Saturday, February 13, 2010

शादी का घर

यह एक सुंदर वैवाहिक दृश्य है
दो शिक्षित, सुरुचि संपन्न ब्राह्मण परिवार
एक आरआई और दूसरा एनआरआई
स्नेह बंधन में बंध रहे हैं।

मोहल्ले के झगड़े की तरह मंत्र धांसता
बनारस का एक चतुर चिबिल्ला पंडित
दोनों तरफ से हजार-हजार के नोट
झींटते हुए ठग मुद्रा में हंस रहा है।

एक अच्छे-भले होटल के लॉन में
घराती और बराती बिना सिर फुटौअल के
रंगबिरंगे मगर शाश्वत स्वादहीन
वैवाहिक खाने के मजे लूट रहे हैं।

लेकिन इस आयोजन की कोई अंतर्कथा भी है
जिसे एक-दूसरे को कोंच न पाने से दुखी
सुगंधित अंग्रेजीदां औरतों की
खुसफुस में सुना जा सकता है।

कन्या की बहन के सिवाय
उसका कोई सगा शादी में क्यों नहीं आया
घरातियों में सबके सब ननिहाली हैं,
पर उनमें भी कुछ नजर नहीं आते।

और यल्लो, मां कहां है?
लड़की का बाप नहीं, चलो कोई बात नहीं
लेकिन मां तो है,
वह तो दिखनी चाहिए कहीं, वह कहां है?

कन्या के घर पर इस वक्त ताला पड़ा है,
लेकिन घर में कुछ इन्सानी हलचल है
लड़की सी दिखती ढले नक्श वाली एक स्त्री
ग्रिल से बाहर की दुनिया देख रही है।

छूटते ही वह मुझसे पूछती है
क्या ऐसी भी कोई शादी आपने देखी है
जिसमें दुल्हन की मां को ही
शादी देखने की इजाजत न हो?

मेरी खामोशी उससे कहती है-
कामयाब लोगों की दुनिया है बहन,
देखना-दिखाना क्या, कल को शायद इसमें
जीने की इजाजत भी न मिले।

शादी निपटाकर लोग घर चले आए हैं
शादी के किस्से बताती एक औरत
रात चार बजे उसका सिर सहलाती है
कि जैसे सारी बेहूदगियां इससे ढक जाएगी।

4 comments:

Arvind Mishra said...

गजब

सतीश पंचम said...

मोहल्ले के झगड़े की तरह मंत्र धांसता
बनारस का एक चतुर चिबिल्ला पंडित
दोनों तरफ से हजार-हजार के नोट
झींटते हुए ठग मुद्रा में हंस रहा है।


बहुत बढिया।

मनीषा पांडे said...

सुंदर......

परछाईं said...

तर्जे बयानी गहरी है। दिल को अंदर तक छूती है