Friday, August 31, 2007

दो दिन में कोई टीवी सिखा दे

प्रमोद भाई ने कुछ दिन पहले सीखने को लेकर एक पोस्ट डाली थी। पिछले पांच-सात सालों में मैंने कंप्यूटर और स्कूटर चलाना सीखा, टेबल टेनिस और जैसा-तैसा कैरम, शतरंज खेलना भी सीखा। यही नहीं, बचपन में साइड में खड़े होकर खेले गए वॉलीबॉल को सेंटर जैसी महत्वपूर्ण जगह पर खड़े होकर खेलने लगा। मुझे लगा चालीस पार जाती उम्र में इतना सीखना काफी है लिहाजा उस पोस्ट पर कोई टिप्पणी नहीं की। क्या पता था कि बहुत जल्दी मुझे सांसत में डालते हुए सीखने की एक और जहमत गले पड़ जाएगी।

कल अचानक एक फोन आया कि सोमवार को मैं टीवी के लिए एक टेस्ट देने फलां जगह चला आऊं।

इस माध्यम से मेरी कोई खास वाबस्तगी नहीं है। टीवी देखता ही बहुत ही कम हूं और न्यूज चैनल तो और भी कम। ऐसा किसी दुराग्रह के चलते नहीं है। शुरू में देखता ही था, फिर झेला नहीं गया और धीरे-धीरे देखना बंद हो गया। रात नौ बजे के इर्द-गिर्द ही खबरें देखने का वक्त मिलता है, लेकिन उस वक्त हिंदी के एकमात्र गंभीर चैनल पर कोई पकाऊ बहस चल रही होती है। बाकी चैनल किसी के पिटने, घिर्राए जाने, फूंकने-तापने की तस्वीरें दिखाते रहते हैं। ले-देकर हेडलाइनें देख ली जाती हैं और रिमोट बालक के हवाले कर दिया जाता है।

प्रिंट में, जहां अभी तक नौकरी की गई है, हालत लगातार खराब होती जा रही है। बॉस लोग यह मानकर चलने लगे हैं कि कहीं काम नहीं मिला, इसीलिए बंदा पड़ा है। और पड़ा ही है तो फिर क्या है, देते जाओ दनादन। नौकरी बदलने की कोशिशें- चाहे प्रिंट में मिले चाहे टीवी में- सिरे नहीं चढ़ रही हैं। एक छोटा सा दरवाजा दूसरी तरफ भी खुल जाता तो शायद जीना कुछ आसान हो जाता, यही सोचकर टीवी लाइन के अपने दोस्तों से चिरौरी-मिन्नत चल रही है। एक भाई की कोशिश से मामला यहां तक पहुंचा है कि एक जगह से टेस्ट देने का बुलौआ आ गया है। लेकिन टेस्ट क्लीयर कैसे करेंगे, सोच-सोचकर हाथ-पांव फूल रहे हैं।

अगले दो दिन अपनी तरफ से इस माध्यम के साथ लगाव बढ़ाने की पूरी कोशिश करूंगा। इसकी भाषा और तस्वीरों के साथ उसका मिलान समझने में भी दिमाग लड़ाऊंगा। लेकिन क्या ही अच्छा होता जो कोई मित्र, कोई भाई, कोई बहन इसके लिए कुछ आसान गुर बता देता। ऐसे निजी बातचीत में सबसे पूछ ही रहा हूं, ब्लॉग पर भी डाल दिया है कि जिससे जो भी बन पड़े अठन्नी-चवन्नी....

6 comments:

अनिल रघुराज said...

एक पुराने मित्र ने बताया था कि टीवी न्यूज भौकाल का माध्यम है। जितना भौकाल खड़ा कर सकते हैं, कर दीजिए। यहां काम कम और काम करते हुए ज्यादा दिखाया जाता है। ये गुर सीख लीजिए। बस्स, और कुछ सीखने की जरूरत नहीं है।

Udan Tashtari said...

चंदु भाई

मुझे टीवी पत्रकारिता मे काम का तो अनुभव नहीं है मगर देखकर भी बहुत चीज आदमी सीख ही जाता है.

साहित्य में एक शब्द है: 'अनर्गल प्रलाप' -इसका विस्तार से रियाज करें. मैने तो यही होते देखा है टीवी पर. विश्वास जानिये, काम बना ही समझियेगा तब. :)

अनिल भाई ने जिस 'भौकाल' शब्द का प्रयोग किया है वो भी शायद इसी घोर साहित्यिक शब्द का उत्तरप्रदेशीकरण हो, तो कोई खास आश्चर्य नहीं.

Pramod Singh said...

मैं गुर बताऊं? लेकिन रहने दो नहीं बताता हूं.. बोलोगे सिखा नहीं, फंसा रहा हूं!

संजय तिवारी said...

यह टिप्पणी इसलिए कि आप धर्मपाल के लिखे पर अपनी टिप्पणी को विस्तार देते हुए एक पोस्ट लिखें. आशा है आप दूसरे पहलू पर जरूर कुछ लिखेंगे.

अनूप शुक्ला said...

हमारी शुभकामनायें!

vimal verma said...

आप सब जानते हैं.. इसमें सीखने जैसी कोई बात नही है. बस जबड़े का काम बढ़ जाएगा अगर आप टी वी पर आना चाहते है... अरे गल्चऊर जो करना होगा. नही तो डेस्क पर बैठने का उपाय कीजियेगा...