Thursday, September 10, 2009

पैसे का क्या है

पैसे का क्या है
वो तो हाथ का मैल है
पता भी नहीं चलता और चिपकता जाता है

काफी जम जाए तो भी नजर नहीं आता
देखने में बिल्कुल साफ दिखते हैं हाथ
मगर पानी में डालो तो समझ नहीं पड़ता
कि कालिख इतनी कहां छिपी थी

पैसे का क्या है
इधर से आता है उधर चला जाता है
घेर-घार लेकिन इतनी मचाता है
कि दूर तक कुछ भी नजर नहीं आता

जब यार-दोस्त होते हैं, पैसा नहीं होता
जब दिल लगता है तो पैसा नहीं होता
जब खुद में खोए रहो तो भी वो नहीं होता

फिर पीछे पड़ो उसके
तो उठ-उठ कर सब जाने लगते हैं
पहले दृश्य, फिर रिश्ते, फिर एहसास
फिर थक कर तुम खुद भी चले जाते हो

दूर तक कहीं जब कुछ नहीं होता
तो पैसा होता है
पैसे का क्या है
वो तो.....

11 comments:

विनय ‘नज़र’ said...

सुन्दर रचना है
---
Tech Prevue: तकनीक दृष्टा

अभय तिवारी said...

सत्य वचन!

Pramod Singh said...

थककर पता नहीं खुद से कितनी दूर निकल गया हूं, लेकिन पीछे पैसा रहा हो ऐसा भी नहीं है, फिर? पैसे का क्‍या है?

संजय तिवारी ’संजू’ said...

लेखनी प्रभावित करती है.

आशुतोष उपाध्याय said...

आधी उम्र बीतने को है लेकिन हाथ कोरे हैं. बहुत कोशिश करने पर भी मैल नहीं जमता. कीचड़ में उतरने का माद्दा नहीं है. कुछ करो प्रभु.

अनिल कान्त : said...

bahut gazab baat kahi hai aapne rachna mein

tarav amit said...

"पैसा चीज मजेदार है
पैना है धारदार है
जो बंद रख सडाते हैं,
उनको दहिया लगा अचार है
जो खर्चते हैं,
उनको व्यापार है .."
बाकी फिर कभी !
बेहतरीन रचना !

अजित वडनेरकर said...

जबर्दस्त अभिव्यक्ति।
सब कुछ तो कह दिया आपने।
जावेद साहब का शेर याद आ रहा है

गिन गिन के सिक्के हाथ मेरा खुरदुरा हुआ
जाती रही वो लम्स की नरमी, बुरा हुआ

चंद्रभूषण said...

@अजित जी, क्या हुआ?

स्वप्नदर्शी said...
This comment has been removed by the author.
दीपा पाठक said...

पूछते हैं आप कि पैसे का क्या है?..... हज़ूर पैसे का ही तो सारा खेल है।
......बहरहाल, सच्ची बात कहती बहुत सुंदर कविता चंदू जी।