Monday, July 9, 2007

भीड़ में दुःस्वप्न

शाम का वक्त है

तुम चौराहे पर पहुंच चुकी हो


वहां एक भीड़ जमा हो रही है

तुरत-फुरत कुछ देख लेने के लिए

पंजों पर उचकते हुए लोग

तेजी से आगे बढ़ रहे हैं



पसीजे हुए उनके चेहरे

लैंप पोस्ट की रोशनी में

पीले नजर आ रहे हैं



तुम चौराहे पर पहुंच चुकी हो

और तुम्हें पता है कि

जिसे देखने वे सभी आ रहे हैं

वह तुम हो



जाने क्या सोचकर

तुम नजरें झुकाती हो

और पाती हो कि

एक सूत भी तुमपर नहीं है



दोनों हाथों से खुद को ढकती हुई

बीच चौराहे तुम बैठ जाती हो

....यह धरती ऐसे मौकों पर

कभी नहीं फटती



भीड़ में तुम

कोई परिचित चेहरा ढूंढ रही हो

लेकिन ये सभी तुम्हारे परिचित हैं

तुम्हें ही देखने आए हैं



वक्त बीत रहा है

लोग धीरे-धीरे बिखर रहे हैं

देखने को अब ज्यादा कुछ बचा नहीं है



किसी रद्दी खिलौने सी

तुम दुबारा खड़ी होती हो

किसी से कहीं चले जाने का

रास्ता पूछती हो



...चकित होती हो यह देखकर कि

वह अब भी कनखियों से

तुम्हें देख रहा है



इतने सब के बाद भी

कोई भय तुममें बाकी है

बाकी है कहीं गहरा यह बोध

कि यह अंत नहीं है

अंधेरा गहरा रहा है

और तुम्हें कहीं जाना है

तेज-तेज तुम रास्ता पार कर रही हो

पीछे सभी तेज-तेज हंस रहे हैं


क्या इस सपने का कोई अंत है-

उचटी हुई नींद में तुम मुझसे पूछती हो

जवाब कुछ नहीं सूझता

....बेवजह हंसता हूं, सो जाता हूं।

3 comments:

परमजीत बाली said...

सुन्दर रचना,सुन्दर भाव है।बधाई\


इतने सब के बाद भी
कोई भय तुममें बाकी हैबाकी है कहीं गहरा यह बोध कि यह अंत नहीं है अंधेरा गहरा रहा हैऔर तुम्हें कहीं जाना हैतेज-तेज तुम रास्ता पार कर रही होपीछे सभी तेज-तेज हंस रहे हैं
क्या इस सपने का कोई अंत है- उचटी हुई नींद में तुम मुझसे पूछती होजवाब कुछ नहीं सूझता....बेवजह हंसता हूं, सो जाता हूं।

Udan Tashtari said...

सामाजिक मानसिकता को दर्शाती बेहद मार्मिक रचना. बधाई.

अनूप शुक्ला said...

अच्छी, सोचने को मजबूर कर देने वाली रचना।