Tuesday, February 20, 2018

कुत्ते का साल सन 4716

पड़ोसी मुल्क चीन में अभी नए साल की छुट्टियां चल रही हैं। बारह राशियों की तर्ज पर वहां बारह अलग-अलग नामों वाले साल लौट-लौट कर आते हैं। हालांकि ये राशियां वे नहीं हैं जो यूरोप-अमेरिका और भारत में मानी जाती हैं। जैसे, यह साल वहां कुत्ते का साल है, पिछला साल मुर्गे का था और अगला सुअर का होगा। उसके बाद, यानी 2020 से चूहे के साल के साथ 12 वर्षों का नया चक्र आरंभ होगा।
इस बार का चीनी नववर्ष बीती 16 फरवरी को पड़ा था, हालांकि इसकी छुट्टियां 15 फरवरी से शुरू हो गई हैं और 21 फरवरी तक चलेंगी। चीनी साल चंद्रवर्ष हुआ करते हैं और नया साल वहां 21 दिसंबर से 20 मार्च के बीच आता है। फिलहाल वहां हर जगह ग्रेगोरियन कैलेंडर ही इस्तेमाल होता है। यानी साल को लेकर जैसा कन्फ्यूजन आपको नेपाल में घूमते-टहलते हुए होता है, चीन में उसकी कोई आशंका नहीं है।
नेपाली आज भी रोजमर्रा के जीवन में विक्रमी संवत ही इस्तेमाल करते हैं, जो चंद्रवर्ष के नियमों का अनुसरण करता है और उसके साल ग्रेगोरियन वर्षों की तुलना में 57-58 साल आगे चलते हैं। इसके विपरीत चीनी साल का महत्व अब नववर्ष के उत्सव के तौर पर ही रह गया है। आप किसी से भी पूछें (बशर्ते वह इतिहास का विद्वान न हो) तो वह शायद ही बता पाए कि अभी कौन सा साल चल रहा है।
इस लेख को पढ़ने वाले कुछ विद्वान भी हो सकते हैं, लिहाजा बता दूं कि अभी चीन में 4716 वां वर्ष चल रहा है। जिस ग्रेगोरियन साल को हम जानते हैं, वह अभी 2018 है और भारत में जो देसी वर्ष चलते आये हैं, उनमें शक संवत ग्रेगोरियन से 78 वर्ष कम और विक्रमी संवत इससे 57-58 साल ज्यादा दर्ज किए जाते हैं। यानी अभी शक संवत 1940 और विक्रमी संवत 2075 चल रहा होगा। नेपाल के लोग आम बातचीत में अपनी नई हुकूमत को सन 75 की सरकार बोल रहे होंगे।
चीनी साल की तुलना इससे करके देखें तो न सिर्फ एशिया में बल्कि पूरी दुनिया में चीनी सभ्यता की प्राचीनता का अंदाजा मिलता है। चीन में एक लड़की ने थोड़ी हिकारत के साथ भारतीय सभ्यता को बहुत ही नई बताया तो मेरा राष्ट्रवाद जाग उठा और मैंने वेद से लेकर सिंधु घाटी तक के किस्से बयान कर दिए। लेकिन 4716 के आस-पास पहुंचने वाला कोई साल मैं अपनी सभ्यता को सिंधु घाटी से जोड़कर भी निकाल नहीं पाया।
बहरहाल, चीनी अपना नया साल होली के बजाय दीवाली की तर्ज पर मनाते हैं। लंबी छुट्टियां, खूब खर्चा, दनादन पटाखे, परिचितों-मित्रों-रिश्तेदारों को लंबी-चौड़ी भेटें (स्वादिष्ट टिकाऊ व्यंजन और नकदी, दोनों ही शक्लों में), जिसे लाल लिफाफा कहा जाता है।
और तो और, सरकारी अफसरों के लिए घूस उगाही के मौके के रूप में भी इस त्यौहार को हमारी दीवाली की ही तरह लिया जाता है। बताया जा रहा है कि दो तकनीकों वीचैट और हाईस्पीड रेलवे ने पिछले तीन वर्षों में चीनी नववर्ष के माहौल को बहुत बदल दिया है।
अपने फेसबुक-ट्विटर जैसे ऑनलाइन सोशल प्लेटफॉर्म वीचैट के जरिये लोगों को नकदी भेंटें अब ऑनलाइन भेजी जा रही हैं। इससे भेंटों की तादाद बढ़ गई है। एक सर्वे के मुताबिक इन तीन वर्षों के अंदर ही प्रति व्यक्ति औसत नकदी भेटों की तादाद 2 से बढ़कर सीधे 33 हो गई है। और हाई स्पीड ट्रेनों का कमाल यह है कि बहुत ज्यादा लोग त्यौहार मनाने दूर-दराज के इलाकों से अपने घर चले आ रहे हैं। इससे नववर्ष पर जबर्दस्त चलने वाले होटलों का धंधा मंदा पड़ गया है।
रही बात जुए की तो अपने गोवा की तरह चीन में वह सिर्फ मकाऊ में एलाउड है, जहां इस बार धंधे में धकाधक बढ़त दर्ज की जा रही है।

Wednesday, October 4, 2017

गुरुत्वीय तरंगें किस तरह बदलने वाली हैं हमारे ज्ञान की दुनिया

सौ साल तक तो यह अटकल ही चलती रही कि इस तरह की कोई चीज संभव है या नहीं। यह आश्चर्य की बात है कि इसी दुविधा के माहौल में कुछ लोग इन तरंगों को दर्ज करने के उपकरण बनाने में भी जुटे रहे। उनके दुस्साहस का अंदाजा लगाकर आप सिर्फ उनके सामने सिर ही झुका सकते हैं। नोबेल कमिटी ने इतना ही किया है। न इससे कम, न ज्यादा। जरा सोचकर देखिए, गुरुत्वीय तरंगों को अगर तरंग माना जाए तो ये किस चीज में चलने वाली तरंगें हैं? इनके रास्ते में करोड़ों प्रकाश वर्ष की दूरी ऐसी गुजर जाती है, जहां एक छोटा से छोटा कण तक नहीं होता, दूसरी तरफ ये ब्लैक होल जैसे इलाकों से भी गुजरती हैं, जिनसे पार पाना रोशनी तक के लिए नामुमकिन होता है।

2015 में आइंस्टाइन ने जनरल थिअरी ऑफ रिलेटिविटी के तहत अपनी तरफ से अकाट्य ढंग से स्पेस-टाइम (देश-काल) संजाल की संकल्पना दी थी। एक ऐसी चीज, जो खुद में कुछ भी नहीं है, लेकिन जो हर जगह, हर चीज में, हर समय में समान रूप से फैली हुई है। भारतीय दर्शन में पंचम तत्व आकाश की व्याख्या कुछ-कुछ इसी रूप में की जाती है, लेकिन समय वहां नदारद है। आइंस्टाइन के यहां आकाश और समय आपस में जुड़े हुए हैं, एक ही अमूर्त व्यक्तित्व के अलग-अलग चेहरों की तरह। और सबसे बड़ी बात यह कि भारतीय दर्शन का आकाश एक सर्वव्यापी स्थिर तत्व है, जबकि आइंस्टाइन का देशकाल फैलता-सिकुड़ता है। यहां तक कि इसमें छेद भी हो सकता है। 

उस समय ही आइंस्टाइन का कहना था कि किसी बहुत भारी पिंड को, सूरज से कई गुना भारी पिंड को अगर बहुत ज्यादा त्वरण मिल जाए, यानी उसकी रफ्तार अचानक बहुत ज्यादा बढ़ जाए तो वह देशकाल में ऐसी विकृति ला सकता है, जो अबाध रूप से आगे बढ़ती हुई एक तरह की तरंग जैसी शक्ल ले सकती है। यह बात आम समझ से परे है। अव्वल तो उस समय तक ऐसे किसी पिंड और उसे मिल सकने वाले इतने बड़े त्वरण की कल्पना करना भी लगभग असंभव था। फिर, मान लीजिए, ऐसी अनहोनी हो ही जाए, तो स्पेस में आने वाले किसी फैलाव या सिकुड़ाव क नापा कैसे जाएगा? जिस भी पैमाने से इसे नापना होगा, क्या वह खुद भी उतना ही फैल या सिकुड़ नहीं जाएगा?

यह उधेड़बुन आखिरकार 2015 में खत्म हुई और पिछले साल, यानी 2016 में पहली बार गुरुत्वीय तरंग की शिनाख्त का प्रकाशन हुआ। पता चला कि 30 सूर्यों के आसपास- एक थोड़ा कम, एक थोड़ा ज्यादा- वजन वाले दो ब्लैक होल एक अरब तीस करोड़ प्रकाश वर्ष दूर एक-दूसरे के करीब आते हुए रोशनी की आधी रफ्तार (एक सेकंड में लगभग डेढ़ लाख किलोमीटर) से घूमने लगे और फिर आपस में मिलकर एक हो गए। इस क्रम में ऊर्जा कितनी निकली- सेकंड के भी एक बहुत छोटे हिस्से में इतनी, जितनी तीन सूर्यों को पूरा का पूरा ऊर्जा में बदल देने पर निकल सकती है। इतनी भीषण घटना से देशकाल में पैदा हुई जो थरथरी एक अरब तीस करोड़ वर्षो में चल कर धरती तक पहुंच पाई, उसका आकार इतना छोटा था कि हमारा दिमाग उसकी कल्पना भी नहीं कर सकता। यूं समझें कि सूरज से धरती तक का आकाश इसके असर में जरा देर के लिए एक परमाणु बराबर सिकुड़ गया।  

बहरहाल, शुरू में कुछ लोगों ने यह भी कहा कि संभव है, यह थरथरी किसी और हलचल से पैदा हुई हो। लेकिन पिछले डेढ़-दो वर्षों में यह सिलसिला बढ़ते-बढ़ते कुछ दिन पहले चौथी तरंग के प्रेक्षण तक पहुंचा और यह तय हो गया कि आने वाले दिनों में विज्ञान की कुछ सबसे बड़ी सनसनियां गुरुत्वीय तरंगों के जरिये रचे जाने वाले खगोलशास्त्र के ही हिस्से आने वाली हैं। लेकिन इससे खगोल विज्ञान की सेहत फर्क क्या पड़ेगा? सबसे पहला तो यह कि आर्यभट से लेकर आज तक का खगोलशास्त्र पूरी तरह रोशनी पर निर्भर है, जो खुद में बहुत भरोसेमंद जरिया नहीं है। स्पेक्ट्रोमेट्री और एक्स-रे, गामा-रे टेलिस्कोपों के साथ भी यह सीमा जुड़ी है कि कुछ मामलों में उनके नतीजे बहुत धुंधले हो जाते हैं। जैसे, ब्लैक होल को ही लें तो उससे कोई रोशनी बाहर ही नहीं आती, लिहाजा अटकलबाजी के सिवाय वहां ज्यादा कुछ करने को होता ही नहीं।

इसके विपरीत गुरुत्व तरंगें किसी भी जिंदा या मुर्दा तारे की परवाह नहीं करतीं। वे खाली जगहों से भी उतनी ही आसानी से गुजरती हैं, जितनी आसानी से महाशून्य (द ग्रेट वॉयड) से। इन्हें धोखा देना या अपने दायरे में जकड़कर बाहर निकल जाने देना सृष्टि के सबसे बड़े ब्लैक होल के भी वश की बात नहीं है। कुछ वैज्ञानिक तो इतने आशावान हो चले हैं कि उन्हें लगता है, भविष्य की गुरुत्वीय तरंग वेधशालाएं सृष्ठि के आरंभ बिंदु ‘बिग बैंग’ का भी कुछ हाल-पता ले सकती हैं, जहां तक पहुंचने की उम्मीद भी किसी टेलिस्कोप से नहीं की जाती। असल में, ब्रह्मांड की बिल्कुल शुरुआती रचनाएं भी बिग बैंग से कम से कम चार लाख साल बाद की हैं। तो नोबेल प्राइज की खबरों में ही न डूबे रहिए। मजे लीजिए, नजर के सामने खुल रहे इस नए शास्त्र के, जिसे कल तक कल्पना से भी परे माना जाता था।