Monday, March 7, 2011

फुरगुद्दियां

जैसे आंधी का एक सघन झोंका
सिर के पीछे से गुजर गया हो

अचंभित करता हुआ
फुरगुद्दियों का एक झुंड
सोसायटी के सातफुटा सजावटी पेड़ों के
झुरमुट से निकलकर
सीधे तीर सा ऊपर उठा

चहकती हुई
कई सौ नन्ही चिड़ियां एक साथ
सेकंड भर में आंखों से ओझल होती हुई
जैसे शकर बन घुल गई हों
सुबह की हल्की नम हवा में

फिर वैसे ही शोर भरे झपाटे से
एक और झुंड निकला
और एक-एक कर कितने सारे और
जैसे सातफुटा पेड़ों में
उनका कोई अक्षयपात्र रखा हो

खाना हर किसी को चाहिए
जिंदगी की दूसरी दीगर जरूरतें भी हैं
मगर सुबह-सुबह
इन चहकती झपाटेदार उड़ानों का
ऐसा कोई मकसद हो सकता है?

देखो-देखो
कई हजार फुरगुद्दियां
क्षितिज से ठीक सात फुट
ऊपर उठे सौम्य सूर्य की
प्रदक्षिणा कर रही हैं

और कोई कारण नहीं
यह सिर्फ इस दुनिया में
होने का उल्लास है
जिससे वंचित जन
इसमें ईश-वंदना के तत्व
खोजते हैं
तो खोजते रहें।

5 comments:

Pratyaksha said...

सुंदर !

Pramod Singh said...

शायद कुछ ऐसे ही मार्मिक संवेदों का असर होगा जिसने 'नया ज़माना' के धर्मेंदर के मुंह से आनंद बक्षी को गवाया होगा, 'दुनिया ओ दुनिया तेरा जवाब नहीं'..

प्रवीण पाण्डेय said...

बहुत ही सुन्दर।

डॉ .अनुराग said...

वाकई खूबसूरत !

अनूप शुक्ल said...

बहुत अच्छा लगा इसे पढ़कर! खासकर यह:
और कोई कारण नहीं
यह सिर्फ इस दुनिया में
होने का उल्लास है
जिससे वंचित जन
इसमें ईश-वंदना के तत्व
खोजते हैं
तो खोजते रहें।