Wednesday, December 21, 2011

आराम का सफर

ट्रेन अगर सामने खड़ी हो
तो अगली वाली में
पसर कर जाने की उम्मीद में
उसे हरिगज मत छोड़ना।

अक्सर तो अगली ट्रेन
वक्त पर आती नहीं
आती भी है तो
पहली वाली से ज्यादा भरी होती है।

यही नहीं, कभी-कभी तो वह
जैसे सिर्फ तुम्हें चिढ़ाने के लिए
रुक-रुक कर चलती है।

ड्राइवर को जुलाब पड़ने लगते हैं
और गार्ड के सिग्नल वाले हाथ में
जरा सी मोच आ जाती है।

जो लोग कहते हैं कि
उन्होंने भरी गाड़ी में कभी पांव ही नहीं रखा
उनकी बात कभी न सुनना
वे अपना तजुर्बा नहीं,
सिर्फ अपनी चाहत बयान कर रहे होते हैं।

मजा आराम से पसर कर बैठने में नहीं
भीड़ में चंपकर लोगों की बातें सुनने में है,
और खिड़की से ताकने का दांव लग जाए तो
बाहर ट्रेन से होड़ लगाते कबूतर को
पीछे छूटते देखने में।

इसलिए जिस दिन तुम्हारा दिल
आराम से पसरकर जाने का हो
उस दिन ट्रेन पकड़ने का इरादा छोड़ दो
और अपनी खटिया को ट्रेन समझकर
घर में ही लंबे से लंबा सफर तय करो।

7 comments:

अनूप शुक्ल said...

बहुत खूब! :)

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

आपकी प्रवि्ष्टी की चर्चा कल बृहस्पतिवार 22-12-2011 के चर्चा मंच पर भी की या रही है!
यदि किसी रचनाधर्मी की पोस्ट या उसके लिंक की चर्चा कहीं पर की जा रही होती है, तो उस पत्रिका के व्यवस्थापक का यह कर्तव्य होता है कि वो उसको इस बारे में सूचित कर दे। आपको यह सूचना केवल उद्देश्य से दी जा रही है!

स्वप्नदर्शी said...

Apko vapas dekh kar khushi huyii. Ummed hai ab swasth honge!

Rajesh Kumari said...

bahut rochak aur sach likha hai.pahli baar aapke blog par aai hoon aakar achcha laga.milte rahenge.

डॉ. जेन्नी शबनम said...

बहुत खूब. सही कहा वक़्त इंतज़ार नहीं करता, वक़्त पर ही मज़ा ले लेना चाहिए आराम से सोचेंगे तो बस...ये ट्रेन भी गई दूसरी कब आये पता नहीं. अच्छी रचना, बधाई.

प्रवीण पाण्डेय said...

सुख की परिभाषा मन से ही आये, बाहर से नहीं।

चंद्रभूषण said...

@स्वप्नदर्शी- शुक्रिया। अपने मन का लिखना अभी भी टेढ़ा काम बना हुआ है, लेकिन हालत पहले से काफी बेहतर है।