Saturday, July 4, 2009

शादी में संपादक

मित्र प्रदीप एनडीटीवी में हैं- उत्साही फ्रीलांस रिपोर्टर से धीरे-धीरे वजनदार डेस्क हैंड में तब्दील होते हुए। अभी चार-पांच दिन पहले उनकी शादी थी। शादी के आयोजन में मिले पत्रकारिता जगत के तमाम बड़े छोटे लोग। प्रभाष जोशी से लेकर ओम थानवी और राजेश रपरिया से होते हुए मंगलेश डबराल, मनोहर नायक, हरवीर सिंह, उर्मिलेश, मनोज चतुर्वेदी, अरिहन जैन, दिलीप चौबे, प्रियदर्शन, शरद गुप्ता, प्रेम, वेंकटेश और प्रवीण तक। इस लाइन में रहते हुए, इतने लोगों के साथ काम करते हुए इतना वक्त इतनी जल्दी कैसे गुजर गया।

एक राजनीतिक कार्यकर्ता के रूप में पार्टी की पत्रिका के लिए लिखना और बात है लेकिन बाकायदा पत्रकारिता की नौकरी करने के बारे में तो नौकरी शुरू करने से पहले कभी सोचा भी नहीं था। अब से करीब चौदह साल पहले गृहस्थी शुरू हुई और छोटी-छोटी जरूरतों के लिए पैसों की किल्लत होने लगी तो भी दिमाग अनुवाद और जब-तब रिक्शा-ठेला चलाने जैसे मेहनत-मजूरी के कामों की तरफ ही जाता था। अखबार में नौकरी कर लेने की बात एकाध बार मुंह से निकली भी तो वैसे ही, जैसे लोग खीझकर कहते हैं कि ज्यादा तंग करोगे तो कुएं में कूद जाऊंगा।

उस दिन प्रदीप की शादी से लौटते हुए आयोजन में मिले लोगों के बारे में सोचता रहा। कैसे-कैसे आत्ममुग्ध तुर्रम खां। इनमें कुछ तो सचमुच दमदार हैं जिन्होंने शब्द तक पहुंचने से पहले उसके अर्थ के साथ साक्षात्कार किया है और आज भी शब्द को अर्थ के करीब रखने की कोशिश करते हैं, लेकिन कुछ ऐसे भी हैं जिन्होंने सिर्फ कुर्सी के सहारे शब्द पर अपनी इजारेदारी मान ली है। लेकिन इन दोनों छोरों के बावजूद पत्रकारिता में बहुत कम ही लोग ऐसे हैं जो कुछ साल यहां रह जाने के बाद भी अपनी सहजता बचा ले गए हैं। कुल मिला कर यह एक तरह का शो बिजनेस ही है, जिसमें उड़ना आसान होता है, लेकिन जमीन पर उतरते वक्त पता चलता है कि पहिया तो कब का पंक्चर पड़ा है।

अगर आप रिपोर्टर हैं तो बड़े-बड़े लोगों के करीब रहने का मौका आपको मिलता है। उनसे कभी-कभार थोड़े-बहुत फायदे भी मिल जाते हैं, लेकिन उनकी ज्यादा बड़ी भूमिका अपनी जीवनशैली से ललचा कर आपके भीतर कुंठा बोने की होती है। अगर आप डेस्क पर हैं तो दुनिया भर की सूचनाओं और उच्च विचारों के करीब होते हैं, जो कुछ समय बाद आपको अपने से लगने लगते हैं और आप भूल ही जाते हैं कि आप यहां नहीं होते तो किसी चीज के बारे में किस तरह सोचते । इस क्रम में अमौलिक तो आप हो ही जाते हैं, लेकिन असल समस्या यह नहीं होती।

असल समस्या यह होती है कि मीडिया की इन दोनों ही भूमिकाओं मे रहते हुए आप एक ऐसी हायरार्की के अधीन होते हैं, जिसका कोई तर्क आपकी समझ में नहीं आता। खासकर हिंदी में तो और भी, जहां अजीब-अजीब वजहों से लोग संपादकी या किसी और तरह की मीडिया अफसरी के हकदार हो जाते हैं।

कुल मिलाकर इस लाइन में काम कर रहे एक ही व्यक्ति में रौशनखयाली और घोंचूपने का, बहादुरी और कायरता का, जूते मारने और जूते चाटने का, एक्स्ट्रोवर्टनेस और इंट्रोवर्टनेस का अजीब घोलमट्ठा देखने को मिलता है। बातचीत में आपने जरा सी ढील दी और लोग मोर की तरह नाचने लगते हैं। येम्मेरी रिपोर्ट, वोम्मेरा आर्टिकल, वोक्कहानी, वोक्कविता....। इनका फोन आया तो कह रहे थे कि अरे अब बर्बाद करके ही छोड़िएगा और उनका फोन आया तो मैंने कहा कि तुम्हारी औकात क्या है। और फिर अंत में यह कि संस्थान में कौन किसके पीछे पड़ा है और कैसे किसका पत्ता कटने वाला है।

अफसरी का आलम यह है कि मध्यकाल के बादशाहों को तस्वीर दिखा दी जाए तो उन्हें भी एकबारगी पसीने छूट जाएं। एक बार मैंने एक प्रोफेशनल साइकियाट्रिस्ट से पूछा कि आजकल सारे संपादक इतने सनकी क्यों होने लगे हैं। उन्होंने कहा कि सबका तो नहीं पता लेकिन कहीं-कहीं यह बात मैन-मैनेजमेंट के स्किल के रूप में सिखाई जाती है। सोचने-समझने वाले मातहतों के बीच आप अगर बहुत ज्यादा प्रेडिक्टिबल होकर काम करेंगे तो वे इसका नाजायज फायदा उठाने लगंगे। लिहाजा उन्हें लगातार पंजों के बल रखने के लिए यह जरूरी है कि उन्हें लगातार आपके बारे में सोचने को मजबूर रखा जाए। इससे उनका दिमाग कामकाजी बना रहता है और आपको उनके बारे में सोचने की जरूरत नहीं रहती।

अपने दो पुराने संपादकों से दो-दो मिनट बात भी हुई। जैसा कि जुरासिक पार्क भाग एक में कहा गया है, पुरानी आदतें जल्दी नहीं जातीं। मुझे लगा कि मैं फर्श पर कालीन की तरह बिछा हुआ उनसे बात कर रहा हूं। लेकिन थोड़ी ही देर में मुझे एहसास हो गया कि मेरी विनम्रता को वे गर्व प्रदर्शन की टेक्नीक की तरह लेकर कुछ आहत से हो रहे हैं। इनमें से एक फिलहाल खाली हैं और दूसरे किसी वजह से मेरे प्रति अपनी नाराजगी आज भी दिल से निकाल नहीं पाए हैं। वह दो-ढाई मिनट की यातना असहनीय थी, लेकिन शादी-ब्याह में यह सब करना पड़ता है।

पता नहीं कब तक जिंदगी की जरूरतें इस लाइन से बांधे रखेंगी। गैब्रिएल गार्सिया मार्खेज और अर्नेस्ट हेमिंग्वे जैसे पत्रकार साहित्यकारों की मिसाल बेमानी है। ऐसी मिसालों के जरिए ही साहित्य में मीडियोक्रिटी का झंडा बुलंद रहता है। हिंदी की पत्रकारिता आपको इस तरह चुसा हुआ आम बना देती है कि आप किसी काम के नहीं रहते। क्या जिंदा रहते इस नियति से कोई निस्तार है?

8 comments:

Ek ziddi dhun said...

akhbaar men bhanti-bhanti ke haramkhoron ke mathat rahna padta hai aur kuchh achhe, samjhdaar insan yahan roshni ki kiran ki tarh hote hain.

रंगनाथ सिंह said...

show business me kisi chij ki ummid hi bekar h !!
jaisa ki galib ne kahaa tha,
fir kijiye hay hay kyu
royiye jar jar kyu

नीरज बधवार said...

चंद्रभूषण जी, बिल्कुल सही कह रहे हैं आप। लेकिन, यही नियति है। कुछ-एक हज़ार की तनख्वाह और उससे बन चुकी व्यवस्था आपके वजूद को ख़त्म कर देती है। कम से कम वजूद के उस हिस्से को जो फॉर-ए-चेंज कभी-कभार बागी होना चाहता है।

वेद रत्न शुक्ल said...

हिंदी की पत्रकारिता आपको इस तरह चुसा हुआ आम बना देती है कि आप किसी काम के नहीं रहते। ItneKam Shabdon Me Poora Khaka Sambhavtah Ab Tak Nahi Padha.

ANIL YADAV said...

जिसे पाना होता है, सबसे पहले निस्तार ही पाता है। बाकी लालसा है जिसपर हर किसी का समान अधिकार है।

Prem said...

शादी के बहाने आपने ने ना सिर्फ अपनों को याद किया... बल्कि बात-बात में वो सारी बातें भी कह गये जो मौजूदा पत्रकारिता में पिसते हुऐ हम में से ज्यादातर महसूस करते हैं...

deepak said...

लेकिन सर, आज के समय में बिना शक एनबीटी का संपादकीय पेज पठनीय है, शायद आपकी वजह से ही, इसलिए आप जैसे कुछ लोगों को तो अखबार में काम करना ही पडेगा, बाकी आपकी मर्जी
हां, संपादकों के बारे में आपकी बात बिल्‍कुल सच है, उनमे हर वह खामी है, जो किसी छोटी मानसिकता के आदमी में होती है , सबसे ज्‍यादा तो जातिवाद, अंहकार, पिता का नाम, प्रापर्टी, कारपोरेट से सीधे संबंध, युवाओं से पैर छुआने की क्षमता यकीन मानिए, अपने पेशे के ज्‍यादातर लोगों से आप निसंकोच होकर दो मिनट बात नहीं कर सकते,
हालांकि मुझे अब तक के जीवन में जितने अच्‍छे लोग मिले हैं, उनमें से आधे से ज्‍यादा इस पेशे के हैं, यह भी सच है आपसे मिलना चाहता हूं, आपसे समय लेकर जल्‍द ही आउंगा
दीपक

deepak said...
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