Thursday, January 29, 2015

शादी : कुछ इंप्रेशन

मेरी मां को दस कदम भी चलना हो तो हाथ पकड़ कर ले जाना होता है। बोलती है तो हरेक शब्द के साथ धौंकनी की तरह एक सांस अतिरिक्त निकलती है। लेकिन पोते की शादी में वह लगातार गाती रही। दहेज का सामान लेकर आई गाड़ी दरवाजे पर लग गई है, यह सूचना पाते ही बिना छड़ी के उठी और धड़ाधड़ दुतल्ले की सीढ़ियां उतर गई। मेरी ममेरी बहन को शादी में शामिल होने की ऐसी चुक्क पड़ी कि अंधेरे में आस्था की छलांग की तरह अपने पति से झगड़ा करके आजमगढ़ से सीधा गुड़गांव निकल गई। वहां से नोएडा पहुंचने की कोशिश में गर्म कपड़ों से भरा अपना बैग मेट्रो में ही भूल आई और फिर उसे खोज निकालने के लिए दो दिन मुझे तंग करती रही।

ये और ऐसी बहुत सारी अटरंगी हरकतें मेरे भतीजे की शादी से जुड़ी हैं, जो विगत 26 जनवरी को संपन्न हुई है।

भाई साहब खानदानी रिवायत के तौर पर किसी भी आयोजन में एक बार यादगार किस्म का हंगामा जरूर खड़ा करते हैं। इन हंगामों के शिकार प्राय: मेरे जीजाजी या कोई न कोई मामाजी होते आए हैं। इस बार का मामला अलग रहा। मामाजी स्वर्गवासी हो चुके हैं और जीजाजी सावधान थे। लिहाजा बकरे की भूमिका भैया के लंगोटिया यार दिनेश भाई को निभानी पड़ी। शादी के ऐन पहले वाली रात 11 से डेढ़ बजे तक भाई साहब के आउट ऑफ बॉक्स हंगामे के नाम रही। इसका फायदा यह हुआ कि शादी के दिन-रात शांति से गुजर गए।

किसको कहां कितना देना चाहिए और कब किससे कितना पाना चाहिए, इस तरह की एक चर्चा में किसी ने गलती से मेरी भी राय पूछ ली। मैंने कहा, मैं तो सिर्फ इतना जानता हूं कि शादी के लिए वकील को 400 रुपये देने पड़ते हैं- हालांकि यह 1995 की बात हुई और वकील भी परिचित मिजाज के थे। अभी रेट ज्यादा हो गए होंगे। बाकी शादी से जुड़ी किसी किस्म की लेनी-देनी के बारे में मुझे कुछ नहीं पता। अपने घर, परिवार, परिचय के सभी लड़के-लड़कियों को आज तक मैंने प्रेम विवाह की ही सलाह दी है। कोई माने ही न तो मैं क्या करूं।

ऐसी दिलतोड़ बातें करने का मुझे कोई शौक नहीं है। मेरे नजदीकी दोस्तों के अलावा मेरा और मेरी पत्नी का कोई भी रिश्तेदार हमारी शादी में शामिल नहीं हुआ। इसके बावजूद एक छोटे से वक्फे को छोड़कर दोनों परिवारों से और बाकी समाज से भी हमारे रिश्ते अच्छे थे और अच्छे रहेंगे। लेकिन शादी की लेनी-देनी के बारे में मेरे पास कहने को कुछ है ही नहीं तो मैं क्या बताऊं। पहले लगता था, समय बीतने के साथ यह कोढ़ खत्म होता जाएगा। लेकिन कम होना तो दूर, समाज में पैसे की बहुतायत के साथ यह दिनोंदिन बढ़ता ही जा रहा है।    

शादी-ब्याह में बहुत ज्यादा तो नहीं लेकिन कभी-कभी जाना जरूर चाहिए। इन आयोजनों में अब कोई वैरिएशन नहीं रह गया है। हर जगह एक से कपड़े, एक से शामियाने, एक सा खाना, एक सा गाना। और तो और, लोगों का लबो-लहजा भी एक सा। लिहाजा नजरों को कुछ अलग देखने की चाह हो तो इसके लिए वहां कुछ खास नहीं होता। लेकिन लोग बदल रहे हैं, रिश्ते बदल रहे हैं, उनके मिलने-जुलने में एक किस्म का चमत्कार तो पैदा हो ही रहा है। बहुत ही चकाचौंध भरा, बीमार, गंदा किस्म का चमत्कार, हालांकि सब कुछ के बावजूद एक इंप्रेशन छोड़ता हुआ।

हर तरफ अजीब किस्म की चढ़ाचढ़ी रहती है। हमारा लड़का पांच लाख रुपया महीना पाता है, तो हमारा तीन फैक्टरियां संभालता है। हमारा ऑस्ट्रेलिया में है, तो हमारा अमेरिका से अभी-अभी लौटा है। संवाद इस तरह के कि जब-तब सब के सब एक साथ बोलते हुए से लगते हैं। सुनने की तो कोई कोशिश भी करता नहीं दिखता। थोड़ी ही देर में दम घुटने लगता है। सबसे कमजोर सा दिखने वाला कोई परिचित या रिश्तेदार खोजकर उसके साथ दो पल शांति से बैठने की कोशिश करो तो वह भी पिया हुआ निकलता है।

अच्छी भली पढ़ी-लिखी लड़कियां ऐसे आयोजनों में दुल्हन बनकर सार्वजनिक यातना झेलने के लिए कैसे तैयार हो जाती हैं, यह बात मेरी समझ में पहले भी नहीं आती थी, अब तो बिल्कुल नहीं आती। उनके दूल्हे भी अब बेशर्म हो गए हैं। कैमरे वाले के हुक्म पर स्टेज पर ही लिपटने-चिपटने में संकोच नहीं करते। ऐसी किसी अटपटी चीज पर एतराज कर दीजिए, फिर देखिए आपके प्यारे-प्यारे रिश्तेदार आपकी क्या गत बनाते हैं। अभी इसी शादी में इतने सारे एहतियात बरतकर आ रहा हूं कि मन कई दिनों तक खिन्न रहेगा।

अपनी ही एक पुरानी कविता की पंक्तियां हैं- ‘सुन्न शरीरों पर रस की फुहार/  अपनी-अपनी नींदों में खोए सभी नाच रहे हैं/  गजब यह कि थिरक रहे हैं खुद अपने भी पांव/  न रोक पाता हूं इन्हें, न शामिल हो पाता हूं/  चहार-सू व्यापी इस एकरस लय में’ ।  डिटैच...डिटैच...डिटैच...मेरे जैसे सारे लोग ऐसी जगहों पर पहुंच कर मन ही मन में बार-बार कहते हैं, लेकिन हो नहीं पाते। हर बार सोचते हैं, इस बार कोई नया पेंच पकड़ने की कोशिश करेंगे, लेकिन एक लाइलाज कसैलेपन के सिवाय कुछ भी हाथ नहीं आता।

5 comments:

Pramod Singh said...

सांय-सांय सा मन डोलता है, और होंठ बुदबुदाते हैं छइंया हो.. अच्‍छी रपट. बीच-बीच में दूर से घर देखना चाहिये.

अनूप शुक्ला said...

बहुत अच्छा लिखा।

मोहन श्रोत्रिय said...

बढ़िया रपट है। कब मुक्त होंगे हम भौंडे प्रदर्शनों से?

कविता मुखर said...

बहुत सी शिरकत की हुई शादियां याद आ गई! अनुभव कोई उन्नीस बीस नहीं हूबहू रहा।
हाँ, 1995 में हुई कोर्ट मैरिज में 500/- और फिर आर्य समाज मंदिर में 3000/- खर्च हुए थे।

कविता मुखर said...

बहुत सी शिरकत की हुई शादियां याद आ गई! अनुभव कोई उन्नीस बीस नहीं हूबहू रहा।
हाँ, 1995 में हुई कोर्ट मैरिज में 500/- और फिर आर्य समाज मंदिर में 3000/- खर्च हुए थे।