Monday, May 7, 2007

खबर कहॉ से बनती है

'बुरी हो चली जगहों पर कुछ अच्छे लोग' - यह एक ऐसा जुमला है, जिसे बिना ज्यादा किच-किच के आप मीडिया ही नहीं किसी भी संस्था पर किसी भी समय जड़ सकते हैं। अभय की चलाई बहस का नतीजा यही निकला, और इसके सिवा निकल भी क्या सकता था। जिससे सवाल पूछे जाने चाहिए वह सवालों से परे है। जो जवाब दे रहा है वह खामखा की कसरत मे उलझा है। बेहतर हो कि ग्राहकों से कार व्यापार की नैतिकता पर बहस करने के बजाय हम सेल्स्मैनों की कनखियों वाली गुफ्तगू की तरह इस बारे मे बात करें कि अपनी खबर लालाओं और उनके खुर्राट लठैतों के मत्थे कैसे मढी जाये। 'अपनी खबर' से मतलब है जो खबर है और जिसे खबर होना चाहिए। एस पी सिंह का काम का तरीका इस मामले मे दिलचस्प था। ढेरों लोकल अखबार लेकर वे उनकी छोटी-छोटी खबरों की कतरनें काटते रहते थे और उन्हीं मे से कुछ को बडे पैमाने पर बेचने लायक बनाने की जुगत भिडाते रहते थे। इस कोशिश मे हफ्ते भर मे दो- तीन ऐसी खबरें निकल ही आती थीं जो खबर के पैमाने पर भी अच्छी होती थीं और बिकती भी थीं। अभी मुश्किल प्रिंट की यह है कि यहाँ नए रंगरूट को दरोगा, एस पी, नेता या अभिनेता के मुह से खबर निकालने को कहा जाता है। यह् काम मोबाइल के इस जमाने मे फोन से भी हो जाता है। हरामखोरी की असली जड़ यहाँ है। टी वी की मुश्किल यह है कि यहाँ खबर दिखानी होती है। यहाँ लोग आते ही उस्ताद हैं। ऊपर से कोई दौडाने वाला ना हो तो यहाँ कुछ भी खेल कैमरा कर डालता है। इसलिये जरूरत नीचे से संभावना शील ख़बरों का कोई वैकल्पिक चैनल बनाने की है। मौका मिल जाये तो गढ़ के ऐसा माल मेज पर रख दीजिए कि बन्दे से निगलते ना बने तो फेंकते भी ना बने।

5 comments:

अभय तिवारी said...

बड़ी पूँजी के इस दौर में ऐसे वैकल्पिक चैनल की सम्भावना कितनी है.. ये विचारणीय है..?

चंद्रभूषण said...

abhay, channel se mera matlab soochnaon ke ek informal dhanche se hai, tv channel jaisi kisi cheej se nahin. reporters ke paas mahanagaron me do-char logon ka ek aisa circle hota hi hai. iska dayra badha diya jaye aur iske beech blog numa ek interface ho to potential khabren nikalna koi mushkil kam nahin hai.

dhurvirodhi said...

देखना कुछ न कुछ हल जरूर निकलेगा. इन्सान बहुत कारसाज है.

अभय तिवारी said...

देखिये कहा कुछ गया.. और समझा कुछ..माफ़ करें.. शायद आपकी बात, रवीश के शब्दों में, बाज़ार खुद लागू कर ही रहा है.. ब्लॉग..जहाँ पर लोग शब्द ही नहीं.. ऑडियो और वीडियो भी चढ़ा रहे हैं.. देखिये कितना समय लगता है.. इन बड़े समाचार तंत्रो को टूटने में..

poetry said...

very good/