Friday, May 28, 2010

युद्ध और उबासियां

पीछे उबासियां थीं और आगे युद्ध था
हमने नदी पार करने की सोची ताकि युद्ध में उतर सकें
अंतहीन चौड़ी लगती थी नदी
चांदनी रात में उसकी लहरें ठोस चांदी की तरह चमकती थीं
लेकिन हमें रोक पाता ऐसा उनमें कुछ भी नहीं था
जैसे-तैसे हमने नदी पार की
फिर एक नजर डोंगियों पर डाली कि उन्हें कहीं छुपा दें।

न जाने कब की एक आकाशवाणी हमारे जेहन पर छाई हुई थी
कि सब नावें जला देनी हैं तोड़ देने हैं सारे पुल
कि इस युद्ध से वापसी की कोई गुंजाइश नहीं छोड़नी है
यह सिर्फ एक आकाशवाणी थी जिसे अनसुना किया जा सकता था
कोई आदेश नहीं था
कि इतने ही आदेश मानने वाले होते तो उस पार न पड़े रहते
यह हमारा चयन था हमारा अपना फैसला
जो सुलगती डोंगियों के धुएं में पक कर और गहरा हो चला था।

फिर हम उधर बढ़े जिधर से युद्ध की आवाजें आ रही थीं
दरअसल वहां कई युद्ध एक साथ जारी थे
कहीं नगाड़ों की थाप पर मुखौटा बांधे राम-रावण लड़ रहे थे
तो कहीं मुहर्रम के झपताल पर चटकी-डांड़ खेला जा रहा था
हमें लगा शायद गलत जगह आ गए हैं
यही मौका था जब पहली बार तुम मुझसे मुखातिब हुए
तुम्हारी आंखों में पहचानी मैंने वह रौशनी
जो हमें इन कागजी युद्धों के पार ले जा सकती थी।

सबसे तीखी रौशनी वाला तारा सबसे जल्द मरता है-
तुमने कहा तो मुझे लगा इस तारे में दूब रोप देनी चाहिए
पीली गर्द में वह शाम ढल रही थी और चेहरे धुंधले पड़ रहे थे...

सबकुछ वैसा ही था जैसे आज था तुमसे मिलते समय

तुम इतने दिन कहां रहे दोस्त
किन-किन युद्धों में शामिल हुए कितनी नदियां पार कीं कितनी बार
आज तुम्हें सड़क पर एक लंबी नाव में आते देखा तो याद आया
ऐसी कितनी नावें जलाकर हम इस पार आए थे
उबासियों भरे इस थके हुए युद्ध में
जहां नदियां सिर्फ बीते दिनों की याद में बहती हैं।

8 comments:

श्यामल सुमन said...

जहां नदियां सिर्फ बीते दिनों की याद में बहती हैं। - ये अंतिम पंक्ति बहुत कुछ कह जाती है चन्द्रभूषण जी।

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
www.manoramsuman.blogspot.com

डॉ .अनुराग said...

आज के दिन की सबसे शानदार कविता ......शीर्षक उतना ही अर्थपूर्ण.....आपको पढना अपने अनुभवों को शब्द चित्र में देखना है

उम्मेद गोठवाल said...

बेहतरीन प्रतीकात्मक कविता.....सुन्दर, सशक्त व सार्थक लेखन हेतु बधाई।

dhiru singh {धीरू सिंह} said...

बेहतरीन कविता

स्वप्नदर्शी said...

बहुत अच्छी कविता, फिर कविता के पार भी बहुत कुछ जाना पहचाना ...

जोशिम said...

क्या कहने - सड़क पर लंबी नांव के सवार, इतने दिन कहाँ रहे दोस्तों को तो ज़रूर पढनी चाहिए बुद्ध पूर्णिमा की सुबह की आपकी कविता

चंद्रभूषण said...

@डियर जोशिम, कुछ पत्राचार हो जाए।

अशोक कुमार पाण्डेय said...

बहुत अच्छी कविता

आपकी एक कविता असुविधा पर पोस्ट की है … देखियेगा