Tuesday, April 22, 2008

रहस्यवादी न्यूटन

न्यूटन की छवि मेरे मन में हाल-हाल तक बड़ी भगवान टाइप की थी। वे अपने जमाने (1643-1727) में ब्रिटेन के कुलीन वर्ग की कुंडलियां बांचा करते थे, यह सूचना (स्टीफन हॉकिंग द्वारा उनकी बहुचर्चित किताब अ ब्रीफ हिस्ट्री ऑफ टाइम में प्रदत्त) भी ज्यादा तंग करने वाली नहीं थी क्योंकि इस तरह के शौक आज भी बड़े पढ़े-लिखे लोग करते पाए जाते हैं। इस छवि में पहली बार खरोंच पकी उम्र में निकोलाई चेर्नीशेव्स्की का उपन्यास ह्वाट इज टु बी डन पढ़ते हुए लगी। उन्नीसवीं सदी में रूस में उभर रही समाजवादी धारणाओं की जमीन तलाशती इस महत्वपूर्ण रचना में एक जीनियस किस्म के नौजवान को बराबर न्यूटन की संकलित रचनाओं का ग्यारहवां वाल्यूम पढ़ता दिखाया जाता है, जिसमें उनकी रहस्यवादी संकल्पनाएं दर्ज हैं।

पिछले साल भाई दिलीप मंडल की सलाह पर डैन ब्राउन के थ्रिलर उपन्यास दा विंची कोड पढ़ते हुए न्यूटन को लेकर रहस्य और गहरा गया। इस किताब में उन्हें यूरोप में पिछले एक हजार से भी ज्यादा वर्षों से सक्रिय एक भूमिगत धार्मिक संगठन प्रायोरी ऑफ सिओन का सदस्य बताया गया है, जिसका मकसद सन् 2000 के बाद किसी समय ईसा मसीह की असली हकीकत सामने लाना है। इस हकीकत का केंद्रीय तत्व ईसा का विवाहित और बाल-बच्चेदार आदमी होना है, और इसका उद्देश्य ईसाई धर्म में पिछले सत्रह सौ सालों से आदिम पाप की मूल दोषी बताकर बहिष्कृत कर दी गई स्त्रीजाति को धर्म में बराबरी का दर्जा देना है।

दिलीप ही नहीं, मैं खुद भी दा विंची कोड से बहुत प्रभावित रहा हूं (दिलीप ने अपनी एक बहुचर्चित पोस्ट का शीर्षक इसके इर्द-गिर्द बनाया था ), लेकिन जहां तक तथ्यों की दृष्टि से इसके महत्व का प्रश्न है, एक जासूसी उपन्यास से ज्यादा ऊंचा दर्जा इसे देना ठीक नहीं है। न्यूटन का अपना निजी जीवन तरह-तरह की अतार्किक-रहस्यवादी मान्यताओं से भरा हुआ था, लेकिन इनमें से ज्यादातर प्रायोरी ऑफ सिओन की मान्यताओं के बिल्कुल उलट प्रतीत होती हैं।

दोनों में साझा बात सिर्फ एक है कि प्रायोरी ऑफ सिओन की तर्ज पर ही न्यूटन कैथोलिक धर्म के घोर विरोधी थे और कैथोलिकों को 'रोमन रंडियों की औलाद' मानते थे। लेकिन यह एलिजाबेथ के जमाने से ही ऐंग्लिकन इंग्लैंड की एक आम सांप्रदायिक मान्यता थी। न्यूटन का निजी योगदान इसमें कुछ भी नहीं था, उनकी निजी मान्यता जैसा इसमें कुछ भी नहीं था। इस मान्यता के चलते कैथोलिक धर्म के अनुयायी कवि अलेक्जेंडर पोप को जिंदगी भर दुत्कार सहनी पड़ी और इंग्लैंड में अपनी प्रतिभा के अनुरूप इज्जत उन्हें कभी नहीं मिली।

जहां तक दा विंची कोड के गुप्त संगठन में स्त्रियों को बराबरी का, बल्कि पुरुषों से भी ऊंचा दर्जा देते हुए सामूहिक संभोग जैसे कर्मकांडी कृत्यों का प्रश्न है, न्यूटन बिल्कुल ही दूसरे छोर पर खड़े दिखाई देते हैं। स्त्रियों से उनके मन में घृणा कूट-कूट कर भरी हुई थी और शायद पूरी जिंदगी किसी स्त्री के साथ संसर्ग का अवसर उन्हें कभी प्राप्त नहीं हुआ (दरअसल, इसके लिए कभी कोई प्रयास ही उन्होंने नहीं किया)।

आम स्त्रियों के बजाय शायद वेश्याओं को लेकर कुछ प्रेक्षण उन्होंने जरूर किए थे, अन्यथा उनकी इस मान्यता का कोई आधार समझ में नहीं आता कि वेश्याओं के मासिक धर्म के रक्त में कुछ जादुई गुण मौजूद होते हैं। इस मासिक रक्त को लेकर एक ऑब्सेसन उनके द्वारा रंगों के चयन में भी दिखाई पड़ता है। उनके शयन कक्ष का रंग, उसमें मौजूद एक-एक चीज- गद्दा-तकिया-चादर-पर्दे आदि का रंग खूनी लाल (क्रिमसन) था। भारत में यह रंग तांत्रिकों की पसंद माना जाता है, लेकिन न्यूटन की पसंद यह क्योंकर था, यह बात कतई समझ में नहीं आती।

ब्रह्मांड में जीवन को लेकर भी उनकी कुछ विचित्र अवधारणाएं थीं, जिसे फिलहाल फैशन में चल रही एक वैज्ञानिक धारणा सर्वजीवनवाद (पैनस्पर्मिया) की बुनियाद माना जा सकता है। उनका मानना था कि ब्रह्मांड में एक विशिष्ट जीवन-वीर्य हर तरफ बिखरा हुआ है। उनकी मान्यता थी कि पुच्छल तारों की लंबी पूंछ विभिन्न ग्रहों में जीवन आरोपित करती है।

संग्रहालय में सुरक्षित न्यूटन के कुछ बालों के अध्ययन से पता चला है कि उनमें सीसे (लेड) और पारे की खतरनाक मात्रा मौजूद है। प्राचीन यूनानी कीमियागर (अलकेमिस्ट) पारस पत्थर (फिलॉस्फर्स स्टोन) के जरिए इन भारी धातुओं से ही सोना और अमृत बनाने में अपनी जिंदगी झोंके रहते थे। ऐसा लगता है कि न्यूटन ऐसे कुछ न कुछ अपने शरीर पर भी करते रहते थे। आग लग जाने के उनके शाश्वत भय और सचमुच उनके घर में बार-बार आग लगने की हकीकत के पीछे मुख्य वजह उनकी कीमियागिरी के अलावा और क्या हो सकती है?

लेकिन एक ऐसे समय में, जब पूरे यूरोप में तमाम प्राचीन विश्वासों वाले लोग जादूगर और चुड़ैल बताकर मौत के घाट उतारे जा रहे थे, न्यूटन आखिर बच कैसे गए? इसका सीधा कारण ऐंग्लिकन सोच की उदारता से ज्यादा अपने दरबार के लिए तमाम मामलों में उनका उपयोगी होना था। वे इंग्लैंड की टकसाल के प्रभारी थे और नकली सिक्के बनाने वालों को फांसी पर लटकाने का हुक्म देना उनका रोजमर्रे का प्रिय शगल था।

हाल में पीटर ऐकरवुड द्वारा लिखित न्यूटन की जीवनी में वर्णित इन तथ्यों पर एकबारगी मैं शायद यकीन करने को तैयार नहीं होता, लेकिन इनपर मौजूदा समय के सबसे तीखे नास्तिक (बल्कि धर्मविरोधी) चिंतक क्रिस्टोफर हिचेंस की मोहर लगी हुई है, लिहाजा इनसे सहमत होने में मुझे कोई एतराज नहीं है। हिचेंस की कई पॉपुलर उक्तियां मुझे पुराने जमाने के नास्तिक विचारकों की याद दिलाती रही हैं, हालांकि इस्लाम संबंधी उनके कुछ विचारों में मैं (कबीर आदि के संदर्भ से) कुछ सुधार की गुंजाइश देखता हूं। आप लोग न्यूटन के बारे में हिचेंस के विचार अगर विस्तार से पढ़ना चाहें तो आर्ट ऐंड लिटरेचर डेली (अलडेली.कॉम) पर इसी हफ्ते प्रकाशित (मूलतः वैनिटी फेयर में छपी) ऐकरवुड की किताब पर उनकी समीक्षा देख सकते हैं।

9 comments:

Pramod Singh said...

अच्‍छे पोस्‍ट के एवज में लिंक जोड़ने की यह हमारी ओर से आपको रास्‍ता सुझायी की समझाइश.. बाकी यहां गूगलवा ससुर एक्‍सेप्‍ट करेगा नहीं सो अलग से मेल में ठेलता हूं..

चंद्रभूषण said...

और कुछ नहीं तो कृपया यही बताएं कि यह पोस्ट किसी की समझ में नहीं आ रही है, या इसपर कहने को किसी के पास कुछ नहीं है। वरना मुझे कुत्ते नहीं नहीं काटा है कि मैं एक ढंग की पोस्ट लिखने के लिए साला पछत्तर तरह की चीजें पढ़-पढ़कर दिमाग का दही करता रहूं और सारी टिप्पणियां बैठे-बिठाए हर बात-बेबात पर चेंचें-पेंपें करने वाले लोग बटोर ले जाएं।

Pramod Singh said...

पोस्‍ट मस्‍त है, चंदू.. अब इस पर ससुर लोग क्‍या लिखेंगे मरदे.. न्‍यूटन विवाद कितना जानते हैं.. कि उनके रहस्‍यवाद पर रियेक्टियायेंगे? मैं ही नहीं, तुम भी कभी-कभी हद करते हो?

Pratyaksha said...

विज्ञान से सुपरनॉरमल से पैरानॉरमल की यात्रा शायद दुर्गम नहीं होती । और विचक्राफ्ट में जब लोगों को मौत के घाट उतारा जा रहा था तब इसकी शिकार अनपढ़ गरीब औरतें ज़्यादा थीं । न्यूटन जो एक महत्त्वपूर्ण व्यक्ति थे , ऐसे ट्रायल्स से बच निकलें इसमें आश्चर्य बहुत नहीं ।
प्रायरी ऑफ सियान की तरह फ्री मेसंस की सीक्रेट सोसायटी भी खासी दिलचस्प है।

चंद्रभूषण said...

प्रत्यक्षा, जोन ऑफ आर्क कोई अनपढ़ गरीब औरत नहीं थी, ब्रूनो ज्योर्दानो भी कोई गरीब-अनपढ़ आदमी नहीं थे। यूरोप में चुड़ैल, जादूगर या धर्मद्रोही बताकर मार देना कई सौ साल लंबा, एक तरह का सुचिंतित सांस्कृतिक अभियान था, लिहाजा मेरे ख्याल से इसकी तुलना बिहार-झारखंड या भारत के अन्य पिछड़े इलाकों में होने वाली इस तरह की घटनाओं से नहीं की जा सकती। पढ़ाई का मतलब उस समय सिर्फ और सिर्फ चर्च की पढ़ाई ही हुआ करता था (एडूकेयर, जिससे एजूकेशन शब्द बना, बछड़े को गाय के थन तक ले जाने के लिए इस्तेमाल होने वाला शब्द था और शिक्षा के संदर्भ में थन से तात्पर्य चर्च से था) लिहाजा अनपढ़ का शाब्दिक अर्थ गैर-चर्चीय ज्ञान पद्धतियों में गति रखने वाला ही हुआ करता होगा। मुझे लगता है, औद्योगिक क्रांति से पहले के यूरोपीय बौद्धिक जन चर्चीय और गैर-चर्चीय (ग्रीको-रोमन रिनासां एलीमेंट्स के अलावा भी) ज्ञान पद्धतियों के बीच एक तरह के बैलेंसिंग एक्ट के माहिर थे। इनमें चर्च और ग्रीको-रोमन एलीमेंट्स की बातें पिछले सौ-डेढ़ सौ साल से होती आ रही हैं, लेकिन इन दोनों विजातीय तत्वों के अलावा तीसरे, यानी स्थानीय मिथकों और ज्ञान पद्धतियों वाले पहलू के अबतक सिर्फ संकेत मिलते रहे हैं। इसकी विधिवत खोजबीन अभी होनी बाकी है। क्या हम आधुनिक ज्ञान पद्धति के उदय में पुरानी, नॉन-कोडीफाइड ज्ञान पद्धतियों के चेतन-अवचेतन दखल पर कुछ सार्थक विचार-विमर्श कर सकते हैं?

Pratyaksha said...

विचक्राफ्ट के बारे में कहीं नेट पर घूमते देखा कि एलिज़ाबेथन काल में , सोलहवीं सदी में 270 ट्रायल्स हुये जिसमें 247 औरतें थीं , गरीब , अनपढ़ ..और जोन ऑफ आर्क की शहादत शायद राजनितिक ज़्यादा थी , चार्ल्स सातवें के राज्यारोहण और फ्रांस पर अंग्रेज़ अधिकार को खत्म करने का सपना , फ्रांसिसी सेना के साथ कुछ महत्त्वपूर्ण विजय ..अंतत: धार्मिक कोर्ट में कंविक्शन ...फिर भी कुछेक महत्त्वपूर्ण लोग भी इसके चपेटे में आये ही होंगे । दिलचस्प विषय है .. आपने उकसाया तो कुछ और खंगालते हैं ।

खैर आपने जो कहा ज्ञान पद्धति के उदय के बारे में ... मुझे गैलिलियो का ख्याल आया जिसने हेलियोसेंट्रिस्म की वकालत की , कॉपरनिकस की पैरवी की । लेकिन चूँकि धार्मिक पुस्तकों में लिखा था , the world is firmaly established , it cannot be moved, उनका ये कहना कि पृथ्वी सूर्य के गिर्द घूमती है , चर्च के खिलाफ जाता था और अपनी थ्योरी को लहरों के गति से फिज़िकली दिमांस्ट्रेट करने के बावज़ूद , चर्च के दबाव में आ कर खुद इसे गलत कहना पड़ा । अंतिम दिनों में हाउस अरेस्ट में रहते प्राण त्यागे ।
ऐसी चीज़ों का मनिफेस्टेशन कितना और कहाँ , कैसी दिशाओं में हो रहा था, है , ये जानना ज्ञानवर्द्धक और रोचक होगा ।

swapandarshi said...

very interesting indeed. I was not aware of the many details except that he had a bit strange attitude towards women, which was also the attitude of many philosophers and thinkers as well.

I will expect most scientist of that era to try al-chemistry.
As per Dan the auhor of Da Vinci Code, I say it tightly woven fiction and thought provoking, but many things are still fictional.

Infect, Da Vnci himself was homosexual and shared apprehensions towards women, which contradicts the central theme of Da Vinci code.

if you read "Angels and demons" you see the same protagonist and identical theme.

I feel that 2000 and the years after that, are good historically to put women in the central theme of christianity, as world is ready to share all different type of powers with women and large section of western world is liberal minded.

after reading that book it came to my mind that their is probably Da Vinci code parallel in hinduism too. look at the alefenta, khujraho, and popularity of worship of shivling. Indeed the placental cord of brahma is attached to vishnu? is Brahmaa a women? and after the establishment of patriarchy a man's face is painted over a women deity?

there are evidences all over different civilizations, that the first and primary deity was of "mother" and it took a long time before role of male in reproduction was established.

One thing that patriarchy has done is to control reproduction and deny the central role of women in creating new life. women are simply considered as a vessel or baby producing machines to serve men.

you look at the old literature even the name of the mythical characters are often associated more with mother than father.

Though in India, the movie was banned.

swapandarshi said...

I would like to add that Leonardo Da Vinci is one of the most interesting historical figure that I admire, and its not surprising that he could even hold several contradictory thoughts in parallel.

the last line refers to the movie based on Dan's novel

चंद्रभूषण said...

Your 'Brahma' is real-real thought provoking. I would love to do something on this.