Monday, January 14, 2019

कि तू क्या है

अच्छा है कोई अकेडमिक काम
अपने जिम्मे कभी आया नहीं
वरना जब भी तुमसे पूछता कि 
तुम क्या हो, कितने पानी में हो
यही सवाल थोड़ी देर बाद मुझे
खुद से भी करना पड़ जाता


दूर-दूर तक कुछ भी तो नहीं
जिससे पता चल सके कि मैं हूं क्या
काम के ओहदे से खुद को जोड़ूं?
दस दरवाजे घूमकर मिली नौकरी से
जो अपनी रसोई की जरूरत से मुझे
कभी गोभी तो कभी आलू बनाती है?
यूनिवर्सिटी से जोड़ूं, पूरब के ऑक्सफर्ड से?
जो अभी किस-किस खानदानी कमीने से
अपनी इज्जत-आबरू का टांका जोड़कर
अपना सालाना बजट निकाल पाती है?
या आंदोलन से जोड़ूं जो पलट कर पूछता है
कि बस अपनी घात पे जुड़ना आता है बच्चू?
कुल-खानदान से जोड़कर देखूं?
जहां हमेशा अतीत ही गाया जाता है
वह भी ऐसा कि पक्का कुछ भी नहीं?
या थक-हारकर अपनी ही लिखी चीजों से?
जिन्हें पढ़ने वाले इस शर्त पर मिलते हैं कि
कुछ उनका भी हाथोंहाथ पढ़कर दिखाऊं?
बचती है बस यही जैविक पहचान
सूरज के इर्द-गिर्द पृथ्वी ग्रह के
कोई साढ़े चार अरबवें फेरे में जन्मा
चश्माधारी एक अधेड़ आदमजात
जो इसके दस-बीस और चक्करों बाद
अकथ अनजान सफर में पाया जाएगा
लेकिन ऐसे ब्यौरों वाले तो करोड़ों हैं
सिर्फ इतनी सी शिनाख्त के दम पर
ताकत की दुनिया में कहां जाऊंगा?
तुम्हीं कहो कि टूटे-बिखरे बगैर
कभी तुमको या किसी को भी
कह पाऊंगा कि तू क्या है?

Monday, October 29, 2018

यादें

शुक्रगुजार हूं यादों की इस खास गढ़न का
कि इसी के बल पर अब तक जीता आता हूं
कि कड़वा-करख्त धुआं और पसीने से चिपचिप धूल 
दोनों यादों में झर-झर झरते मेहों से धुल जाते हैं
और दफ्तरी यकसारियत जब दिल को दबोचती है
तो इंद्रजाल से महमह अमिया बौर मदद को आते हैं
ऐसी ही चटख यादें अगर चीरफाड़ के डॉक्टर, 
दारोगा, वकील, लाश और बासी खून की भी होतीं
या पूरे साल एक बंद कमरे में अकेले रहने की यातना
अपने असाध्य पीलेपन में वैसी ही टटकी रह आती
और जरा सी कोशिश पर पलटकर आंख में आ जाती
तो जिंदगी के हल्ले से बंदा अर्सा पहले फारिग हो लेता
शुक्रगुजार हूं मेरी और सबकी कहानी लिखने वाले का
कि कहानी जैसा कोई मर्ज उसे बिल्कुल नहीं लगा
कि अच्छी तरह पता है उसे कि गुर्दा, लीवर, तिल्ली
दिल, दिमाग, आंतें और फेफड़े सुख-दुख के हर रचाव से
इतने ज्यादा जरूरी हैं कि कोई घालमेल इनमें नहीं चलेगा
सो मन के कबाड़ में पड़ी छोटी यादें लौट-लौटकर आती हैं
और स्वयं को गढ़ने वाली लंबी-चौड़ी बस घूरे में जाती हैं