Tuesday, August 7, 2007

ठलुएपन की ठसक

सुबह सोकर उठो तो सबसे पहले इसी बात पर ध्यान जाए कि आज तुम्हारे पास करने को कुछ भी काम नहीं है। मुंबई में कई मित्र कई बार ऐसे अनुभव से गुजरते होंगे लेकिन दिल्ली में ऐसा होना बहुत डरावना है। भाई राम शिरोमणि शुक्ल ने अपने ऐसे ही दिनों के बारे में चर्चा करते हुए एक दिन बताया कि सुबह नींद खुलने के बाद भी दो घंटे के लगभग यूं ही पड़े रहे, फिर नहा-धोकर शकरपुर से आईएनएस, करीब बारह-चौदह किलोमीटर पैदल ही चले गए। वहां भी कोई काम नहीं था। सिर्फ यह उम्मीद थी कि कोई मिल जाएगा, संजय चौरसिया की दुकान पर दो-चार बीड़े पान के दबा लिए जाएंगे और जब शाम हो जाएगी तो टहलते हुए धीरे-धीरे वापस घर चले जाएंगे। यह सिलसिला चलता रहेगा, जबतक कोई नौकरी नहीं मिल जाती या मकान मालिक सामान उठाकर बाहर नहीं फेंक देता।

दिल्ली में मेरा ठलुआपन इससे थोड़ा हल्का रहा क्योंकि ग्रंथशिल्पी के श्याम बिहारी राय जी की मेहरबानी से हमेशा अनुवाद के लिए कोई न कोई किताब अपने पास उपलब्ध रहा करती थी। लेकिन अनुवाद जैसा काम आखिर कोई कितनी देर करता रह सकता है। एक और गनीमत यह भी थी कि चेतन (कवि आर. चेतन क्रांति) जैसा एक और ठलुआ मेरे पड़ोस में रहता था और समय बर्बाद करने की कई अद्भुत तकनीकें उसने सीख रखी थीं। इन तकनीकों में कुछ बहुत रचनात्मक थीं, जैसे कविताएं लिखना और क्रेयान की पेंसिलों से अमूर्त चित्र बनाना, और कुछ बहुत ही गैर-रचनात्मक, जैसे नहाना। नहाना यानी चेतन का नहाना, जिसमें गरम पानी होता, नींबू होता, कच्चा दूध होता, झांवां पत्थर होता, वीको टर्मरिक वैनिशिंग क्रीम होती, कई तरह के शैंपू, साबुन और शायद देह घिसने के लिए चंदन की एक छोटी सी छड़ी भी होती।

सुबह अक्सर चेतन की सहारनपुरिया चाय से मनाई जाती- खूब दूध, खूब चीनी, खूब पत्ती, खूब ज्यादा औटाकर एक बहुत बड़ी गिलास में। फिर चेतन बाबू काफी पूछने पर अपने किसी क्रेयॉन चित्र के कलर पैटर्न्स के बारे में बताते। उनका सबसे प्रसिद्ध चित्र था 'स्टंप विद अ पेनिस', जिसकी व्याख्या में वह कभी कुछ नहीं बोलते थे। मुझे यह उनके एकाधिक विफल प्रेमों का नतीजा लगता था- एक व्यर्थता बोध, जो अब भावना से निकलकर उनके पूरे अस्तित्व का अभिन्न अंग बनने लगा था।

चेतन अब यह घर छोड़ना चाहते थे क्योंकि इसमें रहते-रहते वह थक चुके थे। मकान मालिक उन्हें रोज शाम दारू के लिए घेर लेते थे और उन्हें दारू पिला दो तो उस लड़की के बारे में पूछताछ शुरू कर देते थे जो अपने बच्चे के साथ तीन-चार साल इसी घर में चेतन के साथ रही थी। मकान किराए पर लेने के लिए चेतन ने उसे अपनी ममेरी बहन जैसा कुछ घोषित कर रखा था लेकिन हकीकत में यह एक ऐसा लिविंग टुगेदर था, जिसमें सुदूर भविष्य में भी शादी की कोई संभावना नहीं थी। एक दिन पार्टनर के अचानक चले जाने से चेतन बहुत ज्यादा अकेले हो गए थे लेकिन इससे बड़ी समस्या उनके सामने यह थी कि अकेले दम पर उस सिंगल बेडरूम विद किचन-बाथरूम का किराया दे पाने की उनकी हैसियत नहीं थी।

रोज के सौदा-सुलफ वाले बगल के एक किराना दुकानदार से चेतन ने अपनी समस्या बताई और कहा कि आसपास कहीं कोई सस्ता सा कमरा मिल जाए तो दिलवा दो। काफी सोच-विचार करके दुकानदार ने कहा रेलवे लाइन के उस पार कमरे मिल जाएंगे- सस्ते भी और अच्छे भी, लेकिन वहां रहना खतरनाक है। चेतन ने पूछा क्यों, खतरनाक क्यों है। तो दुकानदार ने कहा, अरे वहां गूजर हैं न, दिन दहाड़े लूट लेते हैं। चेतन ने अचानक रहस्योद्घाटन किया- क्यों गूजरों में डरने की ऐसी क्या बात है, मैं खुद गूजर हूं। दुकानदार यह सुनते ही अवाक रह गया और फिर हमेशा चेतन को देखते ही कन्नी काट कर निकलने लगा।

वजह चाहे जो भी रही हो, यह कमरा नियति की तरह अगले कई सालों तक चेतन के साथ चिपका रहा। इसका किराया देने के लिए आखिरकार उन्हें पहाड़गंज के प्रचंड नाम के अखबार में नौकरी करनी पड़ी, जहां उनका मुख्य काम संपादक के नाम पाठकों के पत्र बनाने का रहता था। आठ पन्नों के अखबार में दो पन्ने पाठकों के पत्र छपते थे और दोनों में बॉक्स में छपने वाले एक-एक पत्र संपादक खुद बनाया करते थे। ये खास पत्र 'बचपन के कुटेव से इंद्री टेंडी-मेंडी हो गई हो' किस्म के शर्तिया इलाज वाले विज्ञापनों की ज्यादा भोंडी नकल हुआ करते थे और संपादक का कहना था कि उनके अखबार में सबसे ज्यादा पढ़ी जाने वाली चीज ये दोनों पत्र ही हुआ करते हैं।

अनुवाद की करीब तीन घंटों की एक शिफ्ट पूरी करके बेटू को कंधे पर बिठाए मैं दोपहर काटने के लिए एक बार फिर चेतन के यहां रवाना हो जाता था- यानी कुछ महीनों के उस वक्फे को छोड़कर, जब चेतन प्रचंड अखबार में काम करते थे। गर्मियों के महीनों में इस कमरे में दोपहर बड़ी मुश्किल से ही कट पाती थी। बेटू अलग आफत किए रहता था। लिहाजा हम लोग सड़क के ठीक बगल में पड़ने वाले पड़ोस के छायादार तिकोनिया पार्क में चले जाते थे। वहां बेटू को गाड़ियां दिखाकर बहलाना आसान रहता था और हम लोग भी ताश खेल रहे या यूं ही किसी बेंच पर उठंगे दोपहर काट रहे बुजुर्गों की बातें सुनकर बहल जाते थे। आश्चर्यजनक रूप से ये बातें यौन प्रश्नों के इर्द-गिर्द केंद्रित होती थीं और इनमें शामिल स्थानीय बुजुर्गों का उत्साह देखने लायक होता था।

अपनी पहली और दूसरी नौकरी के बीच कुल डेढ़ साल के इस ठलुआ जीवन में मैंने अपनी सबसे कड़वी कविताएं लिखीं और इसी दौरान चेतन बाबू शायरी से मुड़ते-मुड़ते आधुनिक हिंदी कविता के दायरे में आ गए, हालांकि उनका यह बदलाव उस समय मेरी पकड़ में नहीं आ पाया था। अभी नौकरी से खाली या कम संतोषजनक नौकरियों में पड़े हुए मेरे मित्र-परिचित अक्सर सभा-सोसाइटियों में घूमते पाए जाते हैं और अपना काफी सारा समय पीआर वर्क में बिताते हैं लेकिन हमारे ठलुआ दिनों में कभी-कभी एनएसडी में जाकर नाटक देख आने के अलावा दिल्ली शहर में हमारी कोई सार्वजनिक उपस्थिति नहीं हुआ करती थी। इसके दीगर नुकसान हमें झेलने पड़े लेकिन थोड़ी गैरत शायद बची रह गई। सोचता हूं, अभी अगर अचानक काम छूट जाए तो दुबारा इस तरह जी पाऊंगा या नहीं।

8 comments:

अनिल रघुराज said...

ठलुएपन की कसक को ठसक से ही ठेला जा सकता है। वरना यह निरर्थता के ऐसे अहसास में डुबा देती है कि न जीते बनता है और न ही मरते...

Pramod Singh said...

ठसक, दमक, बमक.. और थोड़ी ज़ि‍द्दी किस्‍म की बेवकूफ़ी पास हो तो ठलुआते हुए जीना ऐसा मुश्किल काम नहीं! इन्‍हीं जीवनदायिनी तत्‍वों के सहारे ही तो आखिर मुल्‍क का नब्‍बे प्रतिशत जीवन खींच रहा है. नहीं?

अनूप शुक्ला said...

सही कहते हैं आप ,अनिल रघुराज और प्रमोदजी भी

Udan Tashtari said...

अधिकतर लोगों के मानस में ऐसे प्रश्न अक्सर उठते रहते हैं. आपने बहुत बहते हुए इसे शब्दों का जामा पहनाया है बड़ी खुबसूरती के साथ.

अनामदास said...

ठलुआपन एक अदभुत अवस्था है जिसका मर्म उससे बाहर निकलकर ही समझ में आता है. नौकरी की चक्की में पिस रहे आदमी के लिए ठलुआपन रोमैंटिक है, तो ठलुए के लिए तथाकथित व्यवस्थित जीवन एक सपना...आदमी जो नहीं है, वही होना चाहता है, कुछ अपवादों को छोड़कर.

निदा साहब ने सही कहा है
मिल जाए तो मिट्टी है, खो जाए तो सोना है

ठलुआपन भी खो जाने के बाद सोना हो जाती है, जीवन के सारे आनंद मिल जाने पर मिट्टी लगते हैं.

वैसे मेरी राय है कि दोस्तों के निजी जीवन (चेतन वाले) के प्रसंगों को इस तरह उनके नाम के साथ न छापें तो बेहतर रहेगा. इसका लाभ तो कोई नहीं है लेकिन नुक़सान ज़रूर हैं. कोई सच्ची आत्मकथा लिखने थोड़े ही न बैठे हैं आप.

चंद्रभूषण said...

अनामदास जी, चेतन वाले प्रसंग पर आपका एतराज वाजिब है लेकिन इस घटना को जमाना गुजर चुका है, चेतन फिलहाल सुखी दांपत्त्य जीवन बिता रहे हैं और इसके लिए उन्हें अपने अतीत को लेकर किसी तरह की गोपनीयता नहीं बरतनी पड़ी है। उनका वह रिश्ता भी ईमानदार और साहसी था और यह रिश्ता भी ऐसा ही है- लिहाजा मेरे ऐसा लिखने में मित्रघात जैसी कोई बात नहीं है। बल्कि इसे भी आप ठलुएपने की एक ठसक की तरह ही ले सकते हैं...

हरिमोहन सिंह said...

प्रोफाइल कहॉं है भाई

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