Tuesday, December 27, 2011

परिचित चेहरे

मुस्कुराते हुए वे कभी-कभी
इतने करीब चले आते हैं
कि उनकी सांसें
मेरे चेहरे से टकराने लगती हैं।

अचकचाहट में नमस्कार के लिए
जुड़ जाती हैं हथेलियां
या आगे बढ़कर
उनके हाथ थाम लेने के लिए
भीतर खुजली सी होने लगती है।

लेकिन हर बार उनकी दिशा
कुछ और होती है।

कभी वे मेरे पीछे खड़े किसी सज्जन से
मिलने को लपक रहे होते हैं
तो कभी वहां मेरी उपस्थिति से भी अनजान
मन ही मन कोई धुन गुनगुनाते हुए
खुद से ही मिले हुए होते हैं।

पहले ऐसी घटनाओं में
अपनी बेतरह शर्मिंदगी को मैं
जबरन झुठला दिया करता था
पर इधर ये कुछ ज्यादा ही बढ़ गई हैं।

चेहरा पढ़ने वाले मेरे चेहरे को
जाना-पहचाना सा लगने वाला
फैमिलियर फेस बताते हैं
लेकिन यहां तो मामला बिल्कुल उलटा है।

अनजान चेहरों को पहचानने की गलती
हर बार मुझी से होती है।

मुझे शक है कि
कहीं यह नाम भूलने की
उलटी प्रक्रिया तो नहीं है।

अक्सर अपने परिचितों के नाम
भूल जाने की भरपाई
मैं कहीं निपट अपरिचितों के
चेहरे पहचान लेने से
तो नहीं करने लगा हूं।

4 comments:

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

अक्सर अपने परिचितों के नाम
भूल जाने की भरपाई
मैं कहीं निपट अपरिचितों के
चेहरे पहचान लेने से
तो नहीं करने लगा हूं।

अक्सर हम अपरिचितों में परिचय ढूँढा करते हैं ..गहन अभिव्यक्ति

वाणी गीत said...

परिचितों से उकताए अपरिचितों में उन्हें क्यों ढूँढने लगते हैं , या एक मुकाम के बाद हर परिचित अपरिचित सा लगने लगता है ...उलझन होती है !

वन्दना said...

यथार्थ बोध कराती सुन्दर प्रस्तुति।

दिलबाग विर्क said...

आपकी पोस्ट आज के चर्चा मंच पर प्रस्तुत की गई है
कृपया पधारें
चर्चा मंच-743:चर्चाकार-दिलबाग विर्क