Saturday, May 3, 2014

अट्ठारह साल का लड़का

सींग कटा कर कुलांचें भरने वालों की यह रंगारंग पार्टी
बस थोड़ी ही देर में अपने शबाब पर पहुंचने वाली है

ऐसे सुहाने, नाजुक मोड़ पर कौन यहां से हिलता है
फिर भी, फुरसत मिले तो जरा आस-पास घूम कर देखना
गंवईं सा दिखने वाला एक अट्ठारह साल का लड़का
अपना दिन का ठिकाना छोड़ कर यहीं कहीं टहल रहा होगा

लेकिन अभी, रात के बारह बजे
तुम कैसे उसे ढूंढोगे, कैसे पहचानोगे ?

वह कुछ भी पहने हो सकता है,
जैसे काठ की खटपटिया पर पीली धोती और नीली टीशर्ट

उसकी चाल का चौकन्नापन गली के गुंडे जैसा
आंखों की तुर्शी झपट पड़ने को तैयार बनैले जानवर जैसी है,
हालांकि यह हुलिया न उसे मजाकिया बनाता है, न खौफनाक

वह सिर्फ एक फुटकर किस्म का डॉन क्विग्जॉट है,
ब्रेड पकौड़ों और पावर ब्रोकरों के शहर में
अंडे बेच कर एडीसन बनने आया है 

लेकिन एक अनजान लड़के की ऐसी बेढब बारीकियां
इस चौंध भरी शहराती रात में तुम्हें दिखेंगी कैसे ?

*

साढ़े पांच फुट का वह ढीला ढीठ गठीला छोकरा
मोटे काले फ्रेम वाला चश्मा भी अभी नहीं लगाता होगा
कि सामने से आ रही गाड़ियों की पलट रोशनी से ही
सड़क पर उसके होने का कुछ अंदाजा मिल सके

पढ़ते वक्त आंखों में दर्द की शिकायत करता है
पर चश्मा अभी उसकी नजर से पंद्रह-बीस दिन दूर है,
और उसकी दाईं आंख पर कटे का निशान भी अभी नहीं है

वह चोट तो उसे पांच साल बाद लगेगी, तेईस की उम्र में

यहां तुम उसे देर रात तक खुली किसी चाय की दुकान पर
पागल कर देने वाली बहसों में भी उलझा हुआ नहीं पाओगे
यह जानी-पहचानी चीज अभी उसकी पहुंच से काफी बाहर है

असल बात यह कि इस वक्त जहां हम-तुम बातें कर रहे हैं,
वह आजमगढ़ या  इलाहाबाद का कोई स्टुडेंट जोन नहीं
साउथ दिल्ली का एक भुतहा सा नाइट क्लब है...
दुनिया की सारी बहसें जहां पहुंचने के पहले ही हल हो चुकी होती हैं



उसे पहचानने के लिए शायद तुम्हें उससे कुछ सवाल करने पड़ें
जैसे यह कि इतने शातिरपने के साथ, फिर भी इतनी शाइस्तगी से
आंखें ऊपर किए बिना लड़कियां वह कैसे ताड़ लेता है,
और यह कि जिंदगी भर ताड़ता ही रहेगा या कभी आगे भी बढ़ेगा

लगता नहीं कि इन सवालों का तुम्हें कोई जवाब मिलेगा
लेकिन इस अटपटेपन के आकर्षण से कहीं तुम उसके दोस्त बन गए
तो बिना कुछ सोचे-समझे कलेजा निकालकर तुम्हारे हाथ पे धर देगा

उससे कहना कि कोशिश चाहे जितनी भी कर ले, कामयाब उसे नहीं होना
कि ग़मे-रोजगार का कैसा भी चमकीला इलाज उसके लिए नहीं बना है
कि हालात चाहे जैसे भी हों, पर अभी की चिंताओं में इतना गर्क न हो
क्योंकि आगे और भी बड़ी चिंताओं का दरिया उसे डूब कर पार करना है

अकाल मौतों के तूफान झेलने हैं, दुनिया बदलने की राजनीति करनी है
फाके की मजबूरियों का मजा डेली अडवेंचर की तरह लेना है
बाड़ेबंदियों के पार जाकर एक पूरा और कुछ अधूरे इश्क करने हैं 
पुलिस की पिटाई खानी है, जेल को घर समझकर जीने का मन बनाना है

और यह सब करके एक दिन अचानक
गृहस्थी और स्वप्नभंग के झुटपुटे में
छोटी से छोटी नौकरी के लिए दफ्तर-दफ्तर भटकना है

*

तुम रेड वाइन का कड़वा घूंट भरते हो,
मुंह बिचकाते हो, कहते हो- ‘लाइफ हैपेंस’
लेकिन इस पल्प फलसफे की बघार से तुम
मुझे बहलाने की कोशिश न करो

मुझे पता है कि सड़क पर पहली ही मुलाकात में
किसी को आने वाली जिंदगी के ऐसे करख्त ब्यौरे देना
अपने लिए बैठे-बिठाए जूते खाने की व्यवस्था करने जैसा है

इसलिए मैं तुम्हें एक आसान रास्ता बताता हूं-
इसी ऊंघती गंधाती हालत में, आंखें आधी मूंदे आधी खोले
तैरते हुए से तुम उस तक जाओ और भुलावा देकर उसे मेरे पास लाओ

उससे कहो कि शक्ल-सूरत में उससे बहुत मिलता-जुलता एक शख्स
जो इसी शहर में कहीं बारह से सात की रेगुलर नौकरी बजाता है,

नीची नजर से लड़कियां ताड़ने और हर हाल में मगन रहने का
अपना आजमाया हुआ हुनर बेध्यानी के बक्से में डाल कर
अट्ठारह साल के ही अपने बेटे के किसी राह लग जाने की फिक्र करता है,

अपनी चोटिल दाईं आंख ही नहीं, अपने वक्त के रिसते घावों को भी
तरह-तरह के चश्मों के पीछे छिपा कर रखने का हुनर
जिसने दुनिया की सबसे ऊंची युनिवर्सिटी में सीख रखा है-

‘आलवेज एटीन’ की रंगारंग पार्टी में दिल से शामिल होने के लिए
सिर्फ दो मील और बत्तीस साल की छोटी सी दूरी पर
बाहें फैलाए उसका इंतजार कर रहा है



2 comments:

anil yadav said...

तकनीक ललचाऊ है चंदू भाई!

स्वप्नदर्शी said...

Bahut hi achchhi.