Tuesday, May 26, 2009

नई चाल में ढली सियासत

सबसे पहले माफी चाहता हूं भाई अशोक पांडे से। यह टीप लिखनी थी कबाड़खाने के लिए लेकिन ब्लॉग खोला तो पता चला कि पहलू बेचारा रो रहा है कि एक महीने से यहां कुछ नहीं पड़ा। बहरहाल, अगली राजनीतिक टीप वहीं पड़ेगी, यह वादा रहा। चुनाव नतीजे जो आए, उनका अनुमान किसी को नहीं था, लिहाजा इस पर अलग से पछतावा क्या करें। लेकिन यह तो लगने लगा था, और कबाड़खाने की अपनी पिछली पोस्ट में मैंने साफ कहा भी था कि करीब बीस साल बाद राजनीति का मुहावरा बदल रहा है।

राजकिशोर जी का यह कहना सही है कि मायावती को विधानसभा चुनाव में जिस समीकरण के लिए धन्य-धन्य कहा गया, उसी का दोहराव लोकसभा में करने के लिए उनकी थू-थू क्यों की जा रही है। लेकिन दोनों स्थितियों में एक बुनियादी फर्क है। विधानसभा में जब उन्होंने ब्राह्मण-दलित समीकरण गढ़ा था तो लगता था कि यह पुराने और नए लतियाए लोगों की दोस्ती है। लेकिन लोकसभा चुनाव तक यह साबित हो गया था कि नहीं, यह लतियाने वालों की वापसी का ही एक चोरदरवाजा भर है।

मायावती आगे भी इस समीकरण पर डटी रह सकती हैं लेकिन ऐसा उन्होंने किया तो निश्चित रूप से उनकी जबर्दस्त दुर्गति होगी। जैसे लक्षण हैं, उत्तर प्रदेश में आगे दो ही छोर बचेंगे। एक तरफ कांग्रेस और दूसरी तरफ सपा और बसपा में जो भी बचे। इन दोनों पार्टियों की मार अब पिछड़े और अति पिछड़े वोटरों पर होनी है। लेकिन राजनीति के बदले हुए मुहावरे की कोई काट भी इन्हें खोजनी होगी। निकट भविष्य में अगर पाकिस्तान बिखर जाए और उसकी अराजकता भारत पर भारी पड़ने लगे, देश पर तालिबान का हमला ही हो जाए, तो बात अलग है, अन्यथा राजनीति का नया मुहावरा पकड़ने का काम भाजपा नहीं कर पाएगी और आप चाहें तो अभी से उसकी ऑबिचुअरी लिख सकते हैं।

लेकिन हां, इसके अलावा भी एक रास्ता ऐसा है, जिसके जरिए धर्म और जाति की सियासत देश में पूरे जोर-शोर के साथ दुबारा लौट सकती है। ताकतवर कांग्रेस से ज्यादा बड़ा दुश्मन कांग्रेसी राज के लिए और कोई हो नहीं सकता। बिल्कुल संभव है कि अगले एक-दो सालों में इस सरकार की ऐसी गंध मच जाए कि नई राजनीति का इसका सारा आबा-काबा बिखर जाए। 1985-86 की अपार लोकप्रियता और आधुनिक छवि के बाद राजीव गांधी के राज की जो गत बनी थी, उसकी परिणति जातिगत और सांप्रदायिक चेतना के अलावा और भला हो ही क्या सकती थी। ऐसे मोहभंग में राजर्षि की छवियां ज्यादा काम नहीं आतीं। न वीपी की आई, न राहुल की आएगी।

राजनीति का नया मुहावरा मोटे तौर पर एनजीओ वाला है। पूरी ईमानदारी, जनता से सीधे संपर्क, लोगों का काम कराने का प्रयास करना- लेकिन यह सब तभी तक, जब तक ऊपर से भरपूर माल आने का इंतजाम न हो जाए। इसकी विडंबनाओं पर पूरी सख्ती से नजर रखी जानी चाहिए, क्योंकि राहुल की राजनीति से होने वाला मोहभंग देश के लिए उनके पिताश्री से होने वाले मोहभंग की तुलना में कहीं ज्यादा खतरनाक साबित होगा।

चलते-चलते एक बात वाम मोर्चे की राजनीति पर भी। पश्चिम बंगाल में उसकी अजेयता का मिथक टूट चुका है। और यह महज 1984 की सहानुभूति लहर में पिट जाने जैसा मामला नहीं है। ममता की वन-मैन डिमोलिशन आर्मी ने अगर अपनी बेवकूफी से अपना सर्वनाश न कर लिया तो अगले विधानसभा चुनाव में वाम मोर्चे को सरकार बचाने की नहीं, अपना अस्तित्व बचाने की लड़ाई लड़नी पड़ेगी। उसके सारे पुराने कारतूस चुक गए हैं और नए गढ़ने की कूवत उसके नेताओं में नजर नहीं आती। विचार के नाम पर सीपीएम संसार की सबसे पैदल कम्युनिस्ट पार्टी है, लेकिन व्यवहार में यह बात पहली बार जाहिर हो रही है। आत्ममुग्ध विरोधाभासों की इस पोटली का भला कोई क्या करे।

6 comments:

Ashok Pande said...

आपने प्रमाद त्यागा और एक अच्छी पोस्ट लिखी. इस के लिए आपका धन्यवाद चन्दू भाई! कबाड़ख़ाने पर अगली पोस्ट का इन्तज़ार रहेगा.

pallav said...

badhiya post.

अनूप शुक्ल said...

सुन्दर पोस्ट! जरा जल्दी-जल्दी लिखा करें न जी!

Ek ziddi dhun said...

बिलकुल ठीक बात, ममता भस्मासुर हैं यही बात उम्मीद की हो सकती है सी पी एम के लिए. ये लगता नहीं है कि सी पी एम वाकई इस हार से कोई सबक ले लेगी. ऐसा होता तो नंदीग्राम और सिंगुर के बाद भी संभला जा सकता था. केरल में तो कांग्रेस के फेवर में कुछ भी नही था और अछ्युतानंदन खासे लोकप्रिय भी हैं लेकिन पार्टी में पावरफुल विजयन ने पूरी ताकत अपनी ही पार्टी के सिएम को नीचा दिखने में laga dee thee. बहरहाल ये नुकसान बड़ा है, इस बात ko सी पी एम शायद ही समझे. कांग्रेस ke बारे mein apkee ray खरी hai. tahee baat bee je pee kee to vah congress ke भीतर आराम से पलती रहती hai.

shashi said...

aapko padane ke liye bar bar pahalu kholata hon, magar kabhi kabhar hi aap dikhate hain, magar jab dikhate hain achcha dikhate hain.
shashi bhooshan dwivedi

sa said...

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