Saturday, July 6, 2013

सुअर और खरगोश

सारी प्लानिंग रहने की है
जाने की प्लानिंग करके क्या होगा
बेहतर होगा, इसे बीमा एजेंटों के लिए ही छोड़ दें
बाकी किसी को ऐसी किसी चीज की कोई जरूरत नहीं

जरा सोचिए,
हर कोई अगर सिर्फ अपने रहने के बारे में सोचे
जैसे आठो पहर खतरों से घिरा होने के बावजूद
शहरी इलाके में रहने वाला जंगली खरगोश सोचता है
(आशंका और असुरक्षा के नाम पर
सात पुश्तों के लिए दबाकर रखने की चिंता छोड़ दे)
तो इस दुनिया में हर किसी के पास
जीने-खाने और मजे करने को कितना कुछ होगा

लेकिन खरगोश तो देखते ही मार दिए जाते हैं
जबकि सुअर मीडिया पर अपनी सफलता के गीत गाते हैं
उनकी देखादेखी हम भी सुअर होकर सीनियर बनते हैं
और सातगुना सुअर होकर सुपीरियर बनने के सपने देखते हैं

अफसोस कि मौत भी सबसे पहले उन्हीं को दबोचती है
जिनके अजेंडे पर यह कहीं नहीं होती
सुअरपन के मानक गढ़ने वालों के यहां तो वह पहुंचती है
विलंबित लय और व्यवस्थित ताल में राग दरबारी गाते हुए
जैसे धीरूभाई अंबानी के यहां पहुंची थी
या कभी नारायण दत्त तिवारी के यहां पहुंचेगी

ताकि बाकी सभी मन ही मन उनपर रश्क करें
और पेज थ्री पर छपा सुअर पुराण गाते हुए
उनके ही जैसा बनने की कतार में शामिल हो जाएं

2 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

सबको अपना खाना प्यारा,
गदहे को भी गाना प्यारा।

अनूप शुक्ल said...

सारी प्लानिंग रहने की है
जाने की प्लानिंग करके क्या होगा
बेहतर होगा, इसे बीमा एजेंटों के लिए ही छोड़ दें
बाकी किसी को ऐसी किसी चीज की कोई जरूरत नहीं




सच लिखा!