Tuesday, July 7, 2009

एक थे उत्तम

कबाड़खाना पर समलैंगिक संबंधों को लेकर जारी उत्तम बहस देखकर उत्तम की याद आ गई। मेरे परिचय में आए लोगों में वह अकेले ही हैं जिन्हें मैं शुद्ध और सबलाइम स्तर तक पहुंचता हुआ समलैंगिक मान सकता हूं। बाकी जो भी लोग इस श्रेणी में दिखे, वे निरपवाद रूप से बाइसेक्सुअल थे, और उनमें कुछ ऐसे भी थे जो एक किस्म के यौन अत्याचार से गुजरते हुए खुद भी उसमें भागीदार हो गए थे।

लेकिन उत्तम की बात कुछ और थी। वे जिस लड़के से प्रेम करते थे उसकी लात खाते थे और पूरे गांव में बदनाम होकर भी खुलेआम, यहां तक कि उसके और अपने बाप के सामने हर तरह की चुटकियां झेल कर भी उसकी पूजा करते मालूम पड़ते थे।

करीब तीस साल पहले उत्तम को मैंने अपनी बहन के ससुराली गांव में देखा था। गोरखपुर जिले के उस सामंती मिजाज और हैसियत वाले ब्राह्मण बहुल गांव में पूजा-पाठ की पवित्रता और सेक्स से जुड़े एक से एक कमीनेपन एक साथ देखने को मिलते थे। अपनी सोच में परिष्कार करते हुए उत्तम को मैं कमीने लोगों की श्रेणी से बाहर मान लूं तो भला दिलीप को क्या कहूं जो बैल बांधने की ओसारी में एक दोपहर अपनी पालतू कुतिया के साथ पकड़ लिए गए थे।

उस समय मैं नवीं में पढ़ रहा था और ये दोनों कमोबेश मेरे हमउम्र लोग ही थे। मेरी बहन के ससुराल में मेरे दो रिश्ते के भानजे (बहन के जेठ के बेटे) भी कमोबेश मेरी ही उम्र के, यानी चौदह-पंद्रह साल के रहे होंगे। उनमें बड़े लड़के से दो-तीन साल ज्यादा उम्र वाले उत्तम उससे उसी तरह प्रेम करते थे जैसे राधा कृष्ण को करती रही होंगी। या शायद यह कहना गलत हो क्योंकि उनके प्रेम में साख्य के बजाय दास्य भाव प्रमुख था।

गर्मियों की छुट्टियों में ही मेरा अपनी बहन के यहां जाना हो पाता था और इन दिनों की दोपहरें हमारे किशोर मनों को जरूरत से कुछ ज्यादा ही रोमांटिक बना देती थीं। हमउम्र लड़कों से आसपास दिखने वाली सुंदर लड़कियों के बारे में बातें करना, उनकी दिलचस्पियों के बारे में जानना, उनमें खुद को लेकर मौजूद संभावनाओं के बारे में जानना तपती जमीन पर छींटे मारने जैसा लगता था। इस गांव में मुझे पहली बार पैंट-टॉप पहनने वाली पढ़ी-लिखी मॉडर्न लड़कियां देखने को मिली थीं। उनकी दुनिया कैसी होगी, उनके सपने कैसे होंगे। इन शाश्वत दिलचस्पियों के बीच अचानक वहां लुंगी पहने, तेल से चिपका कर मांग निकालने वाले लजाए सकुचाए मेहराए से उत्तम की आमद भयंकर खीझ पैदा करती थी।

उत्तम वहां लकी के चक्कर में आते थे जो अपनी उमर में गांव का ही नहीं, पूरे इलाके का सबसे सुंदर और सजीला किशोर हुआ करता था। उसके बारे में किंवदंती थी कि लड़कियों में उसे लेकर झगड़े तक हो जाया करते हैं। लेकिन उत्तम को इससे कोई परेशानी नहीं थी। वे किसी मुग्धा नायिका की तरह पलंग की पाटी पर बैठे-बैठे लकी को निहारा करते थे।

एक दोपहर लकी सोया हुआ था और उत्तम वहां पहुंच कर उसके बाल संवारने लगे। इसी बीच लकी की नींद खुल गई और आधी नींद में ही हाथ के झटके से उसने उत्तम को जमीन पर गिरा दिया। फिर उठ कर गरियाते हुए लातैलात कम से कम पांच-सात लात उन्हें मारा। उत्तम उठे और सुबक-सुबक कर रोते हुए अपने घर चले गए। हमें लगा कि चलो किस्सा खत्म हुआ। लेकिन नहीं। परम धैर्य के साथ तीसरे-चौथे दिन उत्तम दोबारा हाजिर थे। उनके परिवार के कोई व्यक्ति सऊदी अरब रहते थे। वहां से उन्होंने उत्तम के लिए एक धूपी चश्मा भेजा था, जिसे वे लकी को भेंट करना चाहते थे। लकी ने चश्मा ले लिया लेकिन मेरे देखते उन्हें कोई भाव नहीं दिया।

उत्तम के बारे में आखिरी जानकारी मेरे पास यही है कि दो-तीन कोशिशों के बाद हाई स्कूल पास करके उन्होंने अपना पासपोर्ट-वीजा बनवाया और कहीं विदेश चले गए। करीब पंद्रह साल के फासले के बाद लकी और उसके भाई विनोद से यहीं दिल्ली में ही मुलाकात हुई तो उसने बड़े गर्व से बताया कि महिलाओं में उसकी लोकप्रियता आज भी पहले की ही तरह बरकरार है। इसके कुछ देर बाद उसने मेरे सामने ही फोन पर बिना विवाह वाली अपनी एक पत्नी से खूब प्रेम भरी बातें कीं और इसके ठीक बाद विवाह वाली पत्नी को खूब गंदी-गंदी गालियां दीं।

इस घटना को लगभग दस साल हो गए, लेकिन तब से अब तक एक ही शहर में रहते हुए भी लकी से मिलने का मेरा दिल नहीं हुआ। उत्तम उस वक्त मेरे राडार पर कहीं नहीं थे लिहाजा उनके बारे में पूछने का कोई सवाल ही नहीं था। मेरे ख्याल से समलैंगिकता उत्तम के लिए मैटर ऑफ च्वाइस न होकर एक जैविक स्थिति रही होगी। वे जहां भी हों, मुझे लगता है कि दिल्ली हाई कोर्ट का फैसला आने के बाद उन्हें काफी खुशी हुई होगी, भले ही नैतिक और सामाजिक दबावों के चलते निजी जीवन में उन्हें इसका कोई फायदा मिल पाए या नहीं।

6 comments:

anil yadav said...

रोचक संस्मरण....काफी मजा आया....

Aflatoon said...

उत्तम का वर्णन सुन कर मुझे अपने मरहूम नाना का प्रतिपादित एक सिद्धान्त पुष्ट होता दिख रहा है । वे कहते थे कि विषम लैंगिक सम्बन्ध में हिंसा निहित है और समलैंगिक सम्बन्ध में अहिंसा ।

ओम आर्य said...

आपकी अभिव्यक्ति कमाल की है .........जिसके वजह से संस्मरण काफी रोचक हो गया है ..............ऐसे ही लिखते रहे आपने रच्ना का रस चखाये.........धन्यावाद

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

ऐसे दस बीस किस्से हर आदमी ने अपने जीवन में जरूर देखे होंगे।

स्वप्नदर्शी said...

@Kabaadkhana par aapke comment par

I started on that issue exactly same way many years ago, that it is not Indian and secondly, why we as "normal people", (but who believe that every human being has a right to live in a just world, and deserves respect and dignity)support GAY PRIDE?.

Over the years I learned many things by open discussions with some of my Gay friends. I am very grateful to them for taking many of my seemingly offensive questions with open heart.

"एक, क्या मौजूदा समलैंगिक दावेदारी का कोई भारतीय कंटेक्स्ट है, या यूं कहें कि इसमें भारतीय संदर्भ के साथ खुद को जोड़ने की कोई इच्छा भी है।"

There is a documentary called "khush" may be available on internet somewhere, which talks about specific issues of Indian society and struggle of Gays, with pure Indian context. There is also a book, in which different people have written about their life being gay, including "Ruth Vinita" of Manasi/madhu kishwar group. I forgot the name of the book now in ten years time". One thing I remember from the book is that it talks about the misuse of 377 and how gays are being sexually abused in the name of law enforcement, and there is no way to seek justice or emotional support.


2. और दूसरा, आक्रामक रेडिकलिज्म का जो बोध इसके साथ जुड़ा हुआ है, और जो देश के ऊंचे तबकों के कई दूसरे शौकों- मसलन ड्रग्स, रैश ड्राइविंग और रेव पार्टीज जैसा दिखता है, उसके पक्ष में हम भला ताली क्यों बजाएं।

I think for most of us, the gays are invisible as an entity, as human beings. Society even in the west, marginalizes gays socially, denies spousal benefits, right to visit sick partner or partner in jail, medical benefit, inheritence which are part of policies/rules set up by politics, and in that respect it is a struggle of civil rights for them. I would not mention the struggle with their families, where they get rejection, shame, trauma.

Their existence is being denied continuously and therefore, there is a inbuilt need for GAY PRIDE, to tell people that they as a human being exist. So that "offensiveness" comes from an un-acknowledged harassment which they experience.

I do not claim that every thing can be goody goody about this. It will also have its share of problem, politics, like "dalit andolan of BSP" or "naxal aandolan". But this how human society behaves on any issues.

Arvind Mishra said...

प्रकृति की प्रयोगशाला में समलैंगिकता अभी भी प्रयोग परीक्षण के दौर से गुजर रही है जो भविष्य में अनुमोदित हो भी सकती है !
उत्तम का वे व्यवहार इसी के अंतर्गत था और वे एक्स्प्लोरैतारी बिहैवियर के वशीभूत थे ! जैसा जीवन में लगभग सभी के साथ होता है -हम खुद के अनुभव नहीं स्वीकारते ,बस उदाहरण देने में आगे रहते हैं ,