Monday, December 28, 2009

रोमन हिंदी भी हिंदी है

जब हम हिंदी भाषा के विनाश पर दुखी हो रहे होते हैं या उसका स्वर्ण युग दर्ज कर खुशी जता रहे होते हैं तो अनजाने में हमसे एक छोटी सी गलती हो रही होती है। अंग्रेजी, फ्रेंच, जर्मन, स्पेनिश या अरबी, फारसी, चीनी, जापानी की तरह हिंदी कोई यकसार भाषा नहीं है। हिंदी का मतलब कई तरह की हिंदी है। ये हिंदियां इतिहास की अलग-अलग प्रक्रियाओं में उत्पन्न हुई हैं। इनके आगम और संबोधन के दायरे अलग-अलग हैं और एक ही भाषा होने के बावजूद इनके बीच फासले काफी बड़े हैं। गौर से देखें तो इन हिंदियों में कुछ तेजी से फलती-फूलती हुई अपने भविष्य को लेकर अत्यंत आशावान हैं, कुछ सचमुच नष्ट हो रही हैं तो कुछ अपने ऊपर या नीचे जाने को लेकर दुविधा या दिशाभ्रम में हैं।

हिंदी का मतलब अगर बोलचाल की हिंदी है तो पिछले बीस-पचीस सालों में उसका नाटकीय विस्तार हुआ है। सत्तर के दशक तक सिर्फ उत्तर भारतीय शहरों और कुछ हद तक मुंबई-कोलकाता में बोली जाने वाली हिंदी अब न सिर्फ उत्तर भारत के कस्बों-बाजारों में बल्कि गांवों तक में बोली जाने लगी है। इटानगर से मदुरै और गुरदासपुर से सरायकेला तक देश के किसी भी शहर में सिर्फ हिंदी बोलकर आप अपनी सारी बुनियादी जरूरतें पूरी कर सकते हैं। बेंगलूर जैसे शहर में खटाल चलाने वालों से लेकर कंपनियों के डाइरेक्टर तक हिंदी बोलने में न सकुचाते हैं, न इतराते हैं।

बोलचाल के काफी करीब रहने वाली फिल्मों और टीवी की हिंदी का तो अभी स्वर्णयुग चल रहा है। शानदार गीतों और चुटीले संवादों वाली यह भाषा हर साल दसियों हजार करोड़ रुपये का धंधा करके दे रही है। साठ के दशक तक इसका झुकाव अगर उर्दू और लोकभाषाओं की तरफ था तो आज अपनी जरूरत के नए शब्द तलाशने के लिए यह फुटपाथी अंग्रेजी और तमाम भारतीय भाषाओं-बोलियों की मदद लेती है। करन जौहर की फिल्में देखकर तो कई लोगों को लगता है कि अमेरिका और इंग्लैंड की भाषा भी अब शायद हिंदी ही हो चली है। टीवी की मनोरंजन भाषा लगभग फिल्मी ही है लेकिन समाचार भाषा का ढांचा अभी अस्थिर है। जाहिर है कि जड़ता या ढलान टीवी की हिंदी के लिए भी कोई समस्या नहीं है।

लेकिन हिंदी से अर्थ अगर उस हिंदी का लिया जाता है जो राजभाषा के रूप में दफ्तरी फाइलों या पाठ्यपुस्तकों में विराजती है, या जिसे सचिवालयों, अदालतों और शोध संस्थानों में स्थापित करने के लिए लंबी लड़ाई लड़ी गई थी, तो अस्सी के दशक से शुरू हुई नव-उदारवादी नीतियों ने उस पर घातक चोट की है। सरकारी पैसे से चलने वाले सभी संस्थानों में हिंदी अधिकारी या तो हटा दिए गए हैं या उन्हें ऐरे-गैरे काम पकड़ा दिए गए हैं। कानून, विज्ञान और प्रशासन से जुड़ी तकनीकी हिंदी शब्दावली तैयार करने की कसरत इस कदर ध्वस्त पड़ी है कि उसे जिंदा करने की कोशिश भी बेमानी लगती है। इसका दंड शिक्षा माध्यम के रूप में बरती जाने वाली हिंदी को भुगतना पड़ रहा है। छात्रों के मन में इसे लेकर घोर निराशा है क्योंकि इंटरमीडिएट तक हिंदी में वे जो भी सीख कर आ रहे हैं, उसका इस्तेमाल रोजगार पाने में तो क्या शिक्षा की अगली सीढ़ी चढ़ने में भी नहीं कर पा रहे हैं।

पिछली एक सदी में हिंदी का असली युद्ध साहित्यिक हिंदी ने लड़ा है लेकिन आज सबसे ज्यादा संकट उसी के सामने है। समय इतनी तेजी से बदला है कि अज्ञेय तक की हिंदी आज पढ़ने में अटपटी लगती है। कोई नहीं जानता कि आने वाले समय में यह ठीक-ठीक कैसा रूप लेगी। देश का शहरी मध्यवर्ग जिस तरह अपने बच्चों की शिक्षा के लिए अंग्रेजी माध्यम के पब्लिक स्कूलों पर निर्भर होता जा रहा है, उसे देखते हुए हिंदी साहित्यकारों की यह चिंता बिल्कुल वाजिब है कि उनका लिखा पढ़ने में पता नहीं खुद उनके बच्चों की भी दिलचस्पी होगी या नहीं। इस खतरे का सामना प्रिंट पत्रकारिता की हिंदी को भी करना पड़ा है लेकिन निरंतर बढ़ती पाठक संख्या और कामयाबी के अपने-अपने दावों के साथ यहां बहुत सारे प्रयोग जारी हैं।

इस बीच एक नए तरह की हिंदी भी अस्तित्व में आ रही है, लेकिन उसकी लिपि हमारी सुपरिचित देवनागरी नहीं है। इसे आप एसएमएस की हिंदी कह सकते हैं जो रोमन लिपि यानी अंग्रेजी अक्षरों में पंचमेल खिचड़ी वाली शैली में लिखी जाती है। आगे स्मार्टबुक का दौर शुरू होने के साथ यह हाइपरटेक्स्ट की जुबान बन सकती है। हाइपरटेक्स्ट यानी एक ऐसा पाठ जिसमें लिखित सामग्री के अलावा ऑडियो-विडियो क्लिपिंग और इंटरनेट लिंक भी शामिल हों। संवाद के इस उच्चतम रूप में देखना, सुनना, पढ़ना और सोचना, सब कुछ एक साथ चलेगा। रोमन लिपि में लिखी हाइपरटेक्स्ट की हिंदी एक ऐसी भाषा होगी जो न सिर्फ पूरे भारतीय उपमहाद्वीप को बल्कि फिजी से सूरीनाम तक फैले भारतवंशियों और यूरोप-अमेरिका में छाई एनआरआई आबादी को भी एक साझा मंच पर समेटे होगी। इस हिंदी को अंग्रेजी से डरने की कोई जरूरत नहीं होगी क्योंकि अंग्रेजी के सारे हथियार इसके पास पहले से मौजूद होंगे।

ऐसा जब होगा तब हमारी पीढ़ी के लोगों के लिए इसमें खुशी के साथ थोड़ी तकलीफ भी जुड़ी होगी। खुशी यह कि सौ साल के सांप्रदायिक टकरावों को पीछे छोड़ती हुई यह हिंदी खुसरो और कबीर जैसी धंधे-पानी की जुबान होगी। कुछ-कुछ वैसी ही भाषा, जिसे गांधी जी हिंदुस्तानी कहते थे और जिसे लिखने के लिए देवनागरी और नस्तलीक, दोनों लिपियों के इस्तेमाल के हिमायती थे। फर्क सिर्फ इतना होगा कि हाइपरटेक्स्ट तक आते-आते इस सूची में तीसरी लिपि के रूप में रोमन भी शामिल हो चुकी होगी। हिंदी और उर्दू में साहित्यिक लेखन तब भी होता रहेगा, लेकिन इनमें तकनीकी ज्ञान रचने की जिद खत्म हो जाएगी। नौकरी-चाकरी और कारोबार में अंग्रेजी का जोर कुछ और बढ़ जाएगा लेकिन इसके लिए लोगों का पिछली सदी की तरह फूहड़ अंग्रेज बनना जरूरी नहीं होगा। वे अंग्रेजी भाषा को जानने-समझने वाले लोग होंगे। लेकिन ग्लोबल मंच पर उनकी पहचान हिंदी होगी, जीने और मौज करने की जुबान हिंदी होगी।

12 comments:

ज्ञानदत्त पाण्डेय G.D. Pandey said...

कभी हिन्दी की लड़ाई लड़ी होगी साहित्य वालों ने। अब वहां लिलिपुटियन बसते हैं! :)

बेनामी said...

ऐसा ठीक नहीं. हिन्दी जैसी बात हर भाशा में रही है. पहले अपनी पढाई मुकम्मल करो.
हाइपर्तेक्स्ट का जमाना भी सब भाशा के लिए आएंगा केवल हिन्दी के लिए नही. तब भी मानक भाशा की जरूरत रहेगी. इसलिए ऐसे तर्क मत दो.
हम फालतू मे नागरी सीखे क्या! रोमन वाहियात है हिन्दी या किसी हिन्द्उस्तानी भाशा के लिए.
GD, पहले साहित्य पढो. फिर कुछ कहो.
आप जैसे लोग ही प्त्त्थर बने है.

अजित वडनेरकर said...

चंदूभाई, मैं बारहा इन्हीं की फिक्र मे दुबला होता हूं कि आसान भाषा लिखने की नसीहतवाली पत्रकारिता ने अभिव्यक्ति की दुनिया में कितना अकाल पैदा कर दिया है कि आज बाजार शब्द के लिए हिन्दी में कोई दूसरा शब्द पूछने जाओ तो विकल्प मार्केट मिलता है!!!
भविष्य शब्द के कितने विकल्प हिन्दी के पास अब बचे हैं? रोटी और चपाती का फर्क महसूस किए बिना अगर आपने रोटी के विकल्प स्वरूप किसी होटल में चपाती मांग ली तब क्या जवाब मिलता है?

शब्दों को कॉईन करने के हिमायती ज्ञानजी बताएं कि बाजार का बजरिया भी क्यों चलन से बाहर हो रहा है? उसे क्यों देशज या लोकभाषा का मान कर इस्तेमाल से बाहर किया जा रहा है? दिक्कत सिर्फ सरलीकरण की ओर जाने की जिद है। लालित्यपूर्ण अंग्रेजी पढ़ते वक्त हमारे जेहन में उन शब्दों को न समझ पाने पर कोफ्त नहीं होती जिन्हें हमने पहले नहीं पढ़ा है। बड़े श्रद्धाभाव से हम लॉंगमैन या ऑक्सफर्ड की डिक्शनरी से उसका अर्थ और भाव तलाशते हैं। वहीं अगर हिन्दी का कोई कठिन या तत्सम शब्द आ जाए तो हम खुद को न जाने किस ग्रह का प्राणि मानते हुए हिन्दी को कोसना शुरू कह देते हैं और हिन्दी पर अघोषित बैन करने की ठान लेते हैं। हालांकि हमारे पुरखों में भी इतनी शक्ति नहीं कि ऐसा कर सकें। रो-झीक कर उसी हिन्दी की शरण में लौटते हैं जो अपने पास पड़ौस में बोली जाती है। प्रेमचंद से लेकर अज्ञेय तक के साहित्य में जो जिन्दा है।

शर्मनाक है यह सब। कभी विस्तार से लिखूंगा। बेहतरीन पोस्ट। ज्ञानजी बुरा नहीं मानेंगे, ऐसा सोचता हूं। मेरी हिन्दी शायद कुछ अलग है:)

स्वप्नदर्शी said...

I am not assured as you are. If Roman is new hindi becoz of simplification and laziness, basically, (when people do not want to put effort in learning any language). Then I feel more assured that it is going to be dead sooner than later.

If people can put hours in learning various computational languages, and by hook or crook are eager to learn English, french, Chinese and Spanish, such logic for our own "Bhasha" which we inherit in our culture, family and surrounding, seems foolish to me and I can not be hopeful. Basically, learning hindi is not such a big deal.

चंद्रभूषण said...

अगर मेरे इस लेख में रोमन हिंदी को लेकर कुछ ज्यादा ही उत्साह छलकता नजर आया हो तो इसके लिए मैं क्षमाप्रार्थी हूं। मेरी प्रस्थापना सिर्फ यह है कि लिपि को भाषा समझ लेने की गलती भारतीय उपमहाद्वीप का बहुत ज्यादा नुकसान करा चुकी है। हिंदी और उर्दू का झगड़ा आखिर लिपियों का ही था, जबकि हमारी साझा जुबान के सबसे बड़े कवि कबीर की तो कोई लिपि ही नहीं थी। पंजाबी वाले तो इस धुन में यहां तक पहुंच गए कि वारिस और बुल्ले जैसे अपने महाकवियों से पिंड छुड़ाकर अपनी भाषा को लगभग एक घड़े में ला बिठाया। क्या डेढ़ सौ साल लंबे विध्वंस के बाद हमें अब सोचना नहीं चाहिए कि आखिर हम लड़ किस चीज के लिए रहे थे। इसी तरह की जनेऊवादी सोच का विस्तार करके अब क्या हम अक्सर रोमन में टिपटिप करते रहने वाले अपने बच्चों को भी अपने से अलग कर लें, जिस तरह कभी उर्दू वालों ने प्रेमचंद को और हिंदी वालों ने मुसलमान लेखकों को अपनी पांत से बाहर मान लिया था। ध्यान रहे, हमारी भाषा की तुलना में हमारी लिपि की उम्र कुछ भी नहीं है। भाषा बहुत बड़ी चीज है और उसे लिपि से चिपक कर देखना जब तक हम नहीं छोड़ेंगे, तब तक लाख चाहने के बाद भी, एड़ियां उठा-उठा कर भी हमारा कद उसके घुटनों तक नहीं पहुंचेगा।

परमजीत बाली said...

विचारणीय पोस्ट लिखी है....

बेनामी said...

ग़जब अजीत भाई, मन की बात कह दी. देखो मैं अब अच्छा टाइप कर सकता हूँ.
बेशक हिन्दी वाले काहिल हैं - शब्दकोष खोलते झिझक और आलस आती है लेकिन डिक्शिनरी सजा कर रखते हैं और बात बात में देखते हैं - फिर कहते हैं वाह क्या बात है! भले कुछ समझ न आए. :(

hem pandey said...

आपकी पोस्ट पर अजित वडनेरकर जी सटीक प्रतिक्रया दे चुके हैं.भाषा को व्यक्त करने के लिये लिपि ही एक महत्वपूर्ण माध्यम है. रोमन में हिन्दी और संस्कृत के सारे शब्दों के भाव को व्यक्त नहीं किया जा सकता. इसलिए शुद्ध हिन्दी और देवनागरी का गौरव बनाए रखने के यत्न किये जाने चाहिए.वैसे मेरी दृष्टि में इस लेख में आप द्वारा प्रयुक्त हिन्दी शुद्ध हिन्दी ही है.

अभिषेक ओझा said...

'द फिटेस्ट विल सर्वाइव' और मुझे हाइब्रिड हिंदी दिख रही है. जो धीरे-धीरे आकार भी ले रही है.

ab inconvenienti said...

क्या इस अगंभीर एसएमएस हिंगलिश लिंगो को मौज मस्ती के आलावा किसी और काम में प्रयोग किया जा सकता है. क्या अर्थशास्त्र या वित्त की गहरे से जानकारी दी जा सकती है? क्या दार्शनिक व्याख्या की जा सकती है? क्या भाषाविज्ञान के सिद्धांत समझाए जा सकते हैं? क्या कम्पाइलर की बारीकियां सिखाई जा सकती हैं? इन सभी का रोज़मर्रा की जिंदगी से कोई सीधा सरोकार नहीं है, पर फिर भी यह हमारे जीवन से अभिन्न रूप से जुड़े हैं.

गंभीर विषयों को समझने के लिए आपको भाषा के शुद्ध रूप के पास आना ही होगा. चाहे वह हिंदी हो अंग्रेजी या कोई और भाषा. अगर हम हिंगलिश को स्वीकार कर भी लें तो गंभीर चिंतन के लिए हमें अंग्रेजी की ही शरण में ही जाना होगा. क्योंकि गंभीर विचारों के लिए भाषा भी गुरुता और गंभीरता की मांग करती है. मैं रोडीज़ देखते समय तो हिंगलिश सह लेता हूँ. पर डिस्कवरी या नेशनल जियोग्राफिक या हिस्ट्री चैनल पर उत्क्रांति या नेपोलियन की रणनीति पर बने गंभीर वृतचित्र के दौरान जबरन घुसाए गए अंग्रेजी शब्द असहनीय खीझ पैदा करते हैं.

but, if आप अपनी same इसी post को sms Hinglish lingo में post करते तो क्या bloggers वैसा ही respond करते जैसा की right now कर रहे हैं? आप अगर इसी post को sms language में render करते तो hardly कोई perceive कर सकता की आप क्या intend करना चाहते हैं.

ab inconvenienti said...

और भी गम हैं ज़माने में इश्क और मौज मस्ती के सिवा.... isn't it?

eda said...

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