Saturday, July 14, 2018

डरो

कोयले से डरो राख से डरो
सड़क किनारे पड़े फटे जूते से डरो
अपने ठिकाने से हंकाले जाने के बाद
कहीं भी टिक पाने में नाकाम रहे
उजड़े-बिखरे सनकैल इंसान से डरो
दहशत खाओ मैली दिखने के करीब
हल्के हरे रंग की साड़ी पहने औरत
और उसकी उंगली पकड़े चल रहे
दाढ़ी-मूंछ वाले मंदबुद्धि बालक से
कि ये चीजें बहुत धीरे-धीरे चलती हैं
ताकत की चढ़ाई चढ़ते हुए शातिर लोग
जब अपनी गाड़ी का पांचवां गियर लगाते हैं
तो अपने पीछे धूल और तालियों के अलावा
ऐसी चीजों का अंबार भी छोड़ते जाते हैं
और कई बार उन्हें पता भी नहीं होता
कि जो धीमा रुदन रात में आंख लगते ही
उनके सुसज्जित साउंडप्रूफ शयनकक्ष में
सुनाई पड़ता है, वह उनके ही
किसी ज्ञात-अज्ञात कर्म का नतीजा है
हे जननायक, सुख-दुख के दायक
दूर-दूर तक लगी मेटल डिटेक्टरों
और स्टेनगनों की बाड़ के बावजूद
यह इत्मीनान होना नामुमकिन है
कि इन्हीं में से कोई चीज
किसी दिन जमीन से उछलकर
सीधे तुम्हारा गला नहीं पकड़ लेगी
इसे लेकर तुम ज्यादा हतक भी मत मानो
क्योंकि इंसान को उसके अतीत से बचा सके
ऐसा कोई कवच अबतक रचा नहीं जा सका है
तुम्हारी हंसी पूरी दुनिया को लुभाती है
लेकिन बहुतों को उस घड़ी का इंतजार है
जब तुम्हारे ही बनाए हुए इतने सारे भूत
मौका ताड़कर तुम्हारे सामने आएंगे
और इस जगत-विजयिनी हंसी की
लंबी स-स्वर यात्रा तत्काल पलट कर
बाहर से भीतर की ओर हो जाएगी

Tuesday, July 10, 2018

गर्दन नापना

बैल बेचने जा रहे दढ़ियल व्यापारी को
हाट से जरा पहले नामनिहाद जंगल के पास
पकड़ कर दम भर मारा, फिर बैल का लंबा पगहा
आदमी के गले में डालकर ऐसी गांठ मारी
जो किसी भी जिंदा चीज के गले में नहीं मारी जाती

वह पगहा एक पेड़ की नीची शाख से डका कर
150 सीसी की एक रेसिंग बाइक के फ्रेम में बांधा गया
फिर दो किक, एक हुंकारा और फुल थ्रोटल विद फुल वेट

घूं-घूं घुर्र-घुर्र की विकट आवाजों के साथ
बमुश्किल डेढ़ मिनट और बारह फुट लम्बी चली
जिंदगी और मौत की वह विचित्र रस्साकशी

और जब इंजन बन्द हुआ तब रस्सी के एक ओर थी
बित्ता भर खिंची जुबान और दूसरी तरफ
न जाने किन-किन देवी-देवताओं के जैकारे,
थाना-कचहरी पुलिस-पोस्टमार्टम की रस्में-कसमें
और कुछ महीने बाद चॉकलेट केक पर चेरी जैसा
ऑक्सफ़ोर्ड का पढ़ा हुआ एक केंद्रीय मंत्री

जिसके हाथों में थमी गेंदे की मह-मह महकती मालाएं
कैमरों के सामने एक-एक कर पड़ीं उन्हीं की गर्दनों में
जिनके अथक प्रयासों से कुछ महीने पहले
मुंह दाबकर थूरे हुए एक इंसान की गर्दन
बमुश्किल आध इंच लंबी हो पाई थी

गर्दन नपने का मुहावरा मैंने स्कूल में पढ़ा था
क्या पता था कि कभी कविता जैसे नफीस काम के लिए
मुझे भी एक निर्दोष आदमी की गर्दन नापनी होगी

हो सके तो हमें माफ कर देना मानस पिता भवभूति,
मृत्यु के इस महा-महोत्सव में बख्श ही देना
कि मुझे पक्का यकीन है जो यह छोटा सा जीवन
और भी कितने हंसोड़ मुहावरों को नष्ट करते बीतेगा