Thursday, February 7, 2008

यह ज्ञान और वह ज्ञान

पिछले सौ-दो सौ सालों में देश में ज्ञान का अर्थ अचानक बदला है। आज भी किसी आध्यात्मिक आयोजन में जाइए तो वहां जिस ज्ञान की बात हो रही होती है उसके मायने कुछ और ही होते हैं। कबीर जिस ज्ञान की बात करते थे, पलटूदास के यहां जो ज्ञान उनके अद्भुत पदों में उमड़कर बाहर आता था, उसका उस ज्ञान से दूर-दूर तक कोई रिश्ता नहीं है, जिसके नाम पर भारत की समूची अर्थव्यवस्था को ढालने की बात केंद्र की सरकारें अब करने लगी हैं। वह ज्ञान क्या था, इसका पता करने की कोशिश करता हूं लेकिन परेशान हो जाता हूं। एक अंतहीन दुहराव सा लगता है। आत्मा-परमात्मा, खुद को जानना, तत्व को जानना, भीतर पैठना वगैरह-वगैरह बातें बार-बार लौट-लौटकर आती हैं। उनका कोई विकासमान अर्थ समझ पाना हर बार मेरे बूते से बाहर हो जाता है।

पंजाबी कविता के बारे में पढ़ी-सुनी गई अकादमिक बातों में महाकवि वारिसशाह के साथ बुल्लेशाह का नाम भर सुना था। फिर नुसरत फतेह अली खां के गाए बुल्लेशाह के पद सुने। जिन लोगों ने ऐसा कुछ पढ़ा-सुना नहीं होगा, उनके कान में भी एक फिल्मी गीत 'मैं तो यार मनाणा ली चाहे लोग बोलियां बोलें' की शुरुआत में दिए गए नरेंद्र चंचल के बोल 'मंदिर तोड़ो मस्जिद तोड़ो बुल्लेशाह ए कहता है, प्यार भरा दिल कभी न तोड़ो इस दिल विच अल्ला रहता है' के जरिए उनका कम से कम एक बंद तो पड़ ही गया होगा। आजकल बुल्लेशाह पर आध्यात्मिक मकसद से लिखी गई एक किताब 'साईं बुल्लेशाह' पढ़ रहा हूं। बोर हो रहा हूं, मुग्ध हो रहा हूं, चौंक रहा हूं और ज्ञान के रूप में बुल्लेशाह के पदों में जो कुछ कहा गया है, उसे समझने की जद्दोजहद में जुटा हुआ हूं।

चौंकने की बातें कई सारी हैं। मसलन, एक पद में बुल्लेशाह कुछ ऐसा बताते हैं कि शुरू में जो कुछ था उसका कोई व्यक्त रूप नहीं था, अल्लाह भी नहीं था, प्रकाश भी नहीं था, फिर अस्तित्व आया, अल्लाह हुआ और अपने शब्द 'कुन' से उसने सृष्टि प्रारंभ की, आकार बने, धरती-सूरज-चांद-सितारे बने, आदम आए, तमाम नबी आए और फिर नबियों के सरदार मोहम्मद आए। बुल्लेशाह यहां न सिर्फ कुरान, हदीस और इस्लामी दर्शन के पार जाते हैं बल्कि होने और न होने को लेकर ऋग्वेद की बुनियादी दुविधा (सृष्टि से पहले कुछ नहीं था- जिंगल 'भारत एक खोज') के भी पार जाते हुए बिग बैंग-पूर्व के भौतिकीय अनुमानों को छूने लगते हैं। यह रहस्यवादी ज्ञान-पद्धति शायद कुछ ऐसी ही अजीबोगरीब चीज है, जिसमें लोग छलांगे मारते हुए कहां के कहां निकल जाते हैं।

जिस कॉलेज में मैंने ग्रेजुएशन की पढ़ाई की है, उसके संस्थापक अल्लामा शिब्ली नोमानी का एक कथन भी इसी किताब में पढ़ने को मिला- काबे को तोड़ दिया जाना चाहिए ताकि लोग काबे की ओर खिंचने की बजाय उसकी ओर खिंचें जिसने काबे समेत सारा कुछ बनाया है। मेरे ख्याल से अल्लामा अगर आज यह बात बोलते तो कोई उनकी जान ही लेने पहुंच जाता। दुआ करें, 'साईं बुल्लेशाह' पूरी पढ़ ले जाऊं और साईं को थोड़ा-बहुत समझ भी लूं, ताकि 'किताबों का कोना' में उसके बारे में एक पोस्ट डालकर कुछ तो संतोष हो। आध्यात्मिक लोगों से बात करने का कोई साझा आधार खोजना मेरा एक बहुत पुराना एजेंडा है, लेकिन डर है, कहीं इसपर अमल से पहले उम्र न गुजर जाए और तबतक मेरे खुद के ही आध्यात्मिक हो जाने की नौबत न आ पड़े।

3 comments:

Pramod Singh said...

जल्‍दी, जल्‍दी, जल्‍दी.. अच्‍छा, अच्‍छा, अच्‍छा.. ज्ञान, ज्ञान, ज्ञान.. घबराहट होती है? इन दिनों मैं भी घबराया ही रहता हूं..

Aflatoon said...

लोहिया की बात :
राजनीति= तात्कालिक धर्म
धर्म = दीर्घकालिक राजनीति
याद आई ।

Priyankar said...

बहुत सही लिखा है .

लीजिए उन्हीं का हम भी एक टिकाता हूं जो दिल-दिमाग में अटका रह गया :

धरमसाल धड़वाई रहंदे ठाकुरद्वारे ठग्ग ।
विच्च मसीत कुसीते रहंदे आशक रहण अलग्ग ॥