Tuesday, August 21, 2007

कोलाहल में कविता

संजय तिवारी ने अपने ब्लॉग पर हिंदी साहित्य की उपादेयता पर सवाल उठाया है। अनिल रघुराज ने उसमें भी विशेषकर कविता पर अपना ध्यान केंद्रित किया है। दोनों टिप्पणियां बहुत अच्छी हैं और मेरे ख्याल से भाई बोधिसत्व इनका कायदे से जवाब देने के लिए अभी तक अपनी कलम सूत चुके होंगे। समाज में मुशायरों और कवि सम्मेलनों में पढ़ी या गाई जाने वाली कविताओं को छोड़कर शेष संपूर्ण साहित्य को लेकर आम सामाजिक राय इससे काफी मिलती-जुलती है। और तो और, अपने गांव तक में मैंने इसे काफी प्रचंडता के साथ जाहिर होते देखा है।

किसी की दालान में बैठकर आप आजमगढ़ जिले के किसी भी कवि का नाम मुंह से निकाल दीजिए और 101 गालियां ऐडवांस में ले लीजिए। ऐसे ही एक बार 'हल्दीघाटी' और 'जौहर' के रचयिता श्याम नारायण पांडे का जिक्र आने पर हमारे कुल पुरोहित ने उनके गांव का नाम लेकर कहा- 'अब छलेरा-फुलेरा के पांड़े भी साले कवि होने लगे!' कमोबेश ऐसा ही हाल राहुल सांकृत्यायन और अयोध्या सिंह उपाध्याय 'हरिऔध' का भी होता लेकिन एक के संस्कृत ज्ञान और दूसरे की संस्कृतनिष्ठता ने उन्हें इस नियति से बचा लिया। बनारस के प्रेमचंद और प्रसाद जैसे बड़े साहित्यकारों को लोग पता नहीं कैसे बर्दाश्त कर ले जाते थे, हालांकि अपनी-अपनी जातियों को लेकर गालियां कभी-कभी उन्हें भी सुननी पड़ती थीं।

आश्चर्य होता है कि इतने कविता-विरोधी माहौल में कविता की लत मुझे कैसे पड़ गई। कविता भी ऐसी, जिसपर न कोई आह करे न वाह, जिसे लिखकर चुपचाप रख दिया जाए। साल-छह महीने बाद किसी को डरते-डरते सुनाया भी जाए तो सिर्फ मरी हुई प्रतिक्रिया हासिल करने और दुखी होने के लिए। ऐसा बिल्कुल न होता अगर कुछ घटनाओं ने मुझे अपने इस पारंपरिक परिवेश से छिनगा कर अलग न कर दिया होता। लेकिन एक बार यह हो गया तो कविता एक विरोधी, विद्रोही, अंडरग्राउंड किस्म की हरकत की तरह मेरे भीतर पैदा हुई और एक बार पैदा होकर फिर कभी नहीं गई।

बचपन में भाइयों की सोहबत में छोटी-मोटी छंदोबद्ध फ्लर्टिंग के बहुत समय बाद करीब बीस साल की उम्र में दो-तीन दिन के अंतर पर बिल्कुल अलग-अलग संदर्भों में मैंने दो शेर लिखे। सुनने-सुनाने लायक उनमें ऐसा कुछ खास नहीं है, लेकिन उनके होने में ही कुछ ऐसा है कि वे जिंदगी भर मेरी जुबान पर रहेंगे और मैं हमेशा उन्हें 'ओन' करूंगा। तब से लेकर आज तक कभी दो-तीन साल में एक तो कभी एक दिन में दो-तीन कविताएं लिखता आ रहा हूं।

गणित और विज्ञान से लेकर अर्थशास्त्र और अन्य सामाजिक विज्ञानों तक फैली अपनी सहज वैचारिक रुचियों से मेरी कविता का सचेतन तौर पर कुछ भी लेना-देना नहीं है। मेरी जो भी थोड़ी-बहुत सामाजिक छवि है वह इन्हीं गैर-साहित्यिक रुचियों की वजह से है और मेरी रोजी-रोटी भी इन्हीं के सहारे चलती है। मेरे जानने वालों में बहुत कम लोग ऐसे हैं जिन्हें यह पता है कि मैं कविता भी लिखता हूं। लेकिन ऐसा किसी रणनीति के चलते नहीं है।

मेरे लिए कविता सचमुच एक निजी दायरे की चीज है और उसपर उठते-बैठते हर किसी से आलोचनात्मक टिप्पणी या वाह-वाह की अपेक्षा मैं नहीं करता। हां, जिन लोगों को अपने निजी दायरे में मानता हूं वे भी अगर इससे तटस्थता बरतते हैं तो बड़ी खुन्नस होती है। उनसे नफरत करने से लेकर खुद पर शंका करने तक की नकारात्मक भावनाएं मुझे कई दिन त्रस्त किए रहती हैं और यह समय मन ही मन खुद को गालियां देते गुजरता है कि खामखा यह किस चूतियापे में बार-बार मैं फंस जाता हूं।

अविनाश ने अभय तिवारी के ब्लॉग पर अपनी एक टिप्पणी में कविता की 'सामाजिकता' बनाम 'कारीगरी' की एक बात उठाई है। मेरे लेखे ये दोनों ही चीजें बेकार हैं- अगर वे आपके भीतर किसी रचनात्मक तरेड़ की वजह नहीं बनतीं। अगर यह तरेड़ पैदा हो रही है तो कोई कविता कारीगरी से शुरू होकर सामाजिकता का मुकाम हासिल कर सकती है और इसके उलट कई सिद्ध जनों को सामाजिकता के मुहावरे में हम कोरी कारीगरी करते देख ही रहे हैं। प्रसंगवश, कबीर के लिए सामाजिक गैर-बराबरी अगर केवल एक सामाजिक प्रश्न होती और यह उनकी काव्यात्मक आध्यात्मिकता का सबब न बनती तो उनमें और धर्मवीर के बीच कोई फर्क नहीं होता- या शायद धर्मवीर उनसे कुछ बीस ही पड़ते (इस बात का पहला हिस्सा किसी और का- शायद नामवर सिंह या हजारी प्रसाद द्विवेदी का कहा हुआ है।)

कवियों की निर्माण-प्रक्रिया के बारे में मुझे ज्यादा जानकारी नहीं है। जिन्हें जानता हूं उनमें से कुछ मेरे जैसे अपनी धुन में रहने वाले हैं तो कुछ में कविता किसी काव्यात्मक माहौल के असर से उपजी होती है। दूसरी किस्म वाले कवियों में भी कुछ की कविताएं मुझे बहुत अच्छी लगती हैं- जैसे चेतन की, जो कि पारंपरिक शायरी के माहौल से निकलकर नितांत निजी ढंग से आधुनिक हिंदी कविता में आए हैं, या फिर डॉ. संजय चतुर्वेदी की, जो कन्नौज क्षेत्र की छंद परंपरा से उपजे हैं और इसी परंपरा के भीतर रहते हुए कविता के बिल्कुल नए संदर्भ बनाते हैं। लेकिन माहौल से बनी कविताओं के बारे में मेरी आम राय यही है कि इनमें इंटेंसिटी कम होती है और अक्सरहां ये औसत या घटिया स्तर की होती हैं।

कविता में परिवेश और निजता के अंतर्संबंध को लेकर कवि त्रिलोचन की राय इन दो तरह की काव्य-वृत्तियों के बीच एक पुल बनाती है। उनका कहना है कि 'कविता में अगर आप अपना खुद का रास्ता नहीं बना पा रहे हों तो चिंता की कोई बात नहीं, किसी और के बनाए रास्ते पर निकल पड़ें। जो भी आपका सबसे प्रिय कवि हो उसकी भाषा-शैली में लिखना शुरू कर दें- आपके पास अगर सचमुच कोई बात होगी तो उसी में से बहुत जल्द आपका अलग रास्ता बनना शुरू हो जाएगा।'

हिंदी में ज्ञान-विज्ञान होना चाहिए, रोजी-रोटी की बात होनी चाहिए, और भी बहुत सारा कुछ होना चाहिए (थोड़ा-बहुत यह सब होना शुरू भी हुआ है, बशर्ते आप उसे देखने को तैयार हों), लेकिन उस चीज के लिए भी इसमें कुछ गुंजाइश होनी ही चाहिए जिसे महादेवी 'तुमुल कोलाहल कलह में मैं हृदय की बात रे मन' कहती हैं।

अगर आपकी नाराजगी हिंदी साहित्य या हिंदी कविता से है- आप उसे फ्रॉड या कुछ ज्यादा ही जगह घेरने वाला/वाली मानते हैं- तो जरा ठहरकर सोचें- यह सचमुच किस चीज से है? 'तुमुल कोलाहल कलह' से या फिर 'हृदय की बात' से? दूसरी वाली चीज की प्रचुरता या छल-छद्म से आप दुखी या नाराज हों, इसकी उम्मीद कम है क्योंकि हिंदी के साहित्यिक परिदृश्य में इसके दर्शन इधर यदा-कदा ही होते हैं।

5 comments:

Priyankar said...

कविता दुनिया के नक्कारखाने में तूती का स्वर है.महादेवी के शब्दों में इसे 'तुमुल कोलाहल कलह' में ठीक ही 'हृदय की बात' कहा जा सकता है .

बाज़ार के सर्वग्रासी विस्तार के इस धूसर समय में हो सकता कुछ कविताएं पर्म्यूटेशन-कॉम्बीनेशन की तकनीक से बन रही हों . पर कविता फ़कत पर्म्यूटेशन-कॉम्बीनेशन और शब्दों-भावनाओं को फेंटने-लपेटने का मामला नहीं है . न ही यह कोई दिव्य-अलौकिक किस्म का आसमानी ज्वार है . प्रथमतः और अन्ततः यह अपने समय और समाज के प्रति सच्चे होने का मामला है . यह संवेदनाओं और अनुभूतियों का मामला है और विचार का भी. यह ऐसा स्वप्न है जो तर्क की उपस्थिति में देखा जाता है . हां! यह उपलब्ध भाषिक-सांस्कृतिक उपकरणों के 'आर्टीकुलेशन' का भी मामला है . अगर यह एक सच्चे-ईमानदार आदमी का 'स्वान्तः सुखाय' घरू मामला है, तो भी इसका सामाजिक निहितार्थ और विस्तार होगा ही .यूं तो तुलसी ने भी रघुनाथ गाथा स्वान्तः सुखाय लिखी थी .

दिल्ली से दमिश्क और पूर्णिया से पैरिस तक मनुष्य की अनुभूतियां,भावनाएं और संवेग एक जैसे हैं . व्यक्तिगत सुख-दुख,आशा-निराशा,हर्ष-विषाद तो होते ही हैं,पर मूढ को छोड़कर जगत गति भी सबको व्यापती है. रघुराज ने तो फ़िर भी संख्या सौ-पचास गिना दी,हो सकता है संख्या और भी कम हो . पर इसका कोई 'मैथमैटिकल फ़ार्मूला' कभी बन सकेगा मुझे शक है .

इसलिए कविता के प्रति 'सिनिकल ऐटीट्यूड' एक तरह से जीवन से असंतोष का ही एक रूप है -- बीमार असंतोष का . यह मिल्टन के 'पैराडाइज़ लॉस्ट' के सैटर्न की तरह ईश्वर/आलोचक/सत्ता-प्रतिष्ठान के प्रिय कुछ कवियों की धूर्तता और चालाकी के बरक्स एक प्रकार की 'इंजर्ड मैरिट' का इज़हार भी हो सकता है . पर इस नाते इस समूची विधा पर कोई फ़तवा ज़ारी कर देना एक अहमकाना कदम होगा . डार्विन के सिद्धांत के साहचर्य में फल-फूल कर कुछ लोग इतने 'सिनिकल' हो जाते हैं कि उनके लिए जीवन में पवित्र-निर्दोष-निष्पाप या ईमानदारी-त्याग-देशप्रेम जैसे शब्दों का कोई अर्थ नहीं रह जाता . यह 'सिनिसिज़्म' के सम्प्रदाय में निर्वाण जैसी ही कोई स्थिति होती होगी . पर तब वे कविता के लोकतंत्र के सहृदय सामाजिक होने की योग्यता खो देते हैं .

सिनिसिज़्म की कविता से एक दूरी है . अक्सर वह व्यंग्यकारों का औज़ार होता है . शायद यही कारण है कि बहुत कम व्यंग्यकार कविता को ठीक ढंग से सराह पाते हैं . बल्कि ज्यादा 'सिनिसिज़्म' होने पर वे व्यंग्यकार भी निचले दर्ज़े के होते जाते हैं . उनकी अनास्था और उनका द्वेष -- हर बात पर ठठ्ठा करने और दांत चियारने और चियरवाने का उनका रोग -- इस हद तक बढ जाता है कि उन्हें आस्था और भरोसे का कहीं कोई बिंदु ही नहीं दिखाई देता . बस इसी जगह आकर व्यंग्य सृजनात्मक साहित्य के संसार से अपनी नागरिकता खोना शुरू कर देता है .

हां! रघुराज की इस बात से पूरी सहमति है कि कवि वही हो सकता है जिसने जोखिम उठाया हो या जो जोखिम उठाने को तैयार हो . कवि को आलोचक के बाड़े के भीतर और बाहर मिमियाने वाली बकरी नहीं होना चाहिए .

कवि बंधु मैदान में कूदें . इस पर और खुली बात-चीत होनी चाहिए . गंभीर बात-चीत .

Isht Deo Sankrityaayan said...

हां! रघुराज की इस बात से पूरी सहमति है कि कवि वही हो सकता है जिसने जोखिम उठाया हो या जो जोखिम उठाने को तैयार हो . कवि को आलोचक के बाड़े के भीतर और बाहर मिमियाने वाली बकरी नहीं होना चाहिए.
प्रियंकर की इस बात पर गौर किया जाना चाहिए.

अनिल रघुराज said...

चंदू भाई, यही तो समस्या है कि हृदय की बात नहीं होती। क्षुद्र दुनियादारी ने कामयाब कवियों के हृदय की धमनियों को चोक कर रखा है। आप अच्छा लिखते हैं, अच्छे कवि हैं, बेधड़क लिखिए। लेकिन कविता के नाम पर स्वांग रचनेवालों को मत बख्शिए, ये मेरी गुजारिश है।

Pramod Singh said...

हूं?.. हूं!.. हूं? अच्‍छा.

Jan Sevak said...

पूरा पढ़ गया.

अच्छा लगा कि तुमने मेरी सलाह पढ़कर लेख को कई पैरा में बाँट दिया.

इससे फ़ायदा ये हुआ कि तुम्हारा विचार तुम्हारे पाठकों तक पहुँचा.

मुद्दे की बात पर आऊँ तो कहना चाहूँगा कि कभी तुमने सोचा है कि आख़िर कवियों का नाम सुनते ही लोग डंडा पकड़ने के लिए क्यों लपकते हैं?

इसका एक बहुत ही वैज्ञानिक कारण हैः

कितना ही बेसुरा आदमी हो, सरगम का स न मालूम हो और संगीत से कुत्ते-ईंट जैसा बैर हो -- फिर भी अगर उसके कान में बेसुरा गीत पड़ेगा तो वो झट ताड़ जाएगा.

इसी तरह सरइया चक का झम्मन जमादार ही क्यों न हो, अगर कविता के नाम पर उसे चूतियापा बेचने की कोशिश करोगे तो वो पूरा झाड़ू कर देगा.

उसे आल्हा के सुरों में ढाल कर इनक़लाब का गीत सुनाओगे तो वो सुनेगा.

अब ये मत पूछना कि छद्म नाम से क्यों लिख रहा हूँ. हम अभी इतने स्वतंत्र चेता नहीं हुए हैं कि नाम बताकर आलोचना कर सकें और इस बात का डर न हो कि आलोचना का भागीदार गाँठ न बाँध ले.