Saturday, March 8, 2008

महिला दिवस / विवाह दिवस

पिछले तेरह सालों से 8 मार्च के इर्द-गिर्द अजीब सी बेचैनी महसूस होती है। इस बेचैनी की जड़ें नवाबों के शहर लखनऊ में हैं। 1995 की फरवरी में बिहार विधानसभा के चुनाव चल रहे थे। आरा में पुरबारी गुमटी पर माले ऑफिस के बाहर बेंच पर बैठा था कि चुनाव कवर करने आए मित्र दिलीप मंडल पधार गए। यूं ही अललटप्पू उनसे कह बैठा कि अगली चार को हो सके तो लखनऊ पहुंच जाइए, अजय सिंह के यहां- शायद उस दिन वहां मेरी शादी हो।

दो या तीन मार्च को मैंने लखनऊ प्रस्थान किया। शादी के नाम पर आरा के साथियों ने- ठोस रूप से कहें तो बड़े भाई जमुना जी ने- डेढ़ हजार रुपयों का इंतजाम भी कर दिया था। लेकिन वहां पहुंचकर पता चला कि शादी-ब्याह एक बहुत ही गंभीर काम है, उसपर जिंदगी का बनना-बिगड़ना निर्भर करता है, और वह यूं ही थोड़े हो जाया करता है।

इंदु जी एलएलबी के तीसरे और डॉक्टरेट के पहले साल में थीं। उनकी शादी अगर घर-परिवार की मर्जी से होती तो कहीं ढंग की जगह होती, और अभी तो नहीं ही होती। उनके लोकल गार्जियन अजय सिंह हार्ड कोर लेफ्टिस्ट थे और विवाह से उन्हें कोई सैद्धांतिक एतराज नहीं था। लेकिन मेरी दशा-दिशा देखते हुए उन्हें शक था कि मैं किसी से प्रेम कर भी सकता हूं या नहीं।

अपनी आश्वस्ति के लिए उन्होंने मुझसे कई असुविधाजनक सवाल पूछे, लेकिन निष्कर्ष वही निकला कि यह कोई गुड्डे-गुड़िया का खेल थोड़े ही है।

तो हाल यह था कि शादी के लिए कोई राजी नहीं, और जमुना जी से रुपये ले चुकने के बाद बिना ब्याह किए आरा लौटने की मेरी हिम्मत नहीं। और भाई दिलीप मंडल थे कि घड़ी की सुई की तरह 4 मार्च की दोपहर अजय सिंह के यहां यह घोषणा करते हुए दाखिल हो गए कि वे तो विवाह में शामिल होने आए हैं।

एंबरासमेंट मेरे लिए अनोखी चीज कभी नहीं रही, हालांकि आश्चर्यजनक रूप से यह आज भी मुझे परेशान करता है। इशारा करके मैं दिलीप बाबू को किनारे ले गया और किसी तरह उन्हें समझाया कि थोड़ा लोचा हो गया है, ज्यादा भाव न खाएं और चुपचाप पतली गली से निकल लें।

उधर लखनऊ में अलग ही तरह की गहमागहमी थी। महिला संगठन के लिए 8 मार्च की जिम्मेदारियां थीं और 9 मार्च को पार्टी की एक राज्यव्यापी रैली भी होने जा रही थी। किसी कर्मयोगी की तरह इस गहमागहमी के बीच भी मैंने उम्मीद नहीं छोड़ी। अजय जी और शोभा जी को समझाता रहा कि इन छुट्टियों में इंदु जी घर जाएंगी तो वहां से विवाहित होकर ही लौटेंगी, या शायद उधर से ही उधर अपनी ससुराल चली जाएंगी। इसमें मेरा कोई एंगल आना है तो अभी ही आना है, या फिर नहीं आना है।

होते-होते 5 या 6 मार्च तक लोग पसीज गए। पार्टी के प्रति हमदर्दी रखने वाले एक वकील साहब से बात की गई और तय हुआ कि 8 मार्च को किसी अदालत में फटाफट मामला निपटा लिया जाए। मुझे यह मानने में कोई एतराज नहीं कि अदालत की शादी एक भयानक यातना है, लेकिन दिन बीतने में अभी कई घंटे बाकी थे, जहां कुछ और यातनाएं मेरा इंतजार कर रही थीं।

अदालत में खड़े होने वालों में मेरे और इंदु जी के अलावा चार लोगों का अजय सिंह का परिवार, पांच लोगों की अनिल सिन्हा की फैमिली, तीन भाई-बहन सुलेखा और इंदु-भाषा के दो-तीन हमउम्र दोस्त-मित्र शामिल थे। औपचारिकताएं निपटने के बाद दो टेंपो में भरकर सारे लोग घर की तरफ रवाना हुए। मैंने कहा मुझे भी बिठा लीजिए, वहीं भेंड़ीमंडी पार्टी ऑफिस में उतार दीजिएगा। इंदु जी टेंपो में चार-पांच किलोमीटर और आगे जाकर अपने हॉस्टल कैलाश हॉल उतर गईं।

पार्टी ऑफिस में सारे लोग रैली की तैयारियों में जहां-तहां थे। रात में पोस्टर लगाकर थके सिर्फ एक साथी अच्छी-खासी गर्मी में कंबल ओढ़े सो रहे थे। मैंने भी दिन के तीसरे पहर एक कंबल खींचा और तानकर एक कोने लुढ़क गया कि कोई देखेगा नहीं तो बात भी नहीं करेगा। दिमाग में लगातार घूम रहा था कि शादी तो हो गई, अब रहने-खाने का क्या होगा। और सबसे बड़ी बात, उस तकलीफ और जवाबी तकलीफ का क्या होगा, जो इंदु जी का अच्छा-खासा चढ़ता हुआ कैरियर बिना किसी आजमाइश के बर्बाद हो जाने से पैदा होने वाली है।

इसी सचेतन बेहोशी में शाम हो चली। तब पार्टी के राज्य अध्यक्ष राजा बहुगुणा आए। पहले आवाज दी फिर दोनों कंबल खींचे तो एक इन्सान को सोता और दूसरे को जागता हुआ पाया। मुझसे पूछा कि आज तो आपकी शादी थी न। मैंने कहा, थी तो भाई साहब।

फिर राजा भाई खींच-खांचकर मुझे नीचे ले गए, चाय पिलाई और थोड़ी देर बाद एक होटल में ले जाकर परांठे और शाही पनीर खिलाया। बोले कि इससे क्यों परेशान हो कि दो पेट हो गए, यह सोचो कि आज से चार हाथ तुम्हारे हो गए। और तुम अकेले नहीं हो, पूरी पार्टी तुम्हारे साथ है। मैंने एक लंबे समय तक पार्टी की थी लिहाजा इस बात से ज्यादा आश्वस्त या मोहग्रस्त होने की गुंजाइश तो नहीं थी लेकिन उस समय शायद कुछ ऐसी ही बातों की मुझे बड़ी सख्त जरूरत थी।

अगले दिन आरा जाने के लिए रिजर्वेशन शादी की बात तय होते ही करा लिया गया था। दिन भर रैली की थकान के बाद मैं अजय सिंह के घर पहुंचा। वहां इंदु जी दो विशाल बैगों और एक बिस्तरबंद के साथ रवानगी के लिए तैयार थीं। मेरे लिए तो सफर रोज-रोज का किस्सा था और जेहनियत बड़े झटकों की आदी पार्टी में शामिल होने के पहले से ही हो चली थी। लेकिन इंदु जी के लिए यह बहुत बड़ा फैसला था और अपनी जिंदगी के सबसे बड़े क्षण से वे वाबस्ता थीं।

उन्हें लेकर उनके घर-परिवार में बहुत बड़े-बड़े सपने देखे गए थे। मेधावी थीं, लिहाजा बड़ी अफसरी या कोई और अच्छा करियर भी उनका होना ही था। कुछ न होता तो किसी बड़े अफसर की पत्नी तो वे बन ही जातीं। एक फौजी कप्तान से उनके रिश्ते की बात लगभग तय ही हो चुकी थी। लेकिन इन सारी सुंदर संभावनाओं को एक तरफ रखकर वे एक ऐसे आदमी के साथ किसी अनजानी-अनदेखी जगह के लिए रवाना हो रही थीं, जिसके पास अतीत, वर्तमान या भविष्य के नाम पर कहने-सुनने लायक कुछ भी नहीं था।

आप चाहें तो कह सकते हैं कि 8 मार्च को जाति, वर्ग, क्षेत्र, करियर आदि जैसी सभी नई-पुरानी पूर्वधारणाओं के विरुद्ध इंदु जी ने अपने स्तर पर एक क्रांति संपन्न की थी। ऐसा कभी उन्होंने कहा नहीं, लेकिन न कहने से चीजें बदल तो नहीं जातीं।

दुनिया की कोई भी क्रांति सबसे पहले जिस एक चीज का खात्मा करती है, वह रूमानियत ही हुआ करती है। जीवन की कठिनाइयों ने हमारे साथ भी ऐसा ही किया। लेकिन मुझे लगता है कि सहज रूमानियत के अलावा एक और अलहदा किस्म की रूमानियत भी होती है, जिसे आदमी कठिन स्थितियों में अपने तजुर्बों के जरिए धीरे-धीरे अर्जित करता है।

उस चीज को कमाने की कोशिश हम आज भी कर रहे हैं। 8 मार्च जब भी आता है, हमें ऐसी ही कठिनाइयों और चुनौतियों की याद दिलाता है, और हर बार दो-चार दिनों के लिए हमारी धड़कनें बढ़ा जाता है।

11 comments:

उन्मुक्त said...

शादी की सालगिरह की शुभकामनायें

Parul said...

BADHAAYII V SHUBHKAAMNAAYEN AAP DONO KO

@क्यों परेशान हो कि दो पेट हो गए, यह सोचो कि आज से चार हाथ तुम्हारे हो गए।

@सहज रूमानियत के अलावा एक और अलहदा किस्म की रूमानियत भी होती है, जिसे आदमी कठिन स्थितियों में अपने तजुर्बों के जरिए धीरे-धीरे अर्जित करता है।

YE KUCH BAATEN BADI SAHAJ LAGIN

अनिल रघुराज said...

चंदू आपने भी ऐतिहासिक तारीखों पर बड़े-बडे ऐतिहासिक काम किए हैं। आपको और इंदू को शादी की सालगिरह मुबारक।

इरफ़ान said...

सहज रूमानियत के बाद वाली रूमनियत विवशता है, आवश्यकता या अनिवार्यता?
हमें तो आपकी शादी वार्षिकी हमेशा याद रहती है.इंदू और आपको बहुत-बहुत बधाई.

अभय तिवारी said...

शानदार अनुभव तो नहीं कह सकता पर हाँ पढ़ने में दिलचस्प रहा.. और रूमानियत और क्रांति के रिश्ते में तो हम ने अक्सर यह देखा है कि रूमानियत के विदा होते ही लोग क्रांति के रास्ते से लौट चलते हैं..

anuradha srivastav said...

इन्दू जी की हिम्मत की दाद देनी होगी। शादी की सालगिरह मुबारक हो।

मनीषा पांडेय said...

ब्‍लॉग पर आना-जाना लगभग बंद कर रखा है, इसलिए 8 मार्च की पोस्‍ट आज देख रही हूं। सचमुच इंदु जी ने एक साहस का परिचय तो दिया, लेकिन प्‍यार में यह बहुत अस्‍वाभाविक भी नहीं। शादी की सालगिरह मुबारक हो। उसके बाद के अनुभव भी जानना रोचक होगा।

चंद्रभूषण said...

@ इरफान, इन तीनों श्रेणियों की चीज यह नहीं है। अगर आप खुद को डाई हार्ड रोमांटिक मानते हों तो शायद यह अंदाजा लगा सकें कि जो रूमानियत बॉडी केमिस्ट्री से पैदा होती है, उसके बहुत अर्से बाद एक और तरह की रूमानियत से भी आपका सामना होता है। ज्यादातर लोग इसकी आजमाइश किसी नई शक्ल पर करना पसंद करते हैं, मैं इसे एक जानी-पहचानी शक्ल पर आजमाने की कोशिश कर रहा हूं- कामयाबी या नाकामी दोनों ही मामलों में ऊपर वाले के हाथ हुआ करती है...

@ अभय, मुझे तङ श्याओ फिङ जैसी किसी श्रेणी में समझ लीजिए। क्रांति जब अपना सारा रूमान खो बैठती है तो भी कुछ बंदे उसका कोई नया संदर्भ बनाकर उसकी स्पिरिट को जिंदा रखने की कोशिश करते हैं, हालांकि इसके लिए उन्हें क्रांतिविरोधी और संशोधनवादी होने की गालियां भी खानी पड़ती हैं।

swapandarshi said...

rochak kissa, mujhe apanee shaadi bhee yaad aa gayi.
halanki yaha court wale' ghar par gift ke sath aa jate hai.
We got married over a potluck lunch, on sunday and went back to the lab after couple of hours. Next day I spent 8 hours in chemical safety and readioactivity safety training.

sexy said...

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Sudhir said...

dilchsp hai. ara jb aap dono pahuche the tb aaplog hm nye sathio ke liey jbrdast akarshan the. hme bhi utsukta thi ki dekhe to unhe jinhone sathi ka dil le liya. khair, hmlogo ne unhe dekha aur khush huey. pichhe ki dastan ko ab thik se janne ka mauka mila. der se hi sahi pr shubhkamnaey, pyar bhre jivan ki.