Wednesday, June 26, 2019

दुनिया

1. इधर की

ऐसी दुनिया में रहता हूं
जहां भावनाएं नाक तक भरी हैं
आक्रोश, करुणा और कौतुक की 
हर तरफ विपुल भरमार है
लेकिन कुछ भी कर लेने से
जहां कुछ होता नहीं है
कलेजा फाड़ डालने वाली
किसी बर्बर मध्यकालिक छवि के
बगल में यहां खुशी से छलछलाता
कोई ऐसा पोर्ट्रेट दिख जाता है
कि भरमाया मन एक देशकाल में
दोनों को स्थिर ही नहीं कर पाता
और मन भी ले-देकर यहीं का बना है
कोई पार्सल छुड़ाकर तो मंगाया नहीं
तो सब कुछ यहां यूं फटा-बिखरा है
कि पिद्दी सी खुदयकीनी के लिए भी
हम किसी और का मुंह देखते हैं
कोई पूछे, उसके पहले ही नाच-गाकर
सारे अपना अकीदा बयान करते हैं-
हम असल वेदपाठी हम पक्के परहेजगार
हम मार्क्स के मौसा हम दलित दर्द निहार
इतना सारा आक्रोश, इतनी अर्जियां हमारी
आखिर किसके लिए हैं, कहां जाती हैं?
कौन जनता, कौन सरकार, कौन सा ईश्वर
इन्हें लेता है और खारिज कर देता है?
क्या यह ऐसी दुनिया है, सारे भाव जहां
सिर्फ अपने भीतर रखने के लिए हैं?

2. और उधर की

गर्मियों में चांद भला कब डूबता है?
पसीने से भीगी रात घिस जाती है
अनदेखी से उदास तारे लुढ़क जाते हैं
आकाश भी हारकर रंग बदल लेता है
बस चांद ज्यों का त्यों पड़ा रह जाता है
गुर्राते तेंदुए जैसा छलांगें मारता सूरज
अचानक ऊंघते पेड़ों के पार चला आता है
फिर भी बीच आकाश में ठहरा दिखता है
रूई के फाहे सा यह कोमल सफेद जीव
जिसकी धमनियों से गहरा नील झलकता है
आसमान में कहीं कोई रुकावट नहीं है
इधर से उधर तक एक फुट्टी बादल भी नहीं
मैं सोचता हूं, इसी वक्त अगर ऊपर पहुंच सकूं
तो चांद की झिर्रियों से उधर की दुनिया की
एक भरपूर झलक देख पाऊंगा
मेरे लिए वह जगह बिल्कुल अनजान नहीं
जो सपने सुबह याद नहीं रह जाते
उनका वक्त मैं वहीं गुजार कर आता हूं
काश अभी कुछ दिख जाय तो मालूम रहे कि
किसी दिन बाकायदा ठहरने के लिए जाऊं
तो क्या-क्या इंतजाम और करने होंगे

Monday, January 14, 2019

कि तू क्या है

अच्छा है कोई अकेडमिक काम
अपने जिम्मे कभी आया नहीं
वरना जब भी तुमसे पूछता कि 
तुम क्या हो, कितने पानी में हो
यही सवाल थोड़ी देर बाद मुझे
खुद से भी करना पड़ जाता


दूर-दूर तक कुछ भी तो नहीं
जिससे पता चल सके कि मैं हूं क्या
काम के ओहदे से खुद को जोड़ूं?
दस दरवाजे घूमकर मिली नौकरी से
जो अपनी रसोई की जरूरत से मुझे
कभी गोभी तो कभी आलू बनाती है?
यूनिवर्सिटी से जोड़ूं, पूरब के ऑक्सफर्ड से?
जो अभी किस-किस खानदानी कमीने से
अपनी इज्जत-आबरू का टांका जोड़कर
अपना सालाना बजट निकाल पाती है?
या आंदोलन से जोड़ूं जो पलट कर पूछता है
कि बस अपनी घात पे जुड़ना आता है बच्चू?
कुल-खानदान से जोड़कर देखूं?
जहां हमेशा अतीत ही गाया जाता है
वह भी ऐसा कि पक्का कुछ भी नहीं?
या थक-हारकर अपनी ही लिखी चीजों से?
जिन्हें पढ़ने वाले इस शर्त पर मिलते हैं कि
कुछ उनका भी हाथोंहाथ पढ़कर दिखाऊं?
बचती है बस यही जैविक पहचान
सूरज के इर्द-गिर्द पृथ्वी ग्रह के
कोई साढ़े चार अरबवें फेरे में जन्मा
चश्माधारी एक अधेड़ आदमजात
जो इसके दस-बीस और चक्करों बाद
अकथ अनजान सफर में पाया जाएगा
लेकिन ऐसे ब्यौरों वाले तो करोड़ों हैं
सिर्फ इतनी सी शिनाख्त के दम पर
ताकत की दुनिया में कहां जाऊंगा?
तुम्हीं कहो कि टूटे-बिखरे बगैर
कभी तुमको या किसी को भी
कह पाऊंगा कि तू क्या है?