Tuesday, November 24, 2009

अंग्रेजी अपनी दिव्यता खो रही है

अंग्रेजी से मेरे परिवार की मुठभेड़ गुलाम भारत में शुरू हुई थी। दादा जी संस्कृत के अध्यापक थे। एक बार उनकी बनारस में रहने वाले गांव के ही एक सज्जन से कुछ झड़प हो गई तो उनके अंग्रेजीदां लड़के ने डैम फूल जैसी कोई गाली बक दी। दादा जी इसका मतलब नहीं समझ पाए, लेकिन लड़के के लहजे से स्पष्ट था कि वह उन्हें अंग्रेजी में गाली दे रहा है। तभी उन्होंने तय किया कि चाहे कुछ भी हो जाए, अब तो मेरे बच्चे अंग्रेजी में ही पढ़ेंगे। उस समय, जब संस्कृत मिजाज वाले परिवारों में बच्चों को ईसाई स्कूलों में भेजना विधर्मी कृत्य माना जाता था, उन्होंने मेरे ताऊ, पिता और चाचा का नाम आजमगढ़ शहर के वेस्ली मिशन स्कूल में लिखा दिया।

यहां से मेरे परिवार में एक नए युग की शुरुआत हो सकती थी, लेकिन वह नहीं हुई। अंग्रेजी हमारे यहां प्रतिक्रिया की भाषा ही बनी रही। इसका श्रीगणेश गाली से हुआ था और दो-चार जवाबी गालियां दे लेने के बाद इसका काम पूरा हो गया। अलबत्ता इस बीच परिवार की एक शाखा निखालिस अंग्रेजी की राह पर बढ़ चली। अपने चाचा की आलमारियां मैंने सिर्फ अंग्रेजी उपन्यासों से भरी पाईं।

चचेरे भाई-बहनों को भी आपस में और माता-पिता से हमेशा अंग्रेजी में ही बात करते देखा। लेकिन जैसे ही वे घर से निकल कर जिंदगी की राह पर लौटे, वैसे ही ठेठ बनारसी या गोरखपुरिया हो गए। वे पढ़े-लिखे पेशों में हैं लेकिन उनकी रोटी अंग्रेजी से नहीं निकलती। अंग्रेजी उपन्यास उन्हें अब भी पसंद हैं, लेकिन उनके हाथ में मैंने कभी कोई क्लासिक चीज नहीं देखी।

चर्चित उपन्यासकार चेतन भगत ने भारत में अंग्रेजी अपनाने वालों की दो किस्में बताई हैं। एक ई-1, यानी वे, जिनके मां-बाप अंग्रेजी बोलते रहे हैं, जिनका बोलने का लहजा अंग्रेजों जैसा हो गया है और जो सोचते भी अंग्रेजी में हैं। दूसरे ई-2, यानी वे, जिन्होंने निजी कोशिशों से अंग्रेजी सीखी है और जिनका अंग्रेजी बोलना या लिखना हमेशा अनुवाद जैसा अटकता हुआ होता है। भगत का कहना है कि वे अपने पाठक ई-1 के बजाय ई-2 में खोजते हैं, और भारत में अंग्रेजी का भविष्य भी इसी वर्ग पर निर्भर करता है।

अंग्रेजी के साथ भारतीयों के बहुस्तरीय रिश्तों को देखते हुए कोई चाहे तो ई-1, ई-2 के सिलसिले को ई-3 और ई-4 तक फैला सकता है। मसलन, वे लोग जिनका अंग्रेजी में पहली पीढ़ी का दखल भी दहलीज लांघने तक ही सीमित है, या वे, जो बस इतना जान पाए हैं कि अंग्रेजी का अखबार किधर से पकड़ने पर सीधा और किधर से उल्टा होता है। सवाल यह है कि ये सारी श्रेणियां क्या अनिवार्यत: ई-1 की ओर बढ़ रही हैं? या फिर ई-2 जैसी कोई बहुत बड़ी स्थायी श्रेणी ही भारत में अंग्रेजी का प्रतिनिधित्व करेगी?

जो लोग भी अभी ई-1 में शामिल हैं, या होने का दावा करते हैं, उनके पीछे की पीढि़यां कभी न कभी ई-4, ई-3 या ई-2जैसे मुकामों से जरूर गुजरी होंगी, लिहाजा गणितीय तर्क से इस नतीजे तक पहुंचा जा सकता है कि एक दिन भारत के ज्यादातर लोग अंग्रेजी मुहावरे में ही सोचने, बोलने और लिखने लगेंगे। लेकिन तजुर्बे से लगता है कि ई-1 की तुलना में ई-2 का अनुपात तेजी से बढ़ने के साथ ही अंग्रेजी कुलीनता का मिथक कमजोर पड़ने लगता है और एक किस्म के लेवल प्लेइंग फील्ड की शुरुआत हो जाती है।

किसी धौंस, अनुशासन या मजबूरी के तहत नहीं, सहज जीवनचर्या के तहत अंग्रेजी अपना कर उसी में सोचने-समझने और मजे करने वाली कोई पीढ़ी मेरे परिवार में अब तक नहीं आई है। अमेरिका, इंग्लैंड और ऑस्ट्रेलिया में रह रहे सबसे नई पीढ़ी के छह-सात लड़के, लड़कियां और बहुएं अंग्रेजी में लिखते-पढ़ते जरूर हैं, लेकिन इसके लिए मेरे चाचा और उनके बेटे-बेटियों की तरह कई साल तक सचेत ढंग से हिंदी से कटकर अंग्रेज बनने की जरूरत उन्हें कभी नहीं पड़ी। वे इंजीनियर, डॉक्टर या सीए होकर ग्लोबल हुए हैं, अंग्रेज होकर नहीं। उन्हें पता है कि अंग्रेजी का दखल उनकी जिंदगी में कहां शुरू होता है और कहां पहुंच कर खत्म हो जाता है।

Monday, November 23, 2009

जितने नाकारा उतने धर्मधुरीण

तांत्रिकों और कथावाचकों का मंत्री बनना, सड़क घेर कर मंदिर और ग्रीन बेल्ट छेंक कर गुरद्वारे खड़े हो जाना, हर रात ही सिर खाते माता के जगराते, नए-नवेले भगवानों और धर्मगुरुओं का बढ़ता दायरा, हर जुमे को सड़कों पर आना-जाना दूभर बनाती नमाजी जमातें, और खुद को जेन-एक्स, वाई या जेड बताने वाले नौजवानों में भी गंडे-ताबीज बांधने का ट्रेंड। क्या इक्कीसवीं सदी के समाज में धार्मिकता बढ़ रही है?

समय बीतने के साथ लोग उदार और धर्मनिरपेक्ष होते जाएंगे, ऐसी एक राय बीसवीं सदी के सात या आठ दशकों तक मुख्यधारा में थी लेकिन समाजवादी व्यवस्थाओं और उनकी विचारधारा के पतन के साथ ही यह नेपथ्य में चली गई। इसके बाद से धार्मिकता पूरी दुनिया में एक रहस्यमय चीज बनी हुई है। कोई नहीं जानता कि यह घट रही है या बढ़ रही है। सामाजिक विकास के साथ इसका कोई रिश्ता है या नहीं। और किसी समाज में यह आत्मघाती हो चली है तो वहां इसके इलाज की कल्पना भी की जा सकती है या नहीं।

समाज विज्ञानियों के यहां ऐसे सारे सवालों के जवाब अटकलों पर आधारित हैं लेकिन मनोविज्ञान के एक खोजी ने इसका जवाब खोजने में आश्चर्यजनक वैज्ञानिकता आजमाई है। इवोल्यूशनरी साइकॉलजी के पिछले अंक में प्रकाशित ग्रेगरी पॉल के 44पेज लंबे रिसर्च पेपर के निष्कर्षों से भी ज्यादा रोचक है उनकी खोज प्रणाली, उनके पुख्ता मानदंड। आज जब हम चिकित्सा शास्त्र जैसे शुद्ध विज्ञान में भी अधकचरे और बेईमान नतीजों की भरमार देख रहे हैं, तब ग्रेगरी ने समाज विज्ञान के एक उलझे हुए प्रश्न का अकाट्य उत्तर ढूंढ निकाला है।

अपनी खोज में ग्रेगरी पॉल ने यह पता लगाने की कोशिश की है कि किसी समाज के धार्मिक होने और सफल होने के बीच का रिश्ता क्या है। न औद्योगिक, न शक्तिशाली, न विकसित। सिर्फ सफल। कोई समाज कितना सफल है, यह जानने के लिए उन्होंने 25 ऐसे मानक चुने हैं, जिन्हें पक्की संख्याओं के रूप में दर्ज किया जा सकता हो और जिनके प्रामाणिक आंकड़े पहले से मौजूद हों।

इसके लिए उन्होंने ऐसे 17 देशों को लिया है जो विकास के लगभग एक से स्तर पर हैं और जहां ऐसे रेकॉर्ड रखने की पुरानी व्यवस्था मौजूद है। ये हैं- ऑस्ट्रेलिया, ऑस्ट्रिया, कनाडा, डेनमार्क, इंग्लैंड, फ्रांस, जर्मनी, हॉलैंड, आयरलैंड, इटली, जापान, न्यूजीलैंड, नॉर्वे, स्पेन, स्वीडन, स्विट्जरलैंड और अमेरिका। ग्रेगरी के मुताबिक इस दायरे को बढ़ाने का अर्थ होगा तथ्यों से समझौता करना।

किसी समाज की सफलता या असफलता को निर्धारित करने के लिए जो मानक उन्होंने चुने हैं, वे हैं - हत्याएं, जेल में बंद लोगों की तादाद, कम उम्र मौतें, जीवनकाल, कम आयु और सभी आयु वर्गों में स्त्री और पुरुष यौन रोग, किशोर वय में प्रसव और गर्भपात, जवानी में और सभी आयु वर्गों में आत्महत्याएं, प्रजनन क्षमता, विवाह, विवाह की अवधि, तलाक, जीवन से संतुष्टि, शराब की खपत, भ्रष्टाचार, आय, आय में अंतर, दरिद्रता, रोजगार, काम के घंटे और संसाधनों के दोहन का आधार, विदेश में जन्मे लोगों का प्रतिशत और सांस्कृतिक विभेद।

इनमें हर एक मानक के पीछे ग्रेगरी पॉल के कुछ पुख्ता तर्क हैं। इस सूची में हत्या के अलावा बाकी हिंसक अपराध शामिल नहीं किए गए हैं क्योंकि हत्या दर्ज करने के लिए लाश की मौजूदगी जरूरी है, जबकि बाकी अपराधों में ढीलापोली की काफी गुंजाइश होती है। इसी तरह ड्रग्स के मामलों को भी छोड़ दिया गया है क्योंकि इनके पक्के आंकड़े किसी भी देश में नहीं रखे जाते।

धार्मिकता के आकलन के लिए ग्रेगरी ने जो मानक चुने हैं उन्हें भी संख्याओं में व्यक्त किया जा सकता है और नियमित सरकारी सर्वेक्षणों में इनके आंकड़े उपलब्ध हैं। ये हैं- ईश्वर में पूर्ण विश्वास, मूल धर्मग्रंथ के हर शब्द पर पूरा यकीन, महीने में कई बार धार्मिक आयोजनों में शिरकत, हफ्ते में एकाधिक बार उपासना, मृत्यु के बाद जीवन (आफ्टरलाइफ) में पूर्ण विश्वास, संदेहवादी और नास्तिक, और मनुष्य का विकास पशुओं से होने की प्रस्थापना में विश्वास।

सत्रहों देशों में हर साल जारी होने वाले दोनों किस्म के आंकड़ों को ग्रेगरी पॉल ने बड़ी मशक्कत से जुटाया और इनके आधार पर इन समाजों की सफलता और धार्मिकता के अलग-अलग ग्राफ बनाए। ये ग्राफ एक ही नजर में दोनों के अंतर्संबंध को लेकर कुछ ठोस नतीजों तक पहुंचा देते हैं। सीधी समानुपाती रेखाओं द्वारा प्रदर्शित एक नतीजा तो बिल्कुल साफ है कि जो समाज जितने नाकारा, बेचैन और परेशान हैं वहां धार्मिकता का जोर उतना ही ज्यादा है। इसके बरक्स जो समाज जितने सफल, संतुष्ट और प्रसन्न हैं वहां धर्म के प्रति लोगों का नजरिया उतना ही कैजुअल या लापरवाही भरा है।

तानाशाही माहौल से धीरे-धीरे बाहर आ रहे पुर्तगाल और संसार के सबसे शक्तिशाली लोकतंत्र अमेरिका में कुछ भी साझा नहीं है लेकिन अपराधों का प्रतिशत और चर्च से जुड़ी कट्टरता दोनों जगह एक जैसी है। उधर इनके पड़ोसी देश फ्रांस और कनाडा शांति और संतुष्टि में ही नहीं, धार्मिकता के मामले में भी एक जैसे हैं। फ्रांस में तो खुद को संदेहवादी या नास्तिक बताने वालों का हिस्सा कुल आबादी का एक तिहाई हो चला है।

इन तथ्यों के आधार पर ग्रेगरी पॉल इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि मनुष्य का धार्मिक होना कोई स्वत:सिद्ध बात नहीं है। धार्मिकता सुदूर अतीत में आदिम इंसानों के जोखिम भरे जीवन से उपजी डिफाल्ट मोड जैसी मनःस्थिति है, जहां खुद को असुरक्षित और लाचार पाते ही वे अपने आप लौट आते हैं। इस खोज को कुछ महीन दलीलों के जरिए चुनौती देने की कोशिश की जा सकती है, लेकिन यह बुनियादी सवाल से टकराने के बजाय बीच का रास्ता निकालने जैसा ही होगा।

इस तरह की खोज में काम आ सकने वाले भरोसेमंद आंकड़े भारत में मौजूद नहीं हैं, लेकिन यहां जोर मारती धार्मिकता को समाज की बढ़ती नाकामियों से जोड़ कर देखने के लिए शायद इतने गहरे शोध की जरूरत भी नहीं है।