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Tuesday, June 16, 2009

रमाकांत-सूर्यकांत

एक सुबह दिल्ली आने के लिए कप्तानगंज से बस पकड़ते हुए दोनों एक साथ ही मिल गए। बस सेकंड भर का खुटका, और लगा कि अभी कल ही शाम बस्ता कंधे पर टांगे स्कूल से घर जाने के लिए अलग हुए हों। रमाकांत उपाध्याय और सूर्यकांत राय। माट्साब लोग इन्हें दो बैलों की जोड़ी कहा करते थे। अगल-बगल के गांवों के रहने वाले और क्लास में सबसे पहले सिगरेट का सुट्टा मारना सीखने वाले नवीं-दसवीं के मेरे क्लासमेट। हाफ पैंट से फुल पैंट में पहुंचने की उस उम्र में ये दोनों मित्र हमारी पूरी क्लास के लिए एक साथ भय और आकर्षण, दोनों का ही केंद्र बने रहते थे।

हाई स्कूल का रिजल्ट आने के बाद पता चला कि इन दोनों लोगों को अभी अपनी जड़ें और मजबूत करनी हैं, उसके बाद ही ये कहीं और जा पाएंगे। बाद में पता चला कि अगले साल भी उनकी बात नहीं बनी और तीसरे साल स्कूल बदल कर किसी सुविधाजनक सेंटर के सहारे ही वे पढ़ाई के अगले मुकाम की ओर कूच कर पाए। कप्तानगंज में इंटरमीडिएट साइंस की व्यवस्था नहीं थी लिहाजा मैंने तेरही इंटर कॉलेज की तरफ प्रस्थान किया। लेकिन कभी किसी क्रिकेट मैच में तो कभी यूं ही बाजार में टहलते हुए दोनों मित्रों से मुलाकात होती रही। इसी बीच पता नहीं कैसे इन्होंने मुझे गुरू कहना शुरू कर दिया।

मुझे इसकी वजह कभी समझ में नहीं आई क्योंकि सिगरेट का स्वाद बहुत बाद में ले पाने के बावजूद रमाकांत और सूर्यकांत को मैं उनकी हिम्मत और फाकामस्ती, सिनेमाबाजी के उनके शौक और मास्टरों को लेकर उनकी जन्मजात अवमानना के चलते बिल्कुल दिल से अपना गुरू मानता था। स्कूल के सबसे कड़क मास्टर को जो छात्र क्लास में ही उसकी औकात बताने लगे और दोनों हथेलियों पर गिन कर कुल बासठ डंडे खाने के बावजूद उसके सामने रोए-गिड़गिड़ाए नहीं, उसके सामने मेरे जैसे लोग क्या पिद्दी और क्या पिद्दी का शोरबा। बहरहाल, चाहे जिस भी वजह से, वे मुझे गुरू कहते रहे और मैंने कभी इस पर खुल कर एतराज भी नहीं जताया।

करीब एक घंटे के बस के सफर में और फिर किसी दुकान पर एक-दो चाय लड़ाते हुए मैंने हाई स्कूल के बाद गुजरी सूर्यकांत और रमाकांत की जिंदगी का हाल जानने की कोशिश की। उनकी कहानियों में गोगोल की डेड सोल्स और बाल्जाक की ओल्ड गोरियो जैसी रवानी थी। फौरी हाल यह कि रमाकांत ने अयोध्या में एक पुराने मंदिर पर कब्जा कर रखा है और सूर्यकांत आजमगढ़ की फौजदारी अदालत में नाम और दाम कमाने की तरफ बढ़ रहे हैं।

रमाकांत ने किसी तरह इंटर-बीए निपटाने के बाद एमए की पढ़ाई के लिए फैजाबाद स्थित साकेत विश्वविद्यालय का रुख किया। वहां मेरी ही तरह एक पुराने मंदिर की छोटी सी कोठरी में रह कर उन्होंने पढ़ाई की शुरुआत की, लेकिन दो-तीन संयोग उन्हें मुझसे बिल्कुल अलग रास्ते पर ले गए। पहला संयोग यह कि उनके मंदिर का महंथ काफी बूढ़ा था, दूसरा यह कि रमाकांत अपने इरादों में बिल्कुल साफ थे और बाहुबल के इस्तेमाल से उन्हें कोई परहेज नहीं था, और तीसरा यह कि जब वे साकेत विश्वविद्यालय में एमए फाइनल की तैयारी कर रहे थे तब मंदिर आंदोलन अपने चरम पर पहुंच रहा था।

आगे की कहानी रमाकांत के शब्दों में- साला बुड्ढा हर महीने किराए को लेकर बड़ी किचकिच करता था। इधर हम लोग मंदिर आंदोलन में सक्रिय हुए तो वह थोड़ा डरने लगा था और बार-बार कोठरी खाली करने की जिद करने लगा था। एक रात हम लोगों ने डंडा उठाया और घुसकर उसको लगे मारने- साले मुसलमान आएंगे मंदिर पर कब्जा करने तो इसको तुम्हीं बचाओगे। इधर पवन भइया (लोकल गुंडा और अयोध्या आंदोलन का दंगाई नेता) का हमको पूरा सपोर्ट था ही। ले गए हम लोग महंथवा को सरजू डका आए। तब से मंदिर पर रात में हमारा ही ताला रहता है। बुढ़वा शुरू में आता था, अब नहीं आता- अपने टाइम में ऊ भी त साला ऐसे ही मंदिरवा कब्जिआया था न।

इधर सूर्यकांत ने अपने करीअर के विकास में भारतीय न्यायपालिका की काफी पोल खोली। कैसे उनके सीनियर बाजार से आम खरिदवा कर जज साहब के यहां पहुंचवाते हैं, यह कह कर कि घर में पाल खुली है, जरा चख के देखिए। या फिर हर नए आए जज के यहां महीनों दूध का उठवना चलता है, यह कह कर कि भैंस ब्याई है, दूध इतना हो जा रहा है कि समझ में नहीं आता करें क्या।

इतने समय में जज साहब का नरम-गरम पता चल जाता है। क्या चाहते हैं, क्या नहीं चाहते। किस मामले में कहां तक जा सकते हैं और किसमें ज्यादा दबाव देना ठीक नहीं है। बाकी जिरह और दलील सब सिनेमा के लिए है- नीचे तो जैसी जिसकी सेटिंग, वैसी उसकी गेटिंग। अपने सीनियर के पीछे-पीछे सूर्यकांत भी अब इस कला में दक्ष हो चले हैं और अब धीरज के साथ सही मौके का इंतजार कर रहे हैं। किसी दिन उनके सीनियर अपनी कुर्सी के नीचे झांकेंगे तो वहां उन्हें अंतहीन सुरंग नजर आएगी, जो दरअसल उनके सारे कमाऊ मुकदमों और मुवक्किलों को लिए-दिए शहर के नामी वकील सूर्यकांत राय के दफ्तर पहुंच रही होगी। कौन जाने, यह अब तक हो भी चुका हो।

मेरे जिले के दो रंगबाज भाई उमाकांत यादव और रमाकांत यादव बारी-बारी से अगल-बगल के क्षेत्रों से एमपी बनते रहते हैं, लेकिन जब भी उनका जिक्र आता है, मुझे नवीं और दसवीं में अपने साथ पढ़े रमाकांत उपाध्याय और सूर्यकांत राय की जोड़ी याद आती है। दोनों बिल्कुल सही रास्ते पर जा रहे हैं और शायद कुछ साल बाद उनमें भी कोई एमएलए या एमपी बना हुआ दिखे।

Saturday, June 13, 2009

ओए राजू, प्यार ना करियो

अराजीबाग में हमारा कमरा सड़क से थोड़ी दूर खेत में था। उस तरफ मोहल्ले के पिछले मकानों की नालियां निकलती थीं और बिजली विभाग के किन्हीं इंजीनियर साहब ने अपने विभाग को चूना लगाने के बाद हम जैसे किरायेदारों के साथ यही क्रिया दोहराने के लिए इसे खड़ा किया था। कमरे में सोने के लिए मेरे पास तो खटिया थी लेकिन राजू का फैसला वनवास की शर्तों के मुताबिक जमीन पर ही सोने का था। लिहाजा हम लोग अड़ोस-पड़ोस से बहुत सारे ईंटों के टुकड़े उठा लाए और कच्चे फर्श पर उन्हें ठोक-ठोक कर इस लायक बना दिया कि उस पर एक अदद बिस्तर बिछाया जा सके।

स्वभाव से राजू निहायत काहिल थे और मेरे देखते परिश्रम का एकमात्र काम उन्होंने सिर्फ यह फर्श बनाने का ही किया। उनका हंसना शुरू में मुझे चकित करता था, फिर धीरे-धीरे आदत होती गई। वे हंसना शुरू करते तो डर लगता कि कहीं उनकी सांस न अटक जाए। पूरा चेहरा लाल हो जाता और मुंह इस कान से उस कान तक फैल जाता। फिर हिक-हिक हुच-हुच जैसी कोई आवाज आनी शुरू होती और लगता कि घबराने की कोई बात नहीं है। वैसी हंसी मैंने न राजू से पहले देखी थी न उनके बाद देखी।

बाद में उनके पिता-माता और अन्य परिजनों से मुलाकात होने के बाद मैं इस नतीजे पर पहुंचा कि राजू की यह हंसी जेनेटिक नहीं है। दरअसल, उनके पिता जी दिल्ली में एक्सपोर्ट प्रमोशन बोर्ड में बड़े बाबू थे और इस तरह हंसने की कला उन्होंने खासकर पंजाबी एक्सपोर्टरों को साधने के लिए ईजाद की थी। हंसी जैसी सहज क्रिया में चापलूसी और जिंदादिली को एक साथ साधने का यह उपक्रम उनसे होता हुआ उनके ज्येष्ठ पुत्र तक इसी रूप में पहुंच पाया था।

अराजीबाग में रहते हुए हमारा नियमित भोजन दाल और रोटी हुआ करता था, और बहुत बिरले ही कभी भात। सब्जी पकाने के लिए न समय होता न पैसे, लिहाजा दाल की पतीली में ही टमाटर काट लिए जाते और ऊपर से लहसुन-मिर्चे का बघार मार दिया जाता। एक बार दाल खत्म हो गई और सब्जी के लिए पैसे किसी के पास नहीं थे तो हम लोगों ने पिछवाड़े कहीं से कुछ तोड़ लाने की योजना बनाई। बहुत दूर तक चक्कर मारने के बाद भी खेतों में कहीं सब्जी नजर नहीं आई लेकिन एक जगह प्याज के साग जैसा कुछ दिख गया तो उसे हम दो टाइम बनाने भर की मात्रा में उखाड़ लाए। प्याज का साग पकते-पकते पक गया और रोटियां भी बन गईं तो बड़े शौक से खाने बैठे, लेकिन पहला कौर तोड़ कर मुंह में रखते ही जान निकल गई। इतना कसैला कि दोनों से एक कौर भी नहीं खाया गया। फिर हम इस नतीजे पर पहुंचे कि प्याज के चक्कर में हम किसी के खेत से लहसुन उखाड़ लाए थे।

पढ़ाई-लिखाई के मामले में राजू की अपनी अलग शैली थी। खाना नाक तक चढ़ा लेने के बाद वे कोई बहुत मोटी किताब सामने रख कर आलथी-पालथी मारे बैठ जाते। फिर मैं मन ही मन एक से सौ तक की गिनती शुरू करता। बमुश्किल बहत्तर-तिहत्तर तक पहुंचते-पहुंचते वे नाक के बल सीधे किताब पर ही गिरते। अगर बिजली नहीं होती और पढ़ाई लैंप से करनी होती तो इसे न सिर्फ उनके लिए बल्कि पूरे कमरे के लिए खतरनाक जानकर मैं उन्हें आज की पढ़ाई भी कल ही कर लेने की सलाह देता । एक बार मेरे एक अन्य मित्र राजकुमार सिंह ने उनकी यह क्रिया देखी तो उनके मुंह से बेसाख्ता निकला- का ए राजू, मर्दवा जिउ देबा का (क्या राजू, जान देंगे क्या)।

साल जब निकल गया और इम्तहान की बारी आई तो राजू अचानक सक्रिय हुए। पहले ही पेपर में उन्होंने बड़े मनोयोग से बहुत सारी पुर्जियां बनाईं और किसी सुसाइड बॉम्बर की तरह पूरे शरीर में कहीं गेटिस से तो कहीं रबर बैंड से उन्हें फिट कर लिया। इसके बाद एक अंतिम पुर्जी इंडेक्स के लिए बनाई कि कौन सी पुर्जी कहां रखी है, और उसे जेब में रख लिया। मैंने उन्हें चेतावनी दी कि कहीं इंडेक्स ही न धर लिया जाए। यह तो नहीं हुआ लेकिन एक तो सवाल समझ में नहीं आए, दूसरे नकल की पूरी प्रक्रिया उन्होंने इतनी जटिल बना डाली कि रिजल्ट उनका लगभग पैंतालीस प्रतिशत ही आ सका। अलबत्ता यह अच्छा रहा कि शिब्ली कॉलेज ने उन्हें निराश नहीं किया। वे दोनों साल लगातार पास हुए और आखिरकार बी.एससी. बायो की डिग्री लेकर ही आजमगढ़ से दिल्ली रवाना हुए।

राजू की एक और अच्छी बात झूठ बोलने की थी। जैसे कोयल कूकती है और भौंरे गुनगुनाते हैं, वैसे ही वे झूठ बोलते थे। किसी बुरे इरादे से नहीं, ऐसे ही मन की तरंग में। जिसे आजकल लोग मिसाइल से फेंकना कहने लगे हैं और महत्वाकांक्षी लोगों के किसी भी झुरमुट में जिसे सांय-सांय अपने अगल-बगल से गुजरता देख आप तय नहीं कर पाते कि इस पर हंसें या रोएं- उस अकच्च झुट्ठेपने से पहला साक्षात्कार मुझे राजू के जरिए ही हुआ। मेरे ख्याल से यह गुण भी उनके पास फर्जी एक्सपोर्टरों और उनके पिता से होता हुआ उन तक पहुंचा था।

बहुत दिनों बाद राजू से जब दिल्ली में मुलाकात हुई तो पता चला कि वे एक्सपोर्ट के बिजनेस में ही कुछ कर रहे हैं। इस समय तक वे बाल-बच्चेदार हो चुके थे और मेरी शादी बस हुई ही हुई थी। दोनों के रास्ते बिल्कुल अलग थे और संवाद की कोई गुंजाइश नहीं थी लेकिन अब शादी नाम की एक ऐसी चीज नजर आने लगी थी जो दोनों के बीच साझा थी। राजू के कामधंधे के बारे में ज्यादा कुछ पूछ पाना मेरे बूते से बाहर था, लेकिन उस मुलाकात में मैंने गौर किया कि राजू बहुत बदल गए हैं। वे करोड़ों-अरबों में खेलने की बातें, अशोका होटल की काजू और मखाने के तड़के वाली दाल की लंतरानियां सब कहां गईं, जबकि वे फिलहाल एक्सपोर्ट के बिजनेस में थे।

इसके और भी बहुत सालों बाद राजू मुझसे फोन पर मिले, जब मैं सहारा में नौकरी कर रहा था। उन्होंने बाकायदा मुझसे टाइम लिया और एक बड़े से झोले में बहुत सारे कागजात लेकर अखबार के दफ्तर में ही मिलने आए। बहुत देर तक वे मुझे अपने साथ हुए एक षडयंत्र के बारे में समझाते रहे लेकिन मेरे पल्ले ज्यादा कुछ नहीं पड़ा। शायद किसी फर्जी एक्सपोर्टर ने उनकी जिंदगी तबाह करने का इंतजाम कर दिया था। अपने पिता के संपर्कों से अपनी एक एक्सपोर्ट असिस्टेंस कंपनी उन्होंने बना रखी थी। इनके दस्तखत वाली बिल्टी से कोई कंटेनर विदेश भेजा गया लेकिन वहां पहुंचने के बाद कंटेनर खुला तो उसमें एक्सपोर्ट आइटम के नाम पर कागज और भूसा भरा पाया गया।

इस मामले में सारे कागज-पत्तर राजू के नाम से बने थे लिहाजा कुछ समय के लिए वे जेल गए और फिर बारह-चौदह साल की मुकदमेबाजी ने उनके अंजर-पंजर ढीले कर दिए। सारा किस्सा बताने के बाद उन्होंने कुछ मदद की गुजारिश की, लेकिन झूठे दिलासे देने के अलावा उनके लिए मैं भला क्या कर सकता था। बाद में सिद्ध रिपोर्टर और अपने खोजी संपादक प्रभात रंजन दीन से इस विषय में चर्चा की तो उन्होंने कहा कि जैसा ये बता रहे हैं, वैसा होना संभव नहीं लगता, और हो भी तो इस बारे में कुछ किया नहीं जा सकता। फर्जी एक्सपोर्ट का अपना एक अलग ही धंधा है और इसका इस्तेमाल हवाले की तरह विदेशी पैसा देश में लाने के लिए किया जाता है। इस धंधे में शामिल दो पार्टियां आपस में टकरा जाएं या संयोग से यह कस्टम की नजर में आ जाए तभी ऐसी स्थिति बन सकती है।

लब्बोलुआब यह कि इस भीषण संकट में राजू की कोई मदद मुझसे नहीं हो पाई। राजू मददगार आदमी थे, शायद आज भी हों। पढ़ाई के दिनों में तो मेरी बहुत ही मदद उन्होंने की थी, लेकिन उनकी कोई मदद मुझसे नहीं हो पाई। आजमगढ़ में साथ रहते एक-दो बार झल्लाहट के मौके जरूर आए थे लेकिन सिर्फ एक को छोड़कर उनकी कोई कड़वी बात मेरे मन पर नहीं है। डिग्री लेकर दिल्ली पहुंचने के बाद उन्होंने न सिर्फ अपने परिवार को बल्कि मेरे बड़े भाई को भी बताया कि सिर्फ ईमानदारी से इम्तहान देने की सजा उन्हें यह मिली कि उनके नंबर खराब आ गए जबकि नकल करके मैं फर्स्ट क्लास मार ले गया। भैया ने यह किस्सा मुझे बताया तो गुस्सा बहुत आया लेकिन फिर लगा कि वे तो राजू हैं, एक छोटे से झूठ के लिए उन पर गुस्सा क्या करना।

ओह राजू, बीस-पच्चीस सालों में आजमगढ़ से दिल्ली तक आने में हम कहां से कहां पहुंच गए। अराजीबाग की सड़क पर बैंक मैनेजर ढिल्लों साहब की बेटी में पूनम ढिल्लों को तलाशते हुए छपेली शर्ट में गर्मियों की शाम तीन घंटे इधर से उधर चक्कर मारना और बिना किसी आरो-आहट के उससे जबर्दस्त अफेयर चलने के दावे करना आखिरतुम्हारे किस काम आया। सरदार जी ने उसी वक्त कायदे से तुम्हारी पुंगी बजा दी होती तो शायद पैर जमीन पर आ जाते और एक्सपोर्टरों का फेंकू धंधा तुम्हें इतना रास न आता। ......मुझे कभी समझ में नहीं आएगा कि तुम्हारी कहानी पूरी कैसे करूं।

Friday, June 12, 2009

करुण कन्या का आतंक और राजू का अवतरण

सड़क चलते आदमी को यह बिल्कुल नजर नहीं आता। आजमगढ़ में शिवमूर्ति चौराहे के पास लाल डिग्गी बंधे के नीचे एक रास्ता झटकू पहलवान के अखाड़े की तरफ गया है। इस अखाड़े के बगल में ही ढूह जैसी जगह पर एक गणेश मंदिर है। शिब्ली कॉलेज में दाखिले के बाद पिताजी मुझे इसके महंथ के पास लिवा ले गए। महंथ जी चौक के पास एक कटरे के मालिक थे और लंबी चिलम से गांजा पीते थे। इस मंदिर की एक कच्ची कोठरी रहने के लिए आजमगढ़ में शायद सबसे सस्ती जगह थी- सन इक्यासी में तीस रुपये महीने किराये वाली। लेकिन पिताजी की दिलचस्पी मुझे यहां रखने में इसलिए ज्यादा थी कि मैंने यहां रहकर रेगुलर रियाज नहीं किया तो भी कम से कम पहलवानों की संगत में तो रहूंगा।

इस मंदिर की अनेक स्मृतियां हैं, जिनमें से एक का जिक्र मैंने बहुत पहले इसी जगह किया था। तनहाई और गुंडई, आरती और लंठई का यहां अद्भुत समागम था। लेकिन सुबह-शाम की इसकी चहल-पहल मेरे लिए नहीं थी। तेरही इंटर कॉलेज के भोजपुरी मीडियम से निकल कर सीधे अंग्रेजी मीडियम की पढ़ाई मेरी जान लिए हुए थी और खाना बनाने का तजुर्बा न होने के चलते कोठरी में रहने का आधे से ज्यादा वक्त खाना बनाने में ही निकल जाता था। रोज बुरादे की भट्ठी भरना, एक पाव आटा सान कर उसकी रोटी और दो नेनुए या एक लौकी छील कर उनकी सब्जी बनाना। ऊपर से महंथ के लड़के की लुच्चई, जो लगभग हर सुबह चार में से एक या दो रोटी खाकर सुदामा पर कृष्ण जैसा एहसान कर जाता।

ऐसे में एक दिन बड़ा अजीब लगा जब महंथ जी की एक अत्यंत करुण, अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी टाइप मिजाज वाली भतीजी पता नहीं क्या देने या लेने मेरी कोठरी में आई और इसके बहाने जोर से मेरी हथेली दबाती चली गई। मेरे लिए इस अनुभव में अभूतपूर्व, अद्वितीय या अनुपम जैसी कोई बात नहीं थी, लेकिन यह इतना अजीब, अटपटा और गिजगिजा जरूर था कि मेरी आत्मा सटक गई। सारे रास्ते बंद थे। विकल्प की कोई गुंजाइश ही नहीं थी। महंथ की भतीजी के बताए रास्ते पर चलने का मतलब था बलात्कार का शिकार होना, क्योंकि उसे देखते ही मुझे करुणा की हीक आती थी और उससे किसी तरह के लगाव का तो कोई सवाल ही नहीं था।

लेकिन इस रास्ते को छोड़ने का मतलब खतरनाक था। सीधी-सादी दिखने वाली जो लड़की जरा सी आड़ पाते ही इतनी बोल्ड हो सकती थी वह खुद को तिरस्कृत पाकर मेरा जीना हराम कर सकती थी। उसका एक छोटा सा आरोप भी मुझे न सिर्फ इस मंदिर से निकलवाने के लिए काफी होता, बल्कि मेरे पहलवान पिता की नाराजगी शायद मेरी पढ़ाई छूटने की भी वजह बन जाती। इसे कोई चाहे तो लड़कों के बजाय लड़कियों की आम मनःस्थिति के करीब बता सकता है, लेकिन अब क्या करें, जो था सो था। संकट इतना गहरा हो गया कि मैं अपनी कोठरी में जाने से कतराने लगा।

इसी दौर में दिल्ली से वेद प्रकाश उर्फ राजू नाम के एक सज्जन आजमगढ़ पधारे, जिनकी इंटरमीडिएट में कंपार्टमेंट आ जाने के वजह से राजधानी के किसी कॉलेज में दाल नहीं गल पाई थी। उनकी सबसे अच्छी बात यह थी कि कॉलेज और पढ़ाई का उन पर कोई दबाव नहीं था। अगले डेढ़ वर्षों के समय को वे अपने लिए वनवास की तरह ले रहे थे और इस दौरान किसी लक्ष्मण की तलाश उन्हें बड़ी शिद्दत से थी। मेरा संपर्क दिल्ली में उन्हें मेरे बड़े भाई से मिला था जो उस समय से लेकर आज तक इस लोहे के शहर से अपनी रोटी निकालने के प्रयास में जुटे हैं।

राजू बाबू ने मुझसे मिलने के बाद जो पहला काम किया, वह था मेरी मुर्दनी के लिए मेरी लानत-मलामत। उन्होंने मुझे बताया कि कॉलेज की पढ़ाई कोठरी में रहकर किताबें घोटने से नहीं होती। इसके लिए सिनेमा देखना, क्लास बंक करना और अच्छी-अच्छी सूरतों से आंखें सेंकना भी जरूरी है। नतीजा यह हुआ कि अगले एक दो हफ्तों में हम लोगों ने डिलाइट में नसीब से शुरू करके आजमगढ़ के तीनों सिनेमा हॉलों में लगी फिल्में डेढ़ रुपये वाले थर्ड क्लास में बैठ कर देख डालीं। इससे सबसे बड़ा फायदा मुझे यह हुआ कि उस करुण कन्या के आतंक से छुटकारा मिल गया।

इस बीच राजू भी शहर के एक निर्माणाधीन मकान में अपने मामा के साले के यहां रहते-रहते थक गए थे। लिहाजा हम लोगों ने लंबी छलांग मारी और शहर के दूसरे छोर अराजीबाग में नब्बे रुपये किराये वाला एक कमरा ले लिया। इससे मेरा किराये का खर्चा डेढ़ गुना बढ़ गया लेकिन आगे से राशन-पानी में राजू का बड़ा योगदान देखते हुए मैंने यह बोझ बर्दाश्त करने का फैसला कर लिया। पाठक गण क्षमा करें। मेरा इरादा अपना संस्मरण लिखने का नहीं, राजू के बारे में बात करने का था, लेकिन ऑफिस के बाहर खड़ा बगैर ताले का मेरा स्कूटर कोई उठा न ले गया हो, यह देखने के लिए फिलहाल इस पोस्ट को यहीं बंद करना जरूरी है। राजू के बारे में अब कल, या अगली पोस्ट वाले दिन बात करेंगे।

Wednesday, June 10, 2009

दोस्तों की याद में

कल शाम घर लौटते हुए एक मोड़ पर स्कूटर जवाब दे गया। मकेनिक खोज कर बनवाने बैठा, तभी फोन की घंटी बजी। अनजान नंबर। फोन उठाया तो किसी ने पूछा, मिश्रा जी का नंबर है? मैंने कहा, जी मैं चंद्रभूषण बोल रहा हूं, आपको किससे बात करनी है? फिर सीधे- अरे साले मैं नीरज बोल रहा हूं, नीरज अग्रवाल। मैंने कहा, कौन नीरज? अरे, आजमगढ़, शिब्ली कॉलेज भूल गए? फोन में अंग्रेजी गाना लगाए हो पंडितऊ, सब समझ रहे हैं।

शिब्ली कॉलेज में नीरज ठीक-ठीक मेरा दोस्त तो नहीं था लेकिन मेरे एक दोस्त का दोस्त जरूर था। किसी संयोग की तरह मेरा रूम पार्टनर और आजमगढ़ के मेरे सारे दोस्त बायो में थे जबकि मैं अकेला मैथिया रहा था। नीरज और मेरे साझा दोस्त थे पंकज वर्मा, जो आजकल लोकल कोर्ट में दीवानी के ठीकठाक वकील हैं। हम लोग 1983 तक, यानी बी.एससी. पूरा होने तक एक साथ थे लेकिन पंकज से आखिरी मुलाकात को भी अब करीब पंद्रह साल गुजर चुके हैं।

गांव से जैसे-तैसे शहर पढ़ने गए लड़कों के हमारे सर्किल में पंकज अकेला मध्यवर्गीय इलीट था। उसी के जरिए हम लोगों को थोड़ी-थोड़ी शहर की हवा लगी। पंकज ने मुझे शहरी बनाने में अपनी तरफ से कोई कसर नहीं छोड़ी। बैडमिंटन खेलने से लेकर डांस करने तक कई सारे गुर सिखाने के प्रयास किए, यहां तक कि किसी से प्रेम कराने की कोशिश भी की। अब इसका क्या करें कि जिसके लिए यह कोशिश की गई थी, उसका इरादा प्रेम करने का था ही नहीं। पंकज को मैंने इस बारे में सिर्फ इतना सा राज बताया था कि एक शाम मैं उसकी गली से होता हुआ सड़क पर पहुंचने को था कि उसने नई-नई आई फिल्म लव स्टोरी का गाना गुनगुनाना शुरू कर दिया- ए लड़का जरा सा दीवाना लगता है........

फिर क्या था, पंकज बाबू ने आगे का किस्सा खुद ही बना लिया और कहा कि हम तुम्हें गाड़ी का कोई पुराना-धुराना मॉडल तो नहीं लगने दे सकते- एलएमएल वेस्पा नहीं तो चेतक बजाज बनाकर ही छोड़ेंगे। यह कोशिश परवान नहीं चढ़ी, लेकिन कुछ बुनियादी बातें इस दौरान मेरी समझ में आ गईं- जैसे यह कि पैजामे में शर्ट खोंस कर पहनना सिर्फ खुद को ठीक लगता है, दूसरों को तो बिल्कुल अच्छा नहीं लगता। और अगर संभव हो तो हवाई चप्पल के ऊपर ओवरकोट पहन कर और ऊनी टोपी पर मफलर का मुंड़ेसा बांध कर कॉलेज में क्लास करने नहीं जाना चाहिए।

पंकज का वश चलता तो वह मुझे फैंसी चश्मा भी पहना देता लेकिन चश्मा बदलने की मेरी औकात नहीं थी। जो फ्रेम कानपुर में चाचा जी ने बनवा कर दिया था, उसी में पॉवर के मुताबिक शीशा बदलता रहे, तो भी चेहरे पर काफी रौब लाया जा सकता है- ऐसा मैंने पंकज को समझाया।

आजमगढ़ में रहने को लेकर मेरे और राजू के बीच यह समझौता था कि कोठरी का किराया दोनों आधा-आधा देंगे, गेहूं, चावल और दाल घर से राजू लाएंगे जबकि मैं गेहूं की पिसाई दूंगा और बाजार से सब्जी खरीद कर लाऊंगा। फीस और किताब-कॉपी मिलाकर महीने में यह करीब सौ रुपये का खर्चा बैठता था। इतना पैसा दे पाने की हालत पिताजी की थी नहीं, लिहाजा मैं राजू को यह कह कर टरकाए रहता था कि साल के अंत में जैसे ही स्कॉलरशिप मिली, वैसे ही उनका सारा कर्जा उतार दिया जाएगा।

खेती-किसानी से मजबूत राजू की भी नगदी के मामले में अपनी सीमाएं थीं लिहाजा हर हफ्ते इतवार के दिन हम दोनों सुबह से ही पंकज के यहां जाकर जम जाते थे कि उसके घर पर अगर दोपहर का खाना नहीं, कायदे का नाश्ता भी मिल जाए तो कम से कम एक दिन का खर्चा तो बच ही जाएगा। डर की बात सिर्फ एक थी। पंकज के वकील पिता कान से लगभग बहरे थे और मामूली बातें भी इतने करख्त लहजे में इतने जोर से कहते थे कि हमें लगता था, यह सब वे हमें भगाने के लिए कर रहे हैं।

बी.एससी. का रिजल्ट आने के बाद आजमगढ़ में ही करीब एक साल मुझे और रहना पड़ा, लेकिन बिना किसी आपसी घटना के, इस इतनी सी अवधि में ही पंकज इतने अजनबी हो गए कि बस एक या दो बार उनसे मेरी मुलाकात हो पाई- वह भी बिल्कुल ठंडी और बेजान। दरअसल, कॉलेज की दोस्तियों की यही सीमा होती है कि जिंदगी के तूफानों का सामना होते ही वे मुरझा जाती हैं। अब लगता है कि इससे उनका महत्व कम नहीं होता क्योंकि किसी फूल की अच्छाई या बुराई नापने का पैमाना यह नहीं हो सकता कि वह आग में पहुंच कर भी खिला रह पाता है या नहीं।

नीरज के फोन ने मुझे छब्बीस साल पहले वाले आजमगढ़ के समय में घुमा दिया। दोस्तों को याद करने का मन हो रहा है। मौका लगा तो उन पर कुछ पोस्टें लगातार डालूंगा।