Monday, July 6, 2009

चुप लेटे मदान

इतवार की सुबह-सुबह एक अजीब घटनाक्रम में पता चला कि ब्रजेश्वर मदान को पैरालिसिस हो गया है। फोन किया तो कोई उठा नहीं रहा था। दो-चार फोन इधर-उधर खटकाने के बाद स्थिति का पता चला। घर उनके कुल दो बार ही जाना हुआ था लेकिन बिना किसी से रास्ता पूछे स्कूटर ठीक उनके घर के सामने ही खड़ा हुआ। वहां पता चला कि यहां उनकी देखरेख के लिए कोई है नहीं लिहाजा उनके साले साहब ने उन्हें अपने ही यहां रख लिया है। वहां पहुंचने पर मदान साहब को देखा।

यह जिंदादिल इन्सान, जिसे एक बार पैर में चोट खाने के अलावा मैंने कभी बीमार नहीं देखा था, जो न जाने किस समय से हर शाम दारू का पूरा पौआ नीट और एक सांस में ही पीने का आदी रहा, मेरे सामने पड़ा था कमर पर बच्चों की हगीज पहने, बच्चों जैसा ही निस्संग चेहरा लिए, सोया हुआ इस तरह कि जागने भर को भी स्फुरण शरीर के भीतर पैदा नहीं हो रहा था।

एक हाथ अजीब तरह मुड़ा हुआ था। उस पर मैंने अपना हाथ रखा तो कोई हरकत नहीं हुई। फिर माथा छुआ और दूसरा हाथ सहलाया। नाम बताया तो चेहरे पर कहीं कोई भाव नहीं। मन में खुटका हुआ कि यह नाराजगी तो नहीं। फिर शायद वहां मेरे होने की बात दिमाग तक पहुंची होगी। हरकत वाले हाथ से हाथ थाम लिया, आंख खोलकर रोने सा मेरी तरफ देखा और बाईं तरफ जरा सा खुल पा रहे मुंह से मुअइं जैसा कुछ कहा।

इस आदमी के बारे में मैं क्या कहूं। बहुत लोग बहुत तरह से बहुत कुछ कहेंगे। कहने-सुनने में ब्रजेश्वर मदान जो हैं सो हैं। पढ़ने-लिखने वाले लोग उन्हें जीनियस कहते हैं। उनकी कई कहानियां और कुछ कविताएं भी ऐसी हैं जिन्हें पढ़कर अपने आसपास की दुनिया को आप नए तरह से देखने लगते हैं। यह जीनियस का ही काम है। लेकिन उनका लिखा पढ़ने से ज्यादा मजा मुझे उनके साथ होने में, उनकी बातें सुनने में और उनसे बकवास करने में आता रहा है। मुझे इतना भयंकर रोना आया कि क्या कहूं। थोड़ी देर और वहां बैठा, फिर भाग खड़ा हुआ।

घर पहुंचकर शाम होने को थी कि शिवसेवक सिंह आ गए। इलाहाबाद में नगरपालिका पार्षद हैं। बातों-बातों में इलाहाबाद ही पहुंचा देते हैं। मदान साहब का दुख भरमाने में उनकी बातें बड़े काम आईं। फिर सड़क पर यूं ही चाईं-माईं भटकते एक लंबी कार में आते मृगांक शेखर, उनकी पत्नी और पीछे बैठे खालिद पति-पत्नी मिल गए। सहारा से मेरे हटने के बाद ये दोनों लोग मदान साहब के सबसे करीबी थे। मदान साहब अपनी सारी गालियां इन्हीं के मार्फत मुझ तक पहुंचाते थे। कब ठीक होगे ब्रजेश्वर मदान? कभी इतने ठीक होगे कि हम साथ मिलकर वह किताब कर सकें, जिसके बारे में इतनी बातें की हैं?

3 comments:

vijay gaur/विजय गौड़ said...

jald theek hon madan ji, meri subhkamnain. aapki mitrwat aatmiyta me unka wyaktitiw nikhaar pa raha hai. wyaktigat taur par to na unhe jaanta hoon na aapko par dono ko padhta hoon.

स्वप्नदर्शी said...

umeed hai aapke mitr zald achche ho jaaye!

Ek ziddi dhun said...

jab unke panv men chot thi tab main unse milne laga tha SAHARA men. unke akhbaron men kaii lekh padhe aur thode se vakfe men vo mujhe behad achhe insaan lagne lage. kaise kahun ki padhkar dil behad dukhi ho gaya hai.