Friday, September 21, 2007

गले में अटका न्याय का निवाला

कुछ समय पहले गांव गया था। वहां बाजार में हाईस्कूल के अपने दो सहपाठी सूर्यकांत राय और रमाकांत उपाध्याय मिल गए। दसवीं क्लास में वे दोनों मुझसे एक साल पहले से थे और मेरे बाद भी दो साल वहीं रहे। पता नहीं क्या सोचकर दोनों पढ़ाई के दौरान मुझे गुरू कहते थे और इतनी उमर गुजर जाने के बाद भी इसी संबोधन से मुझे संबोधित करते हैं। उनके जीवन की बिल्कुल अलग-अलग और मजेदार दास्तानें हैं, जिनमें से एक यहां मेरे मुद्दे से जुड़ी है और दूसरी का जिक्र सिर्फ क्षेपक के रूप में करना चाहूंगा।

पहले क्षेपक। भाई रमाकांत उपाध्याय को पढ़ाई में जो भी परेशानी हुई वह हाईस्कूल तक ही सीमित रही। उसके बाद का परिवेश उनके लिए प्राकृतिक हो गया और एमए तक के सारे इम्तहान उन्होंने पहली ही बार में प्रथम श्रेणी में पास कर लिए। एमए की पढ़ाई उन्होंने साकेत विश्वविद्यालय से राम जन्मभूमि आंदोलन के दौरान एक मंदिर परिसर में रहते हुए की। एक दिन अपने दो और साथियों के साथ मिलकर उन्होंने फैसला किया कि भारतभूमि पर अन्याय बहुत बढ़ गया है और इसे अब मिटा ही दिया जाना चाहिए।

उसी दिन रात में वे मंदिर के अनधिकृत बूढ़े महंथ के पास गए और बोले कि 'साले तुम हो कौन हमसे हर महीने किराया लेने वाले। किसी दिन मंदिर पर मुसलमान हमला करेंगे तो क्या तुम्हीं इसे बचाओगे?' जवाब में बेचारा महंथ कुछ बोलता, इससे पहले ही उसका मुंह बांध कर उसी की कुबरी से उन्होंने उसे पचास-साठ कुबरी मारा और टेंपो में भरकर सरयू के पार फेंक आए। फिलहाल उसी मंदिर में पूजा-अर्चना का काम देखते हुए एक चिटफंड कंपनी के फील्ड ऑफिसर की भूमिका निभा रहे रमाकांत भाई ने बताया कि मंदिर आंदोलन के दौरान अयोध्या के छोटे-छोटे मंदिरों पर काबिज ऐसे बीसियों कूड़ा-कचरा महंथों का निपटारा हो गया। उनमें से जो उन जैसे शरीफों के हत्थे चढ़े उन्होंने दस-बीस डंडे जरूर खाए लेकिन उनकी जान बच गई। बाकी इहलौकिक कमीनेपन के बाद सात्विक जीवन बिताने के लिए स्वर्ग रवाना कर दिए गए।

रमाकांत उपाध्याय के बरक्स भाई सूर्यकांत राय का जीवन ज्यादा ढर्रे का रहा। एक लोकल कॉलेज से बीए करने के बाद सूर्यकांत ने आजमगढ़ के डीएवी कॉलेज से एलएल. बी. किया और फिर दीवानी कचहरी में एक मेज, दो कुर्सियां और एक छोटी-सी चौकी लगाकर वकालत करने लगे। देश भर में फैले हजारों टीन-टप्पर डिग्री कॉलेजों के लगभग अस्सी प्रतिशत स्नातकों की आगे की पढ़ाई और कैरियर ठीक इसी रास्ते पर आगे बढ़ता है। उनमें भी ज्यादातर अपने लिए कचहरी में बैठने की व्यवस्था नहीं बना पाते और अपनी डिग्री का इस्तेमाल सिर्फ वकील साहब कहलाने में ही कर पाते हैं।

प्रैक्टिस कैसी चल रही है, पूछने पर सूर्यकांत रमाकांत की तरफ देखकर मुस्कराते हैं और पूछते हैं, 'गुरू सच कहें कि झूठ? ' मेरे यह कहने पर कि कुछ भी चलेगा, वे बताते हैं कि शुरू के पांच साल तक तो सब्जी खरीदने के पैसे भी नहीं निकलते थे। फिर एक दिन समझ में आ गया कि साले सीनियर के पीछे घूमने का कोई मतलब नहीं है। बड़े जतन से सीखे गए अपने सीनियर की वकालत के कई दिलचस्प गुर उन्होंने उस दिन की बतकही में बताए, और यह भी कि दलील और नजीर से मुकदमे अब सिर्फ ऊंची अदालतों में, वह भी कभी अपवादस्वरूप ही जीते जाते हैं।

सूर्यकांत के सीनियर के घर दो-तीन नौकर थे, जिनकी ड्यूटी बंधी हुई थी कि रोज सुबह किसी न किसी जज के यहां कोई न कोई चीज पहुंचाते रहें। कभी बाजार से खरीदे हुए पांच किलो आम, इस पुछल्ले के साथ कि गांव में पाल डाली गई थी, कल ही आए हैं। तो कभी गोशाला से खरीदा हुआ दो किलो दूध, इस टेलीफोनिक बातचीत के साथ कि भैंस बियाई हुई है, कल से ही दूध साफ हुआ है। मुवक्किल सुबह से ही आकर डेरा जमाए हुए हैं। उनके सामने किसी जज के लिए आम, किसी के लिए सब्जी तो किसी के लिए दूध पहुंचाती हुई नौकरों की पलटन वकील साहब की फीस बरबस ही बढ़ा देती है। सारे जज जिसके इतने करीबी हों वह फैसला तो जिस केस में जो चाहेगा वही लिखवा लेगा।

एक तरफ निचले स्तर पर न्याय की यह हालत है, दूसरी तरफ पूरा देश सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्टों के न्यायमूर्तियों से समूची कार्यपालिका को न्यायोचित ढंग से चलाने की उम्मीद बांधे बैठा है- यह एक ऐसा विरोधाभास है, जिसका कोई सिर-पैर आज तक मेरी समझ में नहीं आया। करीब तीन साल पहले मैंने अपनी परिचित एक प्रतिष्ठित महिला वकील से माननीय न्यायमूर्ति सब्बरवाल के बेटों के नाम नोएडा में फटाफट कट रहे प्लॉटों का जिक्र किया था। साथ में यह भी उन्हें बताया था कि उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री और उनके दिल्ली स्थित सिपहसालार बिंदास बोलते रहे हैं कि राज्य सरकार के खिलाफ कोई भी मुकदमा इलाहाबाद या लखनऊ से उठकर किसी तरह दिल्ली चला आए तो फिर उन्हें चिंता करने की कोई जरूरत ही नहीं है। वकील साहिबा को मेरी बात पर यकीन नहीं हुआ।

आज हकीकत सामने है, लेकिन जिन लोगों ने हिम्मत करके इस जानी-पहचानी बात का खुलासा किया उन्हें अदालत की अवमानना के आरोप में जेल की सजा सुना दी गई (दस हजार के मुचलके पर उन्हें छोड़ दिया गया, यह और बात है)। इस केस में क्या होता है और सब्बरवाल साहब का इस सिलसिले में क्या बनता है, इसमें कोई खास बात नहीं है। खास बात यह है कि यह एक टेस्ट केस है। अदालतों में भ्रष्टाचार अन्य किसी भी संस्था की तुलना में कहीं ज्यादा गहरा है लेकिन ऊपर कुछ अपवाद भी देखने को मिल जाते हैं। ये अपवाद भी अब खत्म हो गए तो न्याय को लेकर देश में बना हुआ रहा-सहा भ्रम भी जाता रहेगा।

2 comments:

अनिल रघुराज said...

राम जन्मभूमि आंदोलन में अयोध्या के कुछ मंदिरों महंतों के इस निपटारे का सच तो अद्भुत खबर है। इसे तो बाकायदा किसी रिपोर्टर को अच्छी तरह कवर करके बाई-लाइन लेनी चाहिए। और अदालत के इस भ्रष्टाचार को बाकायदा 'कोर्ट क्राफ्ट' कहा जाता है, जिसमें घी और आम या दूध ही नहीं, लड़कियों तक की सप्लाई शामिल है।

संजय तिवारी said...

इस तरह के लेखन के लिए हिम्मत चाहिए. अदालतें पवित्र गाय कतई नहीं हैं जिनपर अंगुली नहीं उठायी जा सकती.