जोसफ स्टालिन का एक मशहूर बयान है- एक आदमी की मौत ट्रेजेडी है लेकिन एक करोड़ लोगों की मौत सिर्फ एक आंकड़ा है। इस बयान में तानाशाही की एक सैद्धांतिकी भी प्रतिबिंबित होती है, लेकिन वह एक अलग मामला है। मौतों के मामले में आंकड़ों का इस्तेमाल मुझे हमेशा ही विचलित करता रहा है और आत्महत्याओं के मामले में तो एकबारगी इसकी कल्पना करना भी कठिन है। लेकिन हाल में आत्महत्याओं पर काम करते हुए कुछ ऐसे आंकड़ों से साबका पड़ा, जिनसे नजर हटाना नामुमकिन है।
नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो द्वारा हाल में जारी सन् 2006 में हुई आत्महत्याओं के आंकड़ों में विभिन्न राज्यों का जो आत्महत्या घनत्व (एक लाख की आबादी पर आत्महत्या करने वाले लोगों की संख्या) दिया हुआ है, वह एक तथ्य की तरफ निर्विवाद रूप से इशारा करता है कि समुद्रतटीय राज्यों में यह बाकी राज्यों की तुलना में बहुत ज्यादा है।
राष्ट्रीय स्तर पर यह औसत 10.5 का है, जो पिछले कई वर्षों से लगभग एक-सा ही चला आ रहा है। लेकिन जरा राज्यों और केंद्र शासित क्षेत्रों से जुड़ी संख्याओं पर नजर दौड़ाइए-
महाराष्ट्र- 14.8, आंध्र प्रदेश- 16.4, दादरा-नगर हवेली- 16.8, गोआ- 17.7, पश्चिम बंगाल- 18.3, तमिलनाडु- 18.9, कर्नाटक- 21.7, केरल- 26.8, अंडमान-निकोबार- 33.6, पॉन्डिचेरी- 50.2
मन में उठी शंकाओं की पुष्टि के लिए अंतरराष्ट्रीय आंकड़े देखे तो पड़ोस के द्वीपीय देश श्रीलंका में आत्मत्याओं का औसत एक लाख पीछे 37 का दिखाई पड़ा।
दुनिया भर में एक आम धारणा बनी हुई है कि भूमंडलीकरण के साथ समृद्धि का विस्तार समुद्र तटीय इलाकों में कहीं ज्यादा संघनित हो रहा है। पूंजी भी दिनोंदिन इन्हीं इलाकों की तरफ खिंची आ रही है क्योंकि राष्ट्रीय उत्पादन का एक बड़ा हिस्सा विदेशों की रवानगी के लिए तैयार किया जाने लगा है। फिर इन इलाकों में इतनी गहरी हताशा की वजह आखिर क्या हो सकती है?
महाराष्ट्र, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश में सूखे और कर्जदारी की वजह से किसानों की आत्महत्या एक नई चीज है। कमोबेश केरल को भी इसी सूची में जोड़ा जा सकता है। लेकिन ऊपर दी गई सूची में तो समुद्र के करीबी देश के लगभग सारे इलाके ही आ गए हैं। क्या रोजी-रोटी की हताशा के अलावा इन इलाकों में ज्यादा आत्महत्या के पीछे कुछ दूसरी वजहें भी काम कर रही हैं, जिनकी तरफ अपनी वैचारिक सीमाओं और आग्रहों के चलते सामाजिक-आर्थिक विश्लेषकों की नजर जा ही नहीं पा रही है?
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Saturday, March 1, 2008
Wednesday, August 15, 2007
कम्युनिस्ट मुसलमानों में काम क्यों करें?
बजार पर चढ़ी शाहनवाज आलम की पोस्ट आतंकवादी कौन बनाता है के जवाब में एक बेनामी टिप्पणी छपी है जिसमें कम्युनिस्टों के नाम लानत भेजी गई है- यह कहते हुए कि मुसलमानों के बीच इनका कोई काम नहीं है और यहां उनका जनाधार भाजपा से भी कम है। इस आक्रोश का कारण चाहे जो भी हो लेकिन बात यह तथ्य से परे है। देश के जिन-जिन इलाकों में कम्युनिस्टों का काम है वहां अन्य समुदायों की तरह ही आनुपातिक रूप से मुसलमानों के बीच भी उनका जनाधार मौजूद है, फिर चाहे वह केरल, बंगाल और त्रिपुरा हो, आंध्र प्रदेश और बिहार हो, या फिर उत्तर प्रदेश, पंजाब, महाराष्ट्र, तमिलनाडु और अन्य राज्यों के छिटपुट इलाके हों।
यह बताने का मकसद सिर्फ एक तथ्य का हवाला देना है, इसमें आत्मसंतुष्टि जैसी कोई बात नहीं है। यह हकीकत अपनी जगह है कि मुसलमानों के बीच कम्युनिज्म तो क्या उदार-वाम या मध्यमार्गी सोच की भी अपनी कोई मुख्तलिफ धारा नहीं है। इसपर अलग से विचार करने की जरूरत है क्योंकि समाजवादियों से लेकर क्षेत्रीय दलों, और तो और कांग्रेंस तक, शायद ही देश की कोई राजनीतिक धारा दावे के साथ यह कह सके कि मुसलमानों के बीच एक स्वतंत्र सोच के रूप में उसकी मौजूदगी है और वहां जरूरत पड़ने पर वह किसी कट्टरपंथी अलोकतांत्रिक विचारधारा का डटकर मुकाबला कर सकती है। कोई दो पैसे के फायदे के लिए या अपनी किसी मजबूरीवश आपके चुनाव चिह्न पर मोहर मार देता है, इसका मतलब यह तो कतई नहीं लगाया जाना चाहिए कि वह आपकी विचारधारा से जुड़ा हुआ है।
कम्युनिस्टों के लिए मुसलमानों को अपनी पार्टी या जनसंगठनों में शामिल करना और मुस्लिम समुदाय के भीतर अपनी स्वतंत्र धारा बनाना दो अलग-अलग काम हैं, जिनमें पहला काम वे अपनी समझ के मुताबिक पूरी ईमानदारी और मनोयोग से करते आए हैं। इसमें जो ढीलापोली हुई है उसका शिकार उनका पूरा जनाधार हुआ है, मुसलमानों के लिए इसमें अलग से कहने को कुछ नहीं है। जहां तक दूसरे काम का सवाल है, इस बारे में अलग से उनका कभी कोई एजेंडा नहीं रहा और इसे लेकर उनके बीच काफी कन्फ्यूजन भी देखने को मिलता रहा है।
बुनियादी मुश्किल दर्शन और विचारधारा के स्तर पर आती है। एक समुदाय के रूप में मुसलमानों के बीच नास्तिकता के लिए कोई गुंजाइश नहीं है और कम्युनिस्ट उस सामूहिक धार्मिकता के साथ कोई तालमेल नहीं बिठा पाते जो किसी भी मुस्लिम जमावड़े में सहज ही जाहिर होने लगती है। पुराने कम्युनिस्टों का सामना इस मुश्किल से शायद उतना न हुआ हो लेकिन जिन कम्युनिस्टों ने पिछले बीस वर्षों में, यानी 1987 के बाद से मुसलमानों के बीच काम किया है, वे इससे काफी नजदीकी से जूझते रहे हैं। आक्रामक हुए हिंदुत्व ने इस समुदाय के भीतर जो असुरक्षा पैदा की उसमें इस समुदाय के उदार हिस्सों को कम्युनिस्ट अपने सबसे भरोसेमंद सहयोगी मालूम पड़े। लेकिन इस लगाव को कोई दीर्घकालिक स्वरूप नहीं दिया जा सका क्योंकि इसका कोई सांगठनिक या वैचारिक आधार खोजा या बनाया नहीं जा सका।
नतीजा यह हुआ कि जो राजनीतिक-सामाजिक शक्तियां 1989 से 1992 तक लगभग लगातार ही मुसलमानों के खिलाफ चली सांप्रदायिक हिंसा में दुम दबाए घर में बैठी रहीं या वक्त-बेवक्त मुसलमानों के खिलाफ खड़ी रहीं, वे ही बाद में उनका नेतृत्व करने लगीं। जमीनी स्तर पर 1992 के बाद से एक समुदाय के रूप में मुसलमानों का जबर्दस्त अराजनीतिकरण हुआ। विधायिका, कार्यपालिका और न्यापालिका से लेकर मीडिया तक हर संस्था से अचानक हुए मोहभंग ने उनके पैरों के नीचे से जमीन खिसका दी। आत्मरक्षा के नाम पर वे चुनाव में किसी को भी वोट देने को तैयार होने लगे, मोहल्ले का सबसे कुंदजेहन कट्टरपंथी गुंडा उन्हें अपना रक्षक लगने लगा और घरों के भीतर लाल किले से लेकर ह्वाइट हाउस तक इस्लाम का हरा झंडा गाड़ देने का दावा करने वाले कैसेट और सीडी देखने-सुनने में उन्हें अपने-अपने से लगने लगे।
सन् 2004 के अप्रत्याशित सत्ता परिवर्तन के बावजूद यह स्थिति आज भी रत्ती भर बदली नहीं है लिहाजा जो लोग मुसलमानों के बीच वामपंथी या उदारवादी विचारधाराओं की अनुपस्थिति से चिंतित हैं वे यह अच्छी तरह जान लें कि यह मामला बहुत गंभीर है और इस बारे में सिर्फ कम्युनिस्टों की लानत-मलामत करने का मतलब होम्योपैथी से ऐडवांस स्टेज कैंसर का इलाज करने जैसा है।
इस बारे में मैं धनिए की छौंक की तरह थोड़ा सा अपना तजुर्बा बता सकता हूं जो हर मायने में किसी भी आम कम्युनिस्ट जैसा ही है। आरा शहर में मुस्लिम इलाकों में हमारा काम पेशा आधारित था। कुछ पेशे ऐसे थे जिसमें मुसलमान मजदूरों की बहुतायत थी। जैसे दर्जी का काम, बक्सा बनाना, कुछ खास तरह के चमड़े के काम, घोड़े की नाल ठोंकने जैसे छिटपुट काम, फुटपाथ की दुकानदारी या ठेले पर अंडा-आमलेट बेचना वगैरह। इन पेशों में हमारी पार्टी सीपीआई-एमएल का पुराना संगठन मौजूद था। काम के दौरान संपर्क में आए हमारे साथी सीधे-सादे जुझारू लोग थे। राजनीतिक आधार पर अपने समुदाय में काम करना या संगठन बनाना उनकी कल्पना से परे था।
1989-92 में इस दिशा में काम शुरू हुआ तो थोड़ी कामयाबी मिली। आरा के मुस्लिम इलाकों में कुल 32 बिरादरियों के लोग रहते थे जिनमें ज्यादातर के चौधरियों के यहां हमारी बैठकें हुईं। और तो और, जुमे के दिन हमें मस्जिदों में भाषण देने के लिए बुलाया गया। लेकिन उसके बाद मुस्लिम समाज के ताकतवर और रसूखदार लोगों को लगने लगा कि अब उनकी हैसियत इतनी ही रह गई है कि वे दर्जियों, बक्सा बनाने वालों और अंडे बेचने वालों के साथ मिलकर मीटिंग करें, नारा लगाएं। नतीजा यह हुआ कि जल्द ही वे लालू यादव की पार्टी के नजदीक चले गए और मुसलमानों के बीच हमारी पार्टी पुनर्मूषको भव वाली स्थिति में आ गई।
इस बात को लेकर मैं आश्वस्त हूं कि कम्युनिस्टों के लिए मुसलमानों के बीच अपना प्रभावक्षेत्र बढ़ाने का रास्ता वर्गीय और तबकाई संगठनों के निर्माण से ही शुरू होता है लेकिन इसमें भी एक मुश्किल है कि खड्डी चलाने और दर्जीगिरी जैसे मेहनतकश पेशों में भी उनका दखल दिनोंदिन कम होता जा रहा है। जहां तक सामुदायिक पहलकदमी का सवाल है तो देश की तमाम उदार वाम धाराओं को इस बारे में मिलकर कोई पहलकदमी लेनी चाहिए- फिर चाहे वे समाजवादी हों, कम्युनिस्ट हों या गांधीवादी स्वयंसेवी संगठन हों। इस तरह की एक बुनियादी कोशिश राम मनोहर लोहिया ने जमायते उलेमा ए हिंद के जरिए की थी जो ज्यादा सिरे नहीं चढ़ी लेकिन उस कोशिश से जो कुछ भी सीखा जा सके उसे सीखा जाना चाहिए। माले की तरफ से इस दिशा में हुई इन्कलाबी मुस्लिम कॉन्फ्रेंस अपने संगठन का दायरा पार नहीं कर पाई लेकिन उस पहल से भी कुछ बचाया जरूर जाना चाहिए।
विचार के स्तर पर इस मामले में कम्युनिस्टों को एक बड़े जोखिम के लिए तैयार होना होगा। आप सामूहिक धार्मिकता में यकीन करने वाले लोगों और नास्तिक दर्शन में भरोसा रखने वालों को दिल से एक कभी नहीं कर सकते। मेरे ख्याल से कम्युनिस्ट विचारधारा पर काम करने वालों को इन दोनों विचारधाराओं के बीच सैकड़ों या हजारों साल लंबे सह-अस्तित्व और बहस के लिए जगह तैयार करनी चाहिए। लेनिन जब अजरबैजान और उज्बेकिस्तान जैसे तुर्क-मुस्लिम देशों की कम्युनिस्ट क्रांति को ईरान, अफगानिस्तान और अरब मुल्कों तक फैलाने का सपना देखते थे उसके पीछे शायद उनकी कुछ ऐसी ही सोच रही हो।
स्टालिन की सोच का टाइम-फ्रेम इतना लंबा नहीं था लिहाजा उन्होंने 15 आजाद समाजवादी मुल्कों के एक ढीले-ढाले लेनिनवादी जमावड़े को रूसी नेतृत्व और लौह दीवारों वाले एक अकेले देश सोवियत संघ में तब्दील कर दिया। इससे न सिर्फ एक लंबी क्रांति योजना का असमय गर्भपात हो गया बल्कि मुस्लिम समुदाय के भीतर कम्युनिस्टों को लेकर एक स्थायी संदेह का बीज भी पड़ गया।
इसका सबसे पहला शिकार ईरान की तूदे पार्टी हुई, जिसे एशिया की पहली समाजवादी पार्टी होने का गौरव प्राप्त है। बाद में इसी प्रक्रिया की पूर्णाहुति स्टालिन के मानसपुत्र ब्रेज्नेव ने अफगानिस्तान में रूसी फौजें भेजकर कर दी। इस इतिहास को आज पोंछा तो नहीं जा सकता लेकिन मुसलमानों के बीच उदार-वाम विचारधारा के प्रसार को अगर सचमुच कम्युनिस्ट एजेंडा पर लाना है तो भविष्य के लिए सोच के स्तर पर बंद कुछ दरवाजे जरूर खोले जा सकते हैं।
यह बताने का मकसद सिर्फ एक तथ्य का हवाला देना है, इसमें आत्मसंतुष्टि जैसी कोई बात नहीं है। यह हकीकत अपनी जगह है कि मुसलमानों के बीच कम्युनिज्म तो क्या उदार-वाम या मध्यमार्गी सोच की भी अपनी कोई मुख्तलिफ धारा नहीं है। इसपर अलग से विचार करने की जरूरत है क्योंकि समाजवादियों से लेकर क्षेत्रीय दलों, और तो और कांग्रेंस तक, शायद ही देश की कोई राजनीतिक धारा दावे के साथ यह कह सके कि मुसलमानों के बीच एक स्वतंत्र सोच के रूप में उसकी मौजूदगी है और वहां जरूरत पड़ने पर वह किसी कट्टरपंथी अलोकतांत्रिक विचारधारा का डटकर मुकाबला कर सकती है। कोई दो पैसे के फायदे के लिए या अपनी किसी मजबूरीवश आपके चुनाव चिह्न पर मोहर मार देता है, इसका मतलब यह तो कतई नहीं लगाया जाना चाहिए कि वह आपकी विचारधारा से जुड़ा हुआ है।
कम्युनिस्टों के लिए मुसलमानों को अपनी पार्टी या जनसंगठनों में शामिल करना और मुस्लिम समुदाय के भीतर अपनी स्वतंत्र धारा बनाना दो अलग-अलग काम हैं, जिनमें पहला काम वे अपनी समझ के मुताबिक पूरी ईमानदारी और मनोयोग से करते आए हैं। इसमें जो ढीलापोली हुई है उसका शिकार उनका पूरा जनाधार हुआ है, मुसलमानों के लिए इसमें अलग से कहने को कुछ नहीं है। जहां तक दूसरे काम का सवाल है, इस बारे में अलग से उनका कभी कोई एजेंडा नहीं रहा और इसे लेकर उनके बीच काफी कन्फ्यूजन भी देखने को मिलता रहा है।
बुनियादी मुश्किल दर्शन और विचारधारा के स्तर पर आती है। एक समुदाय के रूप में मुसलमानों के बीच नास्तिकता के लिए कोई गुंजाइश नहीं है और कम्युनिस्ट उस सामूहिक धार्मिकता के साथ कोई तालमेल नहीं बिठा पाते जो किसी भी मुस्लिम जमावड़े में सहज ही जाहिर होने लगती है। पुराने कम्युनिस्टों का सामना इस मुश्किल से शायद उतना न हुआ हो लेकिन जिन कम्युनिस्टों ने पिछले बीस वर्षों में, यानी 1987 के बाद से मुसलमानों के बीच काम किया है, वे इससे काफी नजदीकी से जूझते रहे हैं। आक्रामक हुए हिंदुत्व ने इस समुदाय के भीतर जो असुरक्षा पैदा की उसमें इस समुदाय के उदार हिस्सों को कम्युनिस्ट अपने सबसे भरोसेमंद सहयोगी मालूम पड़े। लेकिन इस लगाव को कोई दीर्घकालिक स्वरूप नहीं दिया जा सका क्योंकि इसका कोई सांगठनिक या वैचारिक आधार खोजा या बनाया नहीं जा सका।
नतीजा यह हुआ कि जो राजनीतिक-सामाजिक शक्तियां 1989 से 1992 तक लगभग लगातार ही मुसलमानों के खिलाफ चली सांप्रदायिक हिंसा में दुम दबाए घर में बैठी रहीं या वक्त-बेवक्त मुसलमानों के खिलाफ खड़ी रहीं, वे ही बाद में उनका नेतृत्व करने लगीं। जमीनी स्तर पर 1992 के बाद से एक समुदाय के रूप में मुसलमानों का जबर्दस्त अराजनीतिकरण हुआ। विधायिका, कार्यपालिका और न्यापालिका से लेकर मीडिया तक हर संस्था से अचानक हुए मोहभंग ने उनके पैरों के नीचे से जमीन खिसका दी। आत्मरक्षा के नाम पर वे चुनाव में किसी को भी वोट देने को तैयार होने लगे, मोहल्ले का सबसे कुंदजेहन कट्टरपंथी गुंडा उन्हें अपना रक्षक लगने लगा और घरों के भीतर लाल किले से लेकर ह्वाइट हाउस तक इस्लाम का हरा झंडा गाड़ देने का दावा करने वाले कैसेट और सीडी देखने-सुनने में उन्हें अपने-अपने से लगने लगे।
सन् 2004 के अप्रत्याशित सत्ता परिवर्तन के बावजूद यह स्थिति आज भी रत्ती भर बदली नहीं है लिहाजा जो लोग मुसलमानों के बीच वामपंथी या उदारवादी विचारधाराओं की अनुपस्थिति से चिंतित हैं वे यह अच्छी तरह जान लें कि यह मामला बहुत गंभीर है और इस बारे में सिर्फ कम्युनिस्टों की लानत-मलामत करने का मतलब होम्योपैथी से ऐडवांस स्टेज कैंसर का इलाज करने जैसा है।
इस बारे में मैं धनिए की छौंक की तरह थोड़ा सा अपना तजुर्बा बता सकता हूं जो हर मायने में किसी भी आम कम्युनिस्ट जैसा ही है। आरा शहर में मुस्लिम इलाकों में हमारा काम पेशा आधारित था। कुछ पेशे ऐसे थे जिसमें मुसलमान मजदूरों की बहुतायत थी। जैसे दर्जी का काम, बक्सा बनाना, कुछ खास तरह के चमड़े के काम, घोड़े की नाल ठोंकने जैसे छिटपुट काम, फुटपाथ की दुकानदारी या ठेले पर अंडा-आमलेट बेचना वगैरह। इन पेशों में हमारी पार्टी सीपीआई-एमएल का पुराना संगठन मौजूद था। काम के दौरान संपर्क में आए हमारे साथी सीधे-सादे जुझारू लोग थे। राजनीतिक आधार पर अपने समुदाय में काम करना या संगठन बनाना उनकी कल्पना से परे था।
1989-92 में इस दिशा में काम शुरू हुआ तो थोड़ी कामयाबी मिली। आरा के मुस्लिम इलाकों में कुल 32 बिरादरियों के लोग रहते थे जिनमें ज्यादातर के चौधरियों के यहां हमारी बैठकें हुईं। और तो और, जुमे के दिन हमें मस्जिदों में भाषण देने के लिए बुलाया गया। लेकिन उसके बाद मुस्लिम समाज के ताकतवर और रसूखदार लोगों को लगने लगा कि अब उनकी हैसियत इतनी ही रह गई है कि वे दर्जियों, बक्सा बनाने वालों और अंडे बेचने वालों के साथ मिलकर मीटिंग करें, नारा लगाएं। नतीजा यह हुआ कि जल्द ही वे लालू यादव की पार्टी के नजदीक चले गए और मुसलमानों के बीच हमारी पार्टी पुनर्मूषको भव वाली स्थिति में आ गई।
इस बात को लेकर मैं आश्वस्त हूं कि कम्युनिस्टों के लिए मुसलमानों के बीच अपना प्रभावक्षेत्र बढ़ाने का रास्ता वर्गीय और तबकाई संगठनों के निर्माण से ही शुरू होता है लेकिन इसमें भी एक मुश्किल है कि खड्डी चलाने और दर्जीगिरी जैसे मेहनतकश पेशों में भी उनका दखल दिनोंदिन कम होता जा रहा है। जहां तक सामुदायिक पहलकदमी का सवाल है तो देश की तमाम उदार वाम धाराओं को इस बारे में मिलकर कोई पहलकदमी लेनी चाहिए- फिर चाहे वे समाजवादी हों, कम्युनिस्ट हों या गांधीवादी स्वयंसेवी संगठन हों। इस तरह की एक बुनियादी कोशिश राम मनोहर लोहिया ने जमायते उलेमा ए हिंद के जरिए की थी जो ज्यादा सिरे नहीं चढ़ी लेकिन उस कोशिश से जो कुछ भी सीखा जा सके उसे सीखा जाना चाहिए। माले की तरफ से इस दिशा में हुई इन्कलाबी मुस्लिम कॉन्फ्रेंस अपने संगठन का दायरा पार नहीं कर पाई लेकिन उस पहल से भी कुछ बचाया जरूर जाना चाहिए।
विचार के स्तर पर इस मामले में कम्युनिस्टों को एक बड़े जोखिम के लिए तैयार होना होगा। आप सामूहिक धार्मिकता में यकीन करने वाले लोगों और नास्तिक दर्शन में भरोसा रखने वालों को दिल से एक कभी नहीं कर सकते। मेरे ख्याल से कम्युनिस्ट विचारधारा पर काम करने वालों को इन दोनों विचारधाराओं के बीच सैकड़ों या हजारों साल लंबे सह-अस्तित्व और बहस के लिए जगह तैयार करनी चाहिए। लेनिन जब अजरबैजान और उज्बेकिस्तान जैसे तुर्क-मुस्लिम देशों की कम्युनिस्ट क्रांति को ईरान, अफगानिस्तान और अरब मुल्कों तक फैलाने का सपना देखते थे उसके पीछे शायद उनकी कुछ ऐसी ही सोच रही हो।
स्टालिन की सोच का टाइम-फ्रेम इतना लंबा नहीं था लिहाजा उन्होंने 15 आजाद समाजवादी मुल्कों के एक ढीले-ढाले लेनिनवादी जमावड़े को रूसी नेतृत्व और लौह दीवारों वाले एक अकेले देश सोवियत संघ में तब्दील कर दिया। इससे न सिर्फ एक लंबी क्रांति योजना का असमय गर्भपात हो गया बल्कि मुस्लिम समुदाय के भीतर कम्युनिस्टों को लेकर एक स्थायी संदेह का बीज भी पड़ गया।
इसका सबसे पहला शिकार ईरान की तूदे पार्टी हुई, जिसे एशिया की पहली समाजवादी पार्टी होने का गौरव प्राप्त है। बाद में इसी प्रक्रिया की पूर्णाहुति स्टालिन के मानसपुत्र ब्रेज्नेव ने अफगानिस्तान में रूसी फौजें भेजकर कर दी। इस इतिहास को आज पोंछा तो नहीं जा सकता लेकिन मुसलमानों के बीच उदार-वाम विचारधारा के प्रसार को अगर सचमुच कम्युनिस्ट एजेंडा पर लाना है तो भविष्य के लिए सोच के स्तर पर बंद कुछ दरवाजे जरूर खोले जा सकते हैं।
Monday, August 6, 2007
अबे, कैसे-कैसे डे
कल शाम दिलीप मंडल और अनुराधा ने फोन पर हैप्पी फ्रेंडशिप बोला तो मैं बिल्कुल चौंक-सा गया। अकबकाहट में मुंह से निकला- यह क्या हो गया है आपको, पूरा अंग्रेजी छाप हुए जा रहे हैं। दिलीप ने कहा, इसमें बुराई क्या है? क्या दोस्ती, प्यार या मां-बाप के प्रति लगाव जताना- भले यह सब किसी डे के बहाने ही किया जाए- कोई गलत बात है?
कैसी-कैसी तो बातें मन में उमड़ आईं यह सुनकर। थोड़ी देर दिलीप से मां के बारे में बतियाता रहा कि आज तक कभी उसे आप कहकर नहीं बुलाया, झगड़ा करने का कोई मौका कभी नहीं चूका और कैसे एक बार जब तीन साल बाद घर लौटा और पता चला कि वह कितनी अजलस्त हालत में थी तो अपनी समझ से उसका देसी इलाज शुरू किया और उसने छूटते ही कहा कि मैं दरअसल उसकी जान लेने की कोशिश कर रहा हूं। बाद में इसी इलाज से वह बिल्कुल चंगी हो गई, यह और बात है, लेकिन रिश्ते का उजड्डपन तो इससे जाहिर होता ही है। क्या मदर्स डे पर उसे एक गुलाब का फूल दे दूं और 'हैप्पी मदर्स डे, माई ' बोल दूं तो रिश्ता बेहतर हो जाएगा?
कमोबेश यही हाल पिता से रिश्ते का रहा। सात-आठ साल की उम्र तक उनके कंधे पर चढ़कर जहां-तहां घूमता रहा। उनका बस चलता तो स्कूल कतई न भेजते। लेकिन थोड़ा बड़ा होते ही उन्होंने न सिर्फ कंधे पर बिठाना बल्कि समझाना और सिखाना भी बिल्कुल छोड़ दिया। पीट-पीटकर दिमाग में ज्ञान और तमीज घुसाने की जिम्मेदारी बड़े भाई साहब ने अपने ऊपर ले ली। पिता जी ने आखिरी चीज मुझे सिखाई खाना बनाना- इस नीतिवाक्य के साथ कि यह काम तुम्हें आता रहे तो भूखों मरने की नौबत कभी नहीं आएगी। पहली चीज शायद उन्होंने कसरत करना सिखाई थी- इस सूत्रवाक्य के साथ कि शरीर ठीक रहे तो हर कपड़ा जंचता है।
बहरहाल, पिताजी से भी कभी बहुत प्यार से बोलने की आदत नहीं रही। जब मैं चार साल का था तभी वे नौकरी छोड़ चुके थे और उनके पास इतने पैसे फिर कभी नहीं हुए कि अपनी पत्नी और बच्चों की जरूरतें पूरी कर सकें, बदले में उनका भरपूर प्यार पा सकें। हमारे बीच रिश्तों की रुखड़ाहट मजबूरियों से उपजी थी और प्यार यहां जितना भी बचा था वह इतना मजबूत कभी नहीं हो सका कि इस रुखड़ी सतह को पार कर पाता। आज अगर वे जिंदा होते तो फादर्स डे पर मैं उनके लिए क्या करता जो हमारे बीच अचानक हरहराता हुआ प्यार का दरिया बह निकलता?
दोस्त ज्यादा नहीं बने। बचपन के जो दोस्त थे वे बीच में मुझसे अच्छी हैसियत में पहुंच गए थे लेकिन बाद में जमाने के चलन के मुताबिक गांव और छोटे शहरों में रहते हुए वे मजबूर से मजबूरतर होते गए। जवानी में जो बने वे कॉमरेड बने। दोस्त से कॉमरेड एक मायने में बेहतर होता है कि वह आपके लिए बड़ी कुर्बानियां कर सकता है लेकिन एक मायने में बदतर भी होता है कि उसके साथ दोस्ती को लेकर कुछ शर्ते जुड़ी होती हैं- मसलन क्रांतिकारी विचारधारा की शर्त। दोस्ती मेरे लेखे एक ऐसी ही चीज है जिसमें कोई शर्त न हो, जिसमें मेरे पतितपन के लिए भी कुछ गुंजाइश मौजूद हो। चाहे किसी कॉमरेड की तरफ से आए चाहे गैर-कॉमरेड की तरफ से, इसके लिए मैं बांहें फैलाए खड़ा हूं। लेकिन अभी तो सवाल यह है कि क्या इसके लिए मुझे 5 अगस्त को फूल देकर उन्हें हैपी फ्रेंडशिप डे बोलना जरूरी होगा?
कैसी-कैसी तो बातें मन में उमड़ आईं यह सुनकर। थोड़ी देर दिलीप से मां के बारे में बतियाता रहा कि आज तक कभी उसे आप कहकर नहीं बुलाया, झगड़ा करने का कोई मौका कभी नहीं चूका और कैसे एक बार जब तीन साल बाद घर लौटा और पता चला कि वह कितनी अजलस्त हालत में थी तो अपनी समझ से उसका देसी इलाज शुरू किया और उसने छूटते ही कहा कि मैं दरअसल उसकी जान लेने की कोशिश कर रहा हूं। बाद में इसी इलाज से वह बिल्कुल चंगी हो गई, यह और बात है, लेकिन रिश्ते का उजड्डपन तो इससे जाहिर होता ही है। क्या मदर्स डे पर उसे एक गुलाब का फूल दे दूं और 'हैप्पी मदर्स डे, माई ' बोल दूं तो रिश्ता बेहतर हो जाएगा?
कमोबेश यही हाल पिता से रिश्ते का रहा। सात-आठ साल की उम्र तक उनके कंधे पर चढ़कर जहां-तहां घूमता रहा। उनका बस चलता तो स्कूल कतई न भेजते। लेकिन थोड़ा बड़ा होते ही उन्होंने न सिर्फ कंधे पर बिठाना बल्कि समझाना और सिखाना भी बिल्कुल छोड़ दिया। पीट-पीटकर दिमाग में ज्ञान और तमीज घुसाने की जिम्मेदारी बड़े भाई साहब ने अपने ऊपर ले ली। पिता जी ने आखिरी चीज मुझे सिखाई खाना बनाना- इस नीतिवाक्य के साथ कि यह काम तुम्हें आता रहे तो भूखों मरने की नौबत कभी नहीं आएगी। पहली चीज शायद उन्होंने कसरत करना सिखाई थी- इस सूत्रवाक्य के साथ कि शरीर ठीक रहे तो हर कपड़ा जंचता है।
बहरहाल, पिताजी से भी कभी बहुत प्यार से बोलने की आदत नहीं रही। जब मैं चार साल का था तभी वे नौकरी छोड़ चुके थे और उनके पास इतने पैसे फिर कभी नहीं हुए कि अपनी पत्नी और बच्चों की जरूरतें पूरी कर सकें, बदले में उनका भरपूर प्यार पा सकें। हमारे बीच रिश्तों की रुखड़ाहट मजबूरियों से उपजी थी और प्यार यहां जितना भी बचा था वह इतना मजबूत कभी नहीं हो सका कि इस रुखड़ी सतह को पार कर पाता। आज अगर वे जिंदा होते तो फादर्स डे पर मैं उनके लिए क्या करता जो हमारे बीच अचानक हरहराता हुआ प्यार का दरिया बह निकलता?
दोस्त ज्यादा नहीं बने। बचपन के जो दोस्त थे वे बीच में मुझसे अच्छी हैसियत में पहुंच गए थे लेकिन बाद में जमाने के चलन के मुताबिक गांव और छोटे शहरों में रहते हुए वे मजबूर से मजबूरतर होते गए। जवानी में जो बने वे कॉमरेड बने। दोस्त से कॉमरेड एक मायने में बेहतर होता है कि वह आपके लिए बड़ी कुर्बानियां कर सकता है लेकिन एक मायने में बदतर भी होता है कि उसके साथ दोस्ती को लेकर कुछ शर्ते जुड़ी होती हैं- मसलन क्रांतिकारी विचारधारा की शर्त। दोस्ती मेरे लेखे एक ऐसी ही चीज है जिसमें कोई शर्त न हो, जिसमें मेरे पतितपन के लिए भी कुछ गुंजाइश मौजूद हो। चाहे किसी कॉमरेड की तरफ से आए चाहे गैर-कॉमरेड की तरफ से, इसके लिए मैं बांहें फैलाए खड़ा हूं। लेकिन अभी तो सवाल यह है कि क्या इसके लिए मुझे 5 अगस्त को फूल देकर उन्हें हैपी फ्रेंडशिप डे बोलना जरूरी होगा?
Sunday, May 20, 2007
अनदेखी अनचुभी शक की सुई
-14 अप्रैल 2006, दिल्ली की जामा मस्जिद में बम विस्फोट, दो देसी बम फटे, कुछ लोग घायल हुए, थोड़ी सनसनी मची, किस्सा खत्म हो गया।
- 8 सितंबर, 2006, मालेगांव की मस्जिद में देसी ढंग के टाइमर वाला आरडीएक्स बम फटा, एक जिंदा बम बरामद, 34 लोगों की मौत।
-18 मई, 2007, हैदराबाद की मक्का मस्जिद में मोबाइल फोन से संचालित ऐडवांस टाइमर वाला आरडीएक्स बम फटा, 9 लोग मरे, पुलिस से भिड़ंत में फिर 5 लोग और मरे।
तीन कांग्रेस शासित राज्यों दिल्ली, महाराष्ट्र और आंध्र प्रदेश की कुछ प्रमुख मस्जिदों में तकरीबन छह-छह महीनों के अंतर से विस्फोट- लगातार परिष्कृत रूप लेते हुए। हर बार जांच के दौरान पुलिस का पिटा हुआ रवैया। वही पाकिस्तान का हाथ, आईएसआई और आतंकवादी संगठनों द्वारा सांप्रदायिक सौहार्द्र बिगाड़ने की साजिश आदि वाले जुमले और फिर एक-दो प्रेस कॉन्फ्रेंस करके चद्दर तानकर सो जाना।
आखिर पुलिस किसी मुस्लिम विरोधी आतंकवादी संगठन के बारे में अपना कोई कयास तक जाहिर क्यों नहीं कर रही है? क्या इस देश में ऐसे लोगों और संगठनों की कोई कमी है, जो देश में हुई किसी भी दहशतगर्द कार्रवाई की सजा आम मुसलमानों को देने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं?
गौरतलब है कि इससे पहले कुछ-कुछ महीनों के अंतर पर दो हिंदू उपासना स्थलों बनारस के संकटमोचन मंदिर (7 मार्च 2006) और अयोध्या के विवादित स्थल (5 जुलाई 2005) पर भी आतंकवादी हमले हो चुके हैं। उनके पीछे मौजूद 'सांप्रदायिक सौहार्द्र बिगाड़ने की साजिश' वाले पुलिसिया तर्क को लगातार लंबा-लंबा खींचा जा रहा है। कभी किसी सिम कार्ड को तो कभी किसी और चीज को आधार बनाकर पुलिस अपनी दलील घिसे जा रही है। समझ में नहीं आता कि जो व्यक्ति या गुट दस-बीस लोगों की हत्या में गुरेज नहीं करता वह पांच सौ रुपये का सिमकार्ड बिलाल या मतीन जैसे किसी फर्जी मुस्लिम नाम से क्यों नहीं बनवा सकता?
जुमे की नमाज के वक्त बम फोड़ने वाले इन दरिंदों की तलाश करना अगर पुलिस और सरकार के वश की बात नहीं है तो वह न करे, लेकिन टीवी कैमरों के सामने व्यर्थ की बयानबाजी करने के बाद दस-बीस मुस्लिम नौजवानों की पकड़-धकड़ करना, मार-मारकर उनकी जिंदगी तबाह कर देना और हमेशा के लिए उन्हें अपराध या आतंकवाद की राह पर धकेल देना- इस नाम पर कि उन्होंने जुमे की नमाज के वक्त अपने ही भाई या बाप जैसे लोगों की हत्या की है- यह कहां का न्याय है?
- 8 सितंबर, 2006, मालेगांव की मस्जिद में देसी ढंग के टाइमर वाला आरडीएक्स बम फटा, एक जिंदा बम बरामद, 34 लोगों की मौत।
-18 मई, 2007, हैदराबाद की मक्का मस्जिद में मोबाइल फोन से संचालित ऐडवांस टाइमर वाला आरडीएक्स बम फटा, 9 लोग मरे, पुलिस से भिड़ंत में फिर 5 लोग और मरे।
तीन कांग्रेस शासित राज्यों दिल्ली, महाराष्ट्र और आंध्र प्रदेश की कुछ प्रमुख मस्जिदों में तकरीबन छह-छह महीनों के अंतर से विस्फोट- लगातार परिष्कृत रूप लेते हुए। हर बार जांच के दौरान पुलिस का पिटा हुआ रवैया। वही पाकिस्तान का हाथ, आईएसआई और आतंकवादी संगठनों द्वारा सांप्रदायिक सौहार्द्र बिगाड़ने की साजिश आदि वाले जुमले और फिर एक-दो प्रेस कॉन्फ्रेंस करके चद्दर तानकर सो जाना।
आखिर पुलिस किसी मुस्लिम विरोधी आतंकवादी संगठन के बारे में अपना कोई कयास तक जाहिर क्यों नहीं कर रही है? क्या इस देश में ऐसे लोगों और संगठनों की कोई कमी है, जो देश में हुई किसी भी दहशतगर्द कार्रवाई की सजा आम मुसलमानों को देने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं?
गौरतलब है कि इससे पहले कुछ-कुछ महीनों के अंतर पर दो हिंदू उपासना स्थलों बनारस के संकटमोचन मंदिर (7 मार्च 2006) और अयोध्या के विवादित स्थल (5 जुलाई 2005) पर भी आतंकवादी हमले हो चुके हैं। उनके पीछे मौजूद 'सांप्रदायिक सौहार्द्र बिगाड़ने की साजिश' वाले पुलिसिया तर्क को लगातार लंबा-लंबा खींचा जा रहा है। कभी किसी सिम कार्ड को तो कभी किसी और चीज को आधार बनाकर पुलिस अपनी दलील घिसे जा रही है। समझ में नहीं आता कि जो व्यक्ति या गुट दस-बीस लोगों की हत्या में गुरेज नहीं करता वह पांच सौ रुपये का सिमकार्ड बिलाल या मतीन जैसे किसी फर्जी मुस्लिम नाम से क्यों नहीं बनवा सकता?
जुमे की नमाज के वक्त बम फोड़ने वाले इन दरिंदों की तलाश करना अगर पुलिस और सरकार के वश की बात नहीं है तो वह न करे, लेकिन टीवी कैमरों के सामने व्यर्थ की बयानबाजी करने के बाद दस-बीस मुस्लिम नौजवानों की पकड़-धकड़ करना, मार-मारकर उनकी जिंदगी तबाह कर देना और हमेशा के लिए उन्हें अपराध या आतंकवाद की राह पर धकेल देना- इस नाम पर कि उन्होंने जुमे की नमाज के वक्त अपने ही भाई या बाप जैसे लोगों की हत्या की है- यह कहां का न्याय है?
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