Wednesday, August 8, 2007

रात में रेल

रात में रेल चलती है

रेल में रात चलती है

खिड़की की छड़ें पकड़कर

भीतर उतर आता है

रात में चलता हुआ चांद

पटरियों पर पहियों सा

माथे पर खट-खट बजता है



छिटकी हुई सघन चांदनी

रेल का रस्ता रोके खड़ी है

रुकी हुई रेल सीटी देकर

धीरे-धीरे सरकती है

अधसीसी के दर्द की तरह

हवा पेड़ों के सलेटी सिरों पर

ऐंठती हुई गोल-गोल घूमती है



आधी से ज्यादा जा चुकी रात में

सोए पड़े हैं ट्रेन भर लोग

लेकिन कहीं कुछ दुविधा है-

ड्राइवर से फोन पर निंदासी आवाज में

झुरझुरी लेता सा बोलता है गार्ड-

'शायद कोई गाड़ी से उतर गया है...

अभी-अभी मैंने किसी को

नीचे की तरफ जाते देखा है...'



नम और शांत रात में

उड़ता हुआ रात का एक पंछी

नीचे की तरफ देखता है

वहां खेत में रुके हुए पानी के किनारे

चुपचाप बैठा कोई रो रहा है

पानी में पिघले हुए चांद को निहारता

बुदबुदाता हुआ सोना...सोना...



और लो, यह क्या हुआ?

सात समुंदर पार भरी दोपहरी में

लेनोवो का मास्टर सर्वर बैठ गया!



घंटे भर बेवजह सिस्टम पर बैठी

जम्हाइयां ले रही सोना सान्याल

ब्वाय फ्रेंड को फोन मिलाती हैं-

'पीक आवर में सर्वर बैठ गया,

अमेरिका का भगवान ही मालिक है'

दू...र गुम होती लाल बत्तियां

फोन पर ही हैडलाइट को बोलती हैं-

'बताओ...ऐसे वीराने में ट्रेन से उतर गया,

इस इंडिया का तो भगवान ही मालिक है'

11 comments:

परमजीत बाली said...

बहुत बढिया रचना है।बधाई।

'बताओ...ऐसे वीराने में ट्रेन से उतर गया,

इस इंडिया का तो भगवान ही मालिक है'

Udan Tashtari said...

'बताओ...ऐसे वीराने में ट्रेन से उतर गया,
इस इंडिया का तो भगवान ही मालिक है'

--गजब, चन्दु भाई. बहुत खूब.

अनिल रघुराज said...

कविता की सबसे जानदार पंक्तियां हैं -
नम और शांत रात में
उड़ता हुआ रात का एक पंछी
नीचे की तरफ देखता है
वहां खेत में रुके हुए पानी के किनारे
चुपचाप बैठा कोई रो रहा है
पानी में पिघले हुए चांद को निहारता
बुदबुदाता हुआ सोना, सोना...

Pramod Singh said...

कविता में करुणा, विचार, चित्रात्‍मकता ज़ि‍न्‍दाबाद!

mahashakti said...

खूब लिखा है भाई,

क्‍या भरोसा ट्रेन का वह भी राम के भरोसे चलती है।

बोधिसत्व said...

भाई सप्ताह में एक बार से अधिक न जलाइये। तर्पण से जल भुन कर बर्नाल लगा रहा था कि आप फिर जला गये। अच्छी कविता पढ़ कर मैं राख हो जाता हूँ। बधाई नहीं दूँगा।

Divine India said...

शानदार चिन्तनीय कविता… पढ़कर अच्छा लगा।

अनूप शुक्ला said...

बहुत अच्छा!

Pratyaksha said...

रात में रेल चलती है
रेल में रात ....

बहुत बढिया !

indu said...

....adhsisi ke dard ki tarah hava pero ke saleti siro per ainthti hui gol-gol ghoomti hei....

Purani kavitao ki tulna mei yah kuch alag hei, alag tarah ke bimb hei, kuch naye shabd bhi....lekin kul milakar yah ek achhi kavita ban pari hei. Lambi aur ubaoo nahi hei.

अभय तिवारी said...

सरल और तरल.. किसी श्रेष्ठ कविता की तरह इसमें भी निश्चित ही कुछ निजी सन्दर्भ भी हैं.. जो पूरी तरह पल्ले नहीं पड़े.. पर फिर भी.. दिल में उतर जाने वाली कविता..