Friday, October 19, 2007

चलो सखि मेला देखन जाएं

अपने गांव-खानदान में किसी की लिखी जो एकमात्र रचना मुझे याद है उसका संबंध विजयदशमी से है। यह इस प्रकार है-

छहर-छहर छहरात है, सीस मध्य घहराय
पट-पट पट-पट सब्द सुनि लोग गए घबराय।
लोग गए घबराय देखि पनहीं की मारी
चली बात चहुंओर डुबन को आई नारी।
कह उग्रह महराज भयो अतिसय उतपाता
बाभन चला पराय पकरि पुनि खायहु लाता।

रचना से साफ जाहिर है कि इसका संबंध किसी अमूर्त भावबोध से न होकर किसी घटना विशेष से है। अब से कोई सत्तर-पचहत्तर साल पहले विजयदशमी के दिन हमारे गांव में पड़ोस के गांव से राम-लक्ष्मण-सीता बनने आए बालकों में से किसी एक को यह मौका नहीं मिल सका तो खीझकर वह गाली-गलौज पर उतारू हो गया। यही नहीं, बात-बात में वहीं पड़ी किसी की चप्पल उठाई और सज रही त्रिमूर्ति पर उसे फेंक कर भाग खड़ा हुआ।

गांव के कुछ उत्साही बालकों ने दोषी बालक को पकड़कर उसी चप्पल से पीट दिया। यह खबर जब उसकी मां तक पहुंची तो वह दौड़ी हुई घटनास्थल पर आ गई और कुएं में डूबकर मर जाने की धमकी देने लगी। बुजुर्गों के प्रयास से किसी तरह मामला शांत हुआ लेकिन इसे बाजी पलटना जानकर दुष्ट बालक कोई ज्यादा बड़ी शरारत कर बैठा। फिर क्या था, लोगों ने उसे दुबारा पकड़ा और इस बार उसकी पिटाई भी ज्यादा कायदे से हुई।

और जगहों का पता नहीं लेकिन हमारे गांव में बहुत पहले से विजयदशमी के दिन मेला लगता आ रहा है। इसके दो-तीन दिन बाद, रात के वक्त बाकायदा मंच बनाकर और वंदनवार सजाकर भरत-मिलाप भी होता है, लेकिन यह किसी साल होता है, किसी साल नहीं होता। बाद में जब बाजार फैलते-फैलते गांव के नजदीक तक आ गया तो इस छोटे-से मेले का महात्म्य भी कम हो गया। लेकिन जब पक्की सड़क नहीं बनी थी, आने-जाने के साधन कम थे, बाजार छोटा था और दुकानें भी वहां दो-चार ही हुआ करती थीं तब इस मेले का रुतबा ही कुछ और था।

बच्चों के लिए यही एक दिन हुआ करता था, जब उनसे कोई पूछता नहीं था कि वे कहां जा रहे हैं और कितनी देर में लौटेंगे। छितरे पेड़ों वाले एक बड़े से बाग की सुबह से ही सफाई शुरू हो जाती थी। कुछ लोग मंच बनाने में जुट जाते थे, कुछ रावण-कुंभकर्ण का ढांचा बांधने में तो कुछ झंडियां काटने और चिपकाने में। गांव का यही एक आयोजन था जिसमें दलित से लेकर कारीगर और सवर्ण जातियों के अलावा अड़ोस-पड़ोस की चुड़िहार, धरकार, जुलाहा वगैरह मुसलमान बिरादरियों की भी बराबर की भागीदारी हुआ करती थी। सभी लोग बिना कोई ना-नुकुर किए इसके कामों में हाथ भी बंटाते थे, हालांकि ऊंची जातियों के वयस्क जन अपनी आदत के मुताबिक यहां भी हाथ से कोई काम करने के बजाय इधर से उधर टंडैली करते ही नजर आते थे।

पहली बार इस मेले में ही मैंने अपने हाथ से पैसा देकर कोई चीज खरीदी। मां ने मेला देखने के लिए मुझे अठन्नी दे रखी थी। दोपहर से ही मैं इस इंतजार में बैठा था कि कब दुकानें आएं और मैं कुछ खरीदूं। दो बजे के आसपास एक औरत अपने सिर पर मोतीचूर के लड्डुओं की एक दौरी लेकर आई और पेड़ की छाया में बैठ गई। पैसे वाला मैं, अपने साथियों से बिल्कुल अलग-थलग होकर उस खड़ी धूप में किसी मक्खी की तरह उसके बैठते ही उसकी दौरी के इर्द-गिर्द मंडराने लगा।

थोड़ी देर बाद गला खंखारकर मैंने औरत से पूछने की कोशिश की कि एक लड्डू कितने का है। लेकिन आवाज इतनी धीमी निकली कि औरत कुछ समझ नहीं पाई। फिर मैंने अपने प्रश्न का परिमार्जन किया और पूछा कि आठ आने में एक लड्डू दे दोगी? यह सवाल औरत को न सिर्फ सुनाई पड़ गया, बल्कि काफी पसंद भी आया। उसने हथेली बढ़ाई, मैंने उसपर अपनी पूरी जमापूंजी रख दी। और लो, एक नहीं पूरे दो लड्डू उसने उठाए, उन्हें एक कागज पर रखा और मेरे हाथ में थमा दिया।

'मिशन एकॉम्पिल्श्ड' के विजयी भाव में मैंने वह पुड़िया मोड़कर अपनी निकर की जेब में डाल ली और स्कूल की तरफ चला गया। वहां बहुत धीरे-धीरे करके पहले एक और फिर थोड़ी देर बाद दूसरा लड्डू खाया, हालांकि ऐसा करते हुए यह खुटका बराबर लगा रहा कि कोई मित्र टहलता हुआ इस तरफ न चला आए। मेरे ख्याल से इस वक्त मैं सात-आठ साल का रहा होऊंगा।

मेले में मेरी पसंद की जगह मिठाइयों की दुकानें ही हुआ करती थीं लेकिन मेरे बड़े भाइयों समेत मुझसे ठीक आगे वाली पीढ़ी के सारे लड़के पता नहीं क्यों बिसाते वाली गली में मजमा लगाए रहते थे। वहां उन्हें चूड़ी बिंदी टिकुली या चोटी तो खरीदनी नहीं होती थी, फिर ऐसी कौन सी व्यस्तता थी कि वहां से हिलने का वे नाम भी नहीं लेते थे? यह बात ठीक से समझने में मुझे दो-तीन साल और लग गए, हालांकि मेरे मेलहारी शौक में यह कभी शामिल नहीं हो पाया।

दिन में चार-साढ़े चार बजे के लगभग वह होता था, जिसे सभी मेला गरगराना कहते थे। बरफ (बिना क्रीम की आइसक्रीम) बेचने वाले अपना भोंपा बजा-बजाकर, नहीं तो लकड़ी का बक्सा ही उसी के ढक्कन से पीट-पीटकर सबके कान का कचूमर बनाए रहते थे। खिलौने वाले, बिसाते वाले, चाट-पकौड़ी-फुल्की वाले, मिठाई वाले, यहां तक कि मूली-मिर्ची बेचने वाले भी पूरे सुर में कभी अपने सामान की खासियत बताने के लिए तो कभी यूं ही गदर काटकर लड़कियों का ध्यान अपनी तरफ खींचने के लिए हांक लगाने का कोई मौका नहीं छोड़ते थे।

जैसे सबका जीना दुलम करने के लिए इतना शोर कम हो, ठीक इसी समय कुड़मुड़िया, नगाड़ा, ढोल और झाल वाला मेले का अपना खास संगीत भी शुरू हो जाता था। कहने को यह युद्ध संगीत होता था- लड़ाई में उतरी लाल कपड़ों, लाल मुखौटों वाली वानर सेना और काले कपड़ों, काले मुखौटों वाली राक्षस सेना के उत्साहवर्धन के लिए। लेकिन बजाने वालों को इसमें पूरी छूट हुआ करती थी कि वे जो चाहें, जैसा चाहें, बजाएं। इसके एवज में उन्हें थोड़ी-बहुत मजदूरी भी मिलती थी लेकिन असली मजदूरी मेले से झरी वसूलकर पूरी होती थी। झरी, यानी हर दुकान वाला या तो उन्हें अपने सामान में से कुछ दे, या पैसे दे।

अब तक दूर-दूर के गांवों से टोलियां सजाकर गाती हुई औरतों के झुंड मेले में पहुंचने शुरू हो गए होते थे और उनके आते ही मेला बिल्कुल उठान पर आ जाता था। अपने थके पैरों और कानों को राहत देने के लिए पानी पीने या कोई बहाना बनाकर मां से थोड़े और पैसे झटकने घर आ जाओ तो यहां भी जमीन से उठकर आसमान तक पहुंचती मेले की समवेत आवाजें कुछ यूं सुनाई पड़ती थीं जैसे आसपास कहीं मधुमक्खियों का झुंड उधराया हुआ हो।

मेलहारी औरतों के फिलहाल दो ही गाने मुझे याद पड़ते हैं। एक था- भइया ना भेंटायं हो बोहरिया परै मेलवा में। और दूसरा- मचर-मचर करै जुतवा ए सांखी, हमके त भावै रजपुतवा ए सांखी।

ऊंचे खेतों में कहीं-कहीं धान कटना शुरू हो गया रहता और ताल के खेतों में जड़हन धान की बालियां कड़ी होने की तरफ बढ़ रही होतीं। ऐसे में खेत मजदूर औरतों के लिए दोपहर तक घिस-घिसकर नहाने और बाल धोने के बाद सिर में ढेर सारा कड़वा तेल डालकर चोटी में लाल फीता बांधे, माथे पर टिकुली और मांग में गहबर सिंदूर डाले मेला देखने का मजा ही कुछ और था। कटनी में खटने का काम तो कल से करना ही है, आज बेखटके घूम क्यों न लिया जाए। वैसे भी यह लड़कों से ज्यादा लड़कियों का आयोजन था क्योंकि बाजार करने के मौके उनकी जिंदगी में तब कम ही आते थे।

दोपहर से लेकर देर शाम तक लगातार पांच-छह घंटे मेले में पैदल टहलने के बाद घर पहुंचो तो लगता था किसी ने पूरा शरीर लाठियों से थूर दिया हो। फिर किसने क्या खरीदा, यह देखने-दिखाने का सिलसिला भी कुछ देर चलता ही था। लेकिन रसिक जनों के लिए मेला बेचने-खरीदने की नहीं, देखने-दिखाने की भी नहीं, मिलने-मिलाने की जगह हुआ करती थी। वे चाहे युवक हों या युवती, मेले से जो कुछ लेकर घर आए होते थे, उसे लाख अटकलों और चुहलबाजियों के बावजूद उनके सिवाय और कोई नहीं जान पाता था।

6 comments:

अनामदास said...

बिना पइसा के मेला घुमा दिया आपने. लड्डू अकेले खा गए, कोई बात नहीं, ऐसा ही होता है.
और लिखिए, गाँव जवार की बातें, आसरा देखते हैं लोग, अब गाँव जाने की असुविधा उठाए बिना उसका रस मिल जाए तो इससे बढ़िया क्या होगा, हमारा तो गांव ही नहीं है, पता नहीं कहाँ बिला गया, लेकिन जिनका है, वे भी कहां जा पाते हैं. लिखिए
धन्यवाद

Sanjeeva Tiwari said...

बरसों बाद मेला घूमें भाई आपके ब्‍लाग में मजा आ गया ।
धन्‍यवाद

'आरंभ' छत्‍तीसगढ का स्‍पंदन

अभय तिवारी said...

एक बीती हुई दुनिया का मोहक चित्र..

[ आशुतोष ] said...

हमेशा की तरह इस बार भी आपके संस्मरण लाजवाब हैं.

Udan Tashtari said...

बहुत उम्दा रहा भई मेला दर्शन. बधाई.

अनूप शुक्ल said...

बहुत अच्छा लगा मेला का किस्सा! 'टंडैली' पहली बार पढ़ा! शानदार लेख!