Saturday, October 23, 2010

एक ईडियट कोलाज

हर मीश्किन एक दिन लेबेदेव बन जाता है
कुछ बुरे सपने फिर भी दोनों को एक नहीं होने देते
होनी को टालने में जिंदगी गुजर जाती है
अनहोनी फिर भी माथे पर दस्तक देती रहती है
आखिर कितने दांव खेलकर बर्बादी टाली जाएगी
ट्रेन में बैठे भिखमंगे की तस्वीर फिर भी सामने आएगी

काली दीवारों वाले बंद अंधेरे घर में
फेफड़ों तक जाती हुई एक मीठी गंध होगी
छुरा होगा सड़ती हुई लाश के सीने में घुंपा हुआ
दो पागल उसके इर्द-गिर्द हथेलियों के दाग छुपा रहे होंगे
फर्श पर पड़ा-पड़ा कहीं और जा चुका होगा प्यार
दुनिया में सिर्फ नस्तास्या फिलिपोव्ना की तस्वीरें होंगी
रात बारह बजे ग्राहकों और दलालों को बराबर से तरसाती हुई

पैसे का चाबुक हाथ में लिए इल्या रोगोजिन होगा
पागलपन में अपनी अंतिम नाकामी का सोग मनाता हुआ
हंसता हुआ रोता हुआ मन ही मन खुद को करता हुआ लहूलुहान
मौत के घर से धकियाया हुआ कोल्या होगा
अपने सुसाइड नोट के हिज्जे सुधारता हुआ
कि कोई तो समझे न मर पाने की तकलीफ

पर्दे पर फिल्म चल रही होगी लेकिन हर पल इंटरवल होगा
सिगरेट सुलगाते हुए लोग बार-बार पेशाब करने जा रहे होंगे
ईडियट का मेकअप किए एक बहुत महंगा सुपरस्टार होगा
इमोशन, ड्रामा, सेक्स, हिंसा, मारधाड़ सबकुछ होगा
सिर्फ ईडियट नहीं होगा कि फिल्म उसके बिना भी चल जाएगी

हर मीश्किन एक दिन लेबेदेव बन जाता है
कि दुनिया चलाने के लिए नोटरी चाहिए
और कुर्क अमीन और फिलसॉफिकल ऑनटुलॉजिस्ट
और डिवोर्स प्लैनर और मैनेजर एचआर ऑपरेशंस
और विजुअल स्ट्रैटजिस्ट और प्राइम कोडिफायर
और कॉन्जुगल सायकायट्रिस्ट और सुसाइड डिजाइनर...

ऐसे ही गुनी ज्ञानी जनों के सामने हर रोज अपना दुखड़ा रोना है
उन्हीं के पीछे खटना है उन्हीं का दिया खाना है
सपने बहुत डराते हैं पर पिटी हुई राह पकड़ने से रोक नहीं पाते हैं
हर मीश्किन एक दिन लेबेदेव बन जाता है
कुछ बुरे सपने फिर भी दोनों को एक नहीं होने देते

1 comment:

Pramod Singh said...

हूं. अब एकरे बाद?