Tuesday, March 11, 2008

खीर वाले मजनूं

भाई रामजी राय अक्सर खून वाले मजनूं और खीर वाले मजनूं का हवाला दिया करते थे। ये लोग कौन थे, इसका ब्योरा कभी उनके मुंह से सुनने को नहीं मिला, लिहाजा मतलब भी कभी ठीक से समझ में नहीं आया। हर किस्म के मैनरिज्म की आलोचना इरफान का सहज स्वभाव है लिहाजा रामजी भाई का यह मुहावरा भी अक्सर उनके निशाने पर आता था। अगली तरफ से इसकी कोई सफाई न आने पर अपनी समझ से उन्होंने इस मुहावरे का यह अर्थ भी लगा लिया था कि खून वाले मजनूं किसी मकसद के लिए आगे बढ़कर अपना खून देते रहे होंगे, जबकि खीर वाले मजनूं उसके नाम पर, या शायद मकसद पूरा होने की खुशी में खीर खाते रहे होंगे।

मेरे लिए यह सिर्फ रामजी राय के मैनरिज्म का एक हिस्सा था और इसपर दिमाग लड़ाना कभी मुझे जरूरी नहीं लगा। बाद में जब अपने आंदोलन में या इसके इर्द-गिर्द मौजूद खीर वाले मजनुओं से मुलाकात होनी शुरू हुई तो इस तरफ ध्यान गया, लेकिन तबतक समय काफी गुजर गया था। जिन प्यारे-प्यारे कमासुत बंदों ने कभी बिना किसी ठोस फायदे के आंदोलन के लिए अपने पसीने की एक बूंद भी न खर्ची हो, पता नहीं कैसे वे ही महत्वपूर्ण मंचों पर आंदोलन का प्रतिनिधित्व करते पाए जाते थे!

अगर आप विचारों और अनुभवों को आत्मिक स्तर पर लेने के आदी हैं, आपका होना या न होना उनपर निर्भर करता है तो आप ऐसे लोगों के बारे में ज्यादा सोचकर मृत्युपथगामी होने के लिए ही बाध्य होंगे। रास्ता सिर्फ एक बचता है। आप चुपचाप अपना काम करें और इन्हें अपने हाल पर छोड़ दें।...और जब लगे कि अब चुपचाप अपना काम भी नहीं कर पाएंगे, तो वह रास्ता ही छोड़ दें। बिल्कुल अकेले पड़ जाने की हिम्मत लेकर आगे बढ़ें, इस भरोसे के साथ कि आपका नया रास्ता उतना जगर-मगर भले न हो लेकिन यह सच्चा रास्ता है, अच्छा रास्ता है।

हबीब-पेंटल की गाई अमीर खुसरो की कव्वाली 'बहुत कठिन है डगर पनघट की' में आई एक लंतरानी बताती है- 'ये दुनिया मंडी है, हर चीज़ यहां बिक जाती है/ या ख़ुदा ख़ैर है कि तू पर्दे में है, वर्ना तुझको भी बेच देती ये दुनिया'। यह बात मार्क्स के यहां और भी जबर्दस्त मिसालों के जरिए दर्शाई गई है। कैपिटल के पहले अध्याय में माल-मुद्रा-माल के गतिपथ पर विचार करते हुए कार्ल मार्क्स बाइबिल बेचकर शराब खरीदने की प्रक्रिया की चीरफाड़ बिल्कुल तटस्थ होकर करते हैं। भविष्य में इस कैंड़े की कोई और किताब अगर किसी ने लिखी तो शायद उसमें मार्क्सवाद या दूसरी वैचारिक प्रतिबद्धताएं बेचकर की जाने वाली कमाई की वैचारिकी भी मौजूद हो।

मेरे लिए तब भी और अब भी, किसी व्यक्ति को आंकने का अकेला पैमाना उसकी जेनुइनिटी का ही रहा है। आप अगर कहते हैं कि रंडीबाजी आपका शौक है तो आपकी बात की सच्चाई मैं आपकी बातें सुनकर या रंडीबाजी के बारे में आपके लिखे लेख पढ़कर नहीं जान पाऊंगा। इसकी संभावना बहुत काफी है कि आप मन ही मन सीताराम-सीताराम कहते हुए सिर्फ कुछ हजार रुपये कमा लेने के लिए इस तरह के लेख लिख रहे हों या महफिलों में ऐसी बातें करके जेनुइन रंडीबाजों के दायरे में अपना रसूख बढ़ाने की कोशिश में हों।

आपकी सच्चाई जानने के लिए मैं दो-चार दिन यह पता करने में खर्च करूंगा कि रंडीबाजी के लिए आपने अभी तक क्या-क्या छोड़ा है और आगे क्या कुछ छोड़ने के लिए तैयार हैं। अगर मुझे इत्मीनान हो गया कि आपकी बातों की कुछ अंतर्वस्तु भी है तो मैं आपको जेनुइन रंडीबाज समझूंगा और मेरे दिल में आपके लिए एक जगह बन जाएगी। अपने एक सहकर्मी अनिल सिंह पर यहीं लिखी गई मेरी श्रद्धांजलि 'एक घोषित वेश्यागामी की मौत' इस बात का प्रमाण है कि मैं झूठ नहीं बोल रहा हूं।

इसके बरक्स अगर आप हर रोज मुझे क्रांति के बारे में ही फूं-फां करते दिखाई दें, चिली और पेरू से लेकर फिलस्तीन तक पर इंटरनेट से मारी गई सामग्री चेप-चेप कर अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता का ढिंढोरा पीटते रहें तो पहली नजर में ये सारी चीजें मेरे लिए सिर्फ आपकी मुद्राएं हैं। आपकी एक दुकान है, जिसपर फलां-फलां चीजें बिकती हैं। लेकिन इस बाजार में आपसे कहीं ज्यादा इन्हीं चीजों की और भी दुकानें मौजूद हैं, मुझे जरूरत हुई तो मैं वहां क्यों नहीं जाऊंगा? हां, किसी खास वैराइटी में आपका माल सबसे ज्यादा अच्छा हुआ तो आपके यहां आने से भी कोई मनाही नहीं है।

एक बार फिर दोहरा दूं कि इसके लिए आपके प्रति मेरे मन में कोई मैल नहीं है। मेरे लिए आप एक जेनुइन दुकानदार हो, अपना माल मेहनत से बेचते हो, उससे होने वाली कमाई के एक-एक पैसे का हिसाब रखते हो। इसमें लोचा सिर्फ तब होता है जब आप किसी को विचारधारा या भरोसे के नाम पर खींचकर अपने यहां लाते हो और फिर टके के भाव में उसकी कही गई बातों की कीमत लगा देते हो। शायद यह आपके और भी ज्यादा जेनुइन दुकानदार होने का परिचायक हो। इस नतीजे तक पहुंचने में मुझे समय लगेगा, लेकिन इसके बाद भी आप मेरे लिए कोई खलनायक नहीं, सिर्फ एक कैरेक्टर होगे, जिसपर कभी लिखकर मुझे अच्छा ही लगेगा।

इत्मीनान रखें, आपके उकसावे के ट्रैप में इतनी आसानी से मैं नहीं आने वाला। मेरी नजर में एक खलनायक, एक बुरा आदमी बनने के लिए आपको वाकई मेहनत करनी पड़ेगी। आप बहुत सारे लोगों को नुकसान पहुंचाएंगे तो धीरे-धीरे मैं आपको बुरा आदमी मानने लगूंगा। इसकी परिणति यह तो कतई नहीं होगी कि किसी दिन पिस्तौल लेकर मैं आपके घर पहुंच जाऊं- इसकी इजाजत मैं खुद को सिर्फ आत्मरक्षा की स्थिति में देता हूं। अभी तो जो प्रक्रिया चल रही है, उसका नतीजा सिर्फ यह होगा कि धीरे-धीरे करके एक दिन आप मेरे चित्त से उतर जाएंगे।

23 comments:

Pramod Singh said...

खीर से मन भर जाये तो खैनी मलने के लिए इसकी संगत कर लेना..

चंद्रभूषण said...

इसकी यानी किसकी? कुछ तो खुली नहीं रहा।

Pramod Singh said...

कॉपी-पेस्‍ट में हम लरबराये होंगे (कहां-कहां नहीं लरबराते?).. खैर, खैनी की तरह पिटने के लिए यहां ट्राई मारो..

vimal verma said...

"इत्मीनान रखें, आपके उकसावे के ट्रैप में इतनी आसानी से मैं नहीं आने वाला। मेरी नजर में एक खलनायक, एक बुरा आदमी बनने के लिए आपको वाकई मेहनत करनी पड़ेगी। आप बहुत सारे लोगों को नुकसान पहुंचाएंगे तो धीरे-धीरे मैं आपको बुरा आदमी मानने लगूंगा।" बहुत सही लिखा है चन्दू जी आपने...बहुत सटीक...

swapandarshi said...

बहुत अक्छा लिखा है आपने. खीर वाले मजनू ही आगा-पीछा देखे बिना फट से तमगे बांटने मे लगे रहते है.

swapandarshi said...
This comment has been removed by the author.
अनिल रघुराज said...

चंदू भाई, इसे धोबियापाट तो नहीं कह सकता। लेकिन अच्छा है। मगर कुछ लोग इतने थेंथर होते हैं कि उन पर कोई फर्क नहीं बनता। वो पढ़ेंगे और फिर इसमें से कुछ बेचने का मसाला खोज लेंगे।

यशवंत सिंह yashwant singh said...

Adbhut hai Chandu Bhayi... aapne bina kahe sab kah diya. mai aap ke likhe ko baar baar padh raha hun taaki kuchh sikh sakun. jeevan me utaar sakun. shukriy, shandaar tarike se apni baat kahne ke liye.
yashwant

अनूप शुक्ल said...

बहुत अच्छा लगा यह लेख पढ़ना! शानदार। खासकर ये इत्मीनान रखें, आपके उकसावे के ट्रैप में इतनी आसानी से मैं नहीं आने वाला। मेरी नजर में एक खलनायक, एक बुरा आदमी बनने के लिए आपको वाकई मेहनत करनी पड़ेगी।

Pratyaksha said...

"अभी तो जो प्रक्रिया चल रही है, उसका नतीजा सिर्फ यह होगा कि धीरे-धीरे करके एक दिन आप मेरे चित्त से उतर जाएंगे।"

इससे शायद किसी को फर्क नहीं पड़े लेकिन बात सोलह फी सदी सही और यही काफी ।

चंद्रभूषण said...

प्रत्यक्षा आप शायद सोलह आने या सौ फीसदी में से कोई एक चीज कहना चाह रही होंगी। अन्यथा बताइए कि बाकी चौरासी फीसदी यह क्या है?

शेष said...

सीपीआईएमएल की पृष्ठभूमि भी जिस आदमी की जुबान से "रंडीबाज" जैसे शब्द नहीं उतार सकी, उससे और उम्मीद भी क्या की जाए। "चित्त से उतारने और चढ़ाने" की बात आप जैसे ही भूदेव कर सकते हैं जो आज भी अपनी सामंती ढांचे से उबर नहीं सके हैं। सामंती अवशेषों से सज्जित ठेकेदारी की यह भाषा किस कुंठा से निकल रही है? क्या यह रस्सी के जल जाने के बाद का ऐंठन है?
फिलीस्तीन का सवाल आपके लिए एक "माल" है। शर्म नहीं आती मगर! सिर्फ इसलिए कि दिखावे की क्रांतिकारिता के पीछे छिपी कुंठा पकड़ में आ गई।
निजी खुन्नस में भी थोड़ा तो धीरज रखो भाई लोगों। इतना नीचे न उतरो कि एक दूसरे का चेहरा भी देखने लायक न रहो। आपकी "शामिल बाजा" में शामिल होने वालों के साथ जरूर सहानुभूति है क्योंकि उनकी जड़ें साफ दिखाई देती हैं।

सांस्कृतिक प्रतिरोध said...

चंद्रभूषण जी...इतनी गाथा किसे सुना रहे हैं.बातबात में क्रांति के लिए पसीना बहाने की आपकी आदत से आपके भौंड़े क्रातिकारिता पर शक होने लगा है। क्या क्रांति ने यहीं सिखाया आपको कि रंडीबाजी एक कारोबार है। कि आप चित्त से उतारेंगे, कि आपको फिलिस्तीन, पेरू का जनयुद्ध महज इंटरनेट से किया हुआ कोई कॉपी पेस्ट लगेगा। यह कैसे आपकी फर्जी आदर्शवादिता औऱ मौलिकता पर चोट करता है? वैसे हमने इस पोस्ट में आपकी मौलिकता देख रहे हैं। जरा फिर से तो पढ़िए अपना लिखा...और बहुत ठंडे दिमाग से सोचिए कि आपने व्यक्तिगत आक्षेपों के चक्कर में एक शानदार गुजारे गए जीवन को दांव पर लगा दिया।
ताल से ताल मिलाने वालों को छोड़िए.उनकी दुकान और मकान के किस्से कौन नहीं जानता..

चंद्रभूषण said...

इतने प्यारे-प्यारे बच्चों के मुंह से इतनी अच्छी-अच्छी बातें सुनकर लू-लू-लू-लू करने का दिल करता है। बाई द वे, यह पंक्ति किस सामंत की लिखी हुई है-'बड़री मार कबीर की, चित से देय उतार'? और रंडीबाजी के बारे में मार्क्स की लिखाई पढ़ने का मौका न मिला हो अबतक, तो फोन करके पूछिएगा, स्रोत बता देंगे। हां, आपका यह एतराज वाजिब हो सकता है कि यह प्रॉस्टीट्यूशन का हिंदी अनुवाद नहीं है। दरअसल, अंग्रेजी ही नहीं, किसी भी यूरोपीय भाषा में ठीक-ठीक इस वजन का कोई शब्द नहीं मिल पाता क्योंकि मूल पाप की धारणा की तरह इसका दोष पूरी तरह वहां स्त्री के ही सिर पर थोप दिया गया है। फिलस्तीन, पेरू वगैरह माल नहीं हैं, लेकिन इनका ट्रीटमेंट दुनिया भर के अवसरवादी तत्व माल की तरह करते रहे हैं। अगर आप वाकई इतने ही मूर्ख हैं कि इस तरफ किया गया इशारा आपकी समझ में नहीं आ रहा है, तो जैसी कहावत है, इस बीमारी का इलाज हकीम लुकमान के पास भी नहीं था।

सांस्कृतिक प्रतिरोध said...

बच्चा या बच्ची जैसे तुक्के मारते रहिए लेकिन आपका मन लू और लू करने के लिए करेगा... क्योंकि बाकी चीजें आप पोस्ट पर कर चुके हैं। रही रंडीबाजी का अर्थ तो लीजिए पढ़िए.... (वैसे न तो मेरे पास फोन है न पीसीओ से करने के पैसे) हालांकि ये एक अलग कांटेक्स्ट में लिखी गई बात है लेकिन रंडीबाजी के बारे में मार्क्स और आपकी समझ के बीच के अंतर को बताने के लिए काफी है।
"Just as woman passes from marriage to general prostitution, [Prostitution is only a specific expression of the general prostitution of the labourer, and since it is a relationship in which falls not the prostitute alone, but also the one who prostitutes – and the latter’s abomination is still greater – the capitalist, etc., also comes under this head. "– Note by Marx

Economic and Philosophical Manuscripts of 1844
अब पेज नंबर मत मांगिएगा...
किसने अवसर का फायदा उठाया है पेरू और फिलिस्तीन जैसे 'माल'के जरिए...आपको शर्म क्यों नहीं आती रटी रटाई बातों को बोलते हुए...अपने किए को जायज ठहराने के ये तरीके अब पुराने पड़ चुके हैं। लेकिन एक चीज जरूर कहूंगी कि अगर आप पॉलिमिक्स ही करना चाहते हैं तो मैं हमेशा तैयार हूं किसी भी स्तर पर बिना घमंड के...

चंद्रभूषण said...

मेरी और मार्क्स की समझ के बीच अंतर क्या है, यह तो बताइए!

शेष said...

अपने प्यारे-प्यारे ताऊ जी की लू-लू-लू-लू कबूल करते हैं। यों भी अपनी महान सांस्कृतिक गाथाएं यही बताती हैं कि बड़े-बूढ़ों की इज्जत करो। यह बिल्कुल स्वाभाविक है कि आप मध्यकालीन हकीम लुकमान का चढ़ाऊ या उतारू चित्त धारण किए रहें या उसी "रंडीबाजी" के गुन गाते रहें। "मूर्खों" से फोन पर बतियाना तो "मूर्खों" का ही काम कहा जाएगा।
मौका मिले तो जरा इस पर मगजमारी कीजिएगा कि (चाहे वह किसी भी रूप में उठाया जा रहा हो) वे कौन-सी वजहें हैं कि फिलीस्तीन का सवाल आपके लिए महज एक माल बन गया है। जानते हैं, इसका सिरा कहां जुड़ता है? एक यथास्थितिवादी ब्राह्मण मन इसी तरह सारे सवालों को खारिज करता है- चाहे वह फिलीस्तीन का सवाल हो, दलितों या स्त्रियों के सवाल हों।
बहरहाल, बेमानी वजहों का गुस्सा इसी तरह की निराशा पैदा करता है। अगर समय पर समुचित तरीके इसका शमन नहीं किया जाए तो पहले यह हताशा में तब्दील होता है, फिर अवसाद में। वह अवसाद बहुत दुखद होता है, अगर किसी के लिए वह माल होगा तो मैं उसके "प्रोसेस" पर सवाल उठाऊंगा। दुनिया की सबसे महान कही जाने वाली किताब भी ठहर जाने की सलाह नहीं देती है। अगर कोई अपनी बात को आखिरी सच और फैसला कह रहा हो तो वह दया के काबिल है क्योंकि यह दंभ बहुत जल्दी हमें हमारी औकात बता देता है।

चंद्रभूषण said...

शेष, इस तरह का कोई सवाल नहीं है, जो पहलू पर न उठाया गया हो, या जिसमें टिप्पणियों के जरिए मैंने दखल न दिया हो। फिर भी आपको ऐसा लगता है तो मैं इस बारे में विचार करने के लिए तैयार हूं। और बारह साल होलटाइमरी के बाद भी लंबी-लंबी बेरोजगारियों के बीच मेहनत-मशक्कत पर टिका खुली किताब जैसा जीवन जीने वाले एक व्यक्ति के शाथ अगर आपको ऐसी बीएसपी नुमा ब्रांडिंग करके ही बात शुरू करनी हो तो फिर कहने-सुनने को क्या बचता है? ध्यान रहे, ये बातें मैं आपको एक स्वतंत्र व्यक्ति मानकर ही कर रहा हूं। अगर आप अविनाश के शागिर्द के रूप में मुझसे बतकुच्चन करना चाहते हैं तो उस बात का व्याकरण कुछ और होगा।

Priyankar said...

चित्त से जो उतरे सो उतरे,आप तो चढ गए हैं चित्त में .कितने लोग लिख सकते हैं इतना साफ-सुथरा,सार्थक और सटीक ?

वैसे तो(प्रमोद भाय की शब्दावली में कहूं तो) यह लरबराने और लरबराते रहने का महान लबरा समय है . सब लरबरा ही रहे हैं .

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