Saturday, March 1, 2008

सागर किनारे हताशा फुंकारे

जोसफ स्टालिन का एक मशहूर बयान है- एक आदमी की मौत ट्रेजेडी है लेकिन एक करोड़ लोगों की मौत सिर्फ एक आंकड़ा है। इस बयान में तानाशाही की एक सैद्धांतिकी भी प्रतिबिंबित होती है, लेकिन वह एक अलग मामला है। मौतों के मामले में आंकड़ों का इस्तेमाल मुझे हमेशा ही विचलित करता रहा है और आत्महत्याओं के मामले में तो एकबारगी इसकी कल्पना करना भी कठिन है। लेकिन हाल में आत्महत्याओं पर काम करते हुए कुछ ऐसे आंकड़ों से साबका पड़ा, जिनसे नजर हटाना नामुमकिन है।

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो द्वारा हाल में जारी सन् 2006 में हुई आत्महत्याओं के आंकड़ों में विभिन्न राज्यों का जो आत्महत्या घनत्व (एक लाख की आबादी पर आत्महत्या करने वाले लोगों की संख्या) दिया हुआ है, वह एक तथ्य की तरफ निर्विवाद रूप से इशारा करता है कि समुद्रतटीय राज्यों में यह बाकी राज्यों की तुलना में बहुत ज्यादा है।

राष्ट्रीय स्तर पर यह औसत 10.5 का है, जो पिछले कई वर्षों से लगभग एक-सा ही चला आ रहा है। लेकिन जरा राज्यों और केंद्र शासित क्षेत्रों से जुड़ी संख्याओं पर नजर दौड़ाइए-

महाराष्ट्र- 14.8, आंध्र प्रदेश- 16.4, दादरा-नगर हवेली- 16.8, गोआ- 17.7, पश्चिम बंगाल- 18.3, तमिलनाडु- 18.9, कर्नाटक- 21.7, केरल- 26.8, अंडमान-निकोबार- 33.6, पॉन्डिचेरी- 50.2

मन में उठी शंकाओं की पुष्टि के लिए अंतरराष्ट्रीय आंकड़े देखे तो पड़ोस के द्वीपीय देश श्रीलंका में आत्मत्याओं का औसत एक लाख पीछे 37 का दिखाई पड़ा।

दुनिया भर में एक आम धारणा बनी हुई है कि भूमंडलीकरण के साथ समृद्धि का विस्तार समुद्र तटीय इलाकों में कहीं ज्यादा संघनित हो रहा है। पूंजी भी दिनोंदिन इन्हीं इलाकों की तरफ खिंची आ रही है क्योंकि राष्ट्रीय उत्पादन का एक बड़ा हिस्सा विदेशों की रवानगी के लिए तैयार किया जाने लगा है। फिर इन इलाकों में इतनी गहरी हताशा की वजह आखिर क्या हो सकती है?

महाराष्ट्र, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश में सूखे और कर्जदारी की वजह से किसानों की आत्महत्या एक नई चीज है। कमोबेश केरल को भी इसी सूची में जोड़ा जा सकता है। लेकिन ऊपर दी गई सूची में तो समुद्र के करीबी देश के लगभग सारे इलाके ही आ गए हैं। क्या रोजी-रोटी की हताशा के अलावा इन इलाकों में ज्यादा आत्महत्या के पीछे कुछ दूसरी वजहें भी काम कर रही हैं, जिनकी तरफ अपनी वैचारिक सीमाओं और आग्रहों के चलते सामाजिक-आर्थिक विश्लेषकों की नजर जा ही नहीं पा रही है?

2 comments:

जोशिम said...

मेरी समझ में ऐसी अवधारणा निश्चित प्रमाणित अभी तक तो न होगी - मनीष [ नज़रे इनायत -
"http://en.wikipedia.org/wiki/List_of_countries_by_suicide_rate" note the map - its looks as if poorer colder countries having statistical reporting have higher suicide rate

अनामदास said...

चंद्रभूषण जी
आंकड़े एक बात बताते हैं और एक हज़ार बातें छिपाते हैं, यह भी अपने आप में एक आँकड़ा ही है. लाइज़, व्हाइट लाइज़ एंड स्टैट्स...