Wednesday, January 2, 2008

मर्चीसन मेटेओराइट और जीवन की गुत्थी

दिल्ली से अपनी अनुपस्थिति के दौरान अभय तिवारी के ब्लॉग निर्मल-आनंद पर आई मर्चीसन मेटेओराइट के बारे में एक दिलचस्प टिप्पणी पढ़ी। इस उल्कापिंड में पाए गए अमीनो एसिड इसमें पहले से मौजूद थे या धीरे-धीरे करके ये धरती से ही उसमें पहुंच गए, यह एक ऐसी बहस है, जिसके बारे में निर्णायक तौर पर कुछ नहीं कहा जा सकता। यह बहुत सूक्ष्म मात्रा में मौजूद कुछ रसायनों के गुण-धर्म के परीक्षण का मामला है, जिसमें गलतियों की गुंजाइश बनी रहेगी। अगर इन अमीनो एसिड्स के बाहर से आने की बात शत-प्रतिशत सही भी साबित हो जाए तो इससे कोई नई बात शायद ही सिद्ध हो।

कार्बन, नाइट्रोजन और हाइड्रोजन से बनी जटिल रासायनिक संरचनाओं की पुष्टि पुच्छल तारों और अन्य आकाशीय पिंडों में पहले भी की जा चुकी है। संभव है, यह श्रृंखला कहीं बहुत लंबी होकर व्यवस्थित प्रोटीन अणुओं का आकार भी ले ले, लेकिन इसे आधार बनाकर भी जीवन के उदय के बारे में कोई पक्की बात नहीं कही जा सकेगी। असली सवाल पहली बार अजैव पदार्थ से जैव पदार्थ बनने का है, जिसके लिए कोशिका भित्ति नुमा एक ऐसा ढांचा चाहिए जो एक साथ इतना खुला भी हो कि बाहर से जरूरी लेकर भीतर से गैरजरूरी चीजें बाहर करता रहे और साथ में इतना बंद भी हो कि डीएनए जैसे विशाल अणु को साढ़े चार अरब साल, यानी अभी तक- और न जाने कब तक- बैक्टीरिया, काई-सेवार, पेड़-पल्लव, बिच्छू, गोजर और इन्सान जैसे अनंत रूपों में जारी एक लगभग अंतहीन यात्रा पर निकल पड़ने का आधार तैयार कर लेने दे।

नवीं कक्षा में हम लोगों ने स्टैनली मिलर के प्रयोग के बारे में पढ़ा था, जिसमें उन्होंने धरती के प्रारंभिक वातावरण में मौजूद आधारभूत पदार्थों- हाइड्रोजन, कार्बन डाइ ऑक्साइड, मीथेन, अमोनिया और जलवाष्प को एक रिटॉर्ट में लेकर उनके लगातार गतिशील रहने की और इस मिश्रण में कई दिनों तक बिजली कड़कने की तरह इलेक्ट्रिक स्पार्क छोड़ते रहने की व्यवस्था की थी। कई दिनों बाद रिटॉर्ट से एक लाल रंग का द्रव प्राप्त हुआ, जिसमें अमीनो एसिड जैसे कई लंबे और जटिल कार्बनिक अणु मौजूद थे। उससमय इसे जीवन के रासायनिक उद्भव के प्रत्यक्ष प्रमाण की तरह देखा गया था। यह शायद एंगेल्स के 'डायलेक्टिक्स ऑफ नेचर' लिखने के बाद की बात है, क्योंकि जहां तक ध्यान पड़ता है, इस किताब में जीवन के उद्भव के बारे में सिर्फ एक प्रयोग का जिक्र है, जिसमें अंडे में पाए जाने वाले पदार्थ अल्बूमिन के विकास पर कुछ काम किया गया था।

निश्चय ही जीवन के उदय का मामला बड़े कार्बनिक अणुओं की उत्पत्ति की तुलना में कहीं ज्यादा उलझा हुआ है। बीच में कोई बहुत बड़ी फांक है, जिसे पाटने का काम आज भी उतना ही अधूरा है, जितना एंगेल्स के समय था। इसके थोड़ा-बहुत करीब कोई है तो मेरे ख्याल से वे इल्या प्रिगोजिन ही हैं, जिनका जिक्र कुछ समय पहले मैंने अपनी एक पोस्ट में किया था।

स्वप्नदर्शी ध्यान दें, अर्न्स्ट मेर के प्रति पूरे सम्मान के बावजूद मैं यहां कहना चाहूंगा कि दर्शन के लिए- चाहे वह भाववादी हो या पदार्थवादी- यह समस्या जीव विज्ञान और कार्बनिक रसायन शास्त्र की तुलना में कहीं ज्यादा उलझी हुई है। दर्शन में बुनियादी श्रेणियां दो ही हैं- आत्म और अनात्म की। यानी वह जो प्रेक्षण करता है और वह जो प्रेक्षित होता है। रेने देकार्त को भूल जाइए। उनके लिए तो प्रेक्षक का दायरा इस हद तक मनुष्य-केंद्रित था कि कुत्ता भौंकने वाली मशीन हो जाता था, और उनके दूसरे जोड़ीदार खुद को इस बहस में ही मुब्तिला रख लेते थे कि स्त्रियों में आत्मा होती है या नहीं। छोटे से छोटे बैक्टीरिया या प्रोटोजोआ के लिए भी यह बात उतनी ही सही है, जितनी इन्सान के लिए कि वह अपने इर्द-गिर्द की चीजों का प्रेक्षण करता है और उनके बीच अपने और अपनी प्रजाति को जिंदा रखने का रास्ता बनाता है।

जब हम पदार्थ से जीवन की रचना की बात करते हैं, ठीक उसी बिंदु पर आत्म और अनात्म के विभाजन पर टिका दर्शन का बुनियादी द्वैत ध्वस्त हो जाता है। दर्शन के लिए एक नई भाषा की जरूरत महसूस होने लगती है। यह समस्या गणित और भौतिकी के दायरे में तो आती है, लेकिन जीव विज्ञान ने उतनी शिद्दत से शायद अभी तक खुद को इससे संबोधित ही नहीं किया है। अर्न्स्ट मेर की किताब में आई 'इमर्जेंस' की प्रस्थापना अत्यंत महत्वपूर्ण है और उसपर कभी बाद में विस्तार से बात करना चाहूंगा, लेकिन यहां मामला इमर्जेंस का नहीं, क्रिएशन का है- जिसके पृथ्वी पर रासायनिक उद्भव के बारे में कोई पक्की बात तभी कही जा सकेगी, जब पृथ्वी से इतर किसी अन्य स्रोत से कोई कोशिकीय संरचना या उसका जीवाश्म प्राप्त कर लिया जाए। कोई जरूरी नहीं कि इससे पहले किसी नतीजे पर पहुंचकर ही बात को आगे बढ़ाया जाए।

5 comments:

अजित वडनेरकर said...

चंदूभाई , मज़ा आ गया । निर्मल आनंद से ज्यादा मज़ा यहां आया। (अभय भाई , बुरा न मानें..) वहां तो करीब करीब एलियंस की आमद की पटकथा की पूर्वपीठिका तैयार हो रही थी। इसीलिए प्रत्यक्षाजी के मन में भी यही सवाल उठा कि वे आ रहे हैं क्या।
मगर आपने बहुत जोरदार ढंग से इश्के-हक़ीकी को बयान कर दिया। बहरहाल, जीवन यहां कैसे और ब्रह्मांड में कहां कहां जैसी चिंताओं से बड़ी चिंता तो यही है कि हम यहां कब तक ? कमबख्त लोन स्कीमों के चलते कितनी गाड़ियां सड़कों पर आ गई है? कितने नए अख़बार और शुरु हो रहे है , कहां से आएगा पल्प? कटेंगे पेड़ ?
नींद हराम हो चुकी है रातों की...

swapandarshi said...

जीवन की गुथ्थी इतनी आसान नही है, अभी बहुत कुछ जानना बाकी है. एर्नेस्त मेयर की किताब जिसका ज़िक्र मेने कुछ् दिन पहले दिया था, वो भी 10 साल पुरानी है, पर जीव विग्यान के दर्शन पर लिखी अच्छी व सरल किताब है, एक एतिहासिक प्रिस्ठ्भूमी की समझ के लिये.
पिछ्ले 10 सालो मे बहुत से नये आयाम जुडे है, नयी खोजे आयी है, अगर आप लोगो को और हिन्दी ब्लोग के पाठ्को को इस विशय मे रूची हो तो इसे आगे बढाया जा सकता है.

दिलीप मंडल said...

मेरे बेटे को भी जानना है कि दुनिया में जिंदगी कैसे आई। बहुत परेशान करता है और मैं विकीपीडिया देखने की सलाह भर दे देता हूं।

चंद्रभूषण जी, आपके पास तो किताब का मसाला बीज रूप में मौजूद है। ब्लॉपर सीरीज और फिर किताब! क्या बात है! मुझे आपके लिए की गई अपनी इस कल्पना से मंत्रमुग्ध होने की इजाजत दीजिए।

अभय तिवारी said...

बात को आगे बढ़ाया जाय.. यह ज़रूरी है.. हिन्दी में वैज्ञानिक लेखन का वैसे भी घनघोर अभाव है..

Pramod Singh said...

ओहोहो, भूमिका का एक छोटा, संक्षिप्‍त पहलू मात्र? आगे? जल्‍दी, जल्‍दी, जल्‍दी? मैं विज्ञान कुछ नहीं समझता, कितना डरना शुरू करूं?