Friday, October 29, 2010

अंतिम दृश्य

दो महीने अगर
दो साल खिंच जाएं तो?
या घटकर दो दिन
या दो घंटे ही रह जाएं तो?

कैलेंडर घड़ी सब हटा लो
समय इनके बिना ज्यादा सही चलेगा।

दिल का डूबना
हिचकियों का आते ही चले जाना
जब-तब ऐसा लगना
जैसे आंत से गले तक
भीतर-भीतर सब कुछ ऐंठ रहा है

यह सब आदमी को
खोल में ले जाने की टेक्नीक है।

आदमी अखीर में
सिर्फ एक आदमी होता है
जैसे एक कुत्ता
या एक सांप
या एक पेड़

या पहाड़ी शाम का एक रंग
जो एक क्षण भी नहीं टिकता।

थोड़ी सी खाली जगह
हर किसी के जाने के बाद
छूट जाती है
लगता नहीं कि कभी भरेगी
पर भरते-भरते भर भी जाती है

जाता हुआ आदमी
किस-किस के लिए रोएगा?

सामने धूल है या धुंध है
या आंखें ही कुम्हला रही हैं
जो भी है कुछ खास नहीं है
कि यही सब रोज देखते आए हैं

खास है तो सिर्फ इसलिए कि
देखने को आगे यह भी नहीं रहेगा।

4 comments:

निर्मला कपिला said...

बिलकुल सही कहा। कई बार हम गम को पकड कर ही बैठ जाते हैं ये नही सोचते कि जीवन क्षण भंगुर है पता नही जो आज है कल वो भी न हो।
थोड़ी सी खाली जगह
हर किसी के जाने के बाद
छूट जाती है
लगता नहीं कि कभी भरेगी
पर भरते-भरते भर भी जाती है
वक्त ही मरहम है बस। अच्छी रचना के लिये बधाई।

ANIL YADAV said...

उर्फ बड़े भाग मानुष तन पावा।

प्रवीण पाण्डेय said...

अभी दीखने वाले क्षण भविष्य में नहीं दिखेंगे।

डॉ .अनुराग said...

यक़ीनन ....जीवन क्षण भंगुर है .इसे शायद सिर्फ आदमी ही समझता है ...पर झुठलाता रहता है