित के लिंग परिवर्तन के बाद भी उन्हीं के नाम का सिंदूर पहनते उनकी मृत्यु हुई। उनके पति के साथ-साथ खुद उनके नाम की विस्मृति में भी पूरे गांव की भागीदारी रही, लेकिन गांव की औरतें किसी ऐंठन की शक्ल में उनके दुख की छाप उनकी मौत के काफी साल बाद तक बचाए हुए थीं।

Friday, November 16, 2007

वनगंध

एक बहुत चौड़ी नहर का पानी टर्बाइनों पर गिरकर बिजली बनाता था। नहर के इस पार बस्ती और उस पार जंगल था। एक पतला सा रास्ता नहर के बांध से जंगल में उतरने के लिए बना था, जिससे कभी लकड़ी तोड़ने तो कभी किसी और काम के लिए लोग जंगल में उतरते थे। दिशा-पानी के लिए उधर जाने का रिवाज नहीं था क्योंकि वह तो बिल्कुल ही जंगल था, कभी कुछ भी हो सकता था। कुछ-कुछ ऐसा ही डर उस तरफ भी था। पानी की उस चौड़ी लकीर को अपनी चौहद्दी मानकर जानवर इस तरफ आने से परहेज करते थे, हालांकि सफाई के लिए नहर पर एक पतले पुल की व्यवस्था भी थी, जिसका इस्तेमाल वे इधर आने में कर सकते थे।

पतले रास्ते से जंगल में उतरो तो थोड़ी दूर तक यह बस्ती जैसा ही नजर आता था। नहर में बहकर आने वाली लकड़ियां और करकट नहर बनने के बाद से ही वहां पड़े थे। और जानवरों की हड्डियां, जो कभी जंगल से नहर पर पानी पीने आए होंगे और धारा में खिंचकर डूब गए होंगे। हर सुबह टर्बाइन से ठीक पहले लगी जालियों की सफाई करते हुए ये सारी चीजें नहर से निकाली जाती थीं और जंगल की तरफ फेंक दी जाती थीं। उनकी सड़ांध जंगल में काफी दूर तक पीछा करती थी।

थोड़ा ही आगे जाने पर एक गहरा खड्ड आता था और रास्ता वहीं अचानक खत्म हो जाता था। चाहो तो खड्ड के किनारे-किनारे चलते चले जाओ। ऐसे नहर और बस्ती से तुम्हारी सुरक्षित दूरी बनी रहेगी। लोग अक्सर ऐसा ही करते थे। गर्मियों के दिनों में लकड़ियां तोड़ने और बकरियां चराने के लिए यह इलाका बिल्कुल सही था। यहां वन विभाग ने साल के पेड़ लगा रखे थे और छिटपुट कुछ झाड़ियां भी उगी हुई थीं। गौर से देखने पर कोई कांच का टुकड़ा, कोई फटा हुआ ताश का पत्ता, किसी जूते का तल्ला या कोई चिथड़ा नजर आ जाता था। लोग आपस में जिस जंगल जाने की बात करते थे वह यही था, लेकिन यह जंगल नहीं था।

जंगल उधर था, खड्ड के उस पार, जहां पहुंचने के लिए पेड़ों की जड़ें पकड़ते हुए लगभग घिसटकर नीचे उतरना पड़ता था। बारिश के दिनों में यहां पानी भरा रहता होगा, लेकिन अभी यहां सिर्फ पतली सी एक धारा बह रही थी। कहां से आ रहा होगा यह पानी, कहां जाता होगा? नहर तो बहुत बाद में बनी है। उससे तो इसका कोई रिश्ता हो नहीं सकता। क्या घुटनों-घुटनों पानी पार करके जंगल में जाने का कोई मतलब है... वह भी बिना किसी हथियार, बिना किसी सुरक्षा के?

खड्ड की नम तली में गाय-भैंसों के खुरों के निशान नजर आते हैं। शायद जंगल के उस पार कोई गांव है, जहां से जानवर चरने के लिए यहां तक आते हैं। किसी भी सूरत में इस जंगल की चौड़ाई दो-तीन किलोमीटर से ज्यादा नहीं होगी। क्या घुसकर देखें कि उस पार कहां निकलते हैं? अब चलना है तो चलना है। क्या इतना सोच-विचारकर कोई जंगल में उतरता है?

एक अजीब गंध थी- कचर हिरियाइन गंध, जो उधर तक पहुंचती जरूर होगी लेकिन पता नहीं क्यों पहले कभी महसूस नही हुई थी। कंटीली झाड़ियां, ऊंची घासें और इक्का-दुक्का ऊंचे पेड़ों के नीचे आपस में उलझे हुए से छोटे-छोटे पेड़। यहां रास्ता किधर से होगा? नहर से दो सौ गज दूर भी नहीं आए और एक जमाना गुजर गया सा लगता है। जमीन पर गिरा हुआ एक सूखा सड़ा खोखला पेड़। बगल में एक बहुत ऊंची दीमक की बांबी। मिनिएचर में किसी पुराने खंडहर जैसी संरचना, जिसे दीमक भी न जाने कब के छोड़कर जा चुके हैं।

यहां समतल कहीं नहीं है। उड्ढे हैं और गड्ढे हैं हर तरफ। जंगल की अपनी जमीन। लेकिन रास्ता यहां भी है। क्या दुनिया में अब ऐसी कोई जगह नहीं बची है, जहां कोई रास्ता न हो? कभी न कभी कोई न कोई हर जगह से गुजरा जरूर है। आदमी न सही, जानवर ही, लेकिन रास्ता बाकायदा है। पेड़ों, झाड़ियों और घासों के बीच बनती-टूटती, ऊपर-नीचे होती एक लकीर। क्या इसी पर होते हुए उस तरफ जंगल के पार निकल जाएं? लेकिन यह तो एक बस्ती से दूसरी बस्ती में जाना होगा। जंगल जाना नहीं होगा।

वह खुद में खुद को छिपाए हुए था। कोई ऐसा फल-फूल, कोई कंद-मूल वहां नहीं था, जिसे खाकर इन्सान बारह-चौदह साल तो क्या चार-छह घंटे भी गुजार सके। मजबूत जड़ों वाले जंडइल बेनामी पेड़ ही वहां खुद को जिंदा रखे हुए थे। जरा सी रोशनी के लिए उन्हें अपनी फुनगियों के लिए जगह अपने तमाम भाई-बंदों के बीच से, उन्हें दबाते-खरोंचते हुए बनानी पड़ती थी। जरा सा ढीला पड़ते ही कोई उन्हें खत्म कर देता था। ऐसे में वे क्या फूलते और क्या फलते। लेकिन फिर भी वहां आवाजों का अपना एक अलग संसार था।

सघन खामोशी में गूंजती लंगूरों, सियारों, गिलहरियों, हुदहुदों, चीलों और जंगली मैनाओं की आवाजें, कहीं दूर से आती ट्रक की दबी-बुसी घरघराहट को किसी और ही ग्रह की आवाज बनाती हुई । नहर, पॉवर हाउस, सड़क और तमाम नए-पुराने इन्सानी सरंजामों से बेखबर, उन्हें अपने हाल पर छोड़ती हुई सीली, अंधेरी, कचर हिरियाइन गंध वाली जंगल की अपनी दुनिया, जो दिनोंदिन सिमटते जाने के बावजूद न जाने कितने करोड़ वर्षों से ऐसे ही चल रही है...जो न जाने कितने साल और चल पाएगी।

Wednesday, October 24, 2007

प्रेमरस खुजली

क्या किसी प्रेम में डूबे व्यक्ति को देखकर आपको खुजली की दवा का विज्ञापन याद आ सकता है?
जी हां, बिल्कुल याद आ सकता है- 'खुजली करने वाले, पी-टेक्स लगा ले/पी-टेक्स लगाके तु अपनी...दाद-खाज-खुजली मिटाले। ओए, ओए...।' खासकर तब, जब प्रेम करने वाला रोज सुबह ही सुबह आपको दफ्तर के दरवाजे पर घेर ले और किसी अंतहीन आलाप की तरह अपने प्रेम का किस्सा शुरू कर दे। एक ऐसे प्रेम का किस्सा, जो है भी या नहीं, इसे लेकर वह खुद दुविधा में नाक तक डूबा हुआ हो।

'आज उसने मेरे सामने उसकी तरफ देखकर ऐसा-ऐसा कहा। मैं जानता हूं कि यह बात वह मेरे लिए कह रही थी, उससे कहने का तो सिरफ बहाना कर रही थी।'
'आपको कैसे पता कि आपके लिए कह रही थी।'
'ओए, मुझे नहीं पता होगा तो क्या तुझे पता होगा?'
'लेकिन आपके लिए कह रही हो तो भी, इसमें ऐसी क्या बात है, जो इतने उतावले हुए जा रहे हैं?'
'है न! बात तो है, बस तेरी सम्झ में नहीं आ रही है...'
'तो बता क्यों रहे हैं यार?'
'अब बताने की बात है तो बता रहे हैं...'''

या फिर,
'देख, देख...कल यहीं बैठा मैं नीले रंग की तरीफ कर रहा था और वो नीला सूट पहनकर आ गई।'
'लेकिन वह सूट नीला नहीं, बैंगनी है।'
'है तो नीले का ही कोई शेड। यकीन मान, मैं तरीफ न करता तो कोई और कलर पहनकर आई होती।'
'अरे, बैंगनी उसका फेवरिट कलर है। रोज तो वही पहनकर आती है...'
'और तू देखता है रोज, ऐं?'
'नहीं नहीं...ऐसा नहीं है...'
'....'
'चलिए, आ गई पहन के, अब क्या?'
'अब क्या? अब तो देखते जाओ बस...'

एक दिन,
'यार ये दुनिया बड़ी कुत्ती चीज है...'
'क्यों? क्या हुआ?'
'अबे छड यार, बस ये है ही ऐसी।'
'चलिए, छोड़ दिया।'
'........'
'........'
'अब लंच के टाइम गया था कैंटीन। तभी वो आ गई। अरे उसके साथ टहलती रहती है जो।'
'किसके साथ? बैंगनी वाली के?'
'और क्या। बैठा ही था, तबतक सामने वाली सीट पर आकर बैठ गई। करने लगी गल-बात। मैं कया, क्या लेंगी, तो चिकन बोल बैठी। बैरे को बुलाया ही था कि चले आए साले पांच-सात। बैठ गए...हमारा भी चिकन, हमारा भी चिकन। मोबाइल के बिल के लिए पैसे लाया था, पूरा पर्स ही खाली हो गया...'
'ओह...ओह, चलिए, प्यार में ऐसा भी होता है।'
'प्यार न घंटा। प्यार का साला कुछ पता नहीं, मुफतखोर मजे कर गए...'

'आज जानता है क्या हुआ?'
'मुझे नहीं जानना।'
'अरे सुन तो सही।'
'मुझे नहीं सुनना।'
....
'अरे बिल्कुल अलग बात है।'
'आप लोग शादी करने जा रहे हैं?'
'नहीं, वो शादी करने जा रही है यार।'
'तो, क्या शादी में बैंड बजाने का इरादा है?'
....
'यार, मैं उसको जानता हूं...उस लौंडे को। उसकी लाइफ बर्बाद कर देगा...बेच डालेगा कहीं ले जाकर...'
....
'उस दिन चिकन उसने भी खाया था?'
'वही तो लेकर आया था सबको...हर वक्त खी-खी करता रहता है साला...
....
'और बात भी मेरे सामने ऐसे करते थे दोनों, जैसे ममूली जान-पहचान हो सिरफ...ओह, ये साली दुनिया...कितने कमीने हो गए हैं लोग, ओह...'

क्या शुरू में खुजली के मलहम वाले विज्ञापन की याद दिलाकर मैंने कुछ गलत किया?

Tuesday, July 31, 2007

बदरी में कजरी

सावन का मतलब मोटे तौर पर हमारे लिए था कजरी, कबड्डी और पंचईं, यानी नागपंचमी। इसके आगे-पीछे कुछ चीजें और थीं, जैसे गुड़ुई पीटना और झलुआ झूलना। लेकिन इनका संबंध लड़कों से कहीं ज्यादा लड़कियों से था। नागपंचमी के दिन गुड़ुई सेरवाने के लिए लड़कियां सुबह से ही गुड़िया बनाने में जुट जातीं। रुमाल जितनी बड़ी पीली चूनर पहने सिंदूर से टीकी गई छोटी-छोटी अनगढ़ गुड़ियां, जिन्हें पत्तल में, फिर थाली में रखकर लड़कियां गाती हुई पोखरे तक ले जातीं और वहां कुछ और खटकरम करके पत्तल समेत पानी में बहा देतीं। इसके साथ ही छोटे-छोटे दोनों में आटे के दिए जलाकर पानी में प्रवाहित किए जाते।

ढाक-पलाश की झाड़ियां इस दिन बहुत महत्वपूर्ण हो जातीं। इनके पत्तों से ही पत्तलें और दोने बनते और गोजा कहलाने वाले इनके सीधे-सीधे डंडों को छीलकर लड़के इनपर कलाकारी करते। ये डंडे बाद में पोखरे पर किशोरावस्था का शुरुआती पराक्रम लड़कियों के सामने प्रदर्शित करने के काम आते। गुड़ुई सेरवाने वाली लड़कियां लगभग सारी की सारी रिश्ते में बहन ही होतीं लेकिन ऐसे मौकों पर उनमें कोई ज्यादा तो कोई कम और कोई बहुत-बहुत ही कम बहन लगने लगती।

लड़कियों के गुड़ुई सेरवाने के बाद लड़के अपना-अपना छिला, रंगा, तेल लगाया डंडा लेकर झमाझम पोखरे में कूदते और पीट-पीटकर इन गुड़ियों की धज्जियां उड़ा देते। इस मौके पर अगर बूंदें पड़ रही होतीं तो लड़कों का मजा और बढ़ जाता। वैसे यह बात मेरी समझ में आज तक नहीं आई कि ये गुड़ियां किस चीज के प्रतीक के रूप में पानी में प्रवाहित की जाती थीं और लड़के इन्हें इतनी बेरहम बहादुरी से पीटते क्यों थे।

घरों में मांएं इस दिन दाल भरी पूड़ियां और बखीर बनाती थीं। बखीर यानी थोड़ा सा दूध डालकर या बिना दूध के ही बनी गुड़ की लगभग भात जैसी गाढ़ी खीर। सुबह से ही घर से लेकर बाहर तक जबर्दस्त गहमागहमी। लड़कियां, लड़के, महिलाएं और पुरुष, सभी अपने-अपने ढंग से व्यस्त। दोपहर होते-होते सभी लड़के, अधेड़ और बुजुर्ग गांव के सिवान में पहुंच जाते जहां दो-तीन घंटे जमकर कबड्डी होती। जिनके हाथ-पैर कबड्डी में चलने लायक नहीं होते उनकी जुबान चलती। किनारे खड़े होकर वे या तो धर-धर मार-मार करते या फिर अपने जवानी के दिनों की डींगें हांकते।

कबड्डी का खेल काफी जोखिम भरा होता था क्योंकि खेल के अलावा इसमें पुश्तैनी कसान भी निकाली जाती थी। जैसे मेरे दादा ने एक बार कबड्डी खेलते हुए आपके दादा का कंधा या हंसुली की हड्डी तोड़ दी थी और ठीक यही काम आपके पिताजी जीवन भर की कोशिशों के बाद भी मेरे पिताजी के साथ नहीं कर पाए तो आपकी पूरी कोशिश होगी कि इस बार की पंचईं में कबड्डी के दौरान मेरा कंधा या हंसुली की हड्डी नहीं तो दाहिना पंजा ही हुमचकर तोड़ दें। दोपहर होते-होते किसी न किसी को स्पिरिट मलने या उठाकर डॉक्टर के यहां ले जाने की नौबत आ ही जाती। जिस साल ऐसा नहीं होता उस साल लोगों को पंचईं का रोमांच पूरा नहीं पड़ता।

कबड्डी के बाद शरीर में मोटी-मोटी मिट्टी चिपकाए लोग उड्ढी कूदने और अखाड़ेबाजी करने पहुंचते। ऊंची उड्ढी बनाकर उसपर से लंबी कूद कूदने की प्रैक्टिस हफ्तों से चल रही होती लेकिन कूद का कंपटीशन जब वाकई शुरू होता तो उसका आकर्षण अच्छा कूदने वालों से ज्यादा नमूने किस्म के कुदाक होते। कभी देबी भइया तो कभी बबऊ बाबा अपनी विशाल तोंद हिलाते दूर से दौड़ते हुए कूदने आते और अपने पांव के धक्के से उड्ढी ही धसका देते। फिर लड़कों को भुनभुनाते हुए दुबारा उड्ढी बनानी पड़ती। उसपर दूर से ला-लाकर दूब के चकत्ते रखने होते कि कहीं कोई पराक्रमी उड्ढी को दुबारा न धसका दे।

ऐसे मौकों पर मेरे दादाजी का किस्सा कोई न कोई जरूर उभार देता, जिनका लंबी कूद का रिकॉर्ड गांव में उनकी मौत के कई दशक बाद तक कायम था। कोई इसे बारह तो कोई चौदह हाथ बताता, जो नाप में अट्ठारह से इक्कीस फुट के लगभग दूरी के समतुल्य है। कॉलेज स्तर के कंपटीशनों के लिए यह सामान्य दूरी समझी जाती है लेकिन गांव में एक मरे हुए आदमी का मिथकीकरण इतनी ही दूरी को हमेशा के लिए असाधारण बना चुका था।

कुश्ती के लड़वैये मेरा समय आने तक गांव में ज्यादा नहीं बचे थे। ऊंची जातियों के बीच खानदानी कसान बहुत ज्यादा बढ़ गई थी लिहाजा उनके बीच से लड़ने के लिए कोई अखाड़े में नहीं उतरता था। बाकी जातियों के लोग आदेश और उकसावे पर लड़ने के लिए आते थे और उनके बीच भी चित करने या होने की नौबत शायद ही कभी आती थी। ज्यादातर मामलों में कमजोर पड़ने वाला जवान पेट को मिट्टी से चिपकाकर पड़ जाता था और आखिरकार कुश्ती बराबर छूट जाती थी।

इस समय तक दोपहर हो गई होती थी और सबकी भूख तड़क गई रहती थी। भागकर हम घर आते और खूब दबाकर पूड़ी-बखीर खाते। दो-तीन बजे तक झलुआ पड़ने का नंबर आता। अगर बारिश नहीं हो रही होती तो इस समय तक धुंआई डकार लेते हुए हम झलुए तक पहुंच जाते। गुनीजनों ने मेरे समय तक साइकिल के टायरों का झलुआ डालना सीख लिया था, लेकिन आम तौर पर उबहन के मोटे-मोटे रस्से इस काम में लाए जाते। कोई चौड़ा पटरा या हेंगा किसी बरगद की मोटी डाल पर टांगा जाता। इसपर लड़कियां बैठतीं और कजरी गातीं। लड़कों की ड्यूटी पेंग मारने की होती।

पेंग मारने के लिए एक खास कौशल की जरूरत थी जो मुझमें कभी ज्यादा विकसित नहीं हो पाया। मैं झूले को जमीन से डाल की लगभग तीन चौथाई ऊंचाई तक ही उठा पाता था जबकि सिद्ध लोग इसे बिल्कुल खड़ा कर देते थे। इस कौशल का चरम यह माना जाता था कि झूले पर बैठी लड़कियां बारी-बारी से चीखती और खिलखिलाती हुई आपके हाथ-पैर जोड़ने लगें- 'रोक दा, ए भइया रोक दा, गिर जाइब, घुमटा आवत ह'।

इस चक्कर में कुछ ज्यादा ही कौशलयुक्त लोग इतनी जबर्दस्त पेंग मार देते थे कि झलुआ ही पलट जाता था। ऐसे में दो-चार के हाथ-पैर टूट जाते थे, जिसकी खबर आग की तरह पूरे इलाके में फैल जाती थी। रात में झलुए पर लड़कियों से ज्यादा गांव की नई बहुएं होतीं और इस वक्त पेंग मारने का हक कुछ विशेषाधिकार प्राप्त लोगों को ही प्राप्त होता। यह हक उन्हें कैसे और क्यों मिलता, इसका पता मैं कभी नहीं लगा पाया, अलबत्ता हर पंचईं की अगली सुबह उनके बारे में रसीले किस्से सुनकर उनकी पांत में शामिल होने के बारे में बराबर सोचता था।

सावन में तीज और नागपंचमी के मौके पर गाई जाने वाली कजरियां अब ध्यान में नहीं आतीं। 'झलुआ परै कदम की डरिया झूलैं कृष्ण मुरारी ना' को तुक बिठाने की गरज से 'झूलै कृष्ण मुररिया ना' करके गौनहारियों की गालियां सुनने की बात याद आती है। इसके अलावा जिन कजरियों का सुर पड़ता है वे शायद रेडियो पर सुने गए सरकारी टाइप गाने हैं और उनमें कोई खास दम नहीं है।

सिर्फ एक कजरी ऐसी है जिसे शायद गांव में मेरी पीढ़ी के लोग कभी न भूलें। रामपत चाचा लखनऊ गए और वहां से तबला-हारमोनियम सीखकर लौटे। एक बार होली के दिन लोग चौताल गाने बैठे तो रामपत चाचा को चढ़ाया गया कि इस देहात में आप ही हैं जिन्होंने संगीत की शिक्षा ली है, कुछ तो सुनाएं कि हमारा भी जनम सफल हो। उन्होंने तबले पर कुछ टीमटाम किया और गाया- 'हरे रामा कृष्ण बने हैं मनिहारी, पहिर लिए सारी रे हरी'। फगुआ के मौके पर कजरी की यह तान सुनकर लोग हो-हो करके हंस पड़े और रामपत चाचा ने गांव में गाने की हिम्मत इसके बाद कभी नहीं की।

Saturday, July 28, 2007

अस्सी के नामवर

बड़े लोगों का साठ, सत्तर या अस्सी पार करना खुद में कोई ऐसी बात तो नहीं है कि उसपर कोई लंबा-चौड़ा पसारा किया जाए लेकिन बात अगर डॉ. नामवर सिंह की हो तो उनके बारे में कुछ कहने का मौका चूकने का दिल नहीं करता। कई बार नामवर जी पर लिखने का मन बनाया है, यह और बात है कि यह पहली ही बार उनके बारे में औपचारिक रूप से कुछ कह रहा हूं।

नामवर जी की परस्पर दो बिल्कुल विरोधी छवियां मेरे मन में हैं। उनकी व्यावहारिक छवि पूरी तरह एक ऐसे व्यक्ति की है, जिसका ताना और बाना दोनों सत्ता के रेशों से बटकर तैयार किए गए हैं। राजकमल प्रकाशन से लेकर मेरे मौजूदा संस्थान तक मैंने उन्हें सत्ता की भाषा बोलते, इसी के लिए अपनी सारी रचनात्मकता और प्रतिबद्धता का इस्तेमाल करते देखा है। निर्णय के सभी मौकों पर उनके भीतर कोई दुविधा नजर नहीं आई। हर बार उन्होंने वही किया जिससे सत्ता के साथ उनके संबंध और प्रगाढ़ हों। इसमें व्यवधान सिर्फ तभी आया जब गलतफहमी में निचले स्तर की सत्ता उन्होंने खुद को मान लिया और किसी पुराने खिलाड़ी से भिड़ गए। ऐसे मौकों पर उन्हें बुरी तरह मुंह की खानी पड़ी। हालांकि बिल्कुल चारो खाने चित्त हो जाने के बावजूद अपनी पीठ की धूल उन्होंने कुछ इस तरह झाड़ी जैसे यूं ही जरा सा पांव फिसल गया हो।

नामवर सिंह का दूसरा चेहरा मेरे मन में उनकी लिखी किताबों से उभरता है। ऐसी गिनती की कुल दो किताबें मैंने पढ़ी हैं- 'दूसरी परंपरा की खोज' और 'कविता के नए प्रतिमान'। मैं नहीं जानता कि साहित्य महारथियों की राय इन किताबों के बारे में कैसी है, लेकिन मुझे लगता है कि आधुनिक हिंदी साहित्य के कुछ बुनियादी संस्कार अर्जित करने के लिए ये किताबें एक बेहतर रास्ता हैं। इनमें कविता पढ़ने और कविकर्म को सामाजिक संदर्भ में देखने की एक बुनियादी तमीज मौजूद है। हमारी भाषा में यह चीज पता नहीं कैसे बार-बार इस कदर लापता हो जाती है कि हर किसी को उसे नए सिरे से खोजना पड़ता है, या फिर बिना इस तमीज के ही सिर्फ गदर काटते हुए साहित्य का भवसागर पार कर लेना होता है।

'कविता के नए प्रतिमान' पर मेरे बहुत सारे सवाल रहे हैं, जिनके बारे में नामवर जी से बहस करने की मेरी बड़ी इच्छा रही है। मसलन यह कि तमाम अच्छाइयों के बावजूद क्या हिंदी कविता को सार्वजनिक दायरे से निजी दायरे में समेट देने में भी इन प्रतिमानों की कोई भूमिका रही है? मसलन यह कि कविता के परंपरा-अर्जित उपादानों को नया करने की बात अगर भारत में उर्दू और यूरोप में रूसी जैसी कई भाषाओं में आज भी पूरी शक्ति से मौजूद है, यहां तक कि फ्रेंच और अंग्रेजी में भी जब-तब लय-छंद की खोज की लहर चल पड़ती है तो इस दिशा में किए गए रघुवीर सहाय और केदारनाथ सिंह के छुटपुट प्रयासों की कमर आज यूं टूट गई सी क्यों लगती है? क्या इसकी जड़ में ऐसे प्रयासों को कालातीत मान लेने की कोई वैचारिक प्रवृत्ति काम कर रही है, जिसके सूत्र साठ के दशक में शीर्ष तक पहुंचकर अचानक ढल गई हिंदी आलोचना में मौजूद हैं?

नामवर सिंह लिखना एक जमाने से छोड़ चुके हैं लिहाजा उनके लिखे से बहस करने की अब कोई गुंजाइश नहीं है लेकिन आक्रोश और प्रतिवाद का वक्त गुजर जाने के बाद मैं सोचता हूं कि वे आज लिखते भी रहते तो क्या कवियों की कमजोरियों का गुस्सा एक आलोचक पर उतारना सही रहता? नामवर सिंह वाल्टर बेंजामिन की तरह चीजों के नए संदर्भ पेश कर देने वाले रचनात्मक आलोचक नहीं हैं लेकिन उन्नीसवीं के अंत और बीसवीं सदी की शुरुआत में अगर बॉदिलेयर के नेतृत्व में फ्रांसीसी कविता की एक नई धारा आधुनिक भावभूमि में छंद को नए सिरे से जिंदा करती हुई न आ जाती तो बेंजामिन भी आखिर क्या करते?

ज्यादा क्या कहें अगर हिंदी के कथित युवा कवि अपनी आलोचनाओं को छपाने से पहले ही आलोचकों के पास उन्हें जंचवाने चले जाएंगे तो आलोचक के मन में कविता पर कुछ नया सोचने का स्फुरण कहां से आएगा? इस लिहाज से आलोचना के सामने नए के नाम पर थोड़ी-बहुत चुनौती विनोद कुमार शुक्ल पेश करते हैं, हालांकि मुझे उनके काम का नयापन कहन के दायरे को पार कर कथ्य तक पहुंचता कम ही नजर आता है। बाकी विष्णु खरे से लेकर वीरेन डंगवाल तक और अरुण कमल से लेकर अशोक वाजपेयी तक मौजूदा समय के ज्यादातर बड़े कवियों को या तो आलोचना की जरूरत ही नहीं है या अपनी रचना से ज्यादा उनकी दिलचस्पी अपना आलोचना शास्त्र गढ़ने में नजर आती है।

नामवर सिंह के लिखना छोड़ने से सबसे ज्यादा खलने वाली बात साहित्य की संस्कृति के पराभव के रूप में देखने को मिली है। बड़ी आसानी से इसकी जगह गपाष्टकों और अफवाहबाजियों ने ले ली है, जिसका हल्का रूप लगभग हर हफ्ते जनसत्ता अखबार में और साल में कम से कम एक बार अत्यंत गर्हित रूप में आउटलुक नाम के हिंदी साप्ताहिक में देखने को मिलता है। काश, किसी दिए से निकला कोई जिन्न हिंदी में नए सिरे से साहित्य की उसी संस्कृति को एक बार फिर प्रतिष्ठित कर देता, जो नामवर सिंह की लिखी दो किताबों- 'कविता के नए प्रतिमान' और 'दूसरी परंपरा की खोज'- की शक्ल में इतनी आसानी से हमें खुद में समाहित कर लेती है।

Tuesday, July 24, 2007

असीमा-आलोक उर्फ 'क्या आप अपनी पत्नी को पीटते हैं?'

मित्रो, वाइरल फीवर ने जकड़ रखा था, आज ही उठकर दफ्तर पहुंचा हूं। असीमा भट्ट के दारुण दांपत्त्य की कथा कथादेश, कई दूसरे हिंदी प्रकाशनों और रियाज उल हक के ब्लॉग पर प्रकाशित होकर समाज में जबर्दस्त चर्चा में है। उस हिसाब से ब्लॉग पर ज्यादा कुछ नहीं हुआ है। अभय जी और नीलिमा जी ने कुछ पहलकदमी ली है लेकिन ज्यादातर लोग असमंजस में हैं।

असमंजस की वजहें हैं। सूचनाएं अभी इकतरफा हैं। दूसरा पक्ष भले ही असीमा को 'धमकियां देने' जैसे गर्हित कर्म कर रहा हो, लेकिन कम से कम किसी दर्जशुदा अभिव्यक्ति की दृष्टि से उसे मौन ही कहा जाएगा। यह एक पति-पत्नी का मामला है और शालीनता हमसे यह मांग करती है कि इसपर हम अपना गुस्सा भले जताएं लेकिन फैसला दोनों पक्षों को सुनने के बाद ही दें। सबसे बढ़कर इस मामले का केंद्रीय चरित्र एक अतिसंवेदनशील रेडिकल वाम कवि है, जिसकी अपनी एक लार्जर दैन लाइफ छवि है- सो क्या कहें, कैसे कहें!

इससे पहले ठीक ऐसा ही मामला नामदेव ढासाल का उछला था जिन्हें मराठी ही नहीं, पूरे भारत के रेडिकल दलित आंदोलन और दलित साहित्य के भीष्म पितामह जैसा दर्जा हासिल है। इससे भी पहले ब.व. कारंत और विभा कारंत का प्रकरण सामने आया था, जिसमें संवेदनशील कलाकार में लोगों को अचानक घरेलू कसाई की सी छवि नजर आने लगी थी। फिल्मी दुनिया के दांपत्त्य में तो ऐसे हजारों मामले होते होंगे लेकिन ज्यादा पैसे और ताकत वाला उपादान होने के चलते फिल्मी झगड़े सतह पर नहीं आने पाते और आ भी जाएं लोग उन्हें उतनी गंभीरता से नहीं लेते।

पति-पत्नी का रिश्ता भारतीय समाज में पुरुष की तरफ बहुत ज्यादा झुका हुआ है और जैसे-जैसे यहां पैसा-पॉवर बढ़ रहा है वैसे-वैसे यह लोकतांत्रिक होने के बजाय और भी ज्यादा पुरुष-वर्चस्व से ग्रस्त होता जा रहा है। समाज में मूल्यों को लेकर कोई बहस नहीं रह गई है और कभी-कदा यह चलती भी है तो इसका उद्देश्य प्रदर्शनात्मक होता है। यानी इसे दिखाकर कुछ पैसे कमा लेने का- जोकि अब भारतीय समाज में मूल्य का एकमात्र अर्थ और अर्थ का एकमात्र मूल्य रह गया है। ऐसे में किस दंपती की हांड़ी में क्या खिचड़ी पक रही है, इस बारे में सारे अनुमान कभी भी हांड़ी फूट जाने की आशंका के साथ जुड़ गए हैं।

क्रांति भट्ट और आलोक धन्वा की शादी के वक्त मैं पटना में नहीं था लेकिन अलग-अलग इन दोनों व्यक्तित्वों के बारे में पटना में रहते थोड़ी-बहुत जानकारी मुझे थी। जून 1988 में मैं पटना पहुंचा था और इसके कुछ ही महीने बाद हंस में ताजा-ताजा छपी भागी हुई लड़कियां समेत उनकी चार कविताओं को पढ़कर उनका दीवाना हो गया था।

रामजी भाई और महेश्वरजी के साथ मेरी भागी हुई लड़कियां की एक पंक्ति 'जहां प्रणय खुद में पूरा का पूरा एक काम होगा' को लेकर बड़ी जबर्दस्त बहस हुई थी। मेरा कहना था कि मनुष्य के काम्य समाज का यह एक अच्छा चित्रांकन है, जबकि मेरे इन वरिष्ठों का मानना था कि प्रणय जहां खुद में पूरा का पूरा एक काम होगा वह एक जड़ समाज ही होगा और एक काम्य प्रणय वही हो सकता है जो एक बेहतर समाज की रचना के स्वप्न से जुड़ा हो। खूब छूटकर बहस हुई, और जैसा तब की मेरी ज्यादातर बहसों के साथ होता था, अंत में मैं रुआंसा हो गया और मन ही मन रामजी राय और महेश्वर को जड़सूत्री आदि कम्युनिस्ट गालियों से नवाजने लगा। पता नहीं इस बहस का कोई मतलब भी था या नहीं क्योंकि अब इसका कोई सिर-पैर मेरी समझ में नहीं आता।

इस बहस के कुछ समय बाद जब हम लोग आलोक धन्वा से मिलने उनके फ्लैट पर गए तो धन्य-धन्य का भाव थोड़ा कम हो गया। कम्युनिस्ट जार्गन से जुड़ी तमाम जानकारियों के बावजूद आलोक धन्वा का बहस-मुबाहिसे से कोई लेना-देना नहीं है। उनसे बात करने का मतलब है वे बोलते रहें और आप सुनते रहें और वे अंत में कहें कि बहुत अच्छी बातचीत हुई और आप जवाब में कहें कि हां, इस जीवन में इस बातचीत को आप कभी भूल नहीं पाएंगे। इससे भी ज्यादा खुजली पैदा करने वाली चीज थी विवाह को लेकर उनकी प्रचंड इच्छा, जिसका उनकी क्रांतिकारी गुरुगंभीरता के साथ कोई तुक नहीं बनता था। इस सिलसिले में रामजी भाई ने अपनी एक साली के साथ शायद उनकी कुछ बातचीत भी चलाई थी, जो पता नहीं किस वजह से सिरे नहीं चढ़ सकी।

बाद में जब जनमत निकालने मैं भोजपुर से दिल्ली आया तो पता चला कि आलोक धन्वा ने क्रांति भट्ट से शादी कर ली। मुझे याद नहीं आता कि पटना में किसी रंगमंच पर मैंने क्रांति भट्ट को अभिनय करते देखा था या नहीं, लेकिन आईपीएफ दफ्तर में अक्सर नजर आने वाले भट्ट जी की प्रतिभाशाली बेटी के रूप में उनकी एक धुंधली सी शक्ल मेरे दिमाग में जरूर थी। भट्ट जी की छवि हमारी नजर में जरा हल्के आदमी की थी क्योंकि वे किसी के भी बारे में कुछ भी बोल देते थे- जैसे शाहिद अख्तर या इरफान के बारे में यह कि यही हमारे सैयद शहाबुद्दीन हैं।

सचाई चाहे जो भी हो लेकिन हमारे बीच चर्चा यही थी कि आलोक धन्वा किसी मंच पर कविता पढ़ने के बाद अपना मेलोड्रामा फैलाए हुए थे- मैं अस्वस्थ हूं, मेरी देखरेख कौन करेगा, इस आयु में मुझसे विवाह कौन करेगा, कि तभी भट्ट जी की बेटी ऑडिएंस के बीच से खड़ी हुई और बोली- मैं करूंगी। उसका ऐसा करना हमारी नजर में झट से चंग पर चढ़ जाने वाली भट्ट जी की पारंपरिक छवि से बिल्कुल मेल खाता था, लिहाजा इस कहानी को क्रॉस करने की जरूरत हमें कभी महसूस नहीं हुई।

अब असीमा की कहानी से पता चल रहा है कि बाकायदा एक योजना बनाकर आलोक धन्वा ने उन्हें शादी के बंधन में बांधा। सचाई क्या है, इसका पता शायद बाद में चले, या कभी न चले, लेकिन इतना तो तय है कि शादी-ब्याह जैसे मामलों में किसी भी बिंदु पर यदि आप खुद को वस्तु बन जाने देते हैं- यानी अपनी होनी का फैसला आप किसी और के हाथ में सौंप देते हैं- फिर चाहे वे आपके माता-पिता हों, या आपका प्रेमी या कोई प्रिंस चार्मिंग या धीरोदात्त नायक, या कोई क्रांतिकारी योद्धा या नए युग की आवाज के रूप में प्रतिष्ठित कोई दैवी प्रतिभा- तो फिर आगे भी वस्तु बनकर जीना ही आपकी नियति होगी। भले ही चमचे पत्रकारों द्वारा वर्णित असीम-अलौकिक प्रेम का महिमामंडित मुलम्मा आप पर अनंत काल तक चढ़ा रहे, लेकिन एक खुदमुख्तार व्यक्ति बनकर जीने का गौरव आप बहुत भारी कीमत चुकाए बिना फिर कभी नहीं हासिल कर सकेंगे/सकेंगी।

क्रांति भट्ट उर्फ असीमा भट्ट से यह गलती मूर्खता/भोलेपन में हुई या किसी साजिश के फेर में फंसकर वे इसकी शिकार हो गईं, लेकिन इतना तो तय है कि शादी करने का फैसला उनके गले पर चाकू या माथे पर कट्टा रखकर नहीं कराया गया था। अंततः यह उनका अपना फैसला था, और अपनी कथा के दौरान जब वे इसे ओन नहीं करती सी नजर आती हैं तो बड़ा अजीब, लिजलिजा सा लगता है।

इस कहानी में सिर्फ एक बात और मुझे अजीब लगी- आलोक धन्वा की वरिष्ठ प्रेमिका वाली बात। वह जो भी महिला हैं- यदि वे वास्तव में हैं तो- प्रणम्य हैं। मेरा दावा है कि बिना सिरदर्द की गोली लिए आप अकेले-अकेले आलोक धन्वा के साथ दो घंटे नहीं गुजार सकते। और इतने सारे ऐडिशनल सिरदर्द के बाद भी यदि कोई बाल-बच्चेदार साठ-पैंसठ साल की महिला आलोक धन्वा के साथ इस कदर प्रेम करती रही कि उसकी बहुत सुंदर नवयौवना पत्नी अंततः परित्यक्ता बनकर रह गई- ऐसी स्त्री के प्रति संपूर्ण मानव जाति का सिर सम्मान से झुक जाना चाहिए।

जब मैं आरा में पार्टी का काम देख रहा था तो सभी पार्टी सदस्यों की एक मीटिंग इस अकेले मुद्दे पर बुलाई गई थी- 'क्या आप अपनी पत्नी को पीटते हैं?' जाहिर है, यह एक गलत उनवान था क्योंकि मीटिंग में एक-दो स्त्रियां भी शामिल थीं। पूरी मीटिंग में हम जैसे छड़ों और रिक्शा यूनियन के अध्यक्ष गोपालजी को छोड़कर (जिनका कहना था कि उन्होंने कभी अपनी पत्नी पर हाथ नहीं उठाया, उल्टे उनकी पत्नी ने ही एक बार ऐसा किया था। बाद में इस बात की तस्दीक भी हुई। उनकी पत्नी अस्पताल में दाई का काम करती थीं। दोनों लोगों ने आरा में ही स्थित अपने-अपने घरों से भागकर विवाह किया था और अपने रस्टिक अपीयरेंस के बावजूद दोनों के बीच लैला-मजनूं जैसा प्रेम था।) बाकी सभी ने कबूल किया कि इस या उस वजह से उन्होंने पत्नी को पीटा जरूर है।

मीटिंग से एक आम राय यह निकलती दिखी कि घरेलू तनाव में ऐसी स्थितियां पैदा होती हैं लेकिन ऐसे में अपने आवेगों से अपने मूल्यबोध के जरिए निपटा जाना चाहिए। तभी मीटिंग में एक प्रबल प्रतिवाद का स्वर उभरा। हमारी नाटक टीम युवानीति के निर्देशक सुनील सरीन थे और उनकी पत्नी अनुपमा उस समय हमारे पास उपलब्ध सबसे अच्छी अभिनेत्री थी। सुनील ने कहा था कि नौकरी न मिलने के फ्रस्ट्रेशन में एक बार अनुपमा पर उनका हाथ उठ गया था।

जाहिर है, होम्योपैथी की दवाई जैसे अहानिकर/अलाभकर अंदाज में मीटिंग का खत्म होना अनुपमा को अच्छा नहीं लग रहा था। उसने संयोजक को हाथ से रुकने का संकेत किया और बोली, 'सुनील को अगर नौकरी न मिलने का इतना ही फ्रस्ट्रेशन था तो वे अपने हाथ-पैर तोड़ लेते, मर जाते, लेकिन इन्होंने मुझे क्यों मारा?' यह बात मूल्यबोध जैसे किसी भी बौद्धिक नुस्खे से ज्यादा ताकतवर थी। सबको लगा कि गृहस्थी के मामले पुरुषों के मूल्यबोध पर छोड़ने का वक्त अब जा चुका है। मुझे लगता है कि असीमा की करुण कथा में अनुपमा जैसी ऐंठ की थोड़ी गुंजाइश जरूर होनी चाहिए थी- अगर वह होती तो आलोक धन्वा में देवता और राक्षस, दोनों देखने के जो अतिरेक इतना परेशान करते हैं, वैसा न होता और हम जान पाते कि अच्छी कविताएं रचने वाला यह जो आदमी है, वह सचमुच कैसा है।

Wednesday, July 11, 2007

जात के आर-पार देबी भइया

'अरे मैं नायं कही अइया, वहै मोटहा कहा होइगा' (अरे, मैंने नहीं कहा अम्मा, उसी मोटे ने कहा होगा)- यह बात मेरे गांव की भोजपुरी जुबान में नहीं, करख्त किस्म की ठेठ पछांह अवधी में कही जा रही है। न जाने कितने साल पहले सुनी गई यह हरदोई वाली बड़की भउजी की बोली है, जिससे फिलवक्त मेरे कान बज रहे हैं। बड़की भउजी यानी देबी भइया की पत्नी। पचपन का दूल्हा और पचास-बावन की दुल्हन- इसी शक्ल में इस जुगलजोड़ी का एक दिन मेरे गांव में पदार्पण हुआ था और जवान होते लड़कों से लेकर पकी उम्र वाली बहुओं तक के लिए इसके साथ ही एक मुफ्त का सिनेमा शुरू हो गया था।

अधेड़ उम्र में बनी इस जोड़ी का प्यार जितना अद्भुत था, वैसे ही जुलुमजोर इसके झगड़े भी थे। दो कोठरी वाले अपने घर में गर्मियों की दोपहर भर इनका प्रेमालाप लक्ष्मण-परशुराम संवाद की ऊंचाई पर चलता था। इधर से- 'तुम मेरे बिना इतने दिन कैसे रहे', तो उधर से- 'भगवान ने अबतक तुम्हें मेरे ही लिए बचाकर रखा' ।

बाहर लौंडों-लपाड़ियों की एक बिखरी हुई भीड़ यह संवाद प्रेमपूर्वक सुनती थी और पंखा झलते हुए देबी भइया के घर से बाहर निकलते ही सारा कुछ ज्यों का त्यों दुहरा देती थी। बड़े दुलार के साथ, जैसे यह अपनी अबतक नाकारा समझी जा रही मर्दानगी का प्रशस्तिपत्र हो, देबी भइया मुस्कराते हुए हमें गालियां देते और धमकाते कि आगे अगर कभी हम लोग दोपहर के वक्त यहां दिखाई दिए तो टांग पकड़कर घिर्राते हुए नहर में फेंक आएंगे।

बहुत जल्दी, शादी के एक-दो महीने बाद ही उनके झगड़े भी शुरू हो गए, जिसमें दोनों पक्ष से बाकायदा लाठियां चलती थीं। देबी भइया एक लंबे-चौड़े ठीक-ठाक तोंद वाले आदमी थे तो बड़की भउजी भी कद-काठी में उनसे कम नहीं थीं। लाठी पर दोनों का ही हाथ सही चलता था। सबसे बड़ी बात यह कि भउजी को देबी भइया की एक बुनियादी कमजोरी पता थी। वे एक बार भी अगर डंडा उनकी दोनों टांगों के बीच पहुंचाने में या उस तरफ कायदे से इशारा करने में भी कामयाब हो गईं तो फिर दुश्मन के सामने हथियार डाल देने के अलावा और कोई चारा नहीं बचता था।

उनके झगड़े अक्सर शक की बिना पर होते थे। भउजी को हमेशा लगता रहता था कि उनका मोटा पति पराई औरतों के पास जाता है, इसीलिए बिस्तर में जल्दी निढाल हो जाता है, जबकि देबी भइया ऐसे किस्सों को पुराने जमाने की बात बताते थे और इसे सिर्फ चुगलखोर औरतों की कारस्तानी मानते थे।

शादी-ब्याह का मामला छोड़ दें तो एक मामले में देबी भइया पूरे गांव में अजूबा समझे जाते थे। उन्होंने अपनी जिंदगी में कई बिल्कुल अलग-अलग पेशे अपनाए थे और उन पेशों में इस कदर रम गए थे कि लोग उन्हें उन्हीं पेशों से जुड़ी जातियों का सदस्य मानने लगे थे। बारह साल की उम्र में वे घर छोड़कर गड़रियों के साथ चले गए और करीब बीस साल की उम्र तक भेड़ें चराते रहे। बिसम्हर गड़रिया अपने बुढ़ापे तक उनकी गड़रियागिरी के किस्से सुनाते थे- कैसे एक बरसात की रात बछुआपार के ऊसर में भेड़ें ठहरी हुई थीं कि चोर आ गए, खटाखट लाठियां चलने लगीं, बीच में ही मैं चिल्लाया- ठहर साले, बाभन अकेल पड़ गया है तो बहादुर बन रहे हो।

इलाके में जब हल्ला मचने लगा कि मनियारपुर में एक बाभन का लौंडा गड़रिया हुआ जा रहा है तो किसी तरह मार-पीटकर वापस लाए गए, गड़रियों पर भी दबाव डाला गया कि वे देबी को अपने साथ बिल्कुल न रहने दें। हारकर देबी भइया गांव के ही एक चालबाज आदमी के लठैत की भूमिका में कुछ साल घर रहे। कई लोगों को पीटा तो एकाध बार बना-बनाकर मारे भी गए। ऐसी ही किसी तोड़ाई के दौरान उनकी हाइड्रोसील की समस्या शुरू हुई, जो बाद में पत्नी के साथ झगड़ों में उनकी भलमनसाहत की वजह बनी।

ऐसे लफद्दर आदमी का शादी-ब्याह तो क्या होता। गुंडई के दौर में ही अपने छोटे (सौतेले) भाई की बीबी पर दिल आ गया तो एक रात उसकी जान लेने के लिए गंड़ासा लेकर निकल पड़े। पड़ोस की एक बूढ़ी महिला ने उन्हें ऐसा करते देख लिया। अनुजवधू के साथ उनके चक्कर की खबर पूरे गांव को पहले से ही थी, इसके कतल-बलवे तक पहुंचने के डर से लोग सहम गए। हल्ला मचा तो देबी भइया लखनऊ भाग गए और वहां कई साल ग्वाला बनकर भैंसों की एक खटाल पर गोबर-पानी करते रहे, दूध दुहते-बेचते रहे। फिर वहीं किसी तरह जुगाड़ करके तांगा चलाने लगे और तबतक चलाते रहे जबतक लखनऊ में तांगे चलने बंद नहीं हो गए।

जवानी अच्छी तरह ढल जाने और बुढ़ापा शुरू हो जाने के बाद लखनऊ में अपने लिए जीने-खाने का कोई उपाय न देखकर देबी भइया गांव वापस लौटे तो पता चला कि यहां वे किसी काम के नहीं हैं। पढ़ाई उनकी सिर्फ दर्जा दो तक हो पाई थी, वह भी पास नहीं फेल। गुजारा कैसे हो? ऐसे में ब्राह्मणत्व का खोटा सिक्का उनके काम आया। गांव के बुजुर्गों ने किसी तरह अक्षरों से उनकी दुबारा पहचान कराई। जैसे-तैसे उन्हें रामायण, फिर भागवत बांचना सिखाया गया। इस नए धंधे में गले ने उनका भरपूर साथ दिया। संस्कृत के बड़े सामासिक शब्द जहां जुबान को छकाने लगें वहां अटक कर एं-एं करने के बजाय उन्हें जो भी समझ में आता वही गाने लगते थे।

गांव के एक अपने जैसे ही लफद्दर किस्म के यादव लड़के को उन्होंने अपना ठेकइत बना लिया। भागवत के बाद जो हरिकीर्तन होता, उसमें देबी भइया पेटी और ढोलक से समां बांध देते थे। जो लोग उनके कथावाचन को लेकर मीन-मेख निकालते थे, उन्हीं की टेंट से रुपये निकलकर उनकी हारमोनियम पर बरस जाते थे। कथावाचन की इसी चलती उम्र में किसी ने हरदोई की एक परित्यक्ता कान्यकुब्ज ब्राह्मण स्त्री से उनकी शादी की बात चलाई, और इस तरह बड़की भउजी के साथ उनका नेह का- और लाठियों का भी- नाता बना।

देबी भइया को मरे दस-बारह साल हो चुके हैं, लेकिन आज भी गांव में उनके अनंत किस्से चलते हैं। उनकी खुराक के, गांव में बाहा के पास अपने प्रतिपालक के ही हाथों हुई उनकी भीषण थुराई के, खुले हाथों माल हड़पने वाली उनकी पतिव्रता रखैलों के, पत्नी के साथ हर दूसरे-तीसरे दिन होने वाले उनके लट्ठमार झगड़ों के, फगुआ के दिन चौपाल गाते वक्त खींची गई ऊंची तानों के, गड़रिया जीवन के दौरान भेड़ के घी से गीली करके खाई गई सूखी दाल के लारटपकाऊ वर्णनों के, दोपहर की नींद में एक-डेढ़ मिनट तक की लंबाई वाले उनके सस्वर वायु विमोचनों के और जवानी में उनके द्वारा की गई हर रिश्ते की बेकदरी के।

लेकिन मेरे सामने कोई जब भी देबी भइया की चर्चा करता है, मेरी नजर में उनका आखिरी बार देखा गया बीमार चेहरा ही घूमता है- देखते-देखते बुढ़ा गए मेरे बाप की उम्र के एक छोड़ुआ, अनाथ बच्चे का चेहरा, जो अपनी सारी आवारगी और बदकारियों के बाद भी अपनी बेचारगी से निजात न पा सका।

Tuesday, July 10, 2007

लाल मस्जिद का संदेश

इस्लामाबाद की लाल मस्जिद में निर्णायक फौजी कार्रवाई को लेकर पाकिस्तान, हिंदुस्तान समेत समूचे दक्षिण एशिया में परस्पर विरोधी विचार देखने को मिल रहे हैं। पाकिस्तान का एक भी राजनीतिक दल इस कार्रवाई को खुला समर्थन देते हुए परवेज मुशर्रफ के साथ खड़ा नहीं दिखा है, यह मुशर्रफ ही नहीं, सभी के लिए चिंता का विषय है। बात-बात पर फतवे देते, लोगों को हिंसा के लिए उकसाते, तमाम उदार मूल्यों पर खुलेआम धावा बोलते धार्मिक कट्टरपंथियों से बहस करने कोई आगे नहीं आया, और जब उनके खिलाफ सैनिक कार्रवाई हुई तो भी उसके पक्ष में कोई नहीं बोला, इसका मतलब क्या यह लगाया जाए कि पाकिस्तान के सभी राजनीतिक दल ऐसी रोगी विचारधारा को अपना समर्थन देते हैं या उसे बर्दाश्त करने को तैयार हैं?

दुर्भाग्यवश स्थिति ठीक यही है, और यह मामला सिर्फ पाकिस्तान तक ही सीमित नहीं है। भारत में हिंदू कट्टरपंथियों का जब उभार हुआ तो कांग्रेसी पूरी तरह दुम दबाकर बैठ गए। और तो और, गुजरात में उनके एक पूर्व सांसद को जिंदा जला दिया गया और उसके लिए संसद में एक शोक संदेश तक इस पार्टी से पढ़ते नहीं बना। बांग्लादेश में कट्टरपंथी सालोंसाल ऊधम मचाते रहे लेकिन उनके मुकाबले खड़े होने की हिम्मत तसलीमा नसरीन के अलावा और कोई नहीं जुटा पाया- यहां तक कि बंगबंधु शेख मुजीब की बेटी शेख हसीना वाजिद भी नहीं, जिनकी पार्टी की घोषित विचारधारा ही धार्मिक राष्ट्रवाद के ऊपर सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को तरजीह देने पर आधारित है।

पूंजीवादी राजनीतिक दलों के बेरीढ़पने को एक तरफ रख दें तो एक आम पाकिस्तानी के अंदर मुशर्रफ की फौजी कार्रवाई को लेकर संशय की कुछ अलग वजहें समझ में आती हैं। एक तो यह कि मुशर्रफ की इन कट्टरपंथी ताकतों के साथ पुरानी आशनाई रही है और अगर अमेरिका का पुरजोर दबाव न होता तो वे शायद आज भी इन्हें स्वतंत्रता सेनानियों का दर्जा ही देते रहते। पाकिस्तानी समाज में हाल के वर्षों में जोर पकड़ रहे अमेरिका विरोधी राष्ट्रवाद की जुगलबंदी इस्लामी कट्टरपंथ के साथ बन जाना एक अलग ट्रेजेडी है, जिसका खतरा परवेज मुशर्रफ के सिर से आज भी टला नहीं है।

समस्या यह है कि पिछले एक-दो वर्षों में मुशर्रफ बिना किसी वैचारिक या राजनीतिक गोलबंदी के अपने देश में मौजूद जेहादी तत्वों से निपटते नजर आए हैं। यह ट्रेजेडी पूरी इस्लामी दुनिया में मौजूद अमेरिका समर्थित तानाशाहों के साथ है। मिस्र में होस्नी मुबारक यह काम शहरी मध्यवर्ग को आधुनिकता के तमाम फायदे दिलाकर करने की कोशिश में हैं और उन्होंने उदार शहराती मौलानाओं के एक वर्ग की इसमें मदद भी ली है। सऊदी अरब में यह काम लोगों को कई तरह के भत्ते देकर और उन्हें ज्यादा से ज्यादा धर्म-कर्म की तरफ मोड़कर किया जा रहा है। लेकिन पाकिस्तान में कट्टरपंथ से लड़ाई सिर्फ फौजी आदेशों के जरिए लड़ी जा रही है।

और तो और, कोई साल भर पहले परवेज मुशर्रफ ने यह खुलासा ही कर दिया था कि जेहादी तत्वों के खिलाफ लड़ने का फैसला उन्होंने पाकिस्तान को बचाने की मजबूरी में लिया था। मजबूरी यह कि 9/11 के बाद अमेरिकी उपरक्षामंत्री ने उनसे साफ कह दिया था कि पाकिस्तानी हुकूमत अगर अपनी पहल पर यह काम नहीं करती तो बम मार-मारकर पाकिस्तान को दुनिया के नक्शे से मिटा देने में भी अमेरिका को कोई हिचक नहीं होगी।

इसमें कोई शक नहीं कि एक विचारधारा के रूप में जेहादी कट्टरपंथ आज जिस मुकाम पर पहुंच गया है, वहां उसके साथ आमने-सामने का मोर्चा लग जाने की स्थिति में फौजी मारकाट के स्तर पर निपटने के अलावा और कोई चारा नहीं है। लेकिन इससे कहीं ज्यादा बड़ी लड़ाई इससे पहले की है, जिसे छोड़कर या टालकर फौजी विकल्प के आसरे बैठे रहना खुद में कोई विकल्प ही नहीं है। जाहिर है, पाकिस्तान में कट्टरपंथ के बहुसंख्यक समाज की सबसे मुखर विचारधारा का-सा दर्जा हासिल कर लेने के बाद लाल मस्जिद की कार्रवाई से कहीं ज्यादा बड़ी चुनौती इससे वैचारिक स्तर पर निपटने की है। परवेज मुशर्रफ अभी तक यह काम बिल्कुल नहीं कर पाए हैं और आगे भी कर पाएंगे, इसकी कम ही उम्मीद नजर आती है।

पाकिस्तान के बरक्स भारत में पिछले तीन-चार वर्षों में उन्मादी बहुसंख्यक कट्टरपंथ से निपटने का एक बिल्कुल अलग तरीका अपनाया गया है। यहां वामपंथी और समाजवादी विचारधाराएं कहीं ढुलमुल तरीके से तो कहीं डटकर इसके खिलाफ खड़ी हुईं और सबसे बढ़कर नागरिक समाज इसके विरुद्ध सक्रिय हुआ। प्रतिरोध के एक निश्चित स्तर तक पहुंच जाने के बाद कांग्रेस और उसकी सहधर्मी पार्टियां आगे आईं और उन्हें इसका भरपूर फायदा भी मिला। लेकिन राजनीतिक दलों और कभी इनके भीतर तो कभी इनके बाहर मुखरित होने वाले नागरिक समाज से इतर जहां तक सवाल भारतीय राजसत्ता का है, तो उसने बहुसंख्यक कट्टरपंथ के खिलाफ अभी तक कोई इम्तहान पास नहीं किया है।

1992 के अयोध्या से लेकर 2002 के गुजरात तक भारतीय राजसत्ता उन्मादी बहुसंख्यक कट्टरपंथ के विरुद्ध एक पिलपिली संरचना ही साबित हुई है, अलबत्ता अल्पसंख्यक कट्टरपंथियों से निपटने में जब-तब कुछ फूं-फां करके जबर्दस्ती की मर्दानगी दिखाने की कोशिश वह जरूर करती रही है।

लाल मस्जिद में जड़ जमाए कट्टरपंथियों का सिरे से काम तमाम करके परवेज मुशर्रफ ने सभी दक्षिण एशियाई सत्ताओं के सामने यह चुनौती पेश की है कि वक्त आने पर बहुसंख्यक कट्टरपंथ के खिलाफ उन्हें भी ऐसी ही निर्णायक सख्ती का सबूत देने के लिए तैयार रहना चाहिए। अलबत्ता खुद मुशर्रफ के सामने अभी यही चुनौती कोई कम नहीं है कि अपनी कार्रवाई के पक्ष में वे व्यापक जनमत तैयार करें और कश्मीर या किसी और मिशन के नाम पर अपने देश में मजहबी आतंकवादियों को किलेबंदी करने का कोई नया मौका न दें।