Wednesday, March 24, 2010

क्रांति और खुदकुशी

कॉमरेड कानू सान्याल की आत्महत्या की खबर सुनकर मन बहुत दुखी है। हमारे अखबार में यह खबर कवर पर है लेकिन खबर में ही नहीं, खबर के शीर्षक में भी नाम की जगह कनु सान्याल लिखा हुआ है। हाई प्रोफाइल मीडिया के लोग ऐसी गलतियों पर अब पछताते नहीं। टोकने पर हिकारत से देखते हैं और ऐसा जताते हैं जैसे किस जमाने की बात उनसे की जा रही हो। एक समय था जब चारु मजूमदार, कानू सान्याल और जंगल संथाल भारत के रेडिकल नौजवानों के बीच एक साझे नाम की तरह याद किए जाते थे। समय बदल जाता है, लोग बदल जाते हैं लेकिन तकलीफें नहीं बदलतीं, उनकी टीस नहीं बदलती।

कानू सान्याल पिछले तीसेक वर्षों से धीरे-धीरे धुंधले पड़ रहे थे। मतभेद वगैरह जो थे सो थे लेकिन उनका स्वाभाविक रुझान भी बड़े दायरे में काम करने का नहीं था। किरानी से क्रांतिकारी बने थे, जमीनी स्तर पर काम करते थे और अंत तक करते रहे। चाय बागानों में मजदूरों की बदहाली पर एक प्रदर्शन का नेतृत्व उन्होंने पिछले साल ही किया था। हां, 1970 से 77 तक सात साल की जेल उन्होंने जिस गिरफ्तारी के बाद काटी थी, वह उनके कार्यक्षेत्र के आसपास नहीं बल्कि दूर, आंध्र प्रदेश में हुई थी। किसी बैठक के सिलसिले में उधर गए थे और पकड़ लिए गए, हालांकि धाराएं उनके खिलाफ ऐसी-ऐसी लगाई गईं कि पूरा जीवन शायद जेल में ही कट जाता। आपातकाल के खात्मे की एक बड़ी उपलब्धि नक्सली नेताओं की रिहाई भी थी।

इधर कुछ सालों से पश्चिम बंगाल में माओवादी सक्रियता बढ़ी, झारखंड से सटे इलाकों में घटनाएं होने लगीं तो मीडिया को कानू सान्याल में अपनी दिलचस्पी के लायक कुछ मसाला मिल गया। कुछ-कुछ अंतर से लगातार ही उनके इंटरव्यू पढ़ने और सुनने को मिलने लगे थे, जिनमें वे अपने जमाने के सशस्त्र किसान आंदोलन को याद करते थे और बारूदी सुरंगों पर निर्भर माओवादी धड़े की आलोचना करते थे। कोलकाता, दिल्ली और मुंबई में बैठे मनोरंजक मीडिया के लिए उनके इंटर्व्यू से कुछ दिलचस्प और उपयोगी चीजें निकल आती थीं- देखिए, जिस बंदे ने नक्सलपंथ की शुरुआत की, वही बोल रहा है, कि माओवादी जो कर रहे हैं, वह सब कितना गलत है। लेकिन कानू सान्याल को कभी यह कहते नहीं सुना गया कि मनमोहन सिंह और बुद्धदेव भट्टाचार्य के नेतृत्व में देश अब बिल्कुल ठीकठाक चल रहा है और क्रांति जैसी किसी चीज की अब यहां कोई जरूरत नहीं है।

क्रांति और खुदकुशी के बीच कोई साझा बात नहीं है, लेकिन दुनिया का कोई भी क्रांतिकारी आंदोलन ऐसा नहीं रहा, जिसके कार्यकर्ताओं में किसी न किसी दौर में इस तरह का रुझान देखने को न मिला हो। आदमी बहुत कुछ छोड़ कर एक ऐसे आंदोलन से जुड़ता है, जिससे भौतिक अर्थों में कुछ हासिल करने की संभावना दूर-दूर तक नहीं होती। ऐसा आंदोलन जब ठहराव के दौर में चला जाता है, या किसी वजह से व्यक्ति ही उससे अलग-थलग पड़ने लगता है तो इस तनहाई को संभालने की कोशिश मन पर बहुत भारी पड़ने लगती है। लिबरेशन में अपनी सक्रियता के दौरान अपने दिल के करीब रहे लोगों में से दो- गोरख पांडेय और भोजपुर के पासवान जी (पहला नाम याद नहीं) अपने-अपने ठिकानों पर फांसी चढ़े पाए गए। कानू सान्याल से मेरा कोई सीधा परिचय कभी नहीं रहा, देखादेखी भी नहीं हुई थी, लेकिन नक्सली आंदोलन की स्थापना करने वालों में वही अकेले जिंदा बचे थे और इस धारा से जुड़े हर व्यक्ति की तरह मेरे मन में भी उनके प्रति गहरा सम्मान था।

मैं उनकी दृढ़ आस्था और जमीन से उनके गहरे जुड़ाव की कद्र करता था। नक्सलबाड़ी नाम की जगह नक्सल आंदोलन के नक्शे से कब की हट चुकी थी, लेकिन एक नक्सल प्रतीक की तरह उत्तरी बंगाल के नक्सलबाड़ी ब्लॉक से कानू सान्याल का रिश्ता लगातार बना रहा। जब भी उनका जिक्र आता, यह सोचकर खीझ होती कि वे इतने अकेले क्यों हैं, किसी बड़ी वामपंथी धारा का हिस्सा क्यों नहीं बनते। सीपीआई-एमएल लिबरेशन का होलटाइमर रहते हुए यह सवाल अपने सबसे बड़े नेता विनोद मिश्र और नागभूषण पटनायक से भी किया था कि क्या कानू दा को अपने साथ नहीं लाया जा सकता। इसका जवाब किसी की इच्छा या अनिच्छा पर निर्भर नहीं करता था। मन की कोई गांठ इस कदर उलझ गई थी कि विचार उसे सुलझा नहीं पाता था। चीजें खतरनाक दिशा में बढ़ रही थीं। अच्छा होता कि कोई उन्हें रोक लेता, समझा लेता। विचार के स्तर पर आप अल्पमत में पड़ जाएं, अकेले हो जाएं, तो भी आपके पास उसी प्रखरता के साथ जीने को कुछ होना चाहिए। उस नए कुछ को खोजने का कोई जतन ही समय रहते नहीं हो पाया।

देश के सबसे ईमानदार, सबसे प्रतिबद्ध जमीनी आंदोलन के साथ सबसे बड़ी मुश्किल यही है कि इसके तमाम धड़ों में बड़े स्तर के संवाद की संभावना नहीं के बराबर है। कुछ हद तक यह प्रवृत्ति मध्यकालीन योद्धाओं जैसी है। हर धड़े के केंद्र में कोई योद्धा है, जिसे लगता है कि एकमात्र उसका ही विश्लेषण, उसकी ही रणनीति सही है। आंदोलन के कई सत्यों के लिए, उनमें से किसी के पास कोई जगह नहीं है। 1982 में आईपीएफ की स्थापना के कुछ साल इधर और उधर तक लगा था कि शायद देश में एक तीसरी समेकित वाम धारा के लिए कोई स्पेस बन रहा है, लेकिन यह सिलसिला ज्यादा दिन नहीं चला। भारत के गरीब तबकों को खास एक अपनी पार्टी की जरूरत है। वह पार्टी क्रांति करेगी या नहीं, करेगी तो कब करेगी, इससे ज्यादा फर्क नहीं पड़ता। जब भी दिल कचोटने वाली कोई घटना होती है, इस बात को छत पर खड़े होकर जोर-जोर से दोहराने का दिल करता है।

2 comments:

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

कामरेड कानू सान्याल एक मजदूर-किसानों के ईमानदार और मजबूत योद्धा थे। उन्हें नमन।
कौन पार्टी क्रांति करेगी? यह सवाल या आशा ही गलत है। क्रांति कभी पार्टियाँ नहीं करतीं। वह तो जनता का काम है। हाँ कौन सी पार्टी जनता को गोलबंद कर पाती है? यह प्रश्न जरूर है। मुझे लगता है कि क्रांति के लिए देश में परिस्थितियाँ अभी भी बहुत दूर हैं। यही कारण है कि क्रांतिकारी आंदोलन बिखरा पड़ा है। जनता और परिस्थितियों पर भरोसा है कि वे वक्त आने पर इस बिखरे हुए आंदोलन को एक भी कर देंगी। तभी शायद उस पार्टी का जन्म भी हो जो क्रांति का नेतृत्व करे। अभी तो वह गर्भ में ही नजर आती है।

डॉ .अनुराग said...

अक्सर ऐसा होता है किसी भी क्रांति की शुरुआत किसी ईमानदारी ओर उम्मीद से होती है .धीरे धीरे वो बुनियाद अपनी सूरते बदलने लगती है .....