आलम में इंतखाब दिल्ली शहर धूल और बारिश में बारी-बारी भच-भच करता कॉमनवेल्थ नाम के अगम-अगोचर गोदो का इंतजार कर रहा है। लगभग हर चौराहे पर फ्लाईओवर या तो बन गए हैं या बनने की प्रक्रिया में हैं। सड़कें खुदी हुई हैं। बगल में पड़ा ढेर सारा लोहा सड़ रहा है। बड़े-बड़े क्रेन बीसियों किलो के हिलते-डुलते हुक लटकाए कभी भी कपाल क्रिया कर देने को उतावले हैं। मेट्रो को एनसीआर के चप्पे-चप्पे से जोड़ देने की तैयारी है लेकिन उसके खंभे दरक रहे हैं। पटरियों को रोकने के उपाय छूंछे साबित हो रहे हैं और पता चल रहा है कि मेट्रो का एक सीमेंट सप्लायर न जाने कब से घटिया माल उसके मत्थे मंढ़ रहा था।
शहर में अब धीरे-धीरे कॉमनवेल्थ को लेकर एक किस्म का डर व्यापने लगा है। माइकल फेनेल नाम के एक कॉमनवेल्थिया अफसर यहां आकर गहरी चिंता जता गए। यहां तक कहा कि अब तो समय भी इतना कम रह गया है कि खेलों की जगह भी नहीं बदली जा सकती, लेकिन दिल्ली में अभी तैयारियों की जो हालत है, उसमें कोई चमत्कार ही न हो गया तो यहां होने वाले आयोजन से इन खेलों की प्रतिष्ठा पर बुरा असर पड़ सकता है। न कोई स्टेडियम तैयार है, न खिलाड़ियों और अतिथियों के ठहरने की व्यवस्था अगले एक साल में हो पाने के कोई आसार हैं। ऊपर से तुर्रा यह कि आयोजकों की बहुत लंबी सूची में हर कोई अपना-अपना साम्राज्य चलाने में ही मगन है।
एक ऐसा शहर, जहां पचास लाख के लगभग गाड़ियां चल रही हों और इनकी संख्या में हर रोज ही सैकड़ों का इजाफा हो रहा हो, सचमुच जादू की छड़ी हासिल कर ले तो भी अपने यातायात का स्तर सुधार नहीं सकता। सफाई वगैरह के मामले में यह शहर पहले से ही माशाअल्ला है और शहर भर में खुदाई से जमा मिट्टी ने नालों को ढक कर सड़कें बनाने जैसी इंजीनियरिंग कसरतों के साथ मिलकर यहां की गंदगी को चमत्कारिक ऊंचाइयों तक पहुंचा दिया है। मजे की बात यह कि इस धकापेल को घटाने के बजाय तैयारी निरंतर इसे बढ़ाते जाने की ही चल रही है।
पिछले आठ-दस वर्षों में राई से पर्वत बने दिल्ली, गाजियाबाद, फरीदाबाद, गुड़गांव, नोएडा, ग्रेटर नोएडा और हरियाणा के कुछ और पड़ोसी जिलों के बिल्डर और उनके दलाल किसी इलाके में मेट्रो पहुंचने, कहीं आसपास फ्लाईओवर बनने या विकास की ऐसी ही किसी और खबर के दम पर अपने मकानों की कीमत सवा से डेढ़ गुनी कर दे रहे हैं। साथ में खरीदार के लिए यह आश्वासन भी कि मकान लेकर किसी तरह साल-दो साल का वक्त निकाल लीजिए और फिर दस लाख का मुनाफा लेकर कहीं और निकल लीजिए। लालच का यह ऐसा विस्फोट है जिसकी जद में हजार-हजार मील दूर के खाता-कमाता लोग भी आ जा रहे हैं।
महानगरों में आम तौर पर लोग नौकरी-चाकरी के लिए आते हैं और सिलसिला जम जाए तो यहां स्थायी रूप से रहने का इंतजाम भी कर लेते हैं। लेकिन एनसीआर की किसी भी नई विकसित हुई कालोनी में निकल जाइए, हर जगह दस में से दो या तीन लोग वहां ऐसे जरूर मिल जाएंगे, जो यहां कोई काम नहीं करते। वे बलिया, मुजफ्फरपुर, सागर, बीकानेर या तरन तारन से दो-चार लाख का जुगाड़ करने के बाद किसी तरह लंबे लोन की व्यवस्था करके यहां मालिक मकान बन गए हैं और अब अपने मकान की कीमत चढ़ने का इंतजार कर रहे हैं। इस बीच यूं ही लोगों के बिल जमा करवाने लगे, एलआईसी की एजेंटी पकड़ ली, लकड़ी या मार्बल के किसी डीलर के साथ बैठने लगे, किराने की दुकान खोल ली या और कुछ नहीं तो एक फोटोस्टैट मशीन रख ली और साथ में प्रॉपर्टी की दलाली करने लगे।
बताया जा रहा है कि अगले दस वर्षों में एनसीआर में पांच करोड़ परिवार बस रहे होंगे। इनकी रोजी-रोटी का जरिया क्या होगा, कोई नहीं जानता। 1982 के एशियाड में साउथ दिल्ली बसा था और कहा जा रहा है कि 2010 के कॉमनवेल्थ से पूर्वी दिल्ली की किस्मत चमक जाएगी। लेकिन किस्मत तो अभी यहां सिर्फ ब्रोकरों और बिल्डरों की चमकती नजर आ रही है।
एशियाड ने दिल्ली में झोपड़पट्टियों की शुरुआत की थी लेकिन कॉमनवेल्थ के नाम पर पूरी दिल्ली को एक विशाल स्लम एरिया बना देने की दिशा में तेजी से कदम उठाए जा रहे हैं। वे कौन भाग्यशाली लोग होंगे, जो कॉमनवेल्थ में खेल कर देश का नाम रौशन करेंगे। कोई नहीं जानता क्योंकि उनके बारे में सोचने की किसी को फुरसत नहीं है। अलबत्ता जो लोग इस खेल में काफी पहले से पदक पर पदक हासिल करते जा रहे हैं, उनका जिक्र यहां कर दिया गया है।
Wednesday, September 16, 2009
Thursday, September 10, 2009
पैसे का क्या है
पैसे का क्या है
वो तो हाथ का मैल है
पता भी नहीं चलता और चिपकता जाता है
काफी जम जाए तो भी नजर नहीं आता
देखने में बिल्कुल साफ दिखते हैं हाथ
मगर पानी में डालो तो समझ नहीं पड़ता
कि कालिख इतनी कहां छिपी थी
पैसे का क्या है
इधर से आता है उधर चला जाता है
घेर-घार लेकिन इतनी मचाता है
कि दूर तक कुछ भी नजर नहीं आता
जब यार-दोस्त होते हैं, पैसा नहीं होता
जब दिल लगता है तो पैसा नहीं होता
जब खुद में खोए रहो तो भी वो नहीं होता
फिर पीछे पड़ो उसके
तो उठ-उठ कर सब जाने लगते हैं
पहले दृश्य, फिर रिश्ते, फिर एहसास
फिर थक कर तुम खुद भी चले जाते हो
दूर तक कहीं जब कुछ नहीं होता
तो पैसा होता है
पैसे का क्या है
वो तो.....
वो तो हाथ का मैल है
पता भी नहीं चलता और चिपकता जाता है
काफी जम जाए तो भी नजर नहीं आता
देखने में बिल्कुल साफ दिखते हैं हाथ
मगर पानी में डालो तो समझ नहीं पड़ता
कि कालिख इतनी कहां छिपी थी
पैसे का क्या है
इधर से आता है उधर चला जाता है
घेर-घार लेकिन इतनी मचाता है
कि दूर तक कुछ भी नजर नहीं आता
जब यार-दोस्त होते हैं, पैसा नहीं होता
जब दिल लगता है तो पैसा नहीं होता
जब खुद में खोए रहो तो भी वो नहीं होता
फिर पीछे पड़ो उसके
तो उठ-उठ कर सब जाने लगते हैं
पहले दृश्य, फिर रिश्ते, फिर एहसास
फिर थक कर तुम खुद भी चले जाते हो
दूर तक कहीं जब कुछ नहीं होता
तो पैसा होता है
पैसे का क्या है
वो तो.....
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