Saturday, May 26, 2007

दास्तान-ए-ग़ैब-1

सारी बड़ी घटनाओं की तरह इस मामले की शुरुआत भी एक छोटी सी बात से हुई थी। बहुत मोटा, कोई आठ-दस किलो वजन वाला एक शादी का एलबम देखते हुए पैदा हुए एक खुटके से। साल भर पहले हुई उस शादी में प्रकाश खूब धूमधाम से शामिल हुआ था। उसे नाचना बिल्कुल नहीं आता था लेकिन बियर के हल्के सुरूर में दूल्हे की घोड़ी के पीछे मुंह में दस-दस के पांच कर्रे नोट दबाए उसने नागिन की धुन पर जबर्दस्ती डांस करने की कोशिश भी की थी।

उसके साढू के बेटे की यह शादी थी, जो पेशे से आईटी इंजीनियर था और जिसकी एक लाख रुपया महीना से ज्यादा तनख्वाह थी। उसी शादी की सालगिरह पर यह वजनी एलबम उसे देखने के लिए सौंपा गया था।

बड़े धीरज के साथ एलबम का एक-एक फोटो उसने पलटा । उनमें दिखने वाली एक-एक शक्ल के बारे में दिखावटी दिलचस्पी से खूब सारी बातें कीं। लेकिन शादी के एलबम देखने वाले दुनिया के हर आदमी की तरह वह भी इसमें शुरू से आखिर तक दसअरसल अपनी ही तस्वीर ढूंढता रहा। जब आखिरी फोटो भी पलट ली गई और अपना चेहरा उसे नहीं दिखा तो उससे ज्यादा हताशा उसे एलबम दिखा रहे साढ़ू साहब के चेहरे पर फैल गई।

आखिर बात क्या है? वह सोच में पड़ गया था। एलबम में पत्नी दिखीं, बेटा दिखा, बिना किसी अपवाद के सारे रिश्तेदार दिखे। फिर एक आखिर वही इतनी मोटी एलबम के कई सौ फोटुओं में कहीं क्यों नहीं दिखा? अपनी झेंप छुपाते हुए उसने एलबम साढ़ू भाई को सौंपी, लेकिन उतनी ही झेंप में डूबे वह भी उसे ठीक से संभाल नहीं पाए।

फिर तो पूरी ऐनीवर्सरी पार्टी में प्रकाश सामान्य नहीं हो पाया। एक पुराना शक उसे दबोचने लगा। यह पहला मौका नहीं था जब सामूहिक फोटो के किसी बंडल में वह नदारद पाया गया था। इससे पहले स्कूल और कॉलेज की ग्रुप फोटो में भी वह धुंधला और अबूझ सा नजर आता था। यहां तक कि अपना अकेला फोटो खिंचाए तो भी उसमें बहुत घबराया हुआ किसी और का सा चेहरा नजर आता था। कुछ दिन बाद वह फोटो भी कहीं गायब हो जाता था। हालत यह थी चालीस-बयालीस की उम्र में भी अपना कहने को उसके बमुश्किल एक-दो फोटो ही घर में कहीं खोजने पर मिल सकते थे।

'चलो, हार पहनकर सालोंसाल दीवार पर लटके रहने की नियति से तो बचा रहूंगा कम से कम'- एक बार फोटो को लेकर पत्नी की टोकाटोकी के जवाब में उसने यह जुमला बोला था। लेकिन कहीं भीतर से उसे हमेशा लगता रहता था कि उसके साथ कोई प्रॉब्लम है। गुमनामी उसमें बहुत गहरे धंसी हुई है, और इसपर उसका कोई बस नहीं चलने वाला है।

बस स्टैंड या भीड़भाड़ वाली किसी और जगह पर खड़े होकर कोई उसका नाम पुकारे तो दस लोग पलटकर देखने लगते थे। मजा यह कि इतने सारे प्रकाशों में पुकारने वाले को वही सबसे बाद में नजर आता था। इसकी वजह अबतक उसे यही समझ में आई थी कि उसके व्यक्तित्व में चमक कर दिख जाने वाली कोई बात नहीं है और दुनिया के निन्यानबे फीसदी आम लोगों की तरह वह भी एक आम आदमी है।

शुरू में इससे उसे तकलीफ होती थी लेकिन अब उम्र की चढ़ान खत्म होकर ढलान शुरू हो जाने के बाद इसपर दुखी होने का कोई मतलब नहीं रह गया था। बहरहाल, उस दिन पता नहीं ऐसा क्या हुआ कि पिछले दस-पंद्रह सालों में थोड़ा-थोड़ा करके कमाया गया उसका यह आत्मसंतोष दस किलो वजनी वह शादी का एलबम पूरा पलट लेने के बाद अचानक दरक सा गया।

इस घटना के बाद से प्रकाश हर जगह अपनी मौजूदगी को लेकर कुछ ज्यादा ही सतर्क रहने लगा। लेकिन मामला कुछ ज्यादा ही गड़बड़ है, इसका एहसास उसे तीन-चार दिन बाद अपने दफ्तर में हुआ।

उस दिन घर में सुबह-सुबह थोड़ा झंझट हो गया था और उसे बिना टिफिन के ही दफ्तर आना पड़ा। लंच टाइम में भूख ने आदतन जोर मारा तो वह निकलकर पास की एक कैंटीन में चला गया। वहां ब्रेड पकौड़े खाए, चाय पी, जेब से कंघी निकालकर बालों में फेरी, फिर कुछ सोचता हुआ उठा और कैंटीन वाले को दरेरा देता हुआ बाहर चला आया।

शरीर से थोड़ा भारी कैंटीन मालिक उसकी रगड़ से थोड़ा खिसका जरूर लेकिन न कुछ बोला, न ही प्रकाश की तरफ पलटकर देखा।

दफ्तर की सीढ़ियां पूरी चढ़ लेने के बाद प्रकाश को ध्यान आया कि कैंटीन वाले को पैसे तो दिए ही नहीं। इतनी धूप में अब यहां से लौटकर क्या जाएं, पैसे कल दे दिए जाएंगे- ऐसा सोचकर वह अपनी सीट की तरफ बढ़ा लेकिन कैंटीन वाले के व्यवहार को लेकर उसे ताज्जुब लगा रहा।

न तो वह इस दुकान का नियमित ग्राहक था, न दोपहर के वक्त वहां ऐसी कोई भीड़ थी, न ही दो ब्रेड पकौड़े और चाय निपटाने में उसने इतना वक्त लगाया था कि दुकानदार को पैसे आ चुकने की गलतफहमी हो जाए। इसके बावजूद कभी किसी पर चवन्नी न छोड़ने वाले दुकानदार ने उसे इस तरह निकल कैसे जाने दिया?

लेकिन यह तो कुछ भी नहीं था। उसके सचमुच चौंकने और थथम जाने की बारी तब आई जब ऐन वध-काल में उसके दरवाजे से चलकर सीट तक पहुंचने और वहां बैठ जाने के बावजूद खुद उसी पर केंद्रित वध-कार्य में कोई व्यवधान उपस्थित नहीं हुआ।

आदिकाल से उसके दफ्तर में यह परंपरा चली आ रही थी कि लंच के समय जो भी सहकर्मी उपस्थित न होता, उसका बाकी सारे लोग मिलकर भरपूर पराक्रम के साथ वध किया करते थे। मसलन, 'अरे वर्मा जी, भरवां भिंडी लाए हैं क्या? भई क्या बात है, क्या बात है।... और (खाली कुर्सी की तरफ इशारा करते हुए) एक ये हैं साले। जब देखो जुटे पड़े रहते हैं। वही चमचागिरी, वही चमचागिरी। बड़े दरबार से फुरसत ही नहीं मिलती कभी। '

प्रकाश को पता था कि आज गंड़ासे उसी पर चल रहे होंगे। संदेह का कोई कारण नहीं था। भरे मुंह वाली गलगल हंसी की जुगलबंदियों के बीच उसकी कुर्सी की तरफ इशारे भी किए जा रहे थे। उसे पूरी उम्मीद थी कि उसके प्रवेश के साथ ही यह सिलसिला रुक जाएगा, लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। लोगों को जो कहना था, कहते रहे और उठे तो उसकी वजह से नहीं, सिर्फ हाथ-मुंह धोने के लिए।

आखिर चक्कर क्या है? देखकर अनदेखा करने की भी एक सीमा है। अब हजारों फोटो खींचने वाला कैमरा आपकी शक्ल न पकड़ पाए, चाय वाला बिना पैसे लिए चला जाने दे, दफ्तर वाले सामने बैठकर आपका मजाक उड़ाते रहें- यह सब आखिर क्या है?

उसी वक्त प्रकाश के दिमाग ने पहली बार गुलाटी खाई- क्या वह धुंधला होते-होते गायब होने की तरफ बढ़ रहा है? 'मिस्टर इंडिया' बन रहा है, वह भी बगैर किसी गैजेट के!

2 comments:

बजार वाला said...

अरे इतनी जल्दी क्या है ?? इत्ती जल्दी ग़ायब कहे कर रहे हैं , अपने प्रकाश बाबू को थोड़ा घुमाइए , टहलाइए , थोड़ा सा ...बस ज़्यादा नही , और घिस जाने दीजिए , फिर ग़ायब कर दीजिएगा , हम कुछ नही कहेंगे , बर्दाश्त कर लेंगे किसी तरह

बजार वाला said...

अरे कोई तो हमारी बात सुने , हमें अपना बहुमूल्य समर्थन दे , नही तो प्रकाश बाबू ग़ायब हो जाएँगे !!! फिर ना कहियगा की हमने चेताया नही .