Wednesday, January 16, 2008

कितना उड़ पाती है साई-फाई कल्पना

साइंस फिक्शन बहुत सारी थीम्स पर लिखे गए हैं लेकिन मैं यहां पृथ्वी से इतर जीवन की थीम पर लिखने वाले कुछ साई-फाई लेखकों की कल्पनाशीलता पर बात करना चाहता हूं। इस तरह की थीम वाले जो पांच चोटी के लेखक मुझे पसंद हैं, उनके नाम रोचकता के क्रमानुसार इस प्रकार हैं- कार्ल सागान, यूरी मेदवेदेव, इसाक असीमोव, आर्थर सी. क्लार्क और स्तानिस्लाव लेम। वैज्ञानिक चेतना से युक्त इतर जीवन के बारे में इनकी कुछ प्रस्थापनाएं हैं, जिनका अनुसरण ये अपनी रचनाओं में करते हैं।

कार्ल सागान का जिक्र सबसे पहले, क्योंकि अन्य लेखकों के बरक्स वे खुद एक अंतरिक्षविज्ञानी भी थे। उनके दो उपन्यास द ब्लैक क्लाउड और द कांटैक्ट मैंने पढ़े हैं। सागान के ये दोनों उपन्यास मुझे शुरू में रोचक लगे लेकिन बाद में धीरे-धीरे बोरिंग होते गए। जैसे ही वे अपनी परिकल्पना को धरती के सामाजिक-राजनीतिक ढांचे में उतारते हैं, वैसे ही अझेल होते चले जाते हैं।

ब्लैक क्लाउड में वे कुछ करोड़ किलोमीटर लंबे-चौड़े एक जीवित बादल की कल्पना करते हैं। शायद उनकी यह कल्पना कुछ अंतरतारकीय (इंटरस्टेलर) बादलों में पाए गए कार्बनिक रसायनों के स्पेक्ट्रम से उपजी है। शुरू में यह दिलचस्प भी लगती है, लेकिन फिर इस विशेष किस्म के जीवन के लिए उन्हें अपनी सोच में कुछ ऐसे पंप भी आजमाने पड़ते हैं जो इतने बड़े जीव के स्नायुद्रव्य को उसके विशाल नर्वस सिस्टम में इधर से उधर पहुंचा सकें। यह बड़ी पकाऊ किस्म की मेकेनिक्स है।

सागान की कंटैक्ट पर बनी फिल्म शायद ठीकठाक चली थी, लेकिन छह सौ पेज के इस नॉवेल के तो सौ पेज पढ़ना भी मेरे लिए मुश्किल हो गया। इन दोनों उपन्यासों की तुलना में बीबीसी पर उनकी व्याख्यान श्रृंखला 'ऑफ मेन ऐंड गैलेक्सीज' मुझे कहीं ज्यादा रोचक लगी।

सोवियत जमाने के रूसी लेखक यूरी मेदवेदेव को पता नहीं साई-फाई लेखकों में क्या दर्जा हासिल है, लेकिन उनकी चैरिअट ऑफ टाइम मुझे दिलचस्प लगी। इस उपन्यास में ऐसे इतर जीवन की कल्पना की गई है, जिसके लोग लंबाई-चौड़ाई-ऊंचाई से अलग किसी और विमा में सफर करते हैं। उनके यहां समय है लेकिन धरती के होने या न होने का उनके लिए कोई मतलब नहीं है। किसी दुर्घटनावश वे यूराल पर्वत की किसी ठोस चट्टान में फंस जाते हैं, जहां एक ऐडवेंचरर उनके बारे में अपने कुछ इंप्रेशन्स दर्ज करता है। समय इस उपन्यास में कुछ और ही तरह से आता है- कमोबेश फ्लैट शक्ल में।

इसाक असीमोव के उपन्यास पर बनी विल स्मिथ स्टारर फिल्म आई, रोबोट सुपरहिट रही थी और उनकी रोबोट सीरीज वैसे भी लाजवाब है, लेकिन इतर जीवन के बारे में चर्चा उनकी फाउंडेशन सीरीज के इर्द-गिर्द ही की जा सकती है। असीमोव ने इसके लिए अपनी एक स्पष्ट अवधारणा रखी है। इस सीरीज में वे अब से बीस हजार साल या उससे ज्यादा आगे के भविष्य का इतिहास लिखने का प्रयास करते हैं। वे जीवन को सिर्फ और सिर्फ पृथ्वी पर उपजा हुआ और यहीं से कुछ करोड़ ग्रहों पर फैला हुआ मानकर चलते हैं। इससे उन्हें अंतरतारकीय सभ्यता के लिए कुछ साझा मानदंड बनाने में सुविधा होती है। उनके उपन्यास पूंजीवाद और समाजवाद की पुरानी बहस को बहुत ज्यादा बड़े पैमाने पर रखने का प्रयास करते हैं, जो कभी दिलचस्प तो कभी रिपीटेटिव लगता है।

आर्थर सी. क्लार्क को मैं कुछ निश्चित अवधारणाओं के चलते हाल तक नहीं पढ़ पाया था। मसलन, उनका श्रीलंका में रहना, घोषित रूप से बाल-यौनाचारी (पीडियोफाइल) होना और राम पर आधारित एक पूरी साई-फाई श्रृंखला लिखना, जिसमें मेरे ख्याल से रोचक बात भला क्या हो सकती थी। हाल में मैंने उनकी रांदेवू विद रामा पढ़ी और उनके बारे में मेरी सारी धारणाएं रातोंरात बदल गईं। क्लार्क की कल्पनाशीलता का जवाब अगर कोई है तो वे सिर्फ और सिर्फ स्तानिस्लाव लेम ही हो सकते हैं।

मुझे पूरी रामा सीरीज पढ़नी है लेकिन उसका जुगाड़ अबतक नहीं हो पाया है। रांदेवू विद रामा में क्लार्क सचमुच एक इतर जीवन की बानगी खींचते हैं- दसियों लाख साल से अंतरिक्ष में भटक रहा एक निर्जीव सा स्पेसशिप, जो इस तरह प्रोग्राम्ड है कि किसी तारे के करीब पहुंचने के बाद उससे ऊर्जा खींचकर दुबारा अपने भीतर अपने ही जैसे जीवन की पुनर्रचना को संभव बना सके।

मेरी नजर में साइंस-फिक्शन का शीर्ष पोलिश लेखक स्तानिस्लाव लेम हैं, जिनकी रचना पर दो बार बनी उसी नाम की फिल्म सोलारिस से ज्यादातर फिल्म प्रेमी परिचित होंगे। सोलारिस की मैंने सिर्फ थीम-थीम भर पढ़ी है, लेकिन हाल में लेम का उपन्यास द इनविंसिबल पढ़कर मैं उनका मुरीद हो गया। उनके अंदर विज्ञान की पूरी रोचकता मौजूद है, लेकिन स्थिर हो चुकी वैज्ञानिक धारणाओं की खूंटी पकड़ने की नियति से वे अत्यंत कुशलता के साथ बच निकलते हैं।

सोलारिस का जीवित समुद्र कार्ल सागान के ब्लैक क्लाउड की तुलना में कहीं ज्यादा धड़कता हुआ और रोचक है और इनविंसिबल की नैनो-रोबोटिक दुनिया अपनी भयावहता में भी अद्भुत रूप से सम्मोहक है। जहां-तहां मशीनों के आकर्षण के बावजूद उनके उपन्यास किसी चोटी के अंतरिक्ष विज्ञानी या किसी भी किस्म के विज्ञानी को कुछ नया सोचने के लिए प्रेरित कर सकते हैं।

मेरे ख्याल से लेम इतना अच्छा इसलिए लिख पाए क्योंकि पचास और साठ दशक के पोलैंड में हॉलीवुड के आकर्षण से बचे रहना उनके लिए संभव था। भागती हुई हिंसक और ग्लैमरस तस्वीरों का मोह अक्सर कल्पना का हत्यारा साबित होता है। पृथ्वी से इतर जीवन कल्पना के लिए एक अत्यंत रोचक थीम है- काश कोई साई-फाई लेखर इस थीम को और ज्यादा अच्छी तरह इक्सप्लोर कर पाता। ....या कौन जाने किसी ने किया भी हो और मुझे जानकारी न हो।

5 comments:

swapandarshi said...

In a way to appreciate foundation trilogy you should also read
Forwarding the foundation
Foundation and earth

जोशिम said...

पचीस एक साल पहले एक संकलन चाव से पढा था - पीली जिल्द वाला - शायद रूसी था / सस्ता था मगर सभी देशों की कहानियाँ थी थी छोटी छोटी बहुत कहानियाँ थीं - सर्दी की रात में कम्बल के साथ खूब कल्पनाएँ दौड़ती थीं - अभी कुछ याद नहीं - अगर रीवा गया इस साल और मिल गई किताब तो आपको बताऊंगा - मनीष

Pratyaksha said...

साईंस फिक्शन की दुनिया पॉसिबल और इमपॉसिबल के बीच की खाई को पाटती है । असीमोव , सेगान और क्लार्क की किताबें एक दूसरी रोचक दुनिया रचती हैं । मुझे क्रिस्तोफर स्टाशेफ की एक किताब भी याद आ रही है किंग कोबोल्ड जिसमें विचेज़ और वॉरलोक्स भी हैं , नियनडर्थल मैन भी है , इंटरगैलैक्टिक कॉलोनी भी है | एक किताब और जो हलांकि साईंस फिक्शन नहीं पर फंतासी है , गाई गैव्रियल के की समर ट्री । अब तक याद है कैसे मज़े से पढ़ी थीं ये किताबें ।

चंद्रभूषण said...

स्वप्नदर्शी, जिन दोनों किताबों का जिक्र आपने किया है, वे मेरी पढ़ी हुई हैं। दूसरी वाली पहले और पहली वाली बाद में। इन फैक्ट, इस सीरीज की सिर्फ यही दोनों किताबें मैंने पढ़ी हैं। शायद इनका क्रम भी यही है। (और 'ट्राइलॉजी' मिसनॉमर लगती है क्योंकि नेकेड सन, एंपायर और न जाने क्या-क्या करके बहुत सारी किताबें इसी सीरीज के हिस्से की तरह पढ़ी जाती हैं)। गणित की एक संभावित शाखा के रूप में साइकोहिस्ट्री की परिकल्पना दिलचस्प है, लेकिन असीमोव में सबसे ज्यादा खलने वाली बात यही है कि उनकी किसी भी किताब में कोई साइंटिफिक क्वेस्ट नजर नहीं आती। क्या यह कल्पना किसी भी दृष्टि से रोचक हो सकती है कि अब से बीस हजार या बीस लाख साल बाद इन्सानों की रुचि सिर्फ अपने सर्वाइवल से जुड़े सवालों तक सीमित रह गई होगी- अनजाने दायरों की पड़ताल करने की उनकी प्यास बिल्कुल ही बुझकर राख हो चुकी होगी?

Unknown said...

संयोग वश ही राहुल वेमुला से कार्ल सागान खो खोजते हुए आप तक पहुँच गया. जय हो आपकी -औंकार