Monday, June 25, 2007

साम्यवाद क्या है

साहब सलाम ब्लॉग पर रमाशंकर शर्मा ने मार्क्सवाद और साम्यवाद के बारे में किसी बहस के क्रम में उठे ढेर सारे सवालों के जवाब मांगे हैं। वहां एक कमेंट मैंने लिखा जो पता नहीं क्यों प्रकाशित नहीं हुआ। मामूली हेर-फेर के साथ उसे ही यहां चिपका रहा हूं-

'प्यारे भाई, इतने सारे सवालों का जवाब आपको ब्लॉग पर कौन देगा, और किसी तरह दे भी दे तो आप क्या उसे आत्मसात कर पाएंगे? बहरहाल, इनमें कुछ के जवाब आपको एमिल बर्न्स की हिंदी में अनूदित पतली सी किताब 'साम्यवाद क्या है' में मिल जाएंगे। किताब आपको किसी पुरानी पीपीएच की दुकान या किसी कम्युनिस्ट बुद्धिजीवी से मिल जाएगी। जो चीजें वहां नहीं मिलेंगी, वे छोटी कुंजी के रूप में यहां बताई जा सकती हैं। मसलन, रूस और चीन के साम्यवाद में सिद्धांततः कोई अंतर नहीं है। फर्क एक ही सिद्धांत के तहत बनी दोनों की राजनीतिक व्यवस्थाओं में है, जो काफी कुछ उनकी क्रांतिपूर्व स्थितियों पर और कुछ हद तक उनकी कम्युनिस्ट पार्टियों की क्रांतिकारी रणनीतियों की उपज रहीं। रूस बीसवीं सदी की शुरुआत में एक पिछड़ा यूरोपीय औद्योगिक देश था, जबकि चीन बीसवीं सदी के मध्य में एक पिछड़ा एशियाई खेतिहर देश था। दोनों ही देश क्रांति के समय यानी क्रमशः प्रथम और द्वितीय विश्वयुद्ध के अंतिम दौर में बुरी तरह युद्धजर्जर थे। इनके क्रांतिपूर्व शासक अपने फौजी जनरलों पर बुरी तरह निर्भर थे और क्रांति न होती तो दोनों ही जगह दस-बीस साल कोई फौजी जनरल ही राज कर रहा होता। सामाजिक स्थितियों के अनुरूप रूस में क्रांति मजदूरों की अगुआई में संपन्न हुई जबकि चीन में यह भूमिका किसानों ने निभाई- कम्युनिस्ट पार्टियां इनके संगठन की रीढ़ बनीं।

रूस में साम्यवाद क्यों विफल रहा, इसका आकलन दुनिया भर के कम्युनिस्ट अभी कर ही रहे हैं। मुझे इसकी मुख्य वजह एक ठस किस्म की तानाशाही लगती है, जिसने वहां अस्सी का दशक आते-आते अभूतपूर्व बौद्धिक, सामाजिक, आर्थिक जड़ता को जन्म दिया। पांच-सात साल पहले अफगानिस्तान में गई रूसी फौज अस्सी का दशक बीतते बुरी तरह मार खाने लगी और अमरीकियों ने 1960 से शुरू हुए शीतयुद्ध को इतना खर्चीला बना दिया कि 1990 आते-आते रूसी अर्थव्यवस्था की कमर ही टूट गई। सत्तर से शुरू होकर अस्सी के दशक में परवान चढ़ी सूचना क्रांति ने रूसियों के अंदर इस जड़ता से उपजे हीनताबोध को और गहरा कर दिया और वे पूरी तरह कम्युनिस्ट हुकूमत के खिलाफ हो गए। चीन में भी तानाशाही का मर्ज कोई कम गहरा नहीं है लेकिन उसके आर्थिक विकास की गति इतनी तेज है कि उसमें जड़ता के लिए गुंजाइश कम है। मोटे तौर पर कहें तो रूस में गाड़ी खड़े-खड़े जंग खा गई जबकि चीन में इसका कभी भी एक्सीडेंट हो जाने की आशंका बनी हुई है।

एक शासन व्यवस्था की विचारधारा के रूप में साम्यवाद के प्रदर्शन से मैं ज्यादा प्रभावित नहीं हूं, हालांकि रुग्ण जातिवाद और सांप्रदायिक उन्माद जैसी बीमारियों से उसने अपने समाज को ग्रस्त नहीं होने दिया। पिछले डेढ़ सौ वर्षों से मार्क्सवाद को ही साम्यवादी विचारधारा का पर्याय समझा जाता है, यह बात और है कि विविध रूपों में साम्यवादी सोच वाली विचारधाराएं दुनिया भर में हजारों साल से अस्तित्व में रहती आई हैं। इन्हें आदिम साम्यवाद और दूसरे-दूसरे नामों से पुकारा जाता है और भारत में इनकी बानगी ऋग्वैदिक ऋचाओं से लेकर बौद्ध धम्मसंघों तक में देखी जा सकती है।

पिछले डेढ़-दो सौ वर्षों से चल रहे दुनिया के कारोबार का ढांचा समझने के लिहाज से मार्क्सवाद एक उत्तम विचारधारा है। यहां मार्क्सवाद से मेरा तात्पर्य कार्ल मार्क्स और फ्रेडरिक एंगेल्स के लेखन से है। उच्च कोटि के मार्क्सवादी साहित्य की श्रेणी में मैं वी. आई. लेनिन की क्रांतिकारी रणनीति से संबंधित कुछ प्रस्थापनाओं और एशियाई समाजों के बारे में माओ त्से तुंग के गहरे प्रेक्षणों को भी शामिल करना चाहूंगा। इन सभी लोगों का कद इतना बड़ा हो चुका है कि इनके लिखे में से गेहूं और भूसा अलग करना कम्युनिस्ट दायरों में असंभव माना जाता है। लेकिन मुझे लगता है कि एक दिन कम्युनिस्टों को यह फर्क करना ही होगा कि इनकी कही किन बातों का सर्वकालिक महत्व है और क्या-क्या इन्होंने महज फौरी जरूरतों के तहत कहा है।

अभी के समाज में मेहनत और ईमानदारी की कमाई खाने वालों के लिए इज्जत की जिंदगी चाहने वाली आंदोलनकारी धाराओं के लिए साम्यवाद एकमात्र नहीं तो कुछेक सर्वश्रेष्ठ विचारधाराओं में से एक है। हालांकि खुद को मार्क्सवाद की होलसेल विक्रेता समझने की सोच से ग्रस्त कम्युनिस्ट पार्टियों के डिब्बाबंद ढांचे को देखकर कभी-कभी अपनी इस आस्था पर शक होने लगता है।

... और हां, मैं यह कतई नहीं मानता कि सोच-समझ पर मार्क्सवादियों या किन्हीं और तरह के वामपंथियों की कोई इजारेदारी हो सकती है (संदर्भ- रियाजुल हक के ब्लॉग पर छपे अरुंधति रॉय के साक्षात्कार का शीर्षक)। सभ्यता के जिस संकट से हम गुजर रहे हैं वह जल्द ही पारंपरिक वामपंथ और दक्षिणपंथ, दोनों का ही बाजा बजा देगा। इससे निपटने के लिए जहां जो कुछ भी लिखा-पढ़ा, कहा-सुना जा रहा है, उसे ध्यान से सुनने, गुनने और सोच समझकर ही उसके बारे में कुछ कहने की जरूरत है। रास्ता जो भी निकलेगा, वह पूरे समाज की कोख से निकलेगा, किसी डिब्बाबंद विचारधारा के गर्भ से नहीं। हां, इस संदर्भ में आपकी चिंता अगर यहीं तक सीमित हो कि ढोल पीटकर या गाल बजाकर किसी तरह लोगों का ध्यान अपनी तरफ खींच लें, तो बात और है। '

9 comments:

Rama said...

धन्यवाद,
आपने इतना बता दिया कि साम्यवाद का अर्थ स्पष्ट होने लगा है. रही बात ढोल पीटने वाली तो मेरा उद्देश्य कतई ऐसा नहीं है. यह जरूर है कि जिस शब्द को हम आए दिन बोलते है उसके बारे में जानना तो चाहिये. हां कई बार यह अल्पज्ञानियों से मिलता है तो अधकचरा हो जाता है. बस इसलिये मैने ब्लागजगत का सहारा लिया.
एक बार पुनः धन्यवाद.
एक चीज और है साम्यवाद और समाजवाद पर भी थोड़ी रोशनी डाल देते तो आभारी रहता.

Sanjay Tiwari said...

"रास्ता जो भी निकलेगा, वह पूरे समाज की कोख से निकलेगा, किसी डिब्बाबंद विचारधारा के गर्भ से नहीं।"
यह अच्छी समझ से निकला वाक्य है. लगता है आप विकल्प पर लिखते-पढ़ते रहते हैं.

अभय तिवारी said...

सही जवाब दिये चन्दू भाई.. हालांकि विस्तार तो और कितना भी किया जा सकता था..

Pramod Singh said...

संक्षिप्‍त, सटीक, मस्‍त टिप्‍पणी.. गुननेवाले गुनें, गाल बजानेवाले बजायें गाल.

king teja said...

महोदय दी....
नमस्कार.
आपके द्वारा लिखा लेख सम्यवाद और वामपंथी का मिश्रण फीचर लेख के समान है।
काबिले-तारीफ लेख।

Gorakhnath Kathepure said...

क्या आपको साम्यवाद,समाजवाद,मार्क्सवाद,प्रगतिवाद आदि में भेद नजर आता है?अगर भेद नजर आता है तो उसके बारे में आपने टिप्पणी भी नहीं दी इसलिए आपका आलेख आपकी स्थापनाओंका ही समाधान नहीं कर पा रहा है।

ARUN KUMAR YADAV said...

good

The Dream Saler said...

बहुत अच्छा लेख है और comments भी। कई शब्दों के अर्थ जानने समझने, और उनकी पृष्ठभूमि के बारे में काफी व्याख्यापरक और ज्ञानपूर्ण लेख लगा। धन्यवाद।

Tarsem Singh said...

communist hone k liye nastik hona jaruri h kya