Thursday, March 20, 2008

हां जी, मैं खांमखां

किसी और की उठाई और कुछ और ही इरादों से चलाई गई बहस में जबर्दस्ती की अड़ंगेबाजी का यह अमौलिक कृत्य मैं आखिर कबतक संपन्न करता रहूंगा? शायद तबतक, जबतक अपना यह जीवन है। मेरे ख्याल से भाई अनिल रघुराज के मौलिकता संबंधी उद्गारों में कामू, काफ्का या आइंस्टाइन जैसी किसी उद्भट मौलिकता का आग्रह नहीं है। ऐसी मौलिकता हिंदुस्तान में कहां जो देखने को मिल रही है जो इसके न होने का ठीकरा वाम विचारधारा के सिर फोड़ा जाए। उनका तो बस एक छोटा-सा सवाल है कि किसी पुरानी बात को ही अगर कोई किसी अन्य लहजे, अन्य मुहावरे में कहना चाहता है, यहां तक कि कपड़ा-लत्ता ही किसी और तरह का पहन लेता है, तो भी कम्युनिस्ट पार्टियों में उसे संदेह से क्यों देखा जाने लगता है, बिल्कुल अलगाव में पड़ जाने की नौबत उसके सामने क्यों आ जाती है?

उनके इस सवाल से मैं खुद को कभी सहमत तो कभी असहमत महसूस करता हूं। सहमत यहां कि मुक्तिबोध जैसे विराट चिंतक और कवि को भी- जिनके इतने गुन आज गाए जाते हैं- उनके जीते जी कम्युनिस्ट मुख्यधारा ने कभी अपने बीच का आदमी नहीं समझा। उस समय के सबसे बड़े मार्क्सवादी महामहोपाध्याय रामविलास शर्मा ने तो उन्हें अस्तित्ववादी करार देते हुए लगभग कम्युनिस्ट आंदोलन का गद्दार ही घोषित कर डाला। कमोबेश ऐसा ही हाल त्रिलोचन का भी हुआ, और छोटे-बड़े ऐसे दस-बीस और उदाहरण खोजे जा सकते हैं।

यहां गौरतलब बात यह है कि अलग-थलग पड़ने के बावजूद मौलिकता के गहन आग्रहों वाले इन बौद्धिकों ने खुद को कभी वाम धारा से अलग नहीं माना। दूसरी तरफ वाम धारा के भीतर भी देर-सबेर ऐसी उपधाराएं उभर कर आईं जिन्होंने इन मनीषियों के काम की कद्र की। अपने समय में मुक्तिबोध की वाम आंदोलन में चाहे जो भी गति रही हो लेकिन अपनी मृत्यु के बीस साल बाद जितने पोस्टर उनकी कविताओं के बने, उतने शायद ही किसी कवि के बने हों।

अनिल जी से असहमति यहां है कि (छोटे मुंह बड़ी बात कहूं तो) मेरे निजी अनुभव काफी हद तक उनके इस प्रेक्षण का निषेध करते हैं। कविता के लिहाज से अपना सबसे ज्यादा रचनात्मक दौर मैं भोजपुर में बिताए गए अपने तीन वर्षों को मानता हूं। ये सारी कविताएं 'इतनी रात गए' में संकलित हैं और इनपर और चाहे जो भी आरोप लगे, नारेबाजी की चिप्पी तो अभी तकक किसी ने नहीं चिपकाई है। विचार या रचनात्मकता से जुड़ा शायद ही कोई मुद्दा ऐसा रहा हो, जिसपर पार्टी के भीतर मैंने रोने-रुलाने की हद तक जाते हुए बहस न की हो। इनमें कुछ मामले ऐसे भी थे, जिनमें फैसले मेरे मत से प्रभावित हुए, हालांकि ज्यादातर में मैंने ईमानदारी के साथ बहुमत के फैसले का अनुसरण किया।

जब मैं मुख्यधारा से अलग मत को संदेह की दृष्टि से देखने की प्रवृत्ति को आचार-व्यवहार के बजाय दर्शन से जुड़ा सवाल कहता हूं तो इससे मेरी मुराद यह है कि कम्युनिस्ट विचारधारा में जाने-अनजाने 'व्यक्तिवाद' को कम्युनिस्ट संगठन और आंदोलन विरोधी किसी खलनायक का सा दर्जा हासिल हो गया है, जबकि कला, साहित्य, विज्ञान या सोच-समझ के किसी भी सीमावर्ती दायरे में कोई बुनियादी काम एक स्तर के व्यक्तिवाद के बगैर संभव ही नहीं है।

मुझे नहीं लगता कि ऐसा मार्क्स के समय से चला आ रहा है, क्योंकि उनके समय में वाम आंदोलन के भीतर इस तरह की कोई वैचारिक चुनौती थी ही नहीं। पिछड़े पूंजीवादी देश रूस में, जहां संसार की क्रूरतम तानाशाहियों में से एक का मुकाबला वाम और लोकतांत्रिक शक्तियां कर रही थीं, लेनिन ने फरवरी 1904 में लिखी अपनी किताब 'एक कदम आगे, दो कदम पीछे' में स्वतंत्र बौद्धिकों के खिलाफ एक तीखी बहस चलाई, उन्हें अपनी पार्टी के लिए गैरजरूरी घोषित किया और इसे ही मेन्शेविक-बोल्शेविक विभाजन का आधार बना दिया।

रूसी क्रांति के कोई दस साल बाद और लेनिन की आंख मुंदे पांच-छह साल गुजर जाने के बाद स्तालिन के चढ़े जमाने में यह समझदारी स्वतंत्र बौद्धिक सोच के विरुद्ध लगभग फासिस्ट किस्म के अभियान की हद तक पहुंच गई और रूसी क्रांति में अपनी विचारोत्तेजक प्रस्थापनाओं से असाधारण भूमिका निभाने वाले तकरीबन सारे वाम बौद्धिक एक-एक कर मौत के घाट उतार दिए गए। स्तालिन युग के बाद उनकी लाख आलोचनाओं, या इसे एक युगविशेष की विडंबना करार देने के बावजूद, दुर्भाग्यवश, स्तालिन की समझ की दार्शनिक समालोचना का प्रयास दुनिया में कहीं नहीं हुआ। हर जगह इसे तदर्थवादी ढंग से निपटा देने की सोच ही हावी रही।

अगर मौलिकता के आग्रह, या इसकी आधारभूत शर्त- सकारात्मक व्यक्तिवाद- के प्रति मार्क्सवाद का रवैया ऐसा है तो क्या संसार की किसी भी घोषित विचारधारा का रवैया इससे जरा भी अलग है? क्या दक्षिणपंथी विचारधाराओं के अंदर अपनी कतारों में मौलिक रचनाकारों को प्रश्रय देने की कोई सोच देखी जाती है? मिसालें इसकी उल्टी तरफ ही इशारा करती हैं।

लेकिन क्या किसी भी विचारधारा से मौलिकता को बढ़ावा देने का आग्रह उचित है? मेरे ख्याल से यह एक ज्यादती ही होगी। विचारधाराएं अपने साझीदारों के साझा आग्रहों से ही पहचानी जाती हैं। मौलिकता के आग्रही लोग अगर विचारधारा से जुड़ते हैं तो उनका मकसद यहां अपनी मौलिकता निखारना नहीं बल्कि एक साझा उद्देश्य के लिए काम करना होता है।

उनकी एक छोटी सी मांग अपनी विचारधारा से इतनी ही हो सकती है कि उनकी कुछ बातें तात्कालिक रूप से साझा उद्देश्य के दायरे से बाहर जाती दिखें तो भी उनके प्रति थोड़ा धीरज बरता जाए, क्योंकि बाद में कभी ये ही बातें इन उद्देश्यों के लिए ज्यादा काम की साबित हो सकती हैं। विष्णु खरे की एक समीक्षा में भाई प्रियदर्शन द्वारा इस्तेमाल किए गए एक मुहावरे का सहारा लूं तो उन्हें विचारधारा के भीतर एक ऐसी तर्क प्रणाली बनाने का प्रयास करना चाहिए कि वे चलना तो जमीन पर ही चाहते हैं, लेकिन थोड़ी गुंजाइश उनकी उड़ान के लिए भी बनाई जाए- और जब-तब थोड़ा-बहुत उड़ लेने के जुर्म में उन्हें मार गिराने की मेहरबानी तो न ही की जाए!

अब इसका क्या करें कि आज के समय में विचारधारा के बाहर, या उसकी परिधि पर खड़े ऐसे तीरंदाजों की ही भरमार हो गई है, जो 'मोर लॉयल दैन द किंग' का उद्घोष करते हुए उड़ने का सपना भर देख रहे परिंदों को भी अपना निशाना बनाकर खुद को तीसमार खां साबित करने में जुटे हैं!

6 comments:

Priyankar said...

श्रीमान खांमखां के इस हस्तक्षेप की बहुत दिनों से प्रतीक्षा थी . आभार !

अनिल रघुराज said...

गहरा और संतुलित विश्लेषण। वैसे, तीसमार खां लोग ही ज्यादा उछलते-कूदते हैं। बाकी लोग तो सोच और कर्म में ठंडा-ठंडा, कूल-कूल चल रहे हैं। कहीं से कोई उनके बारे में जोर से बोल देता है, तो ज़रूर चिहुंक जाते हैं। वरना, आत्मनिर्भर किसान अर्थव्यवस्था से जुड़ी सोच की मस्ती गजब की है।
होली है। होली मुबारक...

swapandarshi said...

"जब मैं मुख्यधारा से अलग मत को संदेह की दृष्टि से देखने की प्रवृत्ति को आचार-व्यवहार के बजाय दर्शन से जुड़ा सवाल कहता हूं तो इससे मेरी मुराद यह है कि कम्युनिस्ट विचारधारा में जाने-अनजाने 'व्यक्तिवाद' को कम्युनिस्ट संगठन और आंदोलन विरोधी किसी खलनायक का सा दर्जा हासिल हो गया है, जबकि कला, साहित्य, विज्ञान या सोच-समझ के किसी भी सीमावर्ती दायरे में कोई बुनियादी काम एक स्तर के व्यक्तिवाद के बगैर संभव ही नहीं है।"

बहुत अच्छी तरह से एक बडे सवाल को आपने बडी समझदारी से उठाया है. इस तरह की खामखां की बहुत ज़रूरत है. एक बडा जनवादी तबका, भी प्रतिबद्ध विचारधारा से इसीलिये अलग रहता है.

और प्रतिबद्ध् जन बहुतायत मे इस प्रिष्ठ्भूमी से आते है कि उनकी "प्रोफेसनल ट्रेनिग" नही होती. पूंजीवादी व्यवस्था मे घिसकर भी दुनिया की जो समझ बनती है, उससे उनकी वाक़िफियत नही होती. खास्तौर पर नये प्रतिबद्ध मौलवी, दो चार किताबे और लगातार एक घेरे की बहसो मे उलझे रहने के कारण, वो हाथी की सुन्ड को पूरा हाथी समझ लेते है, और सज़दे मे दुहरे हुये जाते है.

शिरीष कुमार मौर्य said...

चन्दू भाई आपने टोका तो मैंने अपने उस शब्द का फिसलना देखा ! फिलहाल उसे हटा दिया ब्लाग से! दुबारा रिव्यू करूंगा ! आपकी किताब इतनी रात गए मेरे पास है और खुशी है कि मेरे पास है। बिल्कुल चेतन के शोकनाच की तरह ! मेरा सलाम !

जोशिम said...

गूढ़ प्रश्नों से दूर - आज होली की शुभ कामनाएं - सपरिवार - सादर - मनीष

arvind mishra said...

धारदार !