Tuesday, June 5, 2007

दास्तान-ए-ग़ैब-5

प्रकाश के बारे में मुझे जो भी जानकारी मिल पाई है, उसका जरिया अजय ही है। वह हम दोनों का साझा दोस्त है। दोस्त, यानी कोई लंगोटिया यार नहीं, बस वैसा ही दोस्त, जैसे नौकरी-चाकरी के दौरान बनते हैं। जैसा मैं पहले ही बता चुका हूं, प्रकाश में एक नजर में दिख जाने या अपनी तरफ खींच लेने वाली कोई बात नहीं थी। न ट्रेजेडी, न कॉमेडी। इधर कुछ समय से उसके साथ कुछ विचित्र घटनाएं घट रही थीं लेकिन इनका स्वरूप ही कुछ ऐसा था कि इनके बारे में किसी के साथ वह साझा नहीं कर सकता था। अलबत्ता बीच-बीच में अजय को अपनी कुछ परेशानियां वह जरूर बता देता था।

जुलाई का दूसरा हफ्ता खत्म हो रहा था और आसमान में बादलों का नहीं नामोनिशान नहीं था। भयंकर गर्मी से राहत सिर्फ हर तीसरी-चौथी शाम उठने वाली धूल भरी आंधियों से मिलती थी। इससे पारा 44-45 डिग्री का दायरा पार नहीं कर पाता था लेकिन माहौल ज्यों का त्यों दमघोंटू बना रहता था। दिन-रात पसीने की चिपचिपाहट हवा में लटकी हुई धूल की किरकिराहट के साथ मिलकर जीना मुश्किल बनाए हुए थी। हालत यह थी कि लोग चाहे छत पर खुले में सोने वाले हों या फिर पंखे, कूलर, एसी की हवा में, चैन की नींद किसी को भी मयस्सर नहीं हो पा रही थी।

ऐसी ही एक शाम प्रकाश दफ्तर से निकला और स्कूटर स्टार्ट कर घर की तरफ बढ़ चला। एक ही संस्थान में दस-पंद्रह साल की नौकरी के बाद आदमी के लिए घर से दफ्तर और दफ्तर से घर जाना सामने रखी थाली से कौर उठाकर मुंह में ले जाने जैसा हो जाता है। आंधी हो, पानी हो, रात हो, दिन हो, बीमारी हो या आराम हो, सिर्फ आंख खुली होनी चाहिए- अपनी मंजिल तक आप खुद ब खुद पहुंच जाते हैं। लेकिन पता नहीं क्या हुआ, प्रकाश उस दिन रास्ता भटक गया।

ज्यादा भीड़ में न फंसना पड़े, इसलिए उसने आने और जाने के लिए अलग-अलग रास्ते बना रखे थे। दफ्तर से घर जाने के रास्ते में वह गलियों-गलियों होकर निकलता था। कोई पंद्रह किलोमीटर लंबे इस रास्ते में हाईवे सिर्फ एक किलोमीटर पड़ता था। फिर गलियों-गलियों होता हुआ ही वह अपने घर पहुंचता था।

उस दिन उसने शुरू की गलियां पार कर ली थीं और हाईवे पर पहुंच गया था, लेकिन हाईवे से उतरने के बाद ही कुछ घपला हो गया। उसने कोई गलत मोड़ काट लिया, या क्या हुआ, लेकिन थोड़ी देर में ही उसे पता चल गया कि वह अपने घर की तरफ नहीं जा रहा है। न जाने कितनी देर तक कितनी गलियां भटक लेने के बाद उसने हारकर अजय के मोबाइल पर फोन किया और उसे बताया कि अपने घर के बिल्कुल करीब पहुंचकर वह पता नहीं कहां फंस गया है।

उसने यह फोन अजय को ही क्यों किया, घर पर किसी को क्यों नहीं बताया, यह एक अलग मसला था। उसे लगा कि यह बात जिससे भी कहेगा वह उसपर हंसेगा और उसकी मुश्किल सुलझने के बजाय और उलझ जाएगी। लेकिन इस मामले में अजय से भी उसकी उम्मीद कुछ ज्यादा ही थी क्योंकि फोन पर उसकी समस्या सुनकर अजय भी हंसे बिना नहीं रह सका। मजे की बात यह कि फोन पर प्रकाश अपनी लोकेशन भी बिल्कुल नहीं बता पा रहा था।

'आस-पास सब तरफ एक ही जैसे मकान हैं, तीन-तीन मंजिलों के सटे-सटे फ्लैट। कोई बाहर भी घूमता दिखाई नहीं दे रहा, जिससे रास्ता ही पूछ लें...'

'तुम पीछे आकर वापस हाईवे पर ही क्यों नहीं पहुंच जाते...'

'...कोशिश की थी...आगे तक गया तो पता चला, गेट बंद है, फिर पीछे आया तो इधर भी गेट बंद नजर आ रहा है...कोई चौकीदार भी नहीं है, जिससे गेट खुलवा लें...'

'ऐसा कैसे हो सकता है? अभी आठ भी नहीं बजे हैं...गेट कैसे बंद हो जाएंगे...देखो वहीं आसपास, कोई चौकीदार होगा जरूर...'

'... ...'

'प्रकाश?'

'ऊं...'

'प्रकाश, तुम ऐसा करो, किसी भी घर की घंटी बजा दो और बोलो कि गलती से इस लेन में आ गए थे...कोई जिम्मेदार आदमी होगा तो गेट खुलवा देगा...'

'यहां अंधेरा है...कहीं कोई बल्ब भी नहीं जल रहा...घंटी बजाई, दरवाजे खटखटाये...कहीं से कोई आवाज ही नहीं आ रही...'

इतना सुनने के बाद अजय का माथा भन्नाने लगा। यह कतई संभव ही नहीं है। दिल्ली के आसपास की एक भी कॉलोनी ऐसी नहीं है जहां आठ बजे बिल्कुल सन्नाटा छा जाता हो। जहां एक कुत्ता भी न बोलता हो और जहां बिजली चली जाने के बाद किसी की हैसियत इनवर्टर या जेनरेटर से एक बल्ब जला लेने की भी न हो।

अजय को अचानक उस दिन की याद आई, जब प्रकाश चाय की दुकान से बिना पैसे दिए वापस आया था, और उस दिन की भी, जब वह रात में एक खाल उतारे हुए आदमी का सपना देखने के बाद सीधे उठकर ढाई सौ मील दूर अपने घर के लिए रवाना हो गया था।

काफी सोच-विचारकर उसने मोबाइल पर कहा, 'हलो, प्रकाश...तुम जहां हो, वहीं स्कूटर खड़ा करके चैन से बैठो। डर लगे तो लाइट जला लो और बीच-बीच में हॉर्न मारते रहो। मैं पंद्रह मिनट के अंदर तुम्हारे आस-पास पहुंच रहा हूं...वहीं कोई तरीका सोचते हैं...'

1 comment:

ANIL YADAV said...

यह एक तरह का नजरबंद है। शायद इसी काऱण खाते पीते लोगों को हाशिए पर फेंक दिए लोग नजर नहीं आते और वे खुद को।

बिल्कुल हमारे जीवन की कहानी के अगले मोड़ की प्रतीक्षा है। जमाए रहिए।