Thursday, December 20, 2007

पुलिस से नाता

बीतती मई की शामें अक्सर भयंकर आंधियां लिए आती हैं। वह एक ऐसी ही दुखभरी दहलाने वाली शाम थी। कुछ ही समय पहले परिवार एक हादसे से गुजरा था। उसी सिलसिले में कुछ सौदा-सुलफ के लिए मैं साइकिल से अपने बाजार कप्तानगंज आया हुआ था। ज्यादातर सामान अभी खरीदा जाना बाकी था कि आसमान में अंधेरा घिरने लगा। उस समय मैं बाजार के चौक पर खड़ा था और आंधी ने देखते-देखते हर चीज को बुरी तरह ढांप लिया। मैंने साइकिल में ताला लगाया, चाभी जेब में रखी और एक दुकान में घुस गया। करीब आधे घंटे के उत्पात के बाद आंधी कुछ कम हुई तो बाहर निकला और पाया कि साइकिल का कहीं नामोनिशान नहीं है।

दिमाग और शरीर जितनी तरफ दौड़ सकता था, दौड़ाया लेकिन नतीजा कुछ नहीं निकला। हारकर एक पखवाड़े में- और जिंदगी में भी- दूसरी बार थाने जाने की हिम्मत की। इससे पहले थाने जाना उसी हादसे के सिलसिले में हुआ था। तब घर में गश खाकर गिरे मेरे पिता और सबसे बड़े भाई को थाने की तरफ से यह संदेश भिजवाया गया था कि मामला खुदकुशी का ही दर्ज हो, मर्डर का नहीं, इसके लिए उन्हें कुछ तो करना पड़ेगा। बहरहाल, जब मैं थाने पहुंचा तो वहां सिपाहीगण आंधी से आये धूल-धक्कड़ की सफाई में जुटे थे और लुंगी-बनियान पहने थाना इंचार्ज तीसरे पहर की नींद असमय टूट जाने से झल्लाए हुए अपना मुंह और मूंछें धोने के गुरुगंभीर काम में अझुराए हुए थे।

मैंने उपन्यासों में पढ़ी तरकीब अपनाते हुए मेज झाड़ रहे एक सिपाही को हवलदार साहब कहकर संबोधित किया। अपनी पारिवारिक मजबूरियां बताईं और इस विपत्ति में अपनी साइकिल खो जाने का दुखड़ा उसके सामने रोया। उसने मेरी बात सुन ली और कहा- वो हैं दरोगा साहब, उन्हीं से बोलो। मैं वहां जाकर खड़ा हो गया, लेकिन दारोगा साहब का हुलिया देखकर कुछ बोलने की हिम्मत नहीं पड़ी। किसी तरह गला साफकर कहा कि साइकिल उठे आधा घंटा से ज्यादा नहीं हुआ है, चोर अभी बाजार में ही कहीं होंगे, कुछ लोग थाने से चले चलें तो शायद मिल जाए। मेरा इतना कहना दारोगा के धीरज पर भारी पड़ गया।

अरे...कौन है ये...कहां से चला आया...थाने से भेज दो...नौकर हैं क्या तुम्हारे? कहां घर है? किसका लड़का है?

जिस सिपाही को मैंने हवलदार साहब कहकर बुलाया था, उसने शायद यह सोचकर कि दरोगा साहब कहीं उसी की पेशी न लगा दें, कहा कि साहब यह मनियारपुर का है। वो जो लटक गया था, उसी का भाई है।

अबतक मेरे सटके हुए गले में थोड़ी तरी आने लगी थी, लिहाजा जोर बांधकर मैंने कहा कि आप ऐसे क्यों बोल रहे हैं? बात तो सिर्फ इतनी सी थी कि अगर थोड़ी कोशिश की जाती तो साइकिल शायद मिल जाती। आप रपट लिख लीजिए और किसी को मेरे साथ भेज दीजिए।

इसके बाद तो दारोगा हत्थे से उखड़ गया- कहां है रपट, लाओ!

मैंने कहा एक सादा कागज दे दीजिए, तुरंत लिख देता हूं।

यहां कागज की दुकान खुली है क्या? चलो, निकलो यहां से। चले आते हैं साले। अरे, इसी ने मारकर टांग दिया होगा अपने भाई को। शकल से ही गुंडा लगता है साला। कैसे जबान चला रहा है चपर-चपर। कागज दे दीजिए, लिख देता हूं! अंदर करो साले को, टांगकर यहीं तोड़ाई करो, साइकिल निकल आएगी अभी नीचे से।

यह मर्म पर चोट थी। कहने-सुनने को अब कुछ बचा नहीं था। लेकिन मन पर पुलिस के खिलाफ एक स्थायी घाव बन चुका था। अवचेतन में पुलिस को लेकर पैठा हुआ भय भी ठीक इसी बिंदु पर पूरी तरह निकल गया। इस घटना के करीब डेढ़ साल बाद इलाहाबाद में रेडिकल वाम छात्र आंदोलन से और उसके जरिए सीपीआई-एमएल लिबरेशन से मेरा जुड़ाव बना।

आंदोलन की राजनीति और विचारधारा अपनी जगह थी लेकिन इस क्रम में पुलिस से मुझे अपने कुछ निजी हिसाब भी चुकता करने थे। जितना वश चला, अगले दस-बारह वर्षों में उन्हें चुकता किया भी गया। किसी दारोगा को थप्पड़ों, घूंसों और लातों से मारने की मेरी इच्छा इलाहाबाद के सीएमपी कॉलेज में 10 जनवरी 1987 को पूरी हुई और खाकी वर्दी पर ईंटे बरसाने के मौके तो न जाने कितनी बार आए-गए। अंततः यह मामला लगभग बराबरी का ही रहा- जिसका जब दांव लग जाए, कूट ले वाला हिसाब था। भोजपुर में यह काम खुद नहीं किया तो मित्रों ने किया और खुद साथ में खड़े होकर आनंद लेते रहे।

बाद में मेरे मित्र-परिचितों के दायरे में कुछ पुलिस वाले भी हुए। एक तो ज्ञानवंत सिंह, जिनका जिक्र पश्चिम बंगाल और अन्य संदर्भों में कई ब्लॉगों पर आ चुका है। उनसे छात्र जीवन छूटने के बाद सिर्फ एक बार आधे घंटे के लिए मेरी मुलाकात हुई और दो बार फोन पर बात हुई। कह नहीं सकता कि अब उनसे मेरे रिश्ते कैसे हैं। और दूसरे विभूति नारायण राय, जिनसे दो-एक बार की अच्छी बातचीत जरूर है लेकिन अवचेतन में दबी किसी टीस ने कभी लगाव नहीं बनने दिया।

आम भारतीय जन के मन में पुलिस की छवि किसी हिंस्र पशु जैसी है। मेरी राय भी इस बारे में ऐसी ही है लेकिन पशुओं के बारे में राय शायद ज्यादातर लोगों की तुलना में जरा बेहतर है लिहाजा मैं पुलिस को लगभग उसी रूप में देखता हूं, जिस तरह मुझसे पचीस पीढ़ी पुराने मेरे पूर्वज राक्षसों को देखते रहे होंगे- मनुष्य का ही एक छवि विस्तार, लेकिन मानवजाति के लिए एक स्थायी खतरा, एक गिरी हुई घृणित जिंदा चीज, जिससे कभी मिले बगैर, जिसकी शक्ल देखे बगैर ही जिंदगी बीत जाए तो खुद को खुशकिस्मत समझना चाहिए।

3 comments:

ALOK PURANIK said...

तब आप पत्रकार न रहे होंगे।
वरना तो पत्रकार के आगे तो पुलिस लगभग दंडवत होती है।
करीब पांच साल पहले मैं मालवीय नगर एक दफ्तर में मुलाकात के लिए गया।
लौटा, तो स्कूटर गायब।
मेरा स्टडेंट पत्रकार था, वहीं, सो खटके से थाने में रिपोर्ट लिखी गयी। कई पेज का वह डोक्यूमेंट अपने आप में व्यंग्य का विषय है। खैर, साहब तीन दिन बाद उस दफ्तर वालों ने बताया कि आपका स्कूटर मिल गया है।
स्कटर मिला क्या दरअसल मैं ही गलत जगह तलाशने चला गया था।
स्कटर वहीं पार्क था। पुलिस उठा कर ले गयी।
मैं पहुंचा थाने। यह सोचते हुए कि काहे को पत्रकार स्टूडेंट को परेशान किया जाये। यह सोचते हुए पहुंचा कि जाऊंगा और स्कटर ले आऊंगा।
वहां एक दीवानजी को मैंने बताया ये रही एफआईआर की कापी और ये रहा स्कूटर, मुझे स्कूटर दीजिये।
दीवानजी हंसने लगे।
बोले-धार879, धारा 755 , धारा 86 के मुताबिक ये स्कूटर तो अब केस प्रापर्टी है।
अलां दिन फलां दिन अदालत में आना पडेगा।
गवाही होगी, क्रास क्वेश्चन होगा
मैंने कहा-हुजूर केस तो बना ही नहीं है। मामला चोरी का है ही नहीं। चोरी हुई नहीं है, तो केस कैसा।
दीवानजी बोले, केस हो या न हो, केस प्रापर्टी तो हो ली।
मैने फिर अपने बालक को फोन लगाया।
पांच मिनट के अंदर थानाध्यक्षजी का फोन मेरे पास आया, जी दीवानजी से बात कराओ, स्कटर आप ले जाओ।
अब मैंने चकराकर पूछा-महाराज ये केस प्रापर्टी, धाराएं। एफआईआर।
थानेदारजी हंसने लगे।
बोले जाइये मस्त रहिये।
वैसे मस्त रहिये आप तो, आप तो अब बाकायदा पत्रकार हैं। आफत तो हम जैसों की है, जो पूरे पत्रकार नहीं माने जाते।

Pramod Singh said...

ओह और आह पुलिस! मगर पुलिस का ही क्‍यों, यहां तो अलग-अलग सेक्‍शंस की पूरी एक हेटलिस्‍ट बनायी जा सकती है!

Nitu said...

पुलिस,पत्रकार, आतन्कवादी, नक्सली और चोर इन सभी मे कोई अन्तर नही है ये सभी आपस मे भाई बन्धु है। तीनो को हराम का खाना अच्छा लगता है।