Tuesday, May 1, 2007

शाखा कैसे लगाएँ

कुछ समय पहले हमारे मोहल्ले मे संघ शाखा लगनी शुरू हुई। पहले एक दाढ़ी वाले बुजुर्ग सज्जन दिखे, फिर तो सात-आठ लोग आर्मः-दक्शः करते दिखने लगे। संयोग से इनमे कुछ लोग वही हैं जिनके साथ मैं वोलिबाल खेलता हूँ। एक दिन बुजुर्ग ने मेरी तरफ ऊँगली दिखाकर कहा कि मेरी तो इच्छा है कि किसी तरह ये काली शर्ट वाले भाई साहब शाखा मे आयें, सुबह उठने मे परेशानी हो तो हम लोग उठा देंगे । मैंने कहा कि मैं तो साढ़े चार बजे भोर मे ही उठ जाता हूँ । बोले आइये तो थोड़ी कसरत हो जायेगी। मैंने कहा, मैं कसरत भी टहलते वक्त ही कर लेता हूँ। थोड़ी झल्लाहट के साथ उन्होने कहा कि कम से कम प्रार्थना तो साथ मे कर ही सकते हैं। मैंने कहा कि प्रार्थना भी कोई साथ मे करने की चीज है? इसके बाद वे खुद को दूसरे लोगों से बात करने मे व्यस्त दिखाने लगे और मुझमे रूचि लेना बंद कर दिया।
यह बात मैंने अपने एक वरिष्ठ अखबारी साथी को बताई तो उन्होने एक पुरानी खबर और उसे दिए गए शीर्षक का किस्सा मुझे सुनाया। खबर दिल्ली की ही थी । पंजाबीबाग इलाक़े मे एक संघ पदाधिकारी किसी बालक के साथ रँगे हाथ पकड़े गए। मोहल्ले के लोगों ने बाहर से दरवाजा बंद कर दिया और काफी नाटक के बाद पुलिस के दखल से मामला रफा-दफा हुआ। स्ट्रिन्गेर ने खबर भेज दी लेकिन डेस्क पर हेडिंग लगाने वालों कि आफत आ गयी । क्या किया जाये कि बात भी आ जाये और शालीनता भी बची रहे। आखिरकार चीफ सब ने हथौड़े की तरह हेडिंग मारी ' शाखा लगाते पकडे गए संघ प्रचारक '। इसके बाद से अखबार मे शाखा लगाने को लेकर कोई कन्फ्यूजन नही पैदा हुआ।

11 comments:

अनिल रघुराज said...

शाखा लगाते पकड़े गए संघ प्रचारक। कहते हैं, बालकों को प्याज खिलाकर उल्टा सुलाने का नुस्खा भी संघी आजमाते रहे हैं। वर्तमान से मुंह चुराने और अतीत को गरिमामंडित करने की सोच का हश्र इसी तरह की कुंठा में होता है। इसीलिए आप कभी संघियों के चेहरे पर तेज नहीं देख सकते। हमेशा लगता है जैसे किसी अपराधबोध से जूझ रहे हों।

avinash said...

बहुत सही भाई साहब...

अभय तिवारी said...

रोचक कि़स्सा है..
एक स्वयंसेवक की मानसिकता पर लिखी उदय प्रकाश की कहानी 'और अंत में प्रार्थना' मैं कभी भूल नहीं पाता सबसे ज़्यादा विवाद में रहने वाले एक संगठन के सद्स्य को वह जिस मनुष्यता के साथ चित्रित करती है मैं उसका क़ायल हो गया था..पूरे समूचेपन में पकड़ लिया था उन्होने उस चरित्र को..

Neeraj said...

हा हा..

होता है.. ऐसे लोग कई जगह और कई संगठनों में होते हैं. ये सिकंदरियाई संस्कृति के लोगन हैं. इनके दद्दा कहते हैं कि माताओं को अष्टपुत्रवती होना चाहिए. खुद बेचारे ताउम्र कुंवारे रहते हैं. वो याद है ना मुखौटा दद्दा ने कहा था - 'मैं कुंवारा हूं ब्रह्मचारी नहीं'.

बजार वाला said...

ha ha ha ha !! hansi hai ki ruk hi nahi rahi hai.. maja aa gaya..

नटराज said...

यह भी बता दो, कैसे ट्रेने उड़ाई जाती है। कैसे बैंक लूटे जाते है। कैसे अपने ही देश वालो का खुन नक्सली बहाते है।

बजार वाला said...

यार नट राज .. तुम तो दिल पे ले लेते हो. नाराज़ मत हुआ करो यार.. अब रेल गाड़िया तो गुजरात में भी जलाई जाती है और लोग वहाँ भी मारे जाते हैं .. अंतर इतना ही है की एक रोटी के लिए करता है और दूसरा धर्म के लिए , लगता है आपको रोटी की ज़रूरत नही .. तभी आप नाराज़ हो रहे हैं , तभी आपको जलती हुई रेल गाड़िया जल्दी दिखती हैं लेकिन भूख से मरते बच्चे नही .

बजार वाला said...

लगता है कि शाखा वालो से आपको काफ़ी प्यार है नट राज जी महाराज

बजार वाला said...

लगता है कि शाखा वालो से आपको काफ़ी प्यार है नट राज जी महाराज

chashmish said...

sakhawala are finer strategicians than communists, they simply avoid pegnenecy and related social hazzards. hats off for their rectum politics.

Reyaz-ul-haque said...

कुंठा...सही कहा. मार्के की बात है कि नटराज ने इसका खंडन नहीं किया. मतलब शाखाएं इसी तरह लगती हैं. क्यों नटराज जी...?

आखिर महान भारतीय परंपरा के रक्षक जो ठहरे संघी.

हा हा हा...