Wednesday, June 16, 2010

बड़े धर्म और छोटे देवता

चर्चित इतिहासकार विलियम डैलरिंपल ने हाल में अमेरिकी पत्रिका नैशनल इंटरेस्ट में प्रकाशित एक लेख में दक्षिण भारत के अपने एक अटपटे अनुभव का उल्लेख किया है। ईसाइयों और हिंदुओं की मिली-जुली आबादी वाले केरल के एक इलाके में वर्जिन मेरी को देवी भगवती की बहन माना जाता रहा है। सदियों से स्थानीय ग्रामीण दोनों की यात्रा एक साथ निकालते थे और दोनों से अपने सुख-समृद्धि की मनौती मानते थे। पिछले दिनों गांव के समर्थ हिंदुओं ने अपने लिए एक नया विष्णु मंदिर बना लिया और स्थानीय चर्च भी अपने अनुयायियों को साझा देवी-यात्राओं में जाने से मना करने लगा।

डैलरिंपल ने इस बारे में स्थानीय पादरी से बात की तो उन्होंने कहा- वर्जिन मेरी यहूदी परंपरा से आती हैं। वे जोकिम और अन्ना की बेटी हैं, फलस्तीन की रहने वाली हैं, जबकि यहां का देवी मंदिर भारतीय परंपरा की चीज है। वर्जिन मेरी और भगवती के बीच कोई रिश्ता नहीं है। हम इस तरह के विश्वास को बढ़ावा नहीं दे सकते। यह एक मिथक है। बल्कि उससे भी बुरी चीज, यह एक बकवास है।

स्थानीय विश्वासों का एक दूसरा फलक एनसीआर के नए विकसित हो रहे इलाकों में देखने को मिलता है। डीडीए, जीडीए या नोएडा अथॉरिटी गांवों की खेतिहर जमीनों का अधिग्रहण करती है तो ग्राम देवताओं के इर्दगिर्द की जमीन को सार्वजनिक मान कर उस पर कब्जा नहीं लेती। फिर ग्राम प्रधानों, पटवारियों और बिल्डरों की नजर इन जमीनों पर पड़ती है और वे इनकी घेरेबंदी शुरू कर देते हैं। चारों तरफ से घिरते-घिरते ग्राम देवता किसी अदृश्य कोने में सिमटा दिए जाते हैं और इस सिलसिले का अंत एक दिन उनकी संपूर्ण विदाई के साथ होता है। जिस टूटे-फूटे, अनगढ़ देवस्थान पर आप गांव में ब्याह कर आई दुलहन को सीस नवाते देखते हैं, दो-चार साल बाद वहीं आपको शेराटन या डैफोडिल जैसे किसी अंग्रेजी ब्रैंडनेम वाले बिल्डर्स एंड डेवलपर्स का मायामहल नजर आता है।

काली माई, शीतला माई, डीह बाबा, सैयद बाबा, लत्ता पीर.... इस तरह के न जाने कितने छोटे-मोटे आस्था केंद्र फसलों की उपज से लेकर शादी-ब्याह, बाल-बच्चों तक किसान जीवन का हिस्सा बने रहते हैं, लेकिन शहरीकरण के क्रम में ये गैरजरूरी होते जाते हैं। जो लोग इन्हें जहालत का प्रतीक नहीं मानते, उन्हें भी इनको बचाने का काम इतना जरूरी नहीं लगता कि इसके लिए भूमाफिया से पंगा लेने जाएं। ग्राम देवताओं की भरपाई के लिए अब लोगों के पास आस्था के कहीं बेहतर स्रोत मौजूद हैं। बिल्कुल संभव है कि पास में ही किसी आस्थावान बिल्डर ने सड़क घेर कर एक भव्य मंदिर बना रखा हो, या शायद अगले ही हफ्ते बगल वाले चौराहे पर किसी फाइव-स्टार बाबा का प्रवचन होने वाला हो।

सामाजिक अध्येता मीरा नंदा अपनी किताब 'द गॉड मार्केट' में हिंदू मंदिरों की बढ़ती तादाद और पंडे-पुजारियों के चढ़ते रुतबे का हवाला देते हुए कहती हैं- ग्लोबलाइजेशन देवताओं के लिए काफी अच्छा साबित हुआ है। उनकी इस प्रस्थापना में यह जोड़ना जरूरी लगता है कि गांव-जंवार के छोटे देवताओं के लिए तो यह कतई अच्छा नहीं रहा है। छोटी आस्थाओं की विदाई और बड़ी आस्थाओं का विस्तार भारत में ही नहीं, पूरे दक्षिण एशिया में पिछले दो-तीन दशकों की एक महत्वपूर्ण परिघटना है। शहरी सत्ता केंद्रों में निरंतर जारी उथल-पुथल के बीच ग्रामीण समाज ने पिछली कई सदियों से अपना संतुलन इन्हीं छोटी आस्थाओं के सहारे बचाए रखा था, लेकिन अब ये उनका साथ नहीं दे पा रही हैं। राजनीति करने वालों और धर्म को धंधा बनाने वालों के लिए इसके फायदे ही फायदे हैं, लेकिन समाज में जिन जगहों पर कई सारी बड़ी आस्थाएं एक साथ मौजूद हैं, वहां इसके नतीजे भयानक सिद्ध हो रहे हैं।

पिछले दशक में आई सैमुअल हंटिंगटन की किताब 'क्लैश ऑफ सिविलाइजेशंस' से मुहावरे उठाकर कुछ लोग हिंदू धर्म और ईसाइयत के साथ इस्लाम के सभ्यतागत टकराव की बात करते हैं और अल कायदा की मुहिम को इसके सबूत की तरह पेश करते हैं। लेकिन कम ही लोगों को पता है कि इस्लामी कट्टरपंथ ने हाल के वर्षों में सबसे तीखी वैचारिक मुहिम सूफी पंथों के खिलाफ चलाई है। भारत में इस तरह की सिर्फ एक घटना चर्चा में आई है। 1995 में कश्मीर के चरार-ए-शरीफ में आईएसआई के पूर्व डीजी मस्त गुल की देखरेख में शेख नूरुद्दीन नूरानी (जिन्हें नुंद ऋषि के नाम से भी जाना जाता है) की दरगाह उड़ा दी गई थी लेकिन कश्मीरी अवाम का गुस्सा देखते हुए कट्टरपंथियों को इसका श्रेय लेने की हिम्मत नहीं पड़ी।

लेकिन पड़ोसी देश पाकिस्तान में इसे अपने सबसे भयंकर रूप में देखा जा सकता है। डैलरिंपल ने अपने उसी लेख में पाकिस्तान के सूफी संत रहमान बाबा की दरगाह का हवाला दिया है, जिसकी रातें हाल तक अफगानिस्तान और पाकिस्तान के पश्तो शायरों और संगीतकारों की कला से गुलजार रहती थीं। खैबर दर्रे के पास अपना ठिकाना बनाने वाले रहमान बाबा को पश्तोभाषियों के बीच राष्ट्रकवि का दर्जा हासिल रहा है। करीब दस साल पहले इस दरगाह के पास ही सऊदी मदद से एक वहाबी मदरसे की स्थापना हुई। इस मदरसे में तथाकथित शुद्ध इस्लाम की पढ़ाई करने वाले छात्रों को जल्द ही लगने लगा कि दरगाह की गतिविधियां गैर-इस्लामी हैं।

इस दरगाह के खादिम ने 2003 में डैलरिंपल को बताया था कि मदरसे के छात्र उन्हें बहुत तंग करने लगे हैं - वे यहां औरतों को आने नहीं देते। लोगों को गाने नहीं देते। अक्सर झगड़ा होता है। कभी-कभी हाथापाई तक की नौबत आ जाती है। लोगों को वे दरगाह पर आने से और हमें इश्क पर बोलने से मना करते हैं। पिछले साल 4 मार्च को पाकिस्तानी तालिबान ने इस दरगाह को डाइनामाइट लगाकर उड़ा दिया। मोहमंद इलाके में तो उन्होंने सूफी संत हाजी साहब तूरंगजई की दरगाह पर कब्जा करके इसे अपना हेडक्वार्टर ही बना लिया है।

तर्क का रास्ता पकड़ कर चलें तो छोटी आस्थाएं इसका पहला मुकाम ही पार नहीं कर पातीं। कट्टर कर्मकांडी ब्राह्मणों के गांव में सैयद का स्थान कहलाने वाले पीपल के नीचे फागुन में घी के दीये जलाने का भला क्या मतलब हो सकता है? लेकिन तर्क से ऊपर उठकर देखें तो इस प्रथा में अपने से भिन्न आस्था वाले लोगों का सम्मान करने, उनके साथ सामंजस्य बिठाने का आग्रह नजर आता है। दुर्भाग्यवश, ईश्वरीय वचनों और प्रामाणिक ग्रंथों पर आधारित बड़े दायरे की धार्मिक समझ छोटी आस्थाओं को मटियामेट करने में जितनी तेजी दिखाती है, उतनी ही बेरहमी से वह अन्य बड़ी आस्थाओं के प्रति नफरत भी पैदा करती है।

3 comments:

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

बदलते भारत की गवाही है यह भी. मेवात में युवा वर्ग द्वारा अपने माता-पिता को हिन्दू नाम छोड़ने का दवाब, उत्तर भारत में वेलेंटाइन डे मनाने वालों को रपटाने का चलन, पूर्वांचल की मुस्लिम महिलाओं का धोती छोड़कर बुर्का अपनाना आदि ऐसे ही कुछ उदाहरण हैं. कुछ उदाहरण सिर्फ अपनी पहचान ढूँढने के जेनुइन प्रयास हैं और कुछ अपना वर्चस्व स्थापित करने के आसुरी प्रयास. रोजाना के संघर्षों से थका हुआ आम आदमी गुंडों से पंगा ले भी तो कैसे? विश्वसनीय, सक्षम और न्यायपूर्ण प्रशासन व्यवस्था की स्थापना इस तरह की एवं अनेकों अन्य समस्याओं का इलाज हो सकती है. अगर संगठित अपराधों से जनता को ही लड़ना पडेगा तो प्रशासन/सरकार की आवश्यकता ही क्या है?

dhiru singh {धीरू सिंह} said...

कई लोग कहते है हमने धर्म बदला है पुरखे नही .

शोभना चौरे said...

apko padhna saty ke kreeb jana lgta hai .shbdo ke sfar bhi niymit padhti hoo