<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-5004531893346374759</id><updated>2012-02-01T10:52:18.462-08:00</updated><category term='blah-blah'/><category term='कुत्तानामा'/><category term='इक झलक'/><category term='नरम गरम गरम'/><category term='कुछ मुझ से ....'/><category term='चलते-चलते'/><category term='बातचीत'/><category term='आस्था'/><category term='राजनीति'/><category term='दस्तावेज'/><category term='होमो'/><category term='बहस'/><category term='लौटते हुए'/><category term='सवाल'/><category term='कुछ सवाल'/><category term='कहानी'/><category term='पक्षी प्रकरण'/><category term='कुछ निवेदन'/><category term='कवितायेँ'/><category term='प्रस्ताव'/><category term='विज्ञान दर्शन'/><category term='काम-धंधा'/><category term='खोज-बीन'/><category term='पर्दा है पर्दा'/><category term='गणित गाथा'/><category term='सभ्यता विमर्श'/><category term='बड़ों की बड़ी बात'/><category term='दोस्त'/><category term='खेल-खिलाड़ी'/><category term='लेखक'/><category term='तुक्के'/><category term='लोकनायक'/><category term='गिलहरी ज्ञान'/><category term='morning'/><category term='गुत्थी'/><category term='वाम से काम'/><category term='यूं ही कुछ'/><category term='डील-पैंतरा'/><category term='कार्यकर्ता की डायरी'/><category term='खेलकूद'/><category term='रामझरोखा'/><category term='नेपाली क्रांति कथा'/><category term='कविताएं'/><title type='text'>पहलू</title><subtitle type='html'>रात का राही</subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://pahalu.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' 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uri='http://www.blogger.com'>Blogger</generator><openSearch:totalResults>235</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>100</openSearch:itemsPerPage><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5004531893346374759.post-3818777233445834632</id><published>2012-01-30T22:25:00.000-08:00</published><updated>2012-01-30T22:46:32.209-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कविताएं'/><title type='text'>बाल को बाल ही रहने दो</title><content type='html'>श्रीमानजी, &lt;br /&gt;आज आपके श्रीमुख से काफी घुमा-फिरा कर यह सुनना अच्छा लगा&lt;br /&gt;कि स्वयं को आप मालिक की नाक का बाल समझते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं आपको बताऊंगा नहीं, लेकिन हकीकत यही है&lt;br /&gt;कि यहां काम करने वाले लोग आपको कहीं और का ही बाल समझते हैं-&lt;br /&gt;इतनी गर्हित जगह का, कि कभी उसे जताना भी ठीक नहीं समझते।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खुद मालिक आपको कहां का बाल समझता है, यह तो रहने ही दें&lt;br /&gt;इस दुनिया में कुछ बातें ऐसी होती हैं, जिन्हें इंसान खुद से भी छुपाता है-&lt;br /&gt;आपकी भंगिमा बताती है कि यह बात आप अच्छी तरह जानते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बहरहाल,&lt;br /&gt;कहीं के भी हों, कुल मिलाकर हैं तो बाल ही-&lt;br /&gt;ज्यादा तनतनाएंगे तो किसी दिन बिना शेविंग क्रीम लगाए काट दिए जाएंगे&lt;br /&gt;पता भी नहीं चलेगा कि इतने भले बाल को किसने काटा, और आखिर क्यों।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5004531893346374759-3818777233445834632?l=pahalu.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://pahalu.blogspot.com/feeds/3818777233445834632/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5004531893346374759&amp;postID=3818777233445834632' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5004531893346374759/posts/default/3818777233445834632'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5004531893346374759/posts/default/3818777233445834632'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://pahalu.blogspot.com/2012/01/blog-post_30.html' title='बाल को बाल ही रहने दो'/><author><name>चंद्रभूषण</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11191795645421335349</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5004531893346374759.post-5061574442857411668</id><published>2012-01-07T03:02:00.000-08:00</published><updated>2012-01-07T03:20:15.758-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='आस्था'/><title type='text'>गीता और फैसले का क्षण</title><content type='html'>रूस की एक अदालत में गीता को आतंकवाद समर्थक ग्रंथ घोषित करने का मुकदमा अभी चर्चा से बाहर भी नहीं हुआ था कि भारतीय मूल के जाने-माने ब्रिटिश अर्थशास्त्री लॉर्ड मेघनाद देसाई ने भारत में ही आयोजित एक सेमिनार में इसे जनसंहार समर्थक ग्रंथ बता दिया। इतना ही नहीं, देसाई ने महात्मा गांधी द्वारा गीता को अंगीकार किए जाने को उनके अहिंसा सिद्धांत से एक बड़ा विचलन बताया और इसे हिटलर के बारे में उनकी उस टिप्पणी से जोड़कर देखा, जिसमें हिटलर को ‘सभी दुर्गुणों से रहित, साफ सोच वाला एक शाकाहारी बौद्धिक’ कहा गया था।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;अगर कोई गांधी वाङ्मय के आधार पर उनकी सोच और उनके बयानों में मौजूद विसंगतियां दर्ज करने निकले तो उसे निराश नहीं होना पड़ेगा, क्योंकि वहां इनकी कोई कमी नहीं है। लेकिन अगर गांधी के दोषों की धुरी गीता के साथ उनके रिश्ते को बनाया जाए तो बहुत सारे लोगों को एक साथ कठघरे में खड़ा करना पड़ेगा। अभी यह सोच कर अजीब लगता है, लेकिन भारत के स्वाधीनता आंदोलन में गीता ने कमोबेश केंद्रीय ग्रंथ जैसी भूमिका निभाई थी। स्वराज आंदोलन के नेता लोकमान्य तिलक, कम्युनिस्ट आंदोलन से जुड़ी ऑल इंडिया किसान सभा के पहले अध्यक्ष स्वामी सहजानंद सरस्वती और भूदान आंदोलन के प्रेरणा स्रोत विनोबा भावे जैसे अलग-अलग धाराओं के आंदोलनकारियों ने इसकी भाषा टीका लिखी थी।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;इसकी वजह अगर सिर्फ यह होती कि यह किताब भारत के लगभग सभी उच्च जातीय मध्यवर्गीय हिंदू घरों में एक धर्मग्रंथ के रूप में मौजूद थी, तो कहना होगा कि देश में ऐसी हैसियत वाली यह अकेली किताब नहीं थी। हिंदू धर्म कोई ग्रंथ या पैगंबर आधारित धर्म तो है नहीं। गीता की मान्यता वैष्णवों में ज्यादा है तो शैवों-शाक्तों में दूसरे ग्रंथ पॉपुलर रहे होंगे। जिन शंकराचार्य को आधुनिक हिंदू धर्म का संस्थापक कहा जाता है, उनके भी चिंतन और कर्म में गीता का कोई विशेष स्थान नजर नहीं आता।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;जाहिर है, भारत के स्वाधीनता आंदोलन में गीता की लोकप्रियता की वजह कुछ और थी। शायद चिंतन के बजाय कर्म पर इसका अतिरिक्त जोर, शायद संबंधों और संस्थाओं को शाश्वत न मानने का इसका आग्रह, शायद ईश्वर और मनुष्य के बीच हुई सीधी बातचीत पर आधारित इसकी रूपरेखा, जिसने भारतीयों को एक ऐसी हुकूमत के खिलाफ बगावत का झंडा बुलंद करने की हिम्मत दी, जिसके राज में सूरज नहीं डूबता था और जिसे तब की दुनिया सूरज के उगने और डूबने जितना ही शाश्वत सत्य मान कर चल रही थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गीता मैंने विधिवत कभी नहीं पढ़ी, न ही आगे कभी ऐसा करने के आसार हैं। सिर्फ उसके कुछ चलताऊ श्लोक जब-तब कान में पड़ते रहे हैं, जिनका मतलब सुविधानुसार कभी कुछ भी लगाया जा सकता है। लेकिन अपने कार्यकर्ता जीवन में एक बार मैंने इस ग्रंथ पर स्वामी सहजानंद सरस्वती की टीका जरूर पढ़ी है, और वह इतनी दिलचस्प थी कि एक बार शुरू कर देने के बाद छोडऩे का मन नहीं करता था। किताब मेरे पास ज्यादा देर टिकी नहीं, लिहाजा उसे भी पूरा पढऩे का मौका नहीं मिला। लेकिन करीब बीस साल गुजर जाने के बाद भी उसके एक अध्याय ‘फैसले का क्षण’ की कुछ झलकियां मेरे दिमाग में शेष हैं, जिन्हें मैं यहां शेयर करना चाहूंगा।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;फैसले हमारी रोजमर्रा जिंदगी का हिस्सा हुआ करते हैं, लेकिन कुछ फैसले हमारी जिंदगी की दिशा तय कर देते हैं। सामाजिक कार्यकर्ताओं और राजनेताओं के बड़े फैसलों के साथ कुछ और भी पहलू जुड़े होते हैं। मसलन, उनका असर आंदोलन और समाज के भविष्य पर पड़ता है। आम तौर पर ये फैसले भी तात्कालिकता के दबाव में लिए जाते हैं, लेकिन इन्हें हम विजनरी फैसले नहीं कहते। सवाल यह है कि विजनरी फैसला क्या है और इसे लिया कैसे जाए। ‘फैसले का क्षण’ इसी सवाल का जवाब खोजने की कोशिश है।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;स्वामी सहजानंद ने इस अध्याय में ‘अर्जुन मोह’ की व्याख्या की है, जो लॉर्ड देसाई की नजर में होलोकॉस्ट को जायज ठहराने जैसा है। स्वामीजी लिखते हैं कि बड़ा फैसला सिर्फ और सिर्फ इतिहास को हाजिर-नाजिर मान कर लिया जाना चाहिए। कृष्ण का अर्जुन को विराट रूप दिखाना एक योद्धा को इतिहास के सामने ला खड़ा कर देने के अलावा कुछ और नहीं है। समय के सामने न व्यक्तियों की कोई औकात है न रिश्तों की- आपको सिर्फ उन मूल्यों से जोड़कर याद किया जाएगा, जिनके लिए आपने संघर्ष किया था।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5004531893346374759-5061574442857411668?l=pahalu.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://pahalu.blogspot.com/feeds/5061574442857411668/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5004531893346374759&amp;postID=5061574442857411668' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5004531893346374759/posts/default/5061574442857411668'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5004531893346374759/posts/default/5061574442857411668'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://pahalu.blogspot.com/2012/01/blog-post_07.html' title='गीता और फैसले का क्षण'/><author><name>चंद्रभूषण</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11191795645421335349</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' 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किया जाने लगा है&lt;br /&gt;उसी तरह चीजें भी चिंतित हैं&lt;br /&gt;कि उनका अच्छी तरह &lt;br /&gt;इस्तेमाल नहीं किया जा रहा है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चीजों का इस्तेमाल करें, लोगों से प्यार&lt;br /&gt;यह सूत्रवाक्य बड़े जतन से लिखी गई&lt;br /&gt;एक आधुनिक नीतिकथा में पढ़ा&lt;br /&gt;जो असल में चीजों से प्यार &lt;br /&gt;और लोगों का इस्तेमाल करने की&lt;br /&gt;सोच के विरोध में लिखी गई थी&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रफूगरों की कब्र पर खिले&lt;br /&gt;कबाड़ियों के फूल बताते हैं कि&lt;br /&gt;लोगों और चीजों का यह द्वैत बेमानी है&lt;br /&gt;अपने भीतर का रफूगर हम जिंदा नहीं रखते&lt;br /&gt;तो बेहतर होगा कि खुद को&lt;br /&gt;कबाड़ी की ही शक्ल में देखने लगें&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5004531893346374759-6390114877539593061?l=pahalu.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://pahalu.blogspot.com/feeds/6390114877539593061/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5004531893346374759&amp;postID=6390114877539593061' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5004531893346374759/posts/default/6390114877539593061'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5004531893346374759/posts/default/6390114877539593061'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://pahalu.blogspot.com/2012/01/blog-post.html' title='कबाड़ी और रफूगर'/><author><name>चंद्रभूषण</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11191795645421335349</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5004531893346374759.post-4214632583670820650</id><published>2011-12-29T22:02:00.000-08:00</published><updated>2011-12-30T22:43:02.928-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कविताएं'/><title type='text'>अंगूठी</title><content type='html'>मुझे इसको निकाल कर आना था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;या फिर चुपचाप पिछली जेब में रख लेता&lt;br /&gt;बैठने में जरा सा चुभती, और क्या होता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;किसी गंदी सी धातु के खांचे में खुंसे&lt;br /&gt;लंबोतरे मूंगे वाली यह बेढब अंगूठी&lt;br /&gt;हर जगह मेरी इज्जत उतार लेती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक नास्तिक की उंगली में &lt;br /&gt;अंगूठी का क्या काम&lt;br /&gt;वह भी ऐसी कि आदमी से पहले &lt;br /&gt;वही नजर आती है&lt;br /&gt;जैसे ऊंट से पहले ऊंट का कूबड़।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब किस-किस को समझाऊं कि&lt;br /&gt;क्यों इसे पहना है&lt;br /&gt;क्या इसका औचित्य है &lt;br /&gt;और निकाल कर फेंक देने में&lt;br /&gt;किस नुकसान का डर सता रहा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्यारे भाई, और कुछ नहीं&lt;br /&gt;यह मेरी लाचारगी की निशानी है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक आदमी के दिए इस भरोसे पर पहनी है&lt;br /&gt;कि पिछले दो साल से इतनी खामोशी में&lt;br /&gt;जो तूफान मुझे घेरे चल रहा है&lt;br /&gt;वह अगले छह महीने में &lt;br /&gt;मुझे अपने साथ लेकर जाने वाला था&lt;br /&gt;लेकिन इसे पहने रहने पर&lt;br /&gt;अपना काम पूरा किए बिना ही गुजर जाएगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इतने दिन तूफानों में मजे किए&lt;br /&gt;आने और जाने के फलसफे को कभी घास नहीं डाली&lt;br /&gt;लेकिन अब, जब खोने को ज्यादा कुछ बचा नहीं है&lt;br /&gt;तब अंगूठी पहने घूम रहा हूं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक पुरानी ईसाई प्रार्थना है-&lt;br /&gt;जिन चीजों पर मेरा कोई वश नहीं है,&lt;br /&gt;ईश्वर मुझे उनको बर्दाश्त करने की शक्ति दे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सवाल यह है कि&lt;br /&gt;मेरे जैसे लोग, ईश्वर के दरबार में &lt;br /&gt;जिनकी अर्जी ही नहीं लगती&lt;br /&gt;वे यह शक्ति भला किससे मांगें।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जवाब- मूंगे की अंगूठी से।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्यारे भाई,&lt;br /&gt;तुम, जो न इस तूफान की आहट सुन सकते हो&lt;br /&gt;न इसमें घिरे इंसान की चिल्लाहट-&lt;br /&gt;अगर चाहो तो इस बेढब अंगूठी से जुड़े &lt;br /&gt;हास्यास्पद दृश्यों के मजे ले सकते हो।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुझे इससे कोई परेशानी नहीं है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बस, इतनी सी खुन्नस जरूर है&lt;br /&gt;कि इस मनोरंजन में मैं तुम्हारा साथ नहीं दे पा रहा हूं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5004531893346374759-4214632583670820650?l=pahalu.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://pahalu.blogspot.com/feeds/4214632583670820650/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5004531893346374759&amp;postID=4214632583670820650' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5004531893346374759/posts/default/4214632583670820650'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5004531893346374759/posts/default/4214632583670820650'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://pahalu.blogspot.com/2011/12/blog-post_29.html' title='अंगूठी'/><author><name>चंद्रभूषण</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11191795645421335349</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5004531893346374759.post-6412347725715536011</id><published>2011-12-27T22:10:00.000-08:00</published><updated>2011-12-27T22:40:43.505-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कवितायेँ'/><title type='text'>परिचित चेहरे</title><content type='html'>मुस्कुराते हुए वे कभी-कभी&lt;br /&gt;इतने करीब चले आते हैं&lt;br /&gt;कि उनकी सांसें &lt;br /&gt;मेरे चेहरे से टकराने लगती हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अचकचाहट में नमस्कार के लिए &lt;br /&gt;जुड़ जाती हैं हथेलियां&lt;br /&gt;या आगे बढ़कर &lt;br /&gt;उनके हाथ थाम लेने के लिए &lt;br /&gt;भीतर खुजली सी होने लगती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन हर बार उनकी दिशा &lt;br /&gt;कुछ और होती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कभी वे मेरे पीछे खड़े किसी सज्जन से &lt;br /&gt;मिलने को लपक रहे होते हैं&lt;br /&gt;तो कभी वहां मेरी उपस्थिति से भी अनजान&lt;br /&gt;मन ही मन कोई धुन गुनगुनाते हुए&lt;br /&gt;खुद से ही मिले हुए होते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पहले ऐसी घटनाओं में&lt;br /&gt;अपनी बेतरह शर्मिंदगी को मैं&lt;br /&gt;जबरन झुठला दिया करता था&lt;br /&gt;पर इधर ये कुछ ज्यादा ही बढ़ गई हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चेहरा पढ़ने वाले मेरे चेहरे को&lt;br /&gt;जाना-पहचाना सा लगने वाला&lt;br /&gt;फैमिलियर फेस बताते हैं&lt;br /&gt;लेकिन यहां तो मामला बिल्कुल उलटा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अनजान चेहरों को पहचानने की गलती&lt;br /&gt;हर बार मुझी से होती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुझे शक है कि&lt;br /&gt;कहीं यह नाम भूलने की &lt;br /&gt;उलटी प्रक्रिया तो नहीं है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अक्सर अपने परिचितों के नाम &lt;br /&gt;भूल जाने की भरपाई&lt;br /&gt;मैं कहीं निपट अपरिचितों के&lt;br /&gt;चेहरे पहचान लेने से &lt;br /&gt;तो नहीं करने लगा हूं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5004531893346374759-6412347725715536011?l=pahalu.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://pahalu.blogspot.com/feeds/6412347725715536011/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5004531893346374759&amp;postID=6412347725715536011' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5004531893346374759/posts/default/6412347725715536011'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5004531893346374759/posts/default/6412347725715536011'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://pahalu.blogspot.com/2011/12/blog-post_27.html' title='परिचित चेहरे'/><author><name>चंद्रभूषण</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11191795645421335349</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5004531893346374759.post-4687245908120659049</id><published>2011-12-21T03:36:00.000-08:00</published><updated>2011-12-21T22:22:13.328-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कवितायेँ'/><title type='text'>आराम का सफर</title><content type='html'>ट्रेन अगर सामने खड़ी हो&lt;br /&gt;तो अगली वाली में &lt;br /&gt;पसर कर जाने की उम्मीद में&lt;br /&gt;उसे हरिगज मत छोड़ना।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अक्सर तो अगली ट्रेन &lt;br /&gt;वक्त पर आती नहीं&lt;br /&gt;आती भी है तो&lt;br /&gt;पहली वाली से ज्यादा भरी होती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यही नहीं, कभी-कभी तो वह &lt;br /&gt;जैसे सिर्फ तुम्हें चिढ़ाने के लिए&lt;br /&gt;रुक-रुक कर चलती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ड्राइवर को जुलाब पड़ने लगते हैं&lt;br /&gt;और गार्ड के सिग्नल वाले हाथ में&lt;br /&gt;जरा सी मोच आ जाती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जो लोग कहते हैं कि&lt;br /&gt;उन्होंने भरी गाड़ी में कभी पांव ही नहीं रखा&lt;br /&gt;उनकी बात कभी न सुनना&lt;br /&gt;वे अपना तजुर्बा नहीं,&lt;br /&gt;सिर्फ अपनी चाहत बयान कर रहे होते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मजा आराम से पसर कर बैठने में नहीं&lt;br /&gt;भीड़ में चंपकर लोगों की बातें सुनने में है,&lt;br /&gt;और खिड़की से ताकने का दांव लग जाए तो&lt;br /&gt;बाहर ट्रेन से होड़ लगाते कबूतर को&lt;br /&gt;पीछे छूटते देखने में।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसलिए जिस दिन तुम्हारा दिल&lt;br /&gt;आराम से पसरकर जाने का हो&lt;br /&gt;उस दिन ट्रेन पकड़ने का इरादा छोड़ दो&lt;br /&gt;और अपनी खटिया को ट्रेन समझकर&lt;br /&gt;घर में ही लंबे से लंबा सफर तय करो।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5004531893346374759-4687245908120659049?l=pahalu.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://pahalu.blogspot.com/feeds/4687245908120659049/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5004531893346374759&amp;postID=4687245908120659049' title='7 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5004531893346374759/posts/default/4687245908120659049'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5004531893346374759/posts/default/4687245908120659049'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://pahalu.blogspot.com/2011/12/blog-post.html' title='आराम का सफर'/><author><name>चंद्रभूषण</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11191795645421335349</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>7</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5004531893346374759.post-8042604078641136331</id><published>2011-09-29T23:15:00.000-07:00</published><updated>2011-09-30T00:33:49.916-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='तुक्के'/><title type='text'>हाल के कुछ तुक्के</title><content type='html'>सड़क चलता कोई व्यक्ति एक्सिडेंट का शिकार हो जाए, इसमें उसकी कोई भूमिका नहीं होती। लेकिन इस दुर्घटना का चौतरफा असर जब उसके जीवन पर पड़ना शुरू होता है तो वह इसे एक अलग-थलग घटना मानकर आगे नहीं बढ़ पाता। उसे इसके पीछे कोई तर्क चाहिए होता है, ताकि जीवन में आए इस आकस्मिक व्यवधान को वह सिरे से खारिज कर सके। यहां परंपरा उसकी मदद के लिए आगे आती है। जीवन का कोई विशेष घटनाक्रम मनुष्य के कर्म का नतीजा है या भाग्य का, इस पर अपने यहां हजारों साल से वाद-विवाद होता आया है। मामले को और जटिल बनाने के लिए प्रारब्ध, नियति या पूर्वजन्मों के कर्मफल जैसी कुछ और गुत्थियां भी इसमें डाल दी गई हैं। लेकिन ये सारी चीजें मिलकर भी किसी के जीवन को उसकी मनचाही दिशा में मोड़ नहीं पातीं और इनकी कुल भूमिका ज्योतिषियों का भला करने तक ही सिमट कर रह जाती है। क्या हम जीवन को एक तयशुदा रास्ते के बजाय आकस्मिक घटनाओं का ही एक प्रवाह मानकर संतुष्ट नहीं रह सकते? ऐसा करके हम ज्यादा सुखी भले न हो पाएं लेकिन दुख की संभावना को कुछ कम जरूर कर लेंगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;-----&lt;br /&gt;अपनी रोज की रोटी की तरह हर रोज हमें अपने लिए थोड़ी आशा भी जुटानी पड़ती है। यह न हो तो रोटी कमाते नहीं बनता। कमा भी लो तो वह तन को नहीं लगती। सामान्य स्थितियों में आशा कोई दुर्लभ वस्तु नहीं जान पड़ती। जिस बाजारवादी समाज में हम जी रहे हैं, उसमें निराशा के लिए कोई जगह ही नहीं है। वहां चारो तरफ सफलता की कहानियां बिखरी हुई हैं। प्रायः प्रायोजित सफलता की कहानियां। आशावाद की तो जैसे हर तरफ बाढ़ आई हुई है। लेकिन आप यह देखकर चकित हो सकते हैं कि नाकामी का एक धक्का भी किस तरह आपको समूची भीड़ से छांटकर अलग कर देता है। हित-मित्र, कुल-कुटुंब सभी अचानक आपको दूर से देखने लगते हैं। उनकी सांत्वनाएं और बाहर उमड़ रहा सारा का सारा आशावाद तब आपके लिए किसी काम का नहीं रहता। ऐसे में हमें हर रोज अपने भीतर न सिर्फ आशा की फसल उगानी होती है, बल्कि हमलावर निराशाओं से उसकी रक्षा भी करनी होती है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;-----&lt;br /&gt;बचपन...जवानी...बुढ़ापा ...मौत। समय का तीर हमारे भौतिक अस्तित्व को सीधे वेधता हुआ निकल जाता है। लेकिन हमारे मानसिक या आत्मिक अस्तित्व के सामने उसकी धार कुछ कुंद सी हो जाती है। दूसरे शब्दों में कहें तो हमारे शरीर की उम्र लगातार बढ़ती जाती है, लेकिन मन की उम्र भंवर में फंसे पानी की तरह कभी आगे कभी पीछे होती रहती है। एक झटके में यह कभी बुजुर्गियत के करीब पहुंच जाता है तो कभी बिल्कुल बच्चा बन जाता है। फारसी के महाकवि रूमी अपने एक शेर में कहते हैं- घास-फूस की तरह मैं सूख-सूख कर फिर हरा हो जाता हूं। मी चू सब्ज़ा बारहा रूईद: एम। जिन लोगों को अपने जीवन के शुरुआती दौर में ही बड़े झटकों से गुजरना पड़ा होता है वे रूमी की उक्ति की तस्दीक ज्यादा बेहतर ढंग से कर सकते हैं। मानवीय प्रकृति की इस दुर्लभ विशेषता के बिना उनके जीवन का निराशा के गर्त से उबरकर दोबारा पटरी पर आना शायद संभव न हो पाता।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5004531893346374759-8042604078641136331?l=pahalu.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://pahalu.blogspot.com/feeds/8042604078641136331/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5004531893346374759&amp;postID=8042604078641136331' title='6 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5004531893346374759/posts/default/8042604078641136331'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5004531893346374759/posts/default/8042604078641136331'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://pahalu.blogspot.com/2011/09/blog-post.html' title='हाल के कुछ तुक्के'/><author><name>चंद्रभूषण</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11191795645421335349</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5004531893346374759.post-902235475890973608</id><published>2011-08-15T00:54:00.000-07:00</published><updated>2011-08-15T01:02:07.429-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कुछ मुझ से ....'/><title type='text'>पटरी पर कब</title><content type='html'>एक बड़े एक्सीडेंट और इसके निदान के लिए हुई दो मेजर सर्जरी के झटकों से उबरने की कोशिश में हूं। एक इंप्लांट फेल हो गया तो तुरंत दूसरे ऑपरेशन की जरूरत पड़ी। इस बार एक के बजाय दो प्लेटें और कूल्हे से निकाल कर एक हड्डी डाली है। इसे भी एक महीना हो गया लेकिन कुल नतीजा यह है कि बायां हाथ अभी बस थोड़ा सा ही उठ रहा है और इसकी दो उंगलियां पूरी तरह, बाकी कुछ हद तक सुन्न हैं। ये दो-तीन लाइनें कंपोज करने में लगता है सब करम हो जाएगा। अभी घर पर ही बैठा हूं। पिछले दो महीनों और कुछ दिनों से नौकरी से गैरहाजिर हूं। जीवन कब और कैसे पटरी पर आएगा, पता नहीं। दोस्तो दुआ करो, यह पोस्ट इसकी शुरुआत हो। &lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5004531893346374759-902235475890973608?l=pahalu.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://pahalu.blogspot.com/feeds/902235475890973608/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5004531893346374759&amp;postID=902235475890973608' title='17 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5004531893346374759/posts/default/902235475890973608'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5004531893346374759/posts/default/902235475890973608'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://pahalu.blogspot.com/2011/08/blog-post.html' title='पटरी पर कब'/><author><name>चंद्रभूषण</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11191795645421335349</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>17</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5004531893346374759.post-5963236287676114873</id><published>2011-05-31T06:15:00.000-07:00</published><updated>2011-06-01T01:30:16.548-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कवितायेँ'/><title type='text'>गुरु गुलाब खत्री</title><content type='html'>1.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लिखने वालों के बारे में कोई राय उनके लिखे हुए से ही बनाई जानी चाहिए&lt;br /&gt;लेकिन गुरु गुलाब खत्री के लिखे हुए के बारे में मेरी कोई राय नहीं है।&lt;br /&gt;इतने विनम्र और अपने लिखे हुए को लेकर इतने अनाश्वस्त वे हमेशा रहते थे&lt;br /&gt;कि उनकी किसी चीज का नाम भर ले लेने से उपकृत हो जाते थे&lt;br /&gt;और उसपर कुछ बोल कर तो आप उनके साथ डिनर के हकदार हो सकते थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसके अलावा उनकी और भी कई आदतें खुजली पैदा करने वाली थीं&lt;br /&gt;मसलन, कुबेर छाप तेजाबी खैनी खाकर एक बार में गिलास भर थूकना&lt;br /&gt;या खाना खाते वक्त गले से ऐसी आवाजें निकालना &lt;br /&gt;जैसे हर नए कौर से पहले पेट में गए पिछले कौर को बाहर निकाल रहे हों।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उनके नजदीकी दोस्तों में कुछ ऐसे  भी थे &lt;br /&gt;जो किसी भी स्त्री के अंतरंग के बारे में खुद उस स्त्री से भी ज्यादा जानते थे&lt;br /&gt;और उसे बताने के हर सार्वजनिक मौके को सुनहरे अवसर की तरह देखते थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक स्तर पर यह लंपटता गुरू के व्यक्तित्व का भी हिस्सा थी&lt;br /&gt;जिसकी तरंग में आकर एक बार उन्होंने उस प्रसिद्ध भिखमंगा उक्ति-&lt;br /&gt;जो दे उसका भी भला, जो ना दे उसका भी भला-&lt;br /&gt;का अर्थ मेरे जेहन में हमेशा के लिए बदल दिया था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कितना विचित्र है यह सोचना कि जिसके साथ तुम बराबरी के स्तर पर &lt;br /&gt;दुनिया भर की टुच्ची बातें कर रहे हो, वह किसी और ही समय में जी रहा है&lt;br /&gt;तुम एक सीधी सड़क पर आराम से टहल रहे हो&lt;br /&gt;और तुम्हारा हाथ पकड़े चल रहा वह भूकंप और चक्रवात से गुजर रहा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;2.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गुरू गुलाब खत्री के साथ मैं पांच साल एक दफ्तर में रहा&lt;br /&gt;इस बीच उन्हें सबसे बड़ी खुशी और सबसे बड़ा दुख हासिल हुआ&lt;br /&gt;और एक ट्रांस में जीने का अलौकिक, अपार्थिव, साइकेडेलिक अनुभव&lt;br /&gt;जिसका सबसे तार्किक, सबसे सुखद अंत फालिज मारने &lt;br /&gt;और गुमनामी की मौत मर जाने के सिवाय और कुछ नहीं हो सकता था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आप आकाश में गड़गड़ाने वाली, अपनी कौंध से अंधा कर देने वाली &lt;br /&gt;बड़ी-बड़ी चीजों को फूस की तरह फूंक देने वाली बिजली के बारे में जानते हैं&lt;br /&gt;और उसे भी जो महीन तारों पर दौड़ती हुई आपकी जिंदगी हसीन बना देती है&lt;br /&gt;लेकिन इन दोनों को मिलाकर देखने की हिमाकत कितने लोग कर पाते हैं?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;साठ की उम्र में पत्नी वंचित हुए गुरु गुलाब खत्री के प्रेम प्रयासों को&lt;br /&gt;करुणा या हास्य-व्यंग्य की नजर से देखना सहज-स्वाभाविक है&lt;br /&gt;लेकिन उन्हें प्यार की गहनतम अभिव्यक्ति की तरह देखना &lt;br /&gt;कुछ ऐसी ही हिमाकत करने जैसा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गुरू अपनी कविताओं में कोटेशन बहुत देते थे, सो एक यहां मैं भी देता हूं&lt;br /&gt;गैब्रिएल गार्सिया मार्खेज अपनी &lt;em&gt;लव इन द टाइम ऑफ कॉलरा &lt;/em&gt;में कहते हैं-&lt;br /&gt;प्यार हमेशा सुंदर होता है लेकिन जब यह मौत के करीब हो &lt;br /&gt;तो इसकी बात ही कुछ और होती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह सिर्फ एक कोटेशन है और गुरु गुलाब खत्री की कहानी से इसका ताल्लुक&lt;br /&gt;सिर्फ इतना है कि उनके भी प्रेम और मृत्यु में ज्यादा फासला नहीं था&lt;br /&gt;और यह अमर कविता- कम से कम मेरे जीते जी अमर-&lt;br /&gt;उन्होंने ऐसी ही जेहनियत में लिखी थी&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;तुम्हारा फोन नंबर याददाश्त से लगाता हूं, फोन पर तुम्हारा नाम उभर आता है&lt;br /&gt;वान गॉग कहता था- &lt;br /&gt;इस दुनिया में सिर्फ एक मर्द हुआ और सिर्फ एक औरत, बाकी सब संख्याएं हैं&lt;br /&gt;यहां मैं एक संख्या को पहले एक नाम और फिर एक औरत में बदलते देख रहा हूं&lt;br /&gt;सोचता हूं, तुम्हीं वह औरत हो जो इस दुनिया में मेरे लिए बनी थीं।&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;3. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बासठ साल के बुजुर्ग और बाइस साल की लड़की का यह प्रेम &lt;br /&gt;कैंपस का तब सबसे बड़ा स्कैंडल था&lt;br /&gt;गुरू के कुछ पुराने दोस्तों और कुछ उनसे भी पुराने दुश्मनों ने&lt;br /&gt;एक दिन स्मोकिंग जोन में उन्हें साथ-साथ घेर लिया &lt;br /&gt;और पूछा कि ऐसा माल उन्होंने आखिर पटाया किस तरह।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक सिद्ध लंपट सार्वजनिक रूप से उनके सामने नतमस्तक हुआ&lt;br /&gt;अपनी काल्पनिक हैट सिर से उतारते हुए बोला- गुरू हैट्स ऑफ टु यू&lt;br /&gt;एक और ने उससे भी ज्यादा सम्मान, ईर्ष्या और लगाव से पूछा-&lt;br /&gt;महीने में आप इसके ऊपर कुल कितना खर्च कर देते होंगे?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खर्च के मामले में गुरू का हाथ कभी तंग नहीं रहा&lt;br /&gt;लेकिन उस दिन शपथ खाकर उन्होंने कहा &lt;br /&gt;कि आज तक कभी भी साथ खाने का बिल&lt;br /&gt;उस लड़की ने मुझे देने नहीं दिया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पता नहीं क्यों इतने हल्के क्षणों में भी &lt;br /&gt;इस रिश्ते के बारे में उनसे बात करने में मुझे खौफ सा होता था&lt;br /&gt;लगता था, इसके लिए कोई उन्हें मार डालेगा &lt;br /&gt;या किसी दिन इसके बोझ से कुचलकर वे खुद ही मर जाएंगे-&lt;br /&gt;&lt;em&gt;इश्क मीर एक भारी पत्थर है, कहां तुझ नातवां से उठता है।&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;4.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरी तरफ से हैट्स ऑफ उस लड़की के लिए, जो उनसे मिली, जुड़ी &lt;br /&gt;और हटी तो इस एहतियात के साथ कि इसका झटका उन्हें मार न डाले&lt;br /&gt;लेकिन अफसोस, गुरू को मौत से बचाने के लिए इतना काफी नहीं था&lt;br /&gt;मेरे ख्याल से अलग होने के बाद भी उन्हें &lt;br /&gt;आपस में बातें करना बंद नहीं करना चाहिए था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक बार मैंने पूछा- गुरू गुलाब खत्री, &lt;br /&gt;क्या आप अपनी पत्नी से भी प्यार करते थे?&lt;br /&gt;गुरू तब कुछ बोले नहीं, सोचते रहे और खामोश हो गए&lt;br /&gt;अपने सवाल का जवाब मुझे मालूम था, सिर्फ उनके मुंह से सुनना चाहता था&lt;br /&gt;यह जानने के लिए कि &lt;br /&gt;उनकी मौत के बाद वे अचानक इतने लिबर्टाइन क्यों हो गए थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अपने करियर, अपनी ही दुनिया में खोई रहने वाली &lt;br /&gt;वह लड़की गुरू से प्रेम क्यों करने लगी-&lt;br /&gt;प्रेम के कई अन्य रहस्यों की तरह शायद यह भी मुझ पर कभी अयां नहीं होगा&lt;br /&gt;गुरू बताते थे- वह बर्फ की सिल्ली नहीं देख पाती &lt;br /&gt;बचपन में उसकी आंखों के सामने उसके पिता की देह उसपर लिटाई गई थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इडिपस कॉम्प्लेक्स? &lt;br /&gt;झट से मेरे मन में एक कीड़ा उछला और पट से मैंने उसे मारा&lt;br /&gt;ब्रांडिंग के इस झोंक में न जाने कितने खूबसूरत रिश्तों का कत्ल होते देखा है&lt;br /&gt;इस बार नहीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;5.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जो भी था, जैसा भी था&lt;br /&gt;इसके लिए तुम्हारा बहुत-बहुत शुक्रिया कन्नी भारद्वाज, &lt;br /&gt;या जो भी तुम्हारा नाम हो&lt;br /&gt;तुम्हारे घुटनों तक भी पहुंचने लायक हम नहीं हैं&lt;br /&gt;अपने दायरे से बाहर किसी से प्यार हम कर नहीं सकते&lt;br /&gt;हमारी कविताएं घूम-फिर कर हमारे ही गुन गाती हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और उस रात की घटाटोप तनहाई में &lt;br /&gt;फालिज की बिजली जब गुरु गुलाब खत्री पर गिरी&lt;br /&gt;तो उनकी आखिरी खमोशियों में तुम्हारी ही यादें उनके साथ रही होंगी&lt;br /&gt;हम तो उनके कानों की सुन्न झिल्लियों के सामने &lt;br /&gt;वादे ही करते रह गए कि आप ठीक हो जाएंगे तो यह करेंगे&lt;br /&gt;और जिस दिन आप साथ में बाजार चलेंगे, उस दिन वह करेंगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हम झूठ बोल रहे थे &lt;br /&gt;उनके बुझे हुए दिल को देने के लिए हमारे पास कुछ नहीं था।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5004531893346374759-5963236287676114873?l=pahalu.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://pahalu.blogspot.com/feeds/5963236287676114873/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5004531893346374759&amp;postID=5963236287676114873' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5004531893346374759/posts/default/5963236287676114873'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5004531893346374759/posts/default/5963236287676114873'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://pahalu.blogspot.com/2011/05/blog-post_31.html' title='गुरु गुलाब खत्री'/><author><name>चंद्रभूषण</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11191795645421335349</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5004531893346374759.post-2207628157117077144</id><published>2011-05-28T05:15:00.000-07:00</published><updated>2011-05-28T06:09:34.582-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कविताएं'/><title type='text'>बुलडोजर पर बसेरा</title><content type='html'>खारी बावली, धोबी तलाब, कांटा पुकुर&lt;br /&gt;ये दिन भर भीड़ से भरे रहने वाले&lt;br /&gt;कुछ सूखे शहरी इलाकों के नाम हैं,&lt;br /&gt;जहां कभी पानी लहराता होगा। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पानी अब यहां बंबों में भी कम ही आता है&lt;br /&gt;और पानी के अलावा कई दूसरी वजहें भी हैं,&lt;br /&gt;मसलन इनका डाउनमार्केट नाम, जिसके चलते&lt;br /&gt;यहां रहने वाले अब इन्हें बिल्कुल पसंद नहीं करते।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वे अपमार्केट नामों वाली कॉलोनियों में रहते हैं&lt;br /&gt;ग्रीन ह्याट, न्यूलैंड्स, वाटर वैली जैसे जिनके नाम हैं&lt;br /&gt;हालांकि डाउनमार्केट नामों वाली जगहों पर&lt;br /&gt;धंधा करने में उन्हें कोई परेशानी नहीं है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कोई देसी जुबानों में इन नामों का अनुवाद करे&lt;br /&gt;और इनकी असलियत का खयाल मन में लाए बगैर सोचे&lt;br /&gt;तो बंद आंखों से शायद उसे घास पर ऊंघता कोई हुदहुद&lt;br /&gt;या काई लगे पानी में ऊंचाई से डुबकी मारकर&lt;br /&gt;झींगा पकड़ता कोई कौड़िन्ना दिखाई पड़े।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कैसी मजे की बात कि ग्रीनवैली मार्केटिंग कॉम्प्लेक्स में&lt;br /&gt;वेटलैंड्स कंजर्वेशन कंसॉर्शियम नाम के एक दफ्तर के&lt;br /&gt;एक कारकुन ने एक शाम हिम्मत करके&lt;br /&gt;अपने एक दोस्ताना सीनियर से पूछा-&lt;br /&gt;सर, और सब तो ठीक है लेकिन&lt;br /&gt;ये वेटलैंड्स साली चीज क्या है और पाई कहां जाती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गर्मियों की रात थी, नौ बजा चाहते थे&lt;br /&gt;नियॉन लैंपों की पीली धुंध के बहुत ऊपर&lt;br /&gt;सारसों की एक पांत कें-कें करती जा रही थी-&lt;br /&gt;खुद को बचाने की इंसानी चिंताओं से अनजान&lt;br /&gt;इस सामूहिक सोच में डूबी हुई कि&lt;br /&gt;अगला बसेरा कहीं बुलडोजर पर ही न करना पड़े।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5004531893346374759-2207628157117077144?l=pahalu.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://pahalu.blogspot.com/feeds/2207628157117077144/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5004531893346374759&amp;postID=2207628157117077144' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5004531893346374759/posts/default/2207628157117077144'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5004531893346374759/posts/default/2207628157117077144'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://pahalu.blogspot.com/2011/05/blog-post_28.html' title='बुलडोजर पर बसेरा'/><author><name>चंद्रभूषण</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11191795645421335349</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5004531893346374759.post-8338894079286500011</id><published>2011-05-25T04:43:00.000-07:00</published><updated>2011-05-25T05:01:50.214-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='लोकनायक'/><title type='text'>लुरखुर लोरिक-2</title><content type='html'>(पिछले अंक से आगे)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वीरगाथा काल की एक अन्य रचना आल्हा की पहुंच हमारे गांव तक थी। सावन के महीने में किसी नट को आल्हा गाते देखने का तजुर्बा यादगार हुआ करता था। लेकिन चनइनी में कोई ऐसी बात थी, जो उसे आल्हा ही नहीं, बाकी किसी भी काव्य से अलग बनाती थी। रामायण, महाभारत से लेकर आल्हा तक सब की सब राजा-रानियों की कहानियां थीं। इनमें आने वाली चीजें हमारे इर्द-गिर्द कम ही पाई जाती थीं। लेकिन चनइनी में गाय-बैल, गोहरउर और मूंज का बना पिटारा भी आता था। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसके कथाक्रम में पता चलता था कि पलाश के डंठलों से ज्यादा भारी कोई और वनस्पति नहीं होती। खानदानी तौर पर शाकाहारी हमारे जैसे बच्चे भी यह जान लेते थे कि मांस को अगर गोइंठे की आग में भून दिया जाए तो एक अकेला आदमी भी एक पला-पलाया बकरा पूरा का पूरा खा सकता है। लोरिक के अधेड़ सलाहकार संवरू ने यह उक्ति उनकी बारात को बताई थी, जिसे बिना दुलहन के ही वापस लौटा देने के लिए ससुराल वालों (मैना के मायके वालों) ने एक भी पकी मूंछ वाला आदमी बारात में न लाने की हिदायत दे रखी थी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बहरहाल, चनइनी के मामले में मेरे लिए कथावाचक का सम्मोहन स्वयं कथा से कम नहीं था। बहुत धीमी आवाज में, मन के भीतर बजती हुई किसी धुन की तरह लुरखुर काका चनइनी गाते थे। कभी-कभी परंपरा निभाने के लिए एक कान में उंगली भी डाल लेते थे। बीच-बीच में श्रृंगारिक या मजाकिया जगहों पर हंसते थे, लेकिन बस जरा सा। ज्यादातर पारंपरिक बिरहिए दोनों कानों में उंगली डालकर बिरहा गाते थे। बैलगाड़ियों की लीख पर बोझा गिराकर लौट रहे गाड़ीवानों को अक्सर इस मुद्रा में देखने का मौका मिलता था। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शहर बनारस के बुल्लू ने बिरहे का फिल्मीकरण उस समय तक तकरीबन पूरा कर दिया था और फिर एक से एक भद्दे प्रयोग इसके साथ किए गए। लेकिन बिना किसी साज-बाज के, अक्सर अकेले ही गाया और सुना जाने वाला खड़ा या खड़ी बिरहा ही इस काव्य विधा का शुद्धतम रूप था, जिसे टेप और सीडी वाले मेकेनिकल समय में बचाए रखना किसी के लिए संभव नहीं था।  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लुरखुर काका को सुनते-सुनते मेरे मन में पहली महत्वाकांक्षा जगी थी, जो बिरहिया बनने की थी। उनके जैसा नहीं, सभा-सोसाइटी में गाने वाला, परफॉर्मर किस्म का बिरहिया बनने की, हालांकि अपनी कल्पना में भी अपनी भूमिका मैं बिरहा गाने वाले से ज्यादा इसे बिठाने, या लिखने वाले की ही सोच पाता था। परफॉर्मर बनने में कई तकनीकी समस्याएं थीं। एक इनमें जाति की भी थी क्योंकि उस समय तक बिरहा बतौर प्रोफेशन अहीर जाति की इक्सक्लूसिव चीज समझा जाता था। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने अपने पिताजी से एक दिन इसके बारे में बताया। कहा कि यह जो राम, कृष्ण की कहानियां आप लोग सुनाते हैं, वे लोरिक और दयाराम तो क्या, गेनिया अहिरिनिया की कहानी के सामने भी कुछ नहीं हैं। इस पर मुझे डांट पड़ी। पिताजी ने कहा कि ये झूठ-फूठ कहानियां अहीर लोग अपने को खास साबित करने के लिए बनाते हैं, ताकि उनके पास भी अपनी बिरादरी से राम-कृष्ण के सामने खड़ा करने के लिए कोई हो।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुझे यह समझने में थोड़ा वक्त लगा कि न सिर्फ मेरे पिता के लिए बल्कि समूची बभनौटी के लिए लुरखुर काका की हैसियत किसी आम घसियारे से ज्यादा नहीं थी। लेकिन गांव के बाकी हिस्से में उनकी ताकत, उनकी मर्दानगी और उनके सख्त लंगोट के किस्से कहे जाते थे। इनमें सबसे गुपचुप ढंग से कहा जाने वाला किस्सा यह था कि एक बार गांव की एक चलता-पुर्जा महिला ने उनसे प्रणय निवेदन किया तो उन्होंने बदले में इसके लिए काफी ऊंची रकम मांग ली। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;महिला ने कहा कि गांव में ऐसे लोगों की कमी नहीं है जो कंधे पर हाथ भर रखने के लिए उसे मनचाहे पैसे देने को तैयार हैं, लेकिन वह उन्हें मुंह नहीं लगाती। लुरखुर काका ने कहा कि तुम्हारे पास जो है, उसकी कीमत लगाने वाले बैठे हैं लेकिन मेरे पास जो है उसकी कोई कीमत नहीं है- जो कुछ मैंने कहा, वह पैसे के लिए नहीं, सिर्फ तुम्हें समझाने के लिए था, उसे भूल जाओ और अपना काम करो।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;समय बीतने के साथ मेरा गाय चराना छूट गया और लुरखुर काका भी कहीं विस्मृति में सिरा गए। अभी दो-तीन साल पहले मैं अपने गांव गया था तो एक सुबह मां को एक साड़ी, कुछ रुपये और सिद्धा-बारी लेकर घर से निकलते देखा। पूछा, कहां जा रही हो तो पता चला कि लुरखुर काका की छोटी बेटी का ब्याह है। लौटकर उसने बताया कि पिछले साल गांव में उनके अकेले बेटे का कत्ल हो गया था, अब पूरा गांव मिलकर उनकी आखिरी बेटी की शादी कर रहा है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुझे याद नहीं आता कि कत्ल की कोई वारदात मेरे गांव में इससे पहले कब हुई थी। कभी हुई भी थी या नहीं। यहां चाकू निकलते हैं, गोलियां चलती हैं, बम फटते हैं, लेकिन लड़ाई हर बार बराबरी की ही छूटती है, कोई मरता नहीं। इसके बावजूद यहां लुरखुर काका का जवान लड़का न सिर्फ मारा गया बल्कि इस तरह मारा गया कि उसका जिक्र करने पर आज भी रोंगटे खड़े हो जाते हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रात में पता नहीं कैसे सोते में ही उसे चारपाई सहित उठा लिया गया। अगली सुबह खोजबीन शुरू हुई, कुछ पता नहीं चला। कई दिन बाद दिसा-मैदान गई औरतों को एक अरहर के खेत में जगह-जगह खून के निशान दिखे और आसपास एक बिस्सा से भी ज्यादा दायरे की अरहर टूटी नजर आई। जैसे वहां कोई युद्ध हुआ हो। अगले ही दिन सिवान में एक अंधे कुएं से भयंकर बदबू उठी और वहां जमा बरसाती पानी में बिल्कुल खड़ी तैरती हुई उसकी लाश दिखाई पड़ी। फूलकर कुप्पा। सैकड़ों चाकुओं से गुदी हुई लाश।   &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह कत्ल किसने किया, क्यों किया, इसका पता आज तक नहीं चल पाया है। किसी का कहना है कि पड़ोस के पंडित परिवार की किसी लड़की से उसका कुछ चक्कर चल गया था, तो कोई इसके लिए उसी परिवार के जमीन के लालच को जिम्मेदार मानता है- अकेला लड़का है, नहीं रहेगा तो देर-सबेर लुरखुर की जमीन अपने ही खाते में आएगी। मन हुआ चलकर लुरखुर काका से मिलूं, लेकिन पता नहीं क्यों हिम्मत नहीं पड़ी। जिस आदमी ने पहली बार मेरे मन में एक काव्य नायक खड़ा किया, जो खुद मेरे लिए किसी नायक से कम नहीं था, उसे इतने बड़े वक्फे के बाद इस टूटी हुई हालत में क्या देखूं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5004531893346374759-8338894079286500011?l=pahalu.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://pahalu.blogspot.com/feeds/8338894079286500011/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5004531893346374759&amp;postID=8338894079286500011' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5004531893346374759/posts/default/8338894079286500011'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5004531893346374759/posts/default/8338894079286500011'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://pahalu.blogspot.com/2011/05/2.html' title='लुरखुर लोरिक-2'/><author><name>चंद्रभूषण</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11191795645421335349</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5004531893346374759.post-7943854239221315242</id><published>2011-05-24T06:53:00.000-07:00</published><updated>2011-05-25T00:24:15.755-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='लोकनायक'/><title type='text'>लुरखुर लोरिक</title><content type='html'>चंडीगढ़ के आर्ट म्यूजियम में लौर-चंदा सीरीज की 14 फोलियो पेंटिंगें मौजूद हैं। 16वीं सदी में बनी चटख रंगों वाली इस कथा-आधारित अद्भुत चित्र श्रृंखला के बहुत सारे चित्रों में अब संभवतः सिर्फ 36 इस दुनिया में शेष बचे हैं, जिनमें बाकी के 22 पाकिस्तान में हैं। किसी ब्रिटिश म्यूजियम में भी कुछ फोलियो होने की बात कही जाती है, लेकिन इस बारे में ज्यादा जानकारी मेरे पास नहीं है। करीब पांच सौ साल पुरानी कॉमिक्स जैसी इस चीज में नायिका को तो राजपूत शैली की पेंटिंग की तरह गोरी और साफ नख-शिख वाली बनाया गया है, लेकिन नायक का रंग कत्थई के करीब पहुंचता हुआ सांवला है। कवच, कुंडल, मुकुट या अन्य किसी भी राजचिह्न का अभाव उसे उस दौर के नायकों से बिल्कुल अलग करता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लौर-चंदा या चंदायन 14वीं सदी में (कबीर के जन्म से भी पहले) फारसी की नस्तलीक लिपि में लिखी गई मुल्ला दाऊद की रचना है। राजकुमारी चंदा और अहीर योद्धा लोरिक की यह प्रेमकथा पूर्वी उत्तर प्रदेश के अवधी और भोजपुरी क्षेत्रों में न जाने कब से कही-सुनी जा रही थी। रायबरेली के मुल्ला दाऊद ने इसे लिखित काव्य का रूप दिया और इस क्रम में जायसी और तुलसी की काव्य भाषा के रूप में अवधी के उदय की बुनियाद रखी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इन किताबी सूचनाओं का मेरे लिए शायद कोई अर्थ न होता, अगर इनसे साबका पड़ना अचानक मेरे लिए मेरे बचपन की भूली-बिसरी यादों का एक झरोखा न खोल देता। गांव में हमारी गर्मियों की छुट्टियां गाय चराते ही गुजरती थीं, जो कभी मजा तो कभी सजा का सबब बना रहता था। इंसानी आंखों वाली एक दुबली-पतली बीमार सी गाय और उसकी एक वैसी ही बछिया हमारे पास थी। सुबह उन्हें खूंटे से खोलकर ऊसर की तरफ निकल जाता था। शरीर में ताकत अपने हमउम्र साथियों से कम थी और पता नहीं क्यों मुझे पीटने या तंग करने में उन्हें कुछ ज्यादा मजा भी आता था। लेकिन ऊसर के खेलों में फिसड्डी की तरह पीछे-पीछे लगे रहना चुपचाप घर में बैठे रहने से फिर भी कुछ बेहतर ही था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरे लिए सुबह गाय चराने जाने का एक आकर्षण वहां लुरखुर काका से चनइनी सुनने का हुआ करता था, जो उसी चंदायन या लौर-चंदा का देसी नाम है, जिसका जिक्र इस टीप की शुरुआत में आया है। लुरखुर काका के चेहरे पर चेचक के हल्के दाग थे। पखवाड़े भर की बढ़ी हुई कच्ची-पक्की दाढ़ी उनके चेहरे पर सदाबहार दिखती थी और वह दोनों कानों में लुरकी (सोने की मुनरी) पहनते थे। जिस समय की मैं बात कर रहा हूं, उस समय उनकी उम्र चालीस के लपेटे में रही होगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बिल्कुल खड़ा शरीर और चलने का अंदाज ऐसा, जो उनके बाद कभी देखने को नहीं मिला। लगता था कि कमर के ऊपर का हिस्सा आगे-आगे चल रहा है और दोनों पैर पहिए की तरह अगल-बगल चलते जा रहे हैं। दौड़ना इस धज में उनके लिए चलने से कहीं ज्यादा आसान होता रहा होगा। रहंठा की एक खांची और खुरपी हमेशा उनके पास रहती थी। जहां भी दूब देखते थे, चुपचाप तपस्या की सी मुद्रा में छीलने बैठने जाते थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चनइनी या चंदायन सहज लोकबुद्धि और शारीरिक पराक्रम की कथा है। मुल्ला दाऊद की रचना कभी मेरे हाथ नहीं लगी, न ही आगे कभी लगने की कोई उम्मीद है, लेकिन लुरखुर काका से इसके इतने हिस्से सुन रखे हैं कि दो-चार बातें इसके बारे में आज भी बता सकता हूं। प्रेम इस काव्य में एक स्थायी लय की तरह बजने वाला भाव है और उसमें स्वकीया-परकीया जैसा कोई भेद नहीं है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बुद्धि की पेचीदा कसरतों और घनी लड़ाइयों से ब्याह कर लाई गई मैना से लोरिक बहुत प्यार करता है, लेकिन गोभार रियासत के राजा सहदेव की बेटी चंदा से मिलने के लिए वह किसी भी हद तक जाने को तैयार है। कहानी में एक बार लोरिक के लिए मैना औरे चंदा का दुर्धर्ष संघर्ष भी आता है, जिसमें एक कोइरी किसान की कई बिस्से में बोई गई सब्जियां बर्बाद हो गईं। श्रोताओं के लिए इस हिस्से का आकर्षण इस लड़ाई के दौरान दोनों नायिकाओं का लगभग निर्वस्त्र हो जाना हुआ करता था- अपने ढंग का आइटम नंबर।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(बाकी अगले अंक में)&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' 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&lt;span style="font-family:Mangal;mso-bidi-language:HI" lang="HI"&gt;वासना की&lt;/span&gt;, &lt;span style="font-family:Mangal;mso-bidi-language:HI" lang="HI"&gt;स्खलन की&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;mso-bidi-language:HI" lang="HI"&gt;प्रणय की&lt;/span&gt;,&lt;span style="font-family:Mangal;mso-bidi-font-family:Mangal;mso-bidi-theme-font: minor-bidi;mso-bidi-language:HI" lang="HI"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-family:Mangal; mso-bidi-language:HI" lang="HI"&gt;संवाद की&lt;/span&gt;, &lt;span style="font-family:Mangal; mso-bidi-language:HI" lang="HI"&gt;टकराव की&lt;/span&gt;, &lt;span style="font-family:Mangal; mso-bidi-language:HI" lang="HI"&gt;संघर्ष की&lt;/span&gt;, &lt;span style="font-family:Mangal; mso-bidi-language:HI" lang="HI"&gt;युद्ध की&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;mso-bidi-language:HI" lang="HI"&gt;लेकिन तत्व उनका कमोबेश एक सा&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI"&gt; &lt;/span&gt;&lt;span style="font-family:Mangal; mso-bidi-font-family:Mangal;mso-bidi-theme-font:minor-bidi;mso-bidi-language: HI" lang="HI"&gt;था&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;mso-bidi-language:HI" lang="HI"&gt;कान तक प्रत्यंचा ताने जब वे वन में घुसे&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;mso-bidi-language:HI" lang="HI"&gt;तो उनके सामने लहर सी डोलती एक सुनहरी छाया थी&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;mso-bidi-language:HI" lang="HI"&gt;और उनकी आंखें अपने तीर की नोक और लक्ष्य के बीच&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;mso-bidi-language:HI" lang="HI"&gt;बनने वाली निरंतर गतिशील रेखा पर थरथरा रही थीं&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;mso-bidi-language:HI" lang="HI"&gt;लक्ष्य चूकने का कोई भय नहीं था&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;mso-bidi-language:HI" lang="HI"&gt;वह तो जैसे खुद ही हजार सुरों में बोल रहा था&lt;/span&gt;&lt;span dir="RTL"&gt;&lt;/span&gt;&lt;span dir="RTL" style="font-family:Mangal" lang="AR-SA"&gt;&lt;span dir="RTL"&gt;&lt;/span&gt;-&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;mso-bidi-language:HI" lang="HI"&gt;मुझे मारो&lt;/span&gt;, &lt;span style="font-family:Mangal;mso-bidi-language:HI" lang="HI"&gt;मेरा संधान करो&lt;/span&gt;, &lt;span style="font-family:Mangal;mso-bidi-language:HI" lang="HI"&gt;वध करो मेरा&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;mso-bidi-language:HI" lang="HI"&gt;चाहे जैसे भी मुझे स्थिर करो&lt;/span&gt;, &lt;span style="font-family:Mangal;mso-bidi-language: HI" lang="HI"&gt;अपने घर ले जाओ वीर&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;mso-bidi-language:HI" lang="HI"&gt;उत्तेजना का दौर खत्म हुआ&lt;/span&gt;, &lt;span style="font-family:Mangal;mso-bidi-language: HI" lang="HI"&gt;वे सभी विजेता निकले&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;mso-bidi-language:HI" lang="HI"&gt;किसी ने व्हार्टन मारा&lt;/span&gt;, &lt;span style="font-family:Mangal;mso-bidi-language:HI" lang="HI"&gt;किसी ने कैंब्रिज का संधान किया&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;mso-bidi-language:HI" lang="HI"&gt;कोई जापान की तरफ निकला&lt;/span&gt;, &lt;span style="font-family:Mangal;mso-bidi-language:HI" lang="HI"&gt;मरीन बायलॉजिस्ट बनकर लौटा&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;mso-bidi-language:HI" lang="HI"&gt;तो कोई पुलिस कमिश्नर बना&lt;/span&gt;, &lt;span style="font-family:Mangal;mso-bidi-language: HI" lang="HI"&gt;वर्दी पर टांचे वही सुनहरापन&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;mso-bidi-language:HI" lang="HI"&gt;मृग के मरने की भी सबकी अलग-&lt;/span&gt;&lt;span dir="RTL"&gt;&lt;/span&gt;&lt;span dir="RTL" style="font-family: Mangal" lang="AR-SA"&gt;&lt;span dir="RTL"&gt;&lt;/span&gt;-&lt;/span&gt;&lt;span dir="RTL" style="font-family: Mangal;mso-bidi-language:HI" lang="HI"&gt;अलग कथाएं थीं&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;mso-bidi-language:HI" lang="HI"&gt;सभी का मानना था कि मरने से पहले वह कुछ बोला था&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;mso-bidi-language:HI" lang="HI"&gt;शायद &lt;/span&gt;&lt;span style="mso-bidi-font-family:Mangal"&gt;‘&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family: Mangal;mso-bidi-language:HI" lang="HI"&gt;मां&lt;/span&gt;&lt;span style="mso-bidi-font-family:Mangal"&gt;’&lt;/span&gt;, &lt;span style="font-family:Mangal;mso-bidi-language:HI" lang="HI"&gt;शायद &lt;/span&gt;&lt;span style="mso-bidi-font-family:Mangal"&gt;‘&lt;/span&gt;&lt;span style="font-family: Mangal;mso-bidi-language:HI" lang="HI"&gt;पापा&lt;/span&gt;&lt;span style="mso-bidi-font-family:Mangal"&gt;’&lt;/span&gt;, &lt;span style="font-family:Mangal;mso-bidi-language:HI" lang="HI"&gt;शायद&lt;/span&gt;&lt;span dir="RTL"&gt;&lt;/span&gt;&lt;span dir="RTL" style="font-family:Mangal" lang="AR-SA"&gt;&lt;span dir="RTL"&gt;&lt;/span&gt;- &lt;/span&gt;&lt;span dir="LTR"&gt;&lt;/span&gt;&lt;span dir="LTR"&gt;&lt;/span&gt;'&lt;span style="font-family:Mangal;mso-bidi-language:HI" lang="HI"&gt;अरे ओ मेरी प्रियतमा&lt;/span&gt;'&lt;br /&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;mso-bidi-language:HI" lang="HI"&gt;या शायद &lt;/span&gt;'&lt;span style="font-family:Mangal;mso-bidi-language:HI" lang="HI"&gt;समथिंग ब्रोकेन&lt;/span&gt;, &lt;span style="font-family:Mangal;mso-bidi-language:HI" lang="HI"&gt;समथिंग रॉटेन&lt;/span&gt;'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;mso-bidi-language:HI" lang="HI"&gt;शाम ढले दरबार उठा&lt;/span&gt;, &lt;span style="font-family:Mangal;mso-bidi-language:HI" lang="HI"&gt;विरुदावली पूरी हुई&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;mso-bidi-language:HI" lang="HI"&gt;तो कोई भी उनमें ऐसा न था&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;mso-bidi-language:HI" lang="HI"&gt;जिसके पास भीषण दुख की कोई कथा नहीं थी&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;mso-bidi-language:HI" lang="HI"&gt;एक अदद बंद कोठरी जो हमेशा बंद ही रह गई&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;mso-bidi-language:HI" lang="HI"&gt;और खुली भी तो ऐसे समय&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;mso-bidi-language:HI" lang="HI"&gt;जब उसकी अंतर्कथा जानने के लिए&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;mso-bidi-language:HI" lang="HI"&gt;पुरानी परिचित बंद कोठरियां ही सामने रह गई थीं&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;mso-bidi-language:HI" lang="HI"&gt;मायामृग की सुनहरी झाईं एक बार फिर उनके सामने थी&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-family:Mangal;mso-bidi-language:HI" lang="HI"&gt;क्षितिज पर रात की सियाही उसे अपने घेरे में ले रही थी&lt;/span&gt;&lt;span style="mso-bidi-language:HI"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5004531893346374759-596014271462002725?l=pahalu.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://pahalu.blogspot.com/feeds/596014271462002725/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5004531893346374759&amp;postID=596014271462002725' title='9 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5004531893346374759/posts/default/596014271462002725'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5004531893346374759/posts/default/596014271462002725'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://pahalu.blogspot.com/2011/05/blog-post_18.html' title='मायामृग'/><author><name>चंद्रभूषण</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11191795645421335349</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>9</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5004531893346374759.post-3086472739291541549</id><published>2011-05-09T06:59:00.000-07:00</published><updated>2011-05-09T07:35:34.895-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कविताएं'/><title type='text'>क्या किया</title><content type='html'>क्या किया?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;थोड़ा एनिमल फार्म पढ़ा&lt;br /&gt;थोड़ा हैरी पॉटर&lt;br /&gt;कुछ पार्टियां अटेंड कीं&lt;br /&gt;बहुत सारा आईपीएल देखा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक दिन अन्ना हजारे के अनशन में गया&lt;br /&gt;पूरे दिन भूखा रहने की नीयत से&lt;br /&gt;लेकिन रात में आंदोलन खत्म हो गया&lt;br /&gt;तो खा लिया- बहुत सारा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक गोष्ठी में सोशलिज्म पर बोलने गया&lt;br /&gt;पता चला, सूफिज्म पर बोलना था&lt;br /&gt;सब बोल रहे थे, मैं भी बोला&lt;br /&gt;फिर एक गोष्ठी में ज्ञान पर बोला&lt;br /&gt;और इसपर कि इतने बड़े बाजार में&lt;br /&gt;ज्ञान के कंज्यूमर कैसे पहचाने जाएं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उसी दिन ज्ञान गर्व से मुफ्त की दारू पी&lt;br /&gt;और उससे बीस दिन पहले भी&lt;br /&gt;कामयाब रिश्तेदारों के बीच&lt;br /&gt;नाचते-गाते हुए, खूब चहक कर पी&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दारू वाली दोनों रातों के बीच&lt;br /&gt;एक सीधी-सादी सूफियाना रात में&lt;br /&gt;घर के पीछे हल्ला करने वालों पर सनक चढ़ी&lt;br /&gt;जबरन पंगा लेकर पूरी बरात से झगड़ा किया&lt;br /&gt;रात बारह बजे दरांती वाला चाकू लेकर&lt;br /&gt;मां-बहन की गालियां देता दौड़ा&lt;br /&gt;किसी को मार नहीं पाया, पकड़ा गया&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बाद में कई दिन भीतर ही भीतर घुलता रहा&lt;br /&gt;जैसे जिंदगी अभी खत्म होने वाली है&lt;br /&gt;इस बीच, इसके आगे और इसके पीछे&lt;br /&gt;जागते हुए, नींद में और सपने में भी&lt;br /&gt;नौकरी की....नौकरी की....नौकरी की&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लगातार सहज और सजग रहते हुए&lt;br /&gt;पूरी बुद्धिमत्ता और चतुराई के साथ&lt;br /&gt;कि जैसे इस पतले रास्ते पर&lt;br /&gt;पांव जरा भी हिला तो नीचे कोई ठौर नहीं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक दिन मिजाज ठीक देख बेटे ने कहा,&lt;br /&gt;पापा आप कभी-कभी पागल जैसे लगते हो&lt;br /&gt;मैंने उसे डांट दिया&lt;br /&gt;मगर नींद से पहले देर तक सोचता रहा-&lt;br /&gt;इतना बड़ा तो कर्ज हो गया है&lt;br /&gt;कहीं ऐसा सचमुच हो गया तो क्या होगा।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5004531893346374759-3086472739291541549?l=pahalu.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://pahalu.blogspot.com/feeds/3086472739291541549/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5004531893346374759&amp;postID=3086472739291541549' title='15 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5004531893346374759/posts/default/3086472739291541549'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5004531893346374759/posts/default/3086472739291541549'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://pahalu.blogspot.com/2011/05/blog-post.html' title='क्या किया'/><author><name>चंद्रभूषण</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11191795645421335349</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>15</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5004531893346374759.post-1330786291573543262</id><published>2011-03-26T05:32:00.000-07:00</published><updated>2011-03-26T06:49:38.847-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कविताएं'/><title type='text'>गुमचोट</title><content type='html'>सब ठीकठाक है&lt;br /&gt;बस एक तकलीफ&lt;br /&gt;जब-तब जीने नहीं देती&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जानता नहीं कि यह क्या है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;याद से जा चुकी&lt;br /&gt;या किसी और जन्म में लगी&lt;br /&gt;भीतर की कोई भोथरी गुमचोट&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कोई अनुपस्थिति&lt;br /&gt;कोई अभाव&lt;br /&gt;कोई बेचारगी कि&lt;br /&gt;हम अपने खयाल को सनम समझे थे&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस खयाल का कोई क्या करे&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भीड़ भरी राहों में खोए&lt;br /&gt;न जाने कितने&lt;br /&gt;खयाली सनम&lt;br /&gt;याद आते हैं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्यूं न इक और बनाया जाए&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भीतर इतनी खटर-पटर&lt;br /&gt;इतनी आमदरफ्त&lt;br /&gt;इतना शोर&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसा कोई ठंडा&lt;br /&gt;पोशीदा कोना कहां है&lt;br /&gt;जहां उसे ठहराया जाए&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह एक साफ-सुथरे&lt;br /&gt;पागलपन की तलाश है&lt;br /&gt;मुझे भी ऐसा लगता है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस दर्द का इलाज मगर कहां से लाया जाए&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5004531893346374759-1330786291573543262?l=pahalu.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://pahalu.blogspot.com/feeds/1330786291573543262/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5004531893346374759&amp;postID=1330786291573543262' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5004531893346374759/posts/default/1330786291573543262'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5004531893346374759/posts/default/1330786291573543262'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://pahalu.blogspot.com/2011/03/blog-post_26.html' title='गुमचोट'/><author><name>चंद्रभूषण</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11191795645421335349</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5004531893346374759.post-2342646192932248204</id><published>2011-03-14T06:18:00.000-07:00</published><updated>2011-03-14T07:10:32.832-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कविताएं'/><title type='text'>ग्यारह सौ गज नीचे</title><content type='html'>कोयले की खान में गहरे उतरो तो&lt;br /&gt;एक अलग सी तनहाई&lt;br /&gt;अपने भीतर उतरती देखते हो&lt;br /&gt;सिर पर चढ़ी टोपलाइट&lt;br /&gt;रोशनी का एक लंबोतरा वृत्त&lt;br /&gt;तुम्हारे आगे फेंकती है&lt;br /&gt;बस उतनी ही तुम्हारी दुनिया होती है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लोग साथ होते हैं, पर नहीं होते&lt;br /&gt;दो-एक रोशनियां अपने इर्दगिर्द देखकर&lt;br /&gt;तुम सोचते हो&lt;br /&gt;कि तुम अकेले नहीं हो&lt;br /&gt;लेकिन असल में यहां कोई&lt;br /&gt;किसी के साथ नहीं है&lt;br /&gt;सभी जानते हैं कि यहां सभी अकेले हैं&lt;br /&gt;और इस बात का कोई दार्शनिक अर्थ नहीं है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कोयले की खान में जाते हुए&lt;br /&gt;सिर्फ पीछे छोड़कर&lt;br /&gt;तुम्हारे दाएं-बाएं ऊपर-नीचे&lt;br /&gt;और आगे भी सिर्फ कोयला है&lt;br /&gt;उसी की दीवारें उसी की छत उसी का फर्श&lt;br /&gt;और जिस जगह पहुंचकर खान बंद हो रही है&lt;br /&gt;उसे ढहने से बचाने के लिए&lt;br /&gt;सैकड़ों बल्लियों पर टांगकर रखा गया है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बीच-बीच में जब दबाव बढ़ता है&lt;br /&gt;तब बल्लियां गरम हुई भैंस की तरह रंभाती हैं&lt;br /&gt;अपनी आधी उम्र खान में गुजार देने वाले भी&lt;br /&gt;उनका चरचराना सुनकर&lt;br /&gt;कई कदम पीछे खिसक जाते हैं&lt;br /&gt;क्योंकि जमीन से ग्यारह सौ गज नीचे&lt;br /&gt;घात लगाए मौत के लिए&lt;br /&gt;न कोई प्रधानमंत्री है न कोई पल्लेदार&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कोयले की खान  में&lt;br /&gt;धीरे-धीरे इंसान और कोयले का&lt;br /&gt;फर्क मिटता जाता है&lt;br /&gt;तुम्हें पता भी नहीं चलता कि&lt;br /&gt;खान में उतरते-उतरते तुम&lt;br /&gt;अपने भीतर कैसे उतर गए-&lt;br /&gt;और क्या हाल है कि&lt;br /&gt;वहां भी सिर्फ कोयले के ढोंके दिखते हैं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कोई कहता है-&lt;br /&gt;चलिए, टाइम हो गया&lt;br /&gt;टाइम हो गया?&lt;br /&gt;जी, सिर्फ आधे रास्ते की बैटरी बची है&lt;br /&gt;उसकी मद्धिम अफसुर्दा रोशनी की तरफ&lt;br /&gt;देखते हुए तुम खुद से बाहर आते हो,&lt;br /&gt;पाते हो कि तुम्हारे और कोयले के सिवा&lt;br /&gt;संसार में कहीं कुछ और भी है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5004531893346374759-2342646192932248204?l=pahalu.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://pahalu.blogspot.com/feeds/2342646192932248204/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5004531893346374759&amp;postID=2342646192932248204' title='6 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5004531893346374759/posts/default/2342646192932248204'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5004531893346374759/posts/default/2342646192932248204'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://pahalu.blogspot.com/2011/03/blog-post_14.html' title='ग्यारह सौ गज नीचे'/><author><name>चंद्रभूषण</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11191795645421335349</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5004531893346374759.post-8317259481157687837</id><published>2011-03-07T05:09:00.000-08:00</published><updated>2011-03-07T05:46:25.864-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कवितायेँ'/><title type='text'>फुरगुद्दियां</title><content type='html'>जैसे आंधी का एक सघन झोंका&lt;br /&gt;सिर के पीछे से गुजर गया हो&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अचंभित करता हुआ&lt;br /&gt;फुरगुद्दियों का एक झुंड&lt;br /&gt;सोसायटी के सातफुटा सजावटी पेड़ों के&lt;br /&gt;झुरमुट से निकलकर&lt;br /&gt;सीधे तीर सा ऊपर उठा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चहकती हुई&lt;br /&gt;कई सौ नन्ही चिड़ियां एक साथ&lt;br /&gt;सेकंड भर में आंखों से ओझल होती हुई&lt;br /&gt;जैसे शकर बन घुल गई हों&lt;br /&gt;सुबह की हल्की नम हवा में&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिर वैसे ही शोर भरे झपाटे से&lt;br /&gt;एक और झुंड निकला&lt;br /&gt;और एक-एक कर कितने सारे और&lt;br /&gt;जैसे सातफुटा पेड़ों में&lt;br /&gt;उनका कोई अक्षयपात्र रखा हो&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खाना हर किसी को चाहिए&lt;br /&gt;जिंदगी की दूसरी दीगर जरूरतें भी हैं&lt;br /&gt;मगर सुबह-सुबह&lt;br /&gt;इन चहकती  झपाटेदार उड़ानों का&lt;br /&gt;ऐसा कोई मकसद हो सकता है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;देखो-देखो&lt;br /&gt;कई हजार फुरगुद्दियां&lt;br /&gt;क्षितिज से ठीक सात फुट&lt;br /&gt;ऊपर उठे सौम्य सूर्य की&lt;br /&gt;प्रदक्षिणा कर रही हैं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और कोई कारण नहीं&lt;br /&gt;यह सिर्फ इस दुनिया में&lt;br /&gt;होने का उल्लास है&lt;br /&gt;जिससे वंचित जन&lt;br /&gt;इसमें ईश-वंदना के तत्व&lt;br /&gt;खोजते हैं&lt;br /&gt;तो खोजते रहें।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5004531893346374759-8317259481157687837?l=pahalu.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://pahalu.blogspot.com/feeds/8317259481157687837/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5004531893346374759&amp;postID=8317259481157687837' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5004531893346374759/posts/default/8317259481157687837'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5004531893346374759/posts/default/8317259481157687837'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://pahalu.blogspot.com/2011/03/blog-post.html' title='फुरगुद्दियां'/><author><name>चंद्रभूषण</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11191795645421335349</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5004531893346374759.post-6660196081044477742</id><published>2011-02-18T04:24:00.000-08:00</published><updated>2011-02-18T04:29:56.762-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कविताएं'/><title type='text'>कामयाबी</title><content type='html'>खो आए&lt;br /&gt;सारे मौसम खो आए&lt;br /&gt;ढो लाए&lt;br /&gt;बदले में&lt;br /&gt;दुनिया भर की तारीखें&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सिर्फ एक साल में&lt;br /&gt;क्या से क्या हो आए&lt;br /&gt;अपना आपा खो आए&lt;br /&gt;ढो लाए&lt;br /&gt;बदले में&lt;br /&gt;दुनिया भर की तारीफें&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इतने बेआवाज हुए&lt;br /&gt;औरों से तो क्या&lt;br /&gt;खुद से&lt;br /&gt;बातें करना भूल गए&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुबारक हो हुजूर&lt;br /&gt;जिंदगी की पहली कामयाबी&lt;br /&gt;मुबारक हो।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5004531893346374759-6660196081044477742?l=pahalu.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://pahalu.blogspot.com/feeds/6660196081044477742/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5004531893346374759&amp;postID=6660196081044477742' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5004531893346374759/posts/default/6660196081044477742'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5004531893346374759/posts/default/6660196081044477742'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://pahalu.blogspot.com/2011/02/blog-post_18.html' title='कामयाबी'/><author><name>चंद्रभूषण</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11191795645421335349</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5004531893346374759.post-7824070206695901610</id><published>2011-02-12T04:48:00.000-08:00</published><updated>2011-06-10T05:46:35.649-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कविताएं'/><title type='text'>स्मृतिपोत</title><content type='html'>छूटे हुए लोग कभी नहीं मिलते&lt;br /&gt;कद-बुत में उनके मिलती हैं&lt;br /&gt;सिर्फ उनकी निशानियां&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कोई जुमला, कोई लहजा,&lt;br /&gt;निगाह का कोई अजब पैंतरा,&lt;br /&gt;जो सजग न रहने पर&lt;br /&gt;अब भी चुभ जाता है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तुम सोचते हो, यह वही है,&lt;br /&gt;जिसकी एक-एक जुंबिश पर&lt;br /&gt;जीना-मरना होता था?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मगर सोचो जरा,&lt;br /&gt;क्या तुम खुद भी वही हो,&lt;br /&gt;एक-एक जुंबिश पर&lt;br /&gt;जीने-मरने वाले?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अच्छा हो कि छूटे हुए लोग&lt;br /&gt;वापस कभी न मिलें&lt;br /&gt;नहीं मिलेंगे तो रहेंगे हमेशा&lt;br /&gt;समय के घावों से महफूज&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सफेद दीवार पर टंगे&lt;br /&gt;रंगबिरंगे स्मृतिपोत में चलते हुए&lt;br /&gt;सदा-सुखी, सदा-सुंदर, सदा-सत्य&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;देखने वाले को भी जब-तब&lt;br /&gt;कुछ दूर अपने साथ ले जाते हुए,&lt;br /&gt;जो उसके अब के होने को&lt;br /&gt;कुछ कम बदरंग बनाता है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5004531893346374759-7824070206695901610?l=pahalu.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://pahalu.blogspot.com/feeds/7824070206695901610/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5004531893346374759&amp;postID=7824070206695901610' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5004531893346374759/posts/default/7824070206695901610'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5004531893346374759/posts/default/7824070206695901610'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://pahalu.blogspot.com/2011/02/blog-post.html' title='स्मृतिपोत'/><author><name>चंद्रभूषण</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11191795645421335349</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5004531893346374759.post-4682761046219692688</id><published>2011-01-14T04:48:00.000-08:00</published><updated>2011-03-02T01:57:02.627-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='आस्था'/><title type='text'>बुल्लेशाह को फिर से खोजें</title><content type='html'>बुल्ला की जाणा मैं कौन? थैया-थैया करके थक गए फकीर बुल्लेशाह ने सदियों पहले किसी दिन यह बात खुद से अकेले में कही होगी। योगवाशिष्ठ में ठीक यही सवाल राम अपने गुरु वशिष्ठ से करते हैं। किसी अंधियारी रात में वह गुरु के घर का दरवाजा खटखटाते हैं। भीतर से गुरु पूछते हैं- कौन? राम बाहर से बोलते हैं- यही तो जानने आया हूं कि मैं हूं कौन? यह कोई संयोग नहीं है कि इक्कीसवीं सदी में धर्म, सभ्यता, क्षेत्रीयता, राष्ट्रीयता आदि जैसे पहचान से जुड़े सवालों से खदबदा रहा दक्षिण एशिया कभी नुसरत फतेह अली खां, कभी वडाली बंधुओं, कभी रब्बी शेरगिल तो कभी ए. आर. रहमान के सुरों पर सवार बुल्लेशाह की रचनाओं में सुकून पा रहा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बाबा का जीवनकाल 1680 से 1757 के बीच माना जाता है। एक ऐसा दौर, जिसकी पहचान औरंगजेब की मजहबी तानाशाही और गुरु गोविंद सिंह की बगावत से जुड़ी है। दिल्ली तख्त के सीधे निशाने पर होने के बावजूद नवें गुरु तेग बहादुर को इस फकीर ने खुलेआम गाजी (धर्मयोद्धा) करार दिया था। हिंसा और रक्तपात से भरे उस युग को ध्यान में रखें तो बाबा बुल्लेशाह की इस काफी (सूफी छंद) का एक अलग अर्थ निकलता है- &lt;em&gt;वाह-वाह माटी दी गुलजार। माटी घोड़ा, माटी जोड़ा माटी दा असवार। माटी माटी नूं दौड़ावे, माटी दी खड़कार। माटी माटी नूं मारन लागी, माटी दे हथियार....। &lt;/em&gt;मिट्टी का घोड़ा, मिट्टी का जोड़ा, मिट्टी का ही सवार। मिट्टी मिट्टी को दौड़ावे, मिट्टी की झनकार। मिट्टी मिट्टी को मार रही है, मिट्टी के हथियार....।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बुल्लेशाह सूफी पंथ के कादरी सिलसिले से संबंध रखते थे, जो उस समय इस्लामी कट्टरपंथ के अग्रदूत के रूप में सक्रिय सरहिंदी तहरीक के मुकाबले उदार इस्लाम का प्रतिनिधित्व करता था। जहांगीर के बाद मुगल सल्तनत का सुसंस्कृत वारिस दारा शिकोह खुद को कादरी सिलसिले के बहुत करीब पाता था। दिल्ली पर जबतक उसका प्रभाव रहा, पंजाब में उदार और सहिष्णु इस्लाम की धारा बहती रही। यह क्रम बाबा बुल्लेशाह की पैदाइश के ठीक तेरह साल पहले औरंगजेब के हाथों दारा शिकोह की पराजय के साथ टूट गया और कादरी सिलसिला अचानक उस समय की सरकारों की नजर में धर्मद्रोह और बगावत के अड्डे की तरह जाना जाने लगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बुल्लेशाह की कविता में कट्टरपंथ और शाही रौब-दाब के प्रति मौजूद हिकारत एक हद तक उनके धार्मिक पंथ से भी प्रभावित है, हालांकि कवि की चेतना हमेशा सामूहिक से ज्यादा निजी ही हुआ करती है। अब इसका क्या करें कि कादरी शब्द अभी हाल में पाकिस्तानी पंजाब के गवर्नर सलमान तासीर की हत्या करने वाले उन्मादी कट्टरपंथी के नाम में भी बदस्तूर जुड़ा है। पता नहीं उसका या उसके परिवार का संबंध सूफी पंथ कादरी फिरके से है या नहीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;बुल्ला की जाणा मैं कौन&lt;/em&gt; को ही गौर से सुनें तो फकीर बुल्लेशाह की विराट चेतना और उनके क्रांतिकारी अध्यात्म की सरहद छू सकते हैं। &lt;em&gt;ना मैं मोमिन विच्च मसीतां, ना मैं विच्च कुफर दिआं रीतां। ना मैं पाकां विच्च पलीतां, ना मैं मूसा ना फिरऔन। ना मैं अंदर बेद किताबां, ना विच भंगां होर शराबां। ना विच रिंदां मस्त खराबां, ना विच जागन ना विच सौन।.....अव्वल आखर आप नूं जाना, ना कोई दूजा होर पिछाना। मैथों होर न कोई सियाना, बुल्ला शाह खड़ा है कौन। &lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;न तो मस्जिद में रमने वाला मोमिन हूं, न कुफ्र की रीत से कोई लेना-देना है। न पवित्र लोगों के बीच गंदा हूं, न मूसा हूं, न फराओ। न वेद और दूसरी किताबों में हूं, न भांग और शराब में। न मस्त शराबियों के बीच खराब हुआ पड़ा हूं, न जागने वालों में हूं, न सोने वालों में। .....प्रारंभ और अंत मैं खुद को ही जानता हूं। किसी और की मुझे पहचान नहीं है। मुझसे सयाना कोई और नहीं है। बुल्लेशाह, तेरी शक्ल में ये कौन खड़ा है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बुल्लेशाह के बारे में किस्सा है कि एक बार रमजान के महीने में वह अपने डेरे में बैठे बंदगी कर रहे थे और उनके चेले बाहर बैठे गाजर खा रहे थे। कुछ रोजादार मुसलमान उधर से गुजरे और फकीर के डेरे पर लोगों को रोजा तोड़ते देख नाराज हो गए। पूछा - तुम लोग मुसलमान नहीं हो क्या? जवाब हां में मिला तो उनकी कुटाई कर दी। फिर उन्हें लगा कि कुछ सेवा उस उस्ताद की भी की जानी चाहिए, जिसके शागिर्द ऐसे हैं। भीतर जाकर पूछा - अरे तू कौन है? बुल्लेशाह ने बाजू ऊपर करके एं- वें हाथ हिला दिए। मोमिनों को लगा, पागल है। बाद में चेलों ने पूछा, बाबा हमें बड़ी मार पड़ी, तुम बच कैसे गए? उन्होंने कहा, तुमसे कुछ पूछा था ? वे बोले, मजहब पूछा था, मुसलमान बताया तो मारने लगे। बुल्लेशाह ने कहा - बेटा, कुछ बने हो, तभी मार खाई है। हम कुछ नहीं बने तो बच गए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सूफी संतों की आम छवि पढ़ाई-लिखाई को घंट पर मारने वालों की हुआ करती है, लेकिन इस छवि से उलट बाबा बुल्लेशाह अपने समय के एक कुलीन परिवार से आए हुए काफी पढ़े-लिखे व्यक्ति थे। उनकी मानसिक गति ज्ञान से भावना की ओर, पढ़े से अपढ़ होने की ओर, तर्क्य से अतर्क्य की ओर बढ़ने की थी। संसार के कम ही बौद्धिकों को यह सुयोग हासिल होता है, और जिन्हें होता है, उनमें से कोई विरला ही इससे उपजी ऐंठ से बच पाता है। बुल्लेशाह की काफियां सुनने में तो अच्छी लगती ही हैं लेकिन उन्हें पढ़ने का भी एक अलग आनंद है। इसके लिए आपको सिर्फ कामचलाऊ पंजाबी आनी चाहिए, और धार्मिक राग-द्वेष से मुक्त एक खुला दिमाग, जिसमें कवि का मर्म समझने का जज्बा हो।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बाबा बुल्लेशाह की जन्मभूमि और कर्मभूमि दोनों अभी पाकिस्तानी पंजाब में है। पता नहीं वहां उभरते मजहबी कट्टरपंथ ने अब उनके घर में उनके बागी सुर के लिए कोई जगह छोड़ी है या नहीं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5004531893346374759-4682761046219692688?l=pahalu.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://pahalu.blogspot.com/feeds/4682761046219692688/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5004531893346374759&amp;postID=4682761046219692688' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5004531893346374759/posts/default/4682761046219692688'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5004531893346374759/posts/default/4682761046219692688'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://pahalu.blogspot.com/2011/01/blog-post.html' title='बुल्लेशाह को फिर से खोजें'/><author><name>चंद्रभूषण</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11191795645421335349</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5004531893346374759.post-433436601431531461</id><published>2010-12-25T03:29:00.000-08:00</published><updated>2010-12-25T03:47:18.204-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='यूं ही कुछ'/><title type='text'>क्रिसक्रॉस क्रिसमस</title><content type='html'>घोर जाड़े में पड़ने वाले अकेले त्योहार क्रिसमस का ढोल-धम्मड़ और पटाखों वाला पंजाबी संस्करण आज रात हम सभी का इंतजार कर रहा है। इसे दुनिया भर में ईसा मसीह का जन्मदिन समझकर मनाया जाता है लेकिन इस बात को लेकर ईसाइयों के बीच आम सहमति ज्यादा पुरानी नहीं है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्रिसमस के मूल शब्द क्रिस्टे मास का क्रिस्टे एकबारगी क्राइस्ट से जुड़ा जान पड़ता है, लेकिन लैटिन में इसका अर्थ एक विशेषण- पवित्र- है। क्रिसमस, यानी पवित्र सभा। अभी दो सौ साल पहले तक ज्यादातर ईसाइयों के लिए इस पर्व का उल्लास चर्च की रस्मी एक सभा तक ही सीमित हुआ करता था, हालांकि इसे लेकर उनके बीच कुछ संदेह भी थे। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सन 312 में सम्राट कॉन्स्टेंटाइन ने ईसाई धर्म अपनाया और इसे रोमन साम्राज्य का राजधर्म घोषित किया। इसके 42 साल बाद सन 354 में एक रोमन सांसद फाउस्ट ने आम सभा में कहा कि प्रभु यीशु का जन्म दिन अलग-अलग तिथियों पर मनाया जाना ठीक नहीं है। फिर इसी साल रोम के मुख्य पादरी बिशप लाइबेरियस ने इसके लिए स्थायी रूप से 25 दिसंबर की तारीख मुकर्रर की। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रोमनों का पारंपरिक त्योहार ब्रूमा 25 दिसंबर को ही मनाया जाता था, जिसका ईसाइयत से कुछ भी लेना-देना नहीं था। ईसाइयों का बड़ा हिस्सा रोमन साम्राज्य की घोषणा के सैकड़ों साल बाद भी 25 दिसंबर को ईसा का जन्मदिन मानने को राजी नहीं हुआ क्योंकि उसे लगता रहा कि रोमनों ने अपना पगान (गैर-ईसाई) त्योहार उन पर थोपने के लिए जबर्दस्ती यह मान्यता बना दी है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हल्ला-गुल्ला, मौज-मजे वाले अपने मौजूदा रूप में क्रिसमस की शुरुआत कहां से हुई, सेंटा क्लॉज, क्रिसमस ट्री और कैरल गाने की परंपराएं इसमें कहां और कब जुड़ती गईं, इसे लेकर स्थिति आज भी बहुत स्पष्ट नहीं है। बर्फ की चिकनी सतह पर स्लेज से चलने वाले सेंटा क्लॉज का यरूशलम जैसी गर्म जगह से भला क्या मेल हो सकता है? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खोजी लेखक जो पेरी ने हाल में अपनी किताब 'क्रिसमस इन जर्मनी' में काफी खोजबीन के बाद यह नतीजा निकाला है कि यह त्योहार दरअसल उन्नीसवीं सदी में जर्मनी की खोज है। नेपोलियन द्वारा युद्ध में पराजित होने के बाद जर्मन रियासतों को एक राष्ट्रीय पहचान की जरूरत थी। मार्टिन लूथर किंग द्वारा जर्मन में तुक के साथ अनूदित लूका रचित सुसमाचार की नए-नए छापाखानों में छपी प्रतियां उनके लिए इसका माध्यम बन गईं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अपने आधुनिक रूप में क्रिसमस सबसे पहले 1820 के दशक में जर्मन कुलीनों और मध्यवर्गीय बुद्धिजीवियों के घरों में मनाया गया। क्रिसमस पर सरकारी छुट्टी घोषित किए जाने की परंपरा भी दुनिया में सबसे पहले जर्मनी में ही शुरू हुई। 1840 में जर्मनी से ही प्रिंस एलबर्ट ब्रिटेन में सबसे पहला क्रिसमस ट्री लेकर आए और लगभग इसी समय यह त्योहार यूरोप से आई एक नई रस्म के रूप में अमेरिका में भी धूमधाम से मनाया जाने लगा। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्रिसमस कार्ड सबसे पहले 1880 के दशक में जर्मनी में बंटे थे। 12 रेंडियरों के साथ घूमने वाले दानी संत क्लॉज को ईसाइयत में नॉर्वे, स्वीडन आदि नॉर्डिक देशों का मौलिक योगदान माना जाता है, लेकिन क्रिसमस की रात उनका बच्चों के सिरहाने गिफ्ट रख जाना शायद जर्मन कल्पना की ही उपज है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यहूदी त्यौहार हनुक्का का जोशोखरोश से मनाया जाना जर्मन क्रिसमस की प्रतिक्रिया थी। बाद में उन्हें इसका नुकसान भी उठाना पड़ा। नाजियों ने इस त्यौहार का इस्तेमाल यहूदियों को और ज्यादा अलग-थलग करने और अपनी विचारधारा को लोकप्रिय बनाने में किया था। क्रिसमस ट्री की सजावट में स्वस्तिक के आकार वाली चकमक बत्तियां उनका मौलिक योगदान हैं। यह बात और है कि समय के साथ क्रिसमस की धूम बढ़ती गई जबकि नाजी अपनी विचारधारा समेत धूल में मिल गए।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5004531893346374759-433436601431531461?l=pahalu.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://pahalu.blogspot.com/feeds/433436601431531461/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5004531893346374759&amp;postID=433436601431531461' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5004531893346374759/posts/default/433436601431531461'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5004531893346374759/posts/default/433436601431531461'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://pahalu.blogspot.com/2010/12/blog-post.html' title='क्रिसक्रॉस क्रिसमस'/><author><name>चंद्रभूषण</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11191795645421335349</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5004531893346374759.post-239325226293877444</id><published>2010-11-26T05:33:00.000-08:00</published><updated>2010-11-26T05:54:40.986-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='यूं ही कुछ'/><title type='text'>प्रेम से ज्यादा कमिटमेंट मांगती है जिंदगी</title><content type='html'>कृष्ण को राधा से प्यार था, लेकिन जब वे गोकुल छोड़कर गए तो फिर लौटकर नहीं आए। बाद में उन्होंने बहुत सी शादियां कीं और आठ तो उनकी पटरानियां थीं। राधा का नाम उनकी ब्याहताओं में नहीं था, न ही इस बात की कोई जानकारी है कि लड़कपन के उस दौर के बाद फिर कभी राधा से उनकी मुलाकात भी हुई या नहीं। लेकिन आज भी अपने यहां प्रेम का श्रेष्ठतम रूप राधा और कृष्ण के संबंध को ही माना जाता है।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;सवाल यह है कि प्यार क्या एक ही बार होता है। क्या इसमें जुए या सट्टे जैसी कोई बात है, जो कभी एक ही बार में लग जाता है तो कभी हजार कोशिशों के बाद भी नहीं लगता।&lt;br /&gt;  &lt;br /&gt;कई लोग सोचते रह जाते हैं कि वह एक ही बार वाला कब होगा, पता नहीं कभी होगा भी या नहीं। उसे खोजने की कोशिश में ट्रायल एंड एरर में जुटे रहते हैं, जब तक बस चले और उमर साथ दे। लेकिन जिन्हें सालोंसाल यह लगता रहता है कि वे जीवन में एक ही बार होने वाले प्यार में हैं, वे भी जिंदगी का ग्राफ बदलने के साथ खुद को उसमें जकड़ा हुआ महसूस करते हैं और पहला मौका मिलते ही उससे जान छुड़ाने की कोशिश करते हैं। रिश्तों का इस तरह दरकना तकलीफदेह होता है।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;वे किसलिए दंडित हैं? आखिर उनका दोष क्या है? प्रेम कमिटमेंट मांगता है। दोनों तरफ से कुछ-कुछ छोडऩे की गुजारिश करता है। लेकिन जिंदगी अक्सर प्रेम से ज्यादा कमिटमेंट मांगती है। पहले शायद कुछ कम से भी काम चल जाता रहा हो, लेकिन अब तो वह सर्वस्व मांगने लगी है। जरा सी चूक और डोर पकड़ में आते-आते रह गई। ऐसी नाकामियों का ठीकरा भी प्रेम के सिर फोड़ा जाता है। लगता है, ऐसी किचकिच से तो अच्छा था नाकामी में ही खुश रह लेते। बाकी जिंदगी के लिए झोली में कुछ अच्छी यादें तो होतीं।&lt;br /&gt;  &lt;br /&gt;अपने यहां लड़की और लड़के के लिए एक-दूसरे से प्रेम करना आसान कभी नहीं रहा। इसके लिए उन्हें बाकायदा एक जंग लडऩी पड़ती थी और ज्यादातर जगहों पर आज भी लडऩी पड़ती है। महानगरों में हालात कुछ बदले हैं, लेकिन इससे प्रेम करना आसान नहीं हुआ है। जब लड़कियां करियर-कांशस नहीं थीं, तब प्यार में घर से बागी हुआ लड़का कहीं झाडग़्राम में जाकर किरानी बाबू हो जाता था और भागी हुई लड़की उसके लिए रोटियां पकाने लगती थी। अब लड़के की जिंदगी उसे खदेड़कर बेंगलूर या बोस्टन ले जाती है तो लड़की को बड़ौदा या बर्लिन की राह पकडऩी होती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिंदगी ढर्रे पर आते ही पुराने प्यार की तड़प उठती है। सात समंदर पार से लोग सब कुछ छोड़-छाड़कर दोबारा करीब आ जाते हैं। लेकिन उसके फैसले तय करने वाली जो ताकतें उन्हें दूर ले गई होती हैं, वे प्रेम कहानी के सुखद दि एंड के बाद भी अपना काम करती रहती हैं। ऐसे में बेहतर क्या होगा? प्रेम के लिए अपने व्यक्तित्व को ठहरा लेना या जिंदगी की जरूरतों के मुताबिक अपने प्रेम और बाकी रिश्तों को पारिभाषित करना। ज्यादा नैतिक क्या होगा?&lt;br /&gt;  &lt;br /&gt;प्रेम एक ही बार होता है, ऐसा मानते हुए शाश्वत प्रेम के लिए अपना सर्वस्व समर्पित कर देना या पुराने रिश्तों के प्रति शुभकामना रखते हुए नए रिश्तों के लिए दिल के दरवाजे खोल देना?&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;शाश्वत प्रेम असंभव नहीं, लेकिन वह आपसे बहुत ज्यादा मांगता है। और अगर आप उसे अपना सब कुछ सौंप दें तो भी उसके होने के लिए कई सारे संयोगों की जरूरत पड़ती है। लेकिन कृष्ण की तरह बिना किसी से कोई छल किए जिस प्रेम को छोड़कर आप आगे बढ़ जाते हैं, उसकी भी एक अलग शाश्वतता होती है।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;बिना कुछ खोने का गम या कुछ पाने की लालसा के, दिल पर कोई बोझ लिए बगैर, बिछडऩे के अरसे बाद अपने प्रिय को भरा-पूरा और खुश देखना भी सच्चे प्यार की एक नियामत है- भले ही यह निस्संगता हासिल करने के लिए आपको दूसरे, तीसरे या चौथे प्रेम से ही क्यों न गुजरना पड़ा हो।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5004531893346374759-239325226293877444?l=pahalu.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://pahalu.blogspot.com/feeds/239325226293877444/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5004531893346374759&amp;postID=239325226293877444' title='12 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5004531893346374759/posts/default/239325226293877444'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5004531893346374759/posts/default/239325226293877444'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://pahalu.blogspot.com/2010/11/blog-post_26.html' title='प्रेम से ज्यादा कमिटमेंट मांगती है जिंदगी'/><author><name>चंद्रभूषण</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11191795645421335349</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>12</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5004531893346374759.post-5617636544874864426</id><published>2010-11-12T03:38:00.000-08:00</published><updated>2010-11-12T05:04:33.926-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='गुत्थी'/><title type='text'>मौत के सामने</title><content type='html'>&lt;em&gt;(कल से आगे)&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;गाड़ी में आगे मैं और ड्राइवर और पीछे अपनी पत्नी के साथ जगमोहन था। मुझे पता था कि जो व्यक्ति अपना हाथ तक उठाने से लाचार हो, वह अपनी पत्नी से बरजोरी करके चलती कार से बाहर नहीं कूद पाएगा। लेकिन मन में दुविधा पैदा हुई कि अस्पताल में ही कौन से सुषेन या धनवंतरि बैठे हैं। डॉक्टर जब अधिकतम हफ्ते भर की ही जिंदगी पास रह जाने की बात कर रहे हैं तो क्यों न मरीज की बात को उसकी आखिरी ख्वाहिश समझ कर मान लिया जाए। इस तरह हमने गाड़ी दाएं के बजाय बाएं मोड़ ली और टनकपुर की तरफ चल पड़े। चढ़ते नवंबर की भोर में टनकपुर की यात्रा बीस मिनट का एक अच्छा अनुभव थी लेकिन बाजार में पहुंचकर पता चला कि जहां जाना है, उस जगह के बारे में किसी को कुछ पता ही नहीं है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जगह-जगह रुक कर लोगों से बंसीधर जोशी टायर वाले के बारे में पूछा गया। फिर उनकी पहचान पीलिया झाड़ने वाले के रूप में बताई गई तो लोगों ने आसपास रहने वाले बीस और पीलिया झाड़ने वालों के नाम-पते बता दिए। फिर एक संकरी गली में पहुंचकर जगमोहन ने कहा कि जिनके यहां जाना है, वे कुछ सुंघाते भी हैं तो एक सज्जन ने बताया कि वे रोडवेज में ड्राइवर रहे रमेश जोशी हैं और उनका ठिकाना दो-तीन किलोमीटर पीछे छूट गया। रमेश जोशी के घर पर एक ड्राइविंग स्कूल का बोर्ड लगा था और न सिर्फ उनकी, बल्कि उनकी पत्नी की बातों का प्रवाह भी ढलान से उतर रही रोडवेज की बस जैसा ही था। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उन्होंने कोई झाड़फूंक नहीं की लेकिन अपनी दवा को रामबाण जैसी अचूक बताते हुए जगमोहन को दस मिनट में उसकी दो चुटकियां सुंघा दीं। उनकी दवा काफी महंगी भी थी- सौ रुपये में एक चुटकी। लेकिन मरीज को अगर इस हाल में कुछ फायदा हो गया होता तो शायद यह सस्ती ही लगती। जोशी जी का कहना था कि इस दवा को लेने के बाद शरीर से पीलिया बाहर निकलेगा। आंख से, नाक से, पसीने से, मल से, मूत्र से, जिस भी रास्ते वह बाहर निकल सकता है, हर रास्ते से बाहर निकलेगा। आजमाइश के लिए जरा सी मैंने भी सूंघी तो दो-तीन छींकें आईं और नाक जरा पनियाई हुई सी लगी। जगमोहन को कुछ भी नहीं लगा, लेकिन बाद में लगेगा, ऐसा सोच कर हम लोगों ने सूंघने और पीने की दो और खुराक बंधवा ली।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;थोड़ा आगे चलकर जगमोहन ने कहा कि उसे लैट्रिन हो गई। हम लोगों ने कहा, कोई नहीं, दो मिनट में पहुंच जाते हैं। घर पहुंचने के बाद सिलसिला ही शुरू हो गया। लंबे समय से पेट पर धीरे-धीरे बन रहे दबाव से मरीज को थोड़ी राहत सी हुई होगी।  घर के लोगों को भी लगा कि उसकी आंखों और त्वचा का पीलापन कम हो रहा है। रमेश जोशी को गलत न समझा जाए, लिहाजा उनके लिए भी यह सफाई देना जरूरी है कि उन्होंने पीलिया का इलाज करने का दावा किया था, कैंसर का नहीं। उन्हें बताया गया कि मरीज को पीलिया अलग से नहीं बल्कि लिवर कैंसर की वजह से है तो उन्होंने कहा था, कैंसर के बारे में मैं कुछ नहीं जानता, लेकिन पीलिया बढ़ने से हार्ट वगैरह पर जो जोर पड़ता है, वह इस दवा से कम हो जाएगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लंबा सफर और लगातार दो रातों का रतजगा दिन में दस-ग्यारह बजे के करीब मुझे दबा ले गया। दो बजे के करीब पत्नी ने जगाया और कहा कि भाई को लगातार लैट्रिन हो रही है। मैंने कहा अस्पताल चलें तो उनका कहना था कि थोड़ी राहत हो जाए तो चलते हैं। हुआ कि खूब ग्लूकोज पिलाया जाए और इंतजार किया जाए। मरीज को नैपी जैसी बनाकर पहना दी गई और थोड़ी देर में दिन ढल गया। रात में जगमोहन की पत्नी ने कहा कि बार-बार इनकी सफाई करनी पड़ रही है इसलिए आज उनके करीब वही सो जाएंगी। पत्नी के ब्रेन में भी एक छोटा सा ट्यूमर डिटेक्ट हुआ है और उसकी दवा के असर में वे अक्सर अर्धचेतन जैसी ही रहती हैं, फिर भी लगा कि कह रही हैं तो रहने दिया जाए। यह अच्छा फैसला नहीं था क्योंकि रात में उन्हें नींद आ गई और जो क्षण जगमोहन के लिए सबसे ज्यादा संकट के रहे होंगे, उनमें उसकी मदद करने वाला कोई नहीं था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सुबह करीब पांच बजे इंदु दौड़ी हुई आईं कि देखो ददा को क्या हो गया। उसका मुंह खुला हुआ था, जिससे वह पानी से बाहर निकाली हुई किसी मछली की तरह घरघराहट के साथ सांस लेने की कोशिश कर रहा था। मुझे लगा कि यह अस्थमा का अटैक है। एंबुलेंस के लिए फोन किया गया, नेबुलाइजर दिया गया और खूब सिंकाई की गई लेकिन नतीजा कुछ नहीं निकला। कुछ ही मिनटों में एक डॉक्टर के साथ एंबुलेंस आ गई। उन्होंने भी थोड़ा बहुत सपोर्ट दिया, फिर अस्पताल ले गए। वहां ऑक्सीजन और लाइफ सपोर्ट की बाकी व्यवस्था मौजूद थी। कुछ देर को लगा कि शरीर में ऑक्सीजन लेवल नॉर्मल हो रहा है, लेकिन चेहरा वैसा का वैसा ही रहा। आंखें खुली हुई थीं। मक्खी हटाने के लिए पंखा करने पर पुतलियां पंखे के पीछे-पीछे घूम रही थीं। पलकें जब-तब वैसे भी झपक रही थीं। लेकिन चेतना जितनी थी, उतनी ही रही, नॉर्मल स्थिति कभी नहीं लौटी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह इतवार की दोपहर थी और सोमवार को हम दोनों को अपनी-अपनी नौकरी पर वापस लौटना था। हम इंतजार कर रहे थे कि इधर या उधर, किसी भी तरफ मामला हो जाए, लेकिन नहीं हो रहा था। मम्मी ने कहा, तुम लोग अब जाओ। इसकी हालत पता नहीं कब तक ऐसी ही रहे। डॉक्टरों ने कहा, दो-तीन दिन तक लोग इसी हालत में रहते देखे गए हैं। मन मार कर हम चले। गाजियाबाद पहुंचकर मेरे पास फोन आया कि गुजर गए...इंदु को मत बताइएगा। घर पहुंचकर घंटी बजाते-बजाते सीधे इंदु के पास ही जयपुर से उनके चचेरे भाई का फोन आ गया और सारा एहतियात धरा रह गया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जगमोहन कुछ समय तक मेरा दोस्त था। फिर कुछ समय दुश्मन रहा। फिर रिश्तेदार हो गया और फिर धीरे-धीरे वापस दोस्त जैसा लगने लगा था। मुझे लगता है कि कुछ मामलों में मेरी और उसकी मिट्टी एक जैसी थी। राजनीति दोनों के लिए सबसे ज्यादा दिलचस्पी की चीज थी, दोनों ने अपने-अपने ढंग से अलग-अलग धाराओं की होलटाइमरी की। एडवेंचर को लेकर दोनों की ललक एक जैसी रही और दोनों ने उसके नुकसान भी उठाए। मुझे अफसोस है कि मेरे खटीमा पहुंच जाने से उसकी मौत में शायद कुछ दिनों की जल्दबाजी हो गई, लेकिन थोड़ी सी राहत भी है कि अपने अंतिम दो-तीन दिन उसने लेटे-लेटे छत देखते हुए नहीं बल्कि अपने बीवी-बच्चों के साथ गुजारे। मौत के एक दिन पहले उसे टनकपुर ले जाने का फैसला गलत था, लेकिन जिंदगी की आखिरी हुड़क लगी तो अपनी मुश्किल आसान करने के लिए शायद मैं भी किसी बंसीधर मामा का बहाना बनाकर उसके जैसा ही कोई विचित्र नाटक करना चाहूंगा।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5004531893346374759-5617636544874864426?l=pahalu.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://pahalu.blogspot.com/feeds/5617636544874864426/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5004531893346374759&amp;postID=5617636544874864426' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5004531893346374759/posts/default/5617636544874864426'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5004531893346374759/posts/default/5617636544874864426'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://pahalu.blogspot.com/2010/11/blog-post_12.html' title='मौत के सामने'/><author><name>चंद्रभूषण</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11191795645421335349</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5004531893346374759.post-69374777571577820</id><published>2010-11-11T04:51:00.000-08:00</published><updated>2010-11-11T06:14:40.065-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='गुत्थी'/><title type='text'>मौत के सामने</title><content type='html'>कुछ घटनाक्रम ऐसे होते हैं जिनका कुछ सिर-पैर समझ में नहीं आता। ऐसे मौकों पर कुछ और नहीं, सिर्फ स्वदेश दीपक की कहानियां याद आती हैं। अतार्किक और भयावह लेकिन तार्किकता से कहीं ज्यादा बांध कर रखने वाली। पिछले तीन महीनों में मेरे पांच नजदीकी रिश्तेदारों की मौत हुई है। पहले एकमात्र चाचा, फिर एकमात्र बुआ, फिर चाचा के बड़े बेटे, फिर एकमात्र साले और अब एकमात्र चाची। इनमें तीन लोग बूढ़े थे और उनकी मौत बुढ़ापे से जुड़ी वजहों से हुई। एक मुझसे दस-बारह साल बड़े और एक हमउम्र थे और दोनों की मौत शराब से जुड़ी बीमारियों लिवोसिरोसिस और लिवर कैंसर से हुई।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इनमें सिर्फ अपने साले साहब जगमोहन सिंह राठौर की मृत्यु का साक्षी होने का मौका मुझे मिला। जुलाई के अंत में उन्हें कैंसर डिटेक्ट हुआ था। उनके घरेलू कस्बे खटीमा (नैनीताल के पास) में ही डॉक्टरों ने उनकी बिल्कुल सटीक डायग्नोसिस की थी। इसोफैगस का कैंसर, जो फैलकर पूरे लिवर को अपनी गिरफ्त में ले चुका था। लोग वहां से उन्हें लेकर दिल्ली आए। एम्स में खटीमा की डायग्नोसिस सही पाई गई। उन्हें बताया नहीं गया लेकिन डॉक्टरों ने उन्हें सिर्फ एक से तीन महीने दिए। बारह-चौदह साल की दो बेटियां और सात साल का एक बेटा। इस महाविपत्ति का क्या करें, किसी को कुछ सूझ नहीं रहा था। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मरीज को उसकी लाइलाज बीमारी के बारे में बताकर उसका हौसला तोड़ देना बुरी बात है, लेकिन उसकी नजर से इस बात को भला कब तक छिपाया जा सकता है। बगैर किसी इलाज के उसे घर ले जाना उसके सामने वैसे भी ज्यादातर चीजें साफ कर देता। डॉक्टर ने जगमोहन को सिर्फ इतना बताया था कि आपके लिवर में गांठें हो गई हैं। इनका कुछ किया नहीं जा सकता। बस, अपने से ठीक हो जाएं तो हो जाएं। हौसला बढ़ाने के लिए यहां मैंने जगमोहन की बात फोन पर एक योगाचार्य से कराई थी तो उन्होंने उसको अपनी इच्छाशक्ति के जरिए अपनी बीमारी से लड़ने और स्वस्थ दिनचर्या अपनाने की सलाह दी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इच्छाशक्ति में मददगार होने के लिए एहतियातन एम्स वाली रिपोर्ट मैंने वहीं रहने दी और सोचा कि खटीमा वाली रिपोर्ट भी किसी तरह छिपा लूं ताकि कोई समझदार आदमी झटके में उसे सब बता न दे। लेकिन ऐसा हो नहीं पाया। मेरी पत्नी इंदु उसे लिवा कर खटीमा गईं। वहां कोई छुटभैया डॉक्टर साहब आए, रिपोर्ट मंगवा कर देखी और कहा कि कैंसर ही है- चौथे स्टेज का। सुना तो दिमाग भन्ना गया। अब क्या करें। शब्दावली ब्लॉग वाले भाई अजित वडनेरकर से बात की। उनके मामा कमलकांत बुधकर हरिद्वार के मानिंद आदमी हैं। उन्होंने स्वामी रामदेव के यहां रिपोर्ट भिजवाई और वहीं वरिष्ठ पद पर काम कर रहे उनके बेटे ने जगमोहन के लिए यथासंभव सलाह और आयुर्वेदिक दवाओं की व्यवस्था की।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह उपाय सिर्फ एक महीने काम कर पाया। उसके बाद मरीज के लिए प्राणायाम करना संभव नहीं रहा। धीरे-धीरे दवाओं में भी अरुचि होने लगी। पेट में कुछ भी जाना बंद हो गया और एक दिन इमर्जेंसी में उसे अस्पताल पहुंचाना पड़ा। इंदु इस बीच खटीमा आती-जाती रहीं और पिछले हफ्ते दीवाली से एक दिन पहले हम दोनों वहां पहुंचे। अस्पताल में लेटे जगमोहन की शक्ल बिल्कुल भी पहचान में नहीं आ रही थी। हल्दी जैसी पीली पतली खाल ओढ़े, उठने-बैठने हाथ हिलाने तक में लाचार हड्डियों का एक ढांचा। पूरी रात मैं और उसकी मम्मी (मेरी सास) उसे उठाते, बैठाते, एक चारपाई से उठाकर दूसरी चारपाई पर पहुंचाते और कुर्सियों पर उसका वजन इधर से उधर शिफ्ट करने की कवायद में जुटे रहे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगला दिन दीवाली का था। पिछले पंद्रह दिनों की तरह यह त्यौहार का दिन भी इसको इस तरह छत देखते हुए नहीं गुजारना चाहिए। यह सोचकर जैसे-तैसे एक व्हीलचेयर का जुगाड़ किया गया। सुबह की हवा और सूरज की रोशनी में उसे बाहर छत पर ले गए, फिर दोपहर को लाद-फांद कर घर उठा लाए। शाम को बच्चे बहुत खुश कि पापा पूजा पर बैठे हैं और वह भी ऐसे-ऐसे चलके-चलके गए। स्वभावतः पूजा-पाठ मुझे बहुत झेलाता है लेकिन इस दीवाली-पूजा के दृश्य मेरे जेहन पर हमेशा छपे रहेंगे। रात में हल्ला करते हुए सारे बच्चों और बड़ों के साथ जगमोहन ने कई सारे बेवकूफी भरे सीरियल देखे, लेकिन जैसे ही सब लोग सोने गए, फिर वही उठाने-बिठाने का सिलसिला शुरू हो गया। कई रातों बाद मम्मी सोने गई थीं, उन्हें उठाने की हिम्मत नहीं हुई, लेकिन लगातार सोचता रहा कि किसी तरह रात कट जाए तो सुबह ही इसे लेकर अस्पताल चला जाऊंगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ठीक चार बजे भोर में मैंने दरवाजा खटखटा कर इंदु को जगाया और उनसे अस्पताल का फोन नंबर लिया। जगमोहन को बहुत बेचैनी हो रही थी। उसे उठाकर मम्मी के कमरे में ले गए तो अचानक वहां उसने एक विचित्र नाटक शुरू कर दिया- सुबह पांच बजे ही मुझे टनकपुर पहुंचना है, वहां बंसीधर मामा, बंगाली तांत्रिक और एक और आदमी पूजा पर मेरा इंतजार कर रहे हैं- तीनों साथ में पूजा करेंगे और मेरा वहां रहना जरूरी है। मैंने पूछा- कौन बंसीधर मामा, तो जगमोहन की मम्मी के पास भी इसका कोई जवाब नहीं था। बहुत सोचने के बाद ध्यान आया कि मम्मी के गांव के रहने वाले कोई बंसीधर जोशी बीस किलोमीटर दूर पहाड़ की तरफ पड़ने वाले टनकपुर कस्बे में टायरों की दुकान करते हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने कहा, इनमें से किसी का भी नंबर हो तो बताओ, या फिर पता बताओ, मैं सबको लिवाकर अस्पताल आ रहा हूं। वहीं पूजा होगी लेकिन पहले अस्पताल चलो। उसका एक जवाब- तुम समझ नहीं रहे हो, कोई फोन नंबर नहीं है और पता भी मेरे पास नहीं है, लेकिन टनकपुर पहुंचने पर सब मालूम हो जाएगा। मैंने कहा, पंद्रह दिन से तुम अस्पताल में हो। इस बीच या तो उनमें से कोई आया होगा या किसी और ने तुम्हें बताया होगा। किसी भी परिचित, किसी भी कॉमन लिंक का फोन या पता हो तो कोई परेशानी नहीं होगी। लेकिन उसके पास ऐसा कुछ भी नहीं था और वह अड़ा हुआ था। जैसे-तैसे उठाकर उसे गाड़ी में लादा और सड़क की तरफ बढ़े तो बोला कि अस्पताल मुझे नहीं जाना... उस तरफ बढ़े तो कूद जाऊंगा...(जारी)&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5004531893346374759-69374777571577820?l=pahalu.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://pahalu.blogspot.com/feeds/69374777571577820/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5004531893346374759&amp;postID=69374777571577820' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5004531893346374759/posts/default/69374777571577820'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5004531893346374759/posts/default/69374777571577820'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://pahalu.blogspot.com/2010/11/blog-post.html' title='मौत के सामने'/><author><name>चंद्रभूषण</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11191795645421335349</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5004531893346374759.post-8121172047341251468</id><published>2010-10-29T06:33:00.000-07:00</published><updated>2011-05-20T00:55:54.424-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कवितायेँ'/><title type='text'>अंतिम दृश्य</title><content type='html'>दो महीने अगर&lt;br /&gt;दो साल खिंच जाएं तो?&lt;br /&gt;या घटकर दो दिन&lt;br /&gt;या दो घंटे ही रह जाएं तो?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कैलेंडर घड़ी सब हटा लो&lt;br /&gt;समय इनके बिना ज्यादा सही चलेगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दिल का डूबना&lt;br /&gt;हिचकियों का आते ही चले जाना&lt;br /&gt;जब-तब ऐसा लगना&lt;br /&gt;जैसे आंत से गले तक&lt;br /&gt;भीतर-भीतर सब कुछ ऐंठ रहा है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह सब आदमी को&lt;br /&gt;खोल में ले जाने की टेक्नीक है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आदमी अखीर में&lt;br /&gt;सिर्फ एक आदमी होता है&lt;br /&gt;जैसे एक कुत्ता&lt;br /&gt;या एक सांप&lt;br /&gt;या एक पेड़&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;या पहाड़ी शाम का एक रंग&lt;br /&gt;जो एक क्षण भी नहीं टिकता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;थोड़ी सी खाली जगह&lt;br /&gt;हर किसी के जाने के बाद&lt;br /&gt;छूट जाती है&lt;br /&gt;लगता नहीं कि कभी भरेगी&lt;br /&gt;पर भरते-भरते भर भी जाती है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जाता हुआ आदमी&lt;br /&gt;किस-किस के लिए रोएगा?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सामने धूल है या धुंध है&lt;br /&gt;या आंखें ही कुम्हला रही हैं&lt;br /&gt;जो भी है कुछ खास नहीं है&lt;br /&gt;कि यही सब रोज देखते आए हैं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खास है तो सिर्फ इसलिए कि&lt;br /&gt;देखने को आगे यह भी नहीं रहेगा।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5004531893346374759-8121172047341251468?l=pahalu.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://pahalu.blogspot.com/feeds/8121172047341251468/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5004531893346374759&amp;postID=8121172047341251468' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5004531893346374759/posts/default/8121172047341251468'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5004531893346374759/posts/default/8121172047341251468'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://pahalu.blogspot.com/2010/10/blog-post_29.html' title='अंतिम दृश्य'/><author><name>चंद्रभूषण</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11191795645421335349</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5004531893346374759.post-3741454619207734942</id><published>2010-10-25T05:59:00.000-07:00</published><updated>2010-10-25T06:40:45.062-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='विज्ञान दर्शन'/><title type='text'>भौतिक समय और जैविक समय</title><content type='html'>हममें से हर किसी के पास एक ही शरीर है। एक बार हमने जन्म लिया है, एक ही बार मरेंगे। एक बचपन, एक जवानी, एक ही बुढ़ापा भुगतेंगे। लेकिन क्या हो अगर इनमें से कोई एक अवस्था बहुत लंबे समय तक स्थायी बना दी जाए? या किसी को एक ही अवस्था में एक से ज्यादा बार जीने का मौका मिल जाए? बात इतनी अटपटी है कि इसकी कल्पना करना भी काफी मुश्किल है। कोमा में गए मरीजों के नाखून और बाल सामान्य रफ्तार से ही बढ़ते हैं। ज्यादा समय तक इस हालत में रह जाने वालों में दाढ़ी-बाल पकने जैसा उम्र का असर भी दिखाई पड़ता है। लेकिन कुछ जेनेटिक बीमारियों में बायलॉजिकल टाइमलाइन में विचलन देखने को मिल जाते हैं। आप चाहें तो इस साल की चर्चित फिल्म &lt;em&gt;पा&lt;/em&gt; को याद कर सकते हैं, जिसकी कहानी तेजी से बूढ़े होते जाने की बीमारी प्रोजेरिया के इर्दगिर्द गढ़ी गई है। हॉलिवुड में बूढ़े से जवान होते जाने की कल्पना करके एक फिल्म &lt;em&gt;द क्यूरियस केस ऑफ बेंजामिन बटन&lt;/em&gt; बनी थी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन सामान्य जीवन में ऐसे मामले बीमारियों और दुर्घटनाओं से ही जुड़े होते हैं। स्वस्थ हालत में जीवन की सिर्फ एक अवस्था को समय में रोके रखने का उपाय अब तक किया जा सका है। यह है भ्रूण अवस्था। यानी वह अवस्था, जब आपका शारीरिक ढांचा नहीं बना होता, लेकिन उसका सॉफ्टवेयर तैयार हो चुका होता है। जीवन की गाड़ी यार्ड से निकल कर जन्म के डिपार्टिंग स्टेशन की तरफ बढ़ रही होती है। लेकिन वहां पहुंचने से पहले ही चेन पुलिंग करके उसे रोक दिया जाता है। पिछले पखवाड़े जोन्स इंस्टिट्यूट, वर्जीनिया (अमेरिका) से खबर आई कि वहां 42 साल की एक महिला ने एक ऐसे शिशु को जन्म दिया, जिसका जुड़वां भाई इसी साल 20 का होने जा रहा है। यह किसी अवांगार्द वैज्ञानिक प्रयोग का नतीजा नहीं है। इस उलटबांसी की वजह यह है कि गर्भधारण के लिए महिला ने जिस भ्रूण का उपयोग किया था, उसे इंस्टिट्यूट ने अपने यहां 19 साल सात महीने पहले से फ्रीज करके रख छोड़ा था। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तीस साल पहले ईजाद हुई टेस्ट ट्यूब बेबी टेक्नीक या इन विट्रो फर्टिलाइजेशन से पैदा हुए लोगों की संख्या पूरी दुनिया में इस समय 40 लाख के आसपास है। संतानोत्पत्ति की इस विधि में सफलता की गारंटी हर पांच में से अधिकतम एक की हुआ करती है। जाहिर है, टेस्ट ट्यूब टेक्नीक के जरिए बच्चा पाने के इच्छुक दंपतियों को एक ही बार में कई सारे भ्रूण बनने लायक जेनेटिक मटीरियल सप्लाई करना होता है। आम तौर पर हर दंपत्ति के लिए सबसे स्वस्थ अंडाणुओं (ओवम) से पांच या छह भ्रूण बनाए जाते हैं, और उनमें भी सबसे अच्छी तरह विकसित हो रहे किसी एक को गर्भ में प्रत्यारोपित किया जाता है। बाकी फ्रीज करके रख लिए जाते हैं और दाता दंपत्ति की मर्जी से उनका इस्तेमाल किसी अन्य इच्छुक दंपत्ति को संतान लाभ कराने में किया जाता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बीस साल के अंतर वाले जुड़वां के जन्म से जुड़े मामले में जोन्स इंस्टिट्यूट के पास 1981 में संरक्षित चार भ्रूणों में से सिर्फ एक ही पिछले साल तक बिल्कुल स्वस्थ रह पाया था। रिपोर्ट में ऐसी कोई जानकारी मौजूद नहीं है, जिससे पता चले कि पिछले पखवाड़े पैदा हुए शिशु को अपने से बीस साल बड़े बिल्कुल अपने ही जैसे भाई से मिलने का मौका कभी मिलेगा या नहीं। लेकिन मान लीजिए, अब से पच्चीस साल बाद अगर दोनों मिले तो अधेड़ बड़े जुड़वां को अपने जवान भाई से मिलकर काफी ईर्ष्या होगी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सवाल यह है कि जन्म का 20 साल लंबा स्थगन क्या इस बच्चे के शरीर या दिमाग पर किसी तरह का असर डालेगा ? उसके जीवन की घड़ी, जो फ्रीजर में जाकर इतने साल से टिक-टिक करना भूल गई थी, क्या इस गुजरे हुए समय को किसी रूप में दर्ज करेगी? फ्रीजिंग की व्यवस्था सही रहे तो भ्रूण को अनंत काल तक सुरक्षित रखा जा सकता है। सवाल यह भी है कि अभी भ्रूण रूप में आकर सैकड़ों साल बाद की पीढ़ी के साथ जन्मने वाले लोग क्या पूरी तरह उन्हीं जैसे होंगे, या मौजूदा वक्त की कोई पहचान भी उनके साथ जुड़ी होगी? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक बात तो तय है कि भौतिक समय के विपरीत जैविक समय में भूत और भविष्य एक साथ रह सकते हैं। एक टेबल के एक तरफ दादा, पिता और बेटा, और दूसरी तरफ अलग-अलग पीढ़ियों में पैदा हुए दादा के तीन जुड़वां भाई एक साथ बैठकर खाना खा सकते हैं। टेबल की दोनों तरफ आमने-सामने बैठी अलग-अलग उम्र की तीनों जोड़ियों में किस-किस तरह के फर्क होंगे, यह जानने की बात है। समस्या की जटिलता को समझने के लिए एक भिन्न संदर्भ से सोचना शुरू करें। ह्यूमन क्लोनिंग को अभी दुनिया के किसी भी देश में कानूनी इजाजत नहीं मिली हुई है, लिहाजा मजबूरी में हमें किसी और जीव से शुरू करना होगा। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्या आपको डॉली की याद है ? वह भेड़, जिसे उसकी मां के थन से ली गई कोशिकाओं से क्लोन करके बनाया गया था। 1996में स्कॉटलैंड के रोजेलिन इंस्टिट्यूट में जन्मा संसार का पहला स्तनधारी जीव, जो नर और मादा के संसर्ग के बगैर पैदा हुआ। बाद में डॉली को सामान्य प्रजनन से तीन बार में कुल छह बच्चे हुए लेकिन 2003 में मात्र सात साल की उम्र में, यानी किसी औसत भेड़ की कुल आयु के लगभग अधबीच में, उसकी मौत बुढ़ापे की दो बीमारियों फेफड़े में सूजन और गठिया से हुई। मौत से दो साल पहले ली गई तस्वीरों में भी वह किसी बूढ़ी भेड़ जैसी ही दिखती है, लेकिन उसे बनाने वाले इयान विल्मुट और उनकी टीम के लोग कभी यह मानने को तैयार नहीं हुए कि डॉली की मौत में बुढ़ापा कोई फैक्टर थी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जैविक समय के स्केल पर हर जीव की एक शून्य आयु, जीरो एज दर्ज होती है, जहां से वह एककोशीय स्थिति से आगे अपना जीवन शुरू करता है। किसी बच्चे के पहले बर्थडे पर उसकी कुल उम्र एक साल, नौ महीने, कुछ दिन और कुछ घंटे-मिनट-सेकंड मानकर देखें तो इससे उसकी शून्य आयु का अंदाजा हो सकता है। कुछ वैज्ञानिकों की राय है कि क्लोनिंग में जीव की शून्य आयु ठीक से दर्ज नहीं हो पाती। वह अपनी मां और पिता की संतान नहीं, बल्कि उन्हीं में से किसी एक का एक्सटेंशन हुआ करता है, लिहाजा अपनी पिछली पीढ़ी की कुछ उम्र भी वह अपने साथ लिए आता है। ऐसा न होता तो शायद यह गुलाब की टहनी से एक नया गुलाब उगा लेने जैसा होता। फ्रीज करके रखे गए मानव भ्रूण पर भी उसके जन्म तक गुजरे सालों की कोई छाप रह जाती है या नहीं, इसका जवाब जानने के लिए हमें जोन्स इंस्टिट्यूट में पिछले पखवाड़े पैदा हुए बच्चे के बड़े होने का इंतजार करना होगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(नोटः मेरा यह लेख किसी अन्य शीर्षक से कहीं अन्यत्र प्रकाशित है लिहाजा शायद शीर्षक के साथ इसमें पर्याप्त न्याय किया गया न लगे। भौतिक समय और जैविक समय के बीच तुलना एक दिलचस्प विषय है, जिसपर कई लोगों ने काम किया है और मेरी भी करने की इच्छा है। कुछ ढंग की बातचीत अगर यहां शुरू हुई तो सिलसिला अभी आगे बढ़ जाएगा, अन्यथा कभी बाद में।)&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5004531893346374759-3741454619207734942?l=pahalu.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://pahalu.blogspot.com/feeds/3741454619207734942/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5004531893346374759&amp;postID=3741454619207734942' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5004531893346374759/posts/default/3741454619207734942'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5004531893346374759/posts/default/3741454619207734942'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://pahalu.blogspot.com/2010/10/blog-post_25.html' title='भौतिक समय और जैविक समय'/><author><name>चंद्रभूषण</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11191795645421335349</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5004531893346374759.post-2538242145137660713</id><published>2010-10-23T05:48:00.000-07:00</published><updated>2010-10-23T06:39:33.730-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कवितायेँ'/><title type='text'>एक ईडियट कोलाज</title><content type='html'>हर मीश्किन एक दिन लेबेदेव बन जाता है&lt;br /&gt;कुछ बुरे सपने फिर भी दोनों को एक नहीं होने देते&lt;br /&gt;होनी को टालने में जिंदगी गुजर जाती है&lt;br /&gt;अनहोनी फिर भी माथे पर दस्तक देती रहती है&lt;br /&gt;आखिर कितने दांव खेलकर बर्बादी टाली जाएगी&lt;br /&gt;ट्रेन में बैठे भिखमंगे की तस्वीर फिर भी सामने आएगी&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;काली दीवारों वाले बंद अंधेरे घर में&lt;br /&gt;फेफड़ों तक जाती हुई एक मीठी गंध होगी&lt;br /&gt;छुरा होगा सड़ती हुई लाश के सीने में घुंपा हुआ&lt;br /&gt;दो पागल उसके इर्द-गिर्द हथेलियों के दाग छुपा रहे होंगे&lt;br /&gt;फर्श पर पड़ा-पड़ा कहीं और जा चुका होगा प्यार&lt;br /&gt;दुनिया में सिर्फ नस्तास्या फिलिपोव्ना की तस्वीरें होंगी&lt;br /&gt;रात बारह बजे ग्राहकों और दलालों को बराबर से तरसाती हुई&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पैसे का चाबुक हाथ में लिए इल्या रोगोजिन होगा&lt;br /&gt;पागलपन में अपनी अंतिम नाकामी का सोग मनाता हुआ&lt;br /&gt;हंसता हुआ रोता हुआ मन ही मन खुद को करता हुआ लहूलुहान&lt;br /&gt;मौत के घर से धकियाया हुआ कोल्या होगा&lt;br /&gt;अपने सुसाइड नोट के हिज्जे सुधारता हुआ&lt;br /&gt;कि कोई तो समझे न मर पाने की तकलीफ&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पर्दे पर फिल्म चल रही होगी लेकिन हर पल इंटरवल होगा&lt;br /&gt;सिगरेट सुलगाते हुए लोग बार-बार पेशाब करने जा रहे होंगे&lt;br /&gt;ईडियट का मेकअप किए एक बहुत महंगा सुपरस्टार होगा&lt;br /&gt;इमोशन, ड्रामा, सेक्स, हिंसा, मारधाड़ सबकुछ होगा&lt;br /&gt;सिर्फ ईडियट नहीं होगा कि फिल्म उसके बिना भी चल जाएगी&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हर मीश्किन एक दिन लेबेदेव बन जाता है&lt;br /&gt;कि दुनिया चलाने के लिए नोटरी चाहिए &lt;br /&gt;और कुर्क अमीन और फिलसॉफिकल ऑनटुलॉजिस्ट&lt;br /&gt;और डिवोर्स प्लैनर और मैनेजर एचआर ऑपरेशंस &lt;br /&gt;और विजुअल स्ट्रैटजिस्ट और प्राइम कोडिफायर&lt;br /&gt;और कॉन्जुगल सायकायट्रिस्ट और सुसाइड डिजाइनर... &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसे ही गुनी ज्ञानी जनों के सामने हर रोज अपना दुखड़ा रोना है&lt;br /&gt;उन्हीं के पीछे खटना है उन्हीं का दिया खाना है&lt;br /&gt;सपने बहुत डराते हैं पर पिटी हुई राह पकड़ने से रोक नहीं पाते हैं&lt;br /&gt;हर मीश्किन एक दिन लेबेदेव बन जाता है&lt;br /&gt;कुछ बुरे सपने फिर भी दोनों को एक नहीं होने देते&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5004531893346374759-2538242145137660713?l=pahalu.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://pahalu.blogspot.com/feeds/2538242145137660713/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5004531893346374759&amp;postID=2538242145137660713' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5004531893346374759/posts/default/2538242145137660713'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5004531893346374759/posts/default/2538242145137660713'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://pahalu.blogspot.com/2010/10/blog-post_23.html' title='एक ईडियट कोलाज'/><author><name>चंद्रभूषण</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11191795645421335349</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5004531893346374759.post-8556022388522199718</id><published>2010-10-20T06:21:00.000-07:00</published><updated>2010-10-20T06:39:38.984-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='आस्था'/><title type='text'>दर्द से बड़ा एक विश्वास होता है</title><content type='html'>सत्य के लिए, प्रेम के लिए या किसी और बड़े मकसद के लिए बिना किसी से शिकायत किए चुपचाप तकलीफ झेलते रहना एक ऐसी प्रवृत्ति है, जिसका कोई मेल आज के समाज के आम मिजाज से नहीं बनता। कोई मीरा, कोई लल द्यद, कोई फ्रांज काफ्का, कोई वान गॉग अब सिर्फ अपने उत्पादों के लिए याद किया जाता है, अपने दुख के लिए नहीं याद किया जाता। इंसान का छोटा से छोटा दुख भी अब अग्राह्य, बल्कि पूरी तरह त्याज्य समझा जाता है। ऊपरी तौर पर इसके समाधान के लिए पूरी दुनिया तत्पर नजर आती है, बशर्ते खुद को दुखी बताने वाले व्यक्ति की कोई स्क्रीन प्रेजेंस हो, या फिर उसके पास बदले में देने के लिए पर्याप्त पैसे हों। ऐसे में किसी का बिना किसी मजबूरी के कष्ट उठाना समाज के लिए एक ऐसी गुत्थी बन जाता है, जिसे अतार्किक कल्ट घोषित करने के अलावा और कोई चारा समाज के प्रवक्ताओं के पास नहीं बचता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अज्ञेय के उपन्यास &lt;em&gt;शेखर : एक जीवनी&lt;/em&gt; में जेल में बंद नायक की मुलाकात बाबा मदन सिंह से होती है। वे 22 सालों से तनहाई की सजा काट रहे हैं। शिक्षा से पूरी तरह वंचित हैं और अपने जीवन और चिंतन से कुछ सूत्र निकालने का प्रयास करते रहते हैं। मदन सिंह से नायक को एक सूत्र प्राप्त होता है- &lt;em&gt;अभिमान से भी बड़ा एक दर्द होता है, लेकिन दर्द से बड़ा एक विश्वास होता है। &lt;/em&gt;इस अटपटे सूत्र का कोई अर्थ एकबारगी शेखर की समझ में नहीं आता, लेकिन इसके आधे भाग का मतलब एक दिन वह खुद से सच्चा स्नेह रखने वाली स्वतंत्रचेता मौसेरी बहन शशि के पत्र से समझ जाता है। इस पत्र में शशि ने अपने विवाह में जरा भी रुचि न होने के बावजूद इसके लिए राजी होने की बात लिखी है, क्योंकि अपनी मान्यताओं का बोझ वह अपनी सद्य: विधवा मां के सिर नहीं डालना चाहती। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बाद में उसी शशि को उसके ससुराल के लोग मार-पीट कर घर से निकाल देते हैं। इतनी बुरी तरह कि उसका गुर्दा फट चुका है और किसी संयोग से ही वह आगे जीवित रह सकती है। चरित्रहीनता के लांछन के साथ। इस अपराध में कि वह आत्मघात के लिए निकले अपने मौसेरे भाई शेखर के कमरे में एक बरसाती रात बिता कर आई है। घर से निकाली गई शशि वापस शेखर के ही यहां आती है और अपनी यातना के बारे में कई दिनों तक उसे कुछ नहीं बताती। बाद में डॉक्टर के जरिए जब शेखर को शशि की स्थिति का पता चलता है तो फिर उसके सामने धीरे-धीरे बाबा मदन सिंह के सूत्र के दूसरा हिस्से का अर्थ भी खुलता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सफरिंग- बिना किसी बाध्यता के यातना सहना- ईसाइयत के लिए एक मूलभूत धार्मिक तत्व है। फ्रेडरिक एंगेल्स ने अपनी रचना आदि ईसाई धर्म के जरिए यह साबित करने का प्रयास किया है कि सफरिंग हकीकत में ईसाइयत का मूल तत्व नहीं, बल्कि इसे अपना राजधर्म बनाते वक्त रोमन साम्राज्य द्वारा आरोपित चीज है। उन्होंने बताया है कि शुरू में ईसाइयत जब बढ़इयों और लोहारों का गुप्त धर्म हुआ करती थी, तब इसका मूल तत्व प्रतिशोध का हुआ करता था और रोमन साम्राज्य को पलटने का षड्यंत्र रचना इसकी मूल गतिविधि हुआ करती थी। हकीकत चाहे जो भी हो, लेकिन ईसाई धर्म अगर इंतकाम तक सिमट कर रह जाता, किसी बड़े उद्देश्य के लिए कष्ट सहने की बात इसमें शामिल नहीं होती तो सेंट पॉल और सेंट ऑगस्टिन से लेकर मदर टेरेसा जैसी उज्ज्वल परंपरा उसके पास नहीं होती। निर्दयी सत्ताओं के लिए उसे पचा लेना भी तब शायद बहुत आसान हो जाता। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दुनिया के इतिहास में न कोई ऐसा समय था, न ऐसा समाज था, जिसमें निजी स्वार्थ ने समाज की मुख्य संचालक शक्ति की भूमिका न निभाई हो। हर बार लोगों को अपनी खाल से बाहर निकल कर सोचने की प्रेरणा उन्हीं व्यक्तियों से मिली, जिन्होंने किसी मजबूरी में नहीं, अपनी इच्छा से कष्ट झेलने का फैसला किया। भारतीय परंपरा में जीते जी अपनी हड्डियां देने वाले महर्षि दधीचि, शरणागत कबूतर को बचाने के लिए खुद को अर्पित करने वाले राजा शिवि और समुद्र मंथन से निकला हलाहल पी जाने वाले भगवान शिव की परिकल्पनाएं सफरिंग को कहीं आगे तक ले जाती हैं, लेकिन हमारे भावजगत में ऐसी चीजों के लिए अब कोई जगह नहीं रह गई है। हम सत्य, प्रेम या किसी सामाजिक उद्देश्य के लिए यातना सहने की क्षमता से वंचित हो सकते हैं, लेकिन इसे महज एक किस्म का कल्ट बताकर इसका निरादर हमें नहीं करना चाहिए।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5004531893346374759-8556022388522199718?l=pahalu.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://pahalu.blogspot.com/feeds/8556022388522199718/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5004531893346374759&amp;postID=8556022388522199718' title='9 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5004531893346374759/posts/default/8556022388522199718'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5004531893346374759/posts/default/8556022388522199718'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://pahalu.blogspot.com/2010/10/blog-post.html' title='दर्द से बड़ा एक विश्वास होता है'/><author><name>चंद्रभूषण</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11191795645421335349</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>9</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5004531893346374759.post-3595373615652782188</id><published>2010-08-28T06:11:00.000-07:00</published><updated>2010-08-28T06:38:08.285-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='गणित गाथा'/><title type='text'>प्योर मैथ का रोमांस</title><content type='html'>अट्ठारह साल के एक नौजवान ने अपने पिता को लिखे पत्र में बड़े उत्साह से अपने रिसर्च टॉपिक के बारे में बताया। जवाब में भेजी गई चिट्ठी में पिता ने लिखा- मेरे बेटे, समानांतर रेखाओं के फेरे में तो तुम हरगिज न पड़ना। यह रास्ता मेरे लिए अच्छी तरह जाना-बूझा है। न जाने कितनी अंतहीन रातें जाग कर मैंने इसकी थाह लेने की कोशिश की है लेकिन मेरे जीवन की सारी रोशनी, मेरी सारी खुशी इस प्रयास में स्वाहा हो गई। इसे उतनी ही हिकारत से त्याग दो, जैसे कोई सच्चरित्र व्यक्ति अवैध यौन संबंध के प्रस्ताव से नजरें फेर लेता है। यह तुम्हें जीवन के हर आनंद से वंचित कर देगा। तुम्हारा स्वास्थ्य चौपट हो जाएगा, आराम छिन जाएगा और तुम्हारे जीवन से प्रसन्नता सदा के लिए लुप्त हो जाएगी।' &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हंगरी के दो महान गणितज्ञों जानोस बोल्याई और फर्कास बोल्याई के बीच 1820 में हुआ यह पत्र-व्यवहार गणित के इतिहास में सदियों संजो कर रखने लायक चीज बन गया है। यहां वे ज्योमेट्री (रेखागणित) की आधारशिला रखने वाले यूनानी गणितज्ञ यूक्लिड की पांचवीं प्रस्थापना के बारे में बात कर रहे हैं, जो इस प्रकार है- &lt;em&gt;किसी रेखा के बाहर स्थित एक बिंदु से होकर उस रेखा के समानांतर एक और केवल एक ही रेखा खींची जा सकती है।&lt;/em&gt; ईसा के तीन सौ साल पहले दी गई यूक्लिड की प्रस्थापनाओं को पूरी दुनिया में अंतिम सत्य माना जाता था, लेकिन यूरोप के आधुनिक गणितज्ञों में पांचवीं प्रस्थापना को लेकर कुछ शंका मौजूद थी। यह यूक्लिड की बाकी प्रस्थापनाओं, मसलन, दो चीजें अगर तीसरी चीज के बराबर हों तो वे आपस में भी बराबर होती हैं, की तरह कॉमन सेंस वाला मामला तो था नहीं। ऐसे में वे इसे प्रस्थापना के बजाय प्रमेय मानकर सोलहवीं सदी से ही इसे सही या गलत साबित करने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन कहीं पहुंच नहीं पा रहे थे। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जानोस और फर्कास की कहानी को आगे बढ़ाने पर इसका एक कोण विश्व इतिहास के पांच महानतम गणितज्ञों में एक कहे जाने वाले जर्मन मैथमेटिशियन कार्ल फ्रेडरिक गॉस से जुड़ता है। फर्कास अपने बेटे को दस साल की उम्र में गॉस के यहां ले गए थे और उसे अपने शिष्य के रूप में स्वीकार करने का निवेदन किया था। गॉस इसके लिए तैयार नहीं हुए और जानोस को पढ़ाई के लिए विएना भेज दिया गया। वहां घूम-फिर कर उनकी रुचि यूक्लिड की पांचवीं प्रस्थापना में ही अटक गई, जो उनके पिता की पूरी जवानी खा गई थी। लेकिन फर्कास से विपरीत जानोस की कोशिश कामयाब रही। यूक्लिड को सही या गलत साबित करने के प्रयास में वे नॉन-यूक्लिडियन ज्योमेट्री की नींव रखने की ओर चले गए। 1822 में उन्होंने फर्कास को लिखा- 'मैंने शून्य से एक अद्भुत, नया ब्रह्मांड रच डाला है।' &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फर्कास बोल्याई को अपने बेटे का काम अपनी तपस्या पूरी होने जैसा लगा। अगले दस वर्षों में उन्होंने अपना ग्रंथ 'टेंटामेन' पूरा किया और उसके परिशिष्ट में जानोस बोल्याई की खोज को महत्वपूर्ण जगह दी। 1932 में प्रकाशित अपनी इस किताब को उन्होंने मूल्यांकन के लिए गॉस के पास भेजा और उनसे खास तौर पर अपने बेटे के काम के बारे में राय मांगी। जवाब में गॉस ने लिखा - 'इसकी प्रशंसा करना मेरे लिए खुद की प्रशंसा करने जैसा होगा। क्योंकि इस काम की लगभग पूरी अंतर्वस्तु .... मेरे खुद के सोच-विचार के संपूर्णत: समतुल्य है।' जानोस के लिए गॉस का यह जवाब दिल तोड़ देने वाला साबित हुआ। उनकी नौकरी छूट गई। वे धीरे-धीरे घुलने लगे और कुल 57 साल की उम्र में 10 हजार पृष्ठों की गणितीय पांडुलिपियां अपने पीछे छोड़कर दुनिया से विदा हो गए। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अपने जवाब में गॉस किसी खलनायक जैसे नजर आते हैं, लेकिन यहां उनका दोष सिर्फ थोड़े अतिकथन का है। नॉन - यूक्लिडियन ज्योमेट्री में उनका काम जानोस बोल्याई से मिलता-जुलता है, लेकिन दोनों में &lt;em&gt;संपूर्णतः समतुल्य&lt;/em&gt; जैसा कुछ नहीं है। गॉस का सबसे कमजोर पक्ष यह था कि ज्योमेट्री के पुराण-पुरुष यूक्लिड की बात काटने की हिम्मत वे नहीं कर पाए और इसी हिचक में अपने काम को सार्वजनिक करने से रह गए। जानोस और गॉस के आसपास ही लोबाचेव्स्की ने और फिर राइमान ने नॉन-यूक्लिडियन ज्योमेट्री को मुकम्मल शक्ल दी और आज की गणित या भौतिकी की कल्पना इसके बगैर नहीं की जा सकती। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक विज्ञान के रूप में गणित की छवि किसी तपस्वी की साधना जैसी ही है। इसकी क्रांतिकारी खोजें भी प्राय: अचर्चित रह जाती हैं। या चर्चित होने में उन्हें इतना वक्त लगता है कि खोजी के लिए अपनी खोज ही बेमानी हो जाती है। इसके दो उज्ज्वल अपवाद यूनान के आर्किमिडीज और ब्रिटेन के आइजक न्यूटन हैं, जो जितने बड़े गणितज्ञ थे, उतने ही बड़े मिलिट्री साइंटिस्ट भी थे। उनका असर जितना आने वाले समय पर पड़ा, उतना ही अपने समय पर भी दर्ज किया गया। बतौर गणितज्ञ उनकी हैसियत को उनके शाही रुतबे के चलते कम करके नहीं आंका गया। लेकिन पिछली सदी में इस खेल के नियम बदल गए। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जी. एच. हार्डी ने ( भारतीय गणितज्ञ श्रीनिवास रामानुजन को दुनिया के सामने लाने के लिए हम जिनके प्रति कृतज्ञ हैं ) अपने निबंध 'अ मैथमेटिशियंस अपॉलजी' में प्योर मैथमेटिक्स और एप्लाइड मैथमेटिक्स को बिल्कुल अलग-अलग चीजों की तरह देखा है। वे अपना जीवन एक ऐसे गणित के प्रति समर्पित बताते हैं, जिसका कोई व्यावहारिक महत्व नहीं है। इसका उन्हें कोई दुख नहीं है। बस एक संतोष है कि अपनी जिंदगी उन्होंने एक सौंदर्य की खोज में लगाई है, किसी के लिए मुनाफा कमाने या युद्ध जीतने की कवायद में नहीं। यह बात और है कि अंकगणित से जुड़ा हार्डी और रामानुजन का बहुत सारा काम द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान (यानी अपॉलजी लिखे जाते समय भी) कूट संकेतों के विज्ञान क्रिप्टॉलजी में इस्तेमाल हो रहा था और इसके बारे में उन्हें पता तक नहीं था। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इंसान का लालच और उसकी खुदगर्जी संसार की हर चीज का इस्तेमाल कर सकती है। प्योर मैथमेटिक्स के पुजारी किसी भी गिरि-कंदरा में छिप जाएं, धंधेबाज लोग वहां से भी उनके काम को खोज लाएंगे और अपने धंधे में लगा लेंगे। लेकिन हार्डी के निबंध का मूल तत्व प्योर मैथमेटिक्स को महिमामंडित करने का नहीं, गणित के उस दूसरे पहलू को सामने लाने का है, जो अपने सौंदर्य में पेंटिंग, संगीत या कविता जैसा और सत्य के प्रति अपने आग्रह में दर्शन जैसा है। अभी के समय में रूसी गणितज्ञ ग्रिगोरी पेरेलमान हार्डी के इन मानकों पर सबसे ज्यादा खरे उतरते हैं, हालांकि अपनी ही दुनिया में मगन रहने वाले इस साधक के बारे में उसके करीबी लोगों का कहना है कि गणित से उनका रिश्ता अब बीते दिनों की बात हो चुका है। एक खटास भरे प्रकरण के बाद उन्होंने खुद को अपने दूसरे शौकों, जैसे पियानो बजाने और टेबल टेनिस खेलने तक सिमटा लिया है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गणित के सामने मौजूद सहस्राब्दी की सात सबसे बड़ी चुनौतियों में एक प्वांकारे कंजेक्चर (जिसका कुछ सिर-पैर जानने के लिए आपको सतहों के उतार-चढ़ाव से जुड़े टोपॉलजी के कठिन शास्त्र में घुसना पड़ेगा) को उन्होंने हल किया लेकिन इसके लिए मिले फील्ड्स मेडल और दस लाख डॉलर के मिलेनियम अवार्ड को यह कह कर ठुकरा दिया कि गणित के क्षेत्र में आई अनैतिकता या अनैतिक तत्वों को बर्दाश्त करने की प्रवृत्ति उन्हें इनको अपनाने से रोक रही है। दरअसल, गणित का नोबेल कहे जाने वाले फील्ड्स मेडल से विभूषित चीन के दो गणितज्ञों ने पेरेलमान की खोज का श्रेय अपने देश के ही दो चेलों को देने का प्रयास किया, हालांकि इस पूरे एपीसोड का अंत चीनी गणितज्ञों के माफीनामे और उनके द्वारा अपनी रिसर्च वापस लेने के रूप में हुआ। गणित की दुनिया के लिए ऐसे कथित राष्ट्रवादी प्रयास बिल्कुल बेमानी माने जाते रहे हैं, लेकिन दुनिया को अपने ठेंगे पर रखने वाला गणितज्ञ समुदाय भी आजकल चीन की आर्थिक ताकत के सामने खड़े होने की हिम्मत नहीं जुटा पाता।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5004531893346374759-3595373615652782188?l=pahalu.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://pahalu.blogspot.com/feeds/3595373615652782188/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5004531893346374759&amp;postID=3595373615652782188' title='8 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5004531893346374759/posts/default/3595373615652782188'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5004531893346374759/posts/default/3595373615652782188'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://pahalu.blogspot.com/2010/08/blog-post.html' title='प्योर मैथ का रोमांस'/><author><name>चंद्रभूषण</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11191795645421335349</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>8</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5004531893346374759.post-330764967745689082</id><published>2010-07-26T06:10:00.000-07:00</published><updated>2010-07-26T06:39:58.708-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='सभ्यता विमर्श'/><title type='text'>कैसे बनते हैं अवतार</title><content type='html'>हिंदू धर्म का आधार समझे जाने वाले ईश्वरीय अवतारों में क्या कोई विशेष पैटर्न है? कोई ऐसी बात जो इन्हें आधुनिक जीव विज्ञान का आधार कहे जाने वाले इवोल्यूशन के करीब ला देती है? यह सवाल किसी ठेठ पारंपरिक हिंदू दिमाग से नहीं उपजा है, जो रॉकेट से लेकर कंप्यूटर तक सारी की सारी मॉडर्न साइंस वेद-पुराणों में ही भरी हुई मानता है। भारत के पहले सांख्यिकी आयोग के सदस्य, डाईहार्ड नास्तिक और 20वीं सदी के सबसे जहीन वैज्ञानिक दिमागों में से एक जे. बी. एस. हाल्डेन ने यह प्रस्थापना चालीस के दशक में दी थी। अवतारों के गैर-धार्मिक अध्ययन के रूप में यह आज भी अद्वितीय है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अवतारों का इतिहास से कुछ भी लेना-देना नहीं है, फिर भी इनकी मिथकीय धारणा में एक स्पष्ट कालक्रम (क्रोनोलॉजी) मौजूद है। गरुड़ पुराण में पहले चार अवतारों (मत्स्य, कूर्म, वाराह और नृसिंह) को सतयुग से, इनके बाद आने वाले तीन (वामन, परशुराम और राम) को त्रेता से और आठवें यानी कृष्ण को द्वापर युग से जोड़ा गया है। इस पुराण में अवतारों की कुल संख्या दस बताई गई है और कलियुग में बुद्ध को बीते हुए और कल्कि को भविष्य में आने वाले अवतार के रूप में रेखांकित किया गया है। हाल्डेन ने इस क्रम में इवोल्यूशन जैसी कोई बात पाई और अपने एक वैज्ञानिक निबंध में इस पर विस्तार से लिखा। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चार्ल्स डार्विन की ओरिजिन ऑफ स्पीसीज से उभरी इवोल्यूशन की धारणा यूरोप में प्रबल धार्मिक विरोध के बावजूद 20वीं सदी के मध्य तक वहां की सामाजिक समझ का हिस्सा बन चुकी थी। भारतीय संस्कृति की तरफ नए-नए आकर्षित हुए जे. बी. एस. हाल्डेन ने अवतारों में एक किस्म का इवोल्यूशन खोज निकाला। इवोल्यूशन में जीवन की उत्पत्ति समुद्र में हुई बताई गई है, जिसे मत्स्यावतार के करीब माना जा सकता है। कछुआ एक उभयचर (ऐंफिबियन) है, जो इवोल्यूशन का अगला चरण भी है। अंडे देने वाले प्राणियों से स्तनधारियों का उदय उद्विकास का एक महत्वपूर्ण पड़ाव माना जाता है, जो हाल्डेन के मुताबिक वाराहावतार में जाहिर होता है। जानवर और इंसान के बीच की श्रेणी नृसिंह से यह पता चलता है कि मनुष्य का विकास पशुओं से हुआ है। सचाई यह है कि इस मूलभूत डार्विनीय धारणा को स्वीकार करने के लिए हिंदू धर्म से इतर कोई भी धर्म आज तक तैयार नहीं हो पाया है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चिंतन के इसी क्रम में हाल्डेन वामन को प्रारंभिक स्तर का मनुष्य (हॉबिट) जैसा मानते हैं। शस्त्रधारी परशुराम को आदिम या बर्बर मनुष्य (प्रिमिटिव मैन) के प्रतिनिधि के रूप में देखते हैं। राम को सामंती मर्यादाओं की रचना करने वाले और उससे बंधे हुए मनुष्य के रूप में (मोरल मैन) तथा गीता की तर्ज पर कृष्ण को पूर्ण पुरुष या राजनीतिक पुरुष (पॉलिटिकल मैन) के रूप में अवतारों की तार्किक परिणति बताते हैं। बुद्ध के लिए हाल्डेन ने एक नई कैटेगरी दार्शनिक मनुष्य (फिलॉसफिकल मैन) की रचना की है, जो सत्रहवीं सदी के यूरोप में उभरी यूटोपिया की अवधारणा के करीब है। पूरी तरह पश्चिमी बनावट वाले एक वैज्ञानिक बुद्धिजीवी का एक पूर्वी सभ्यता में इतनी गहराई तक उतरना और अपने समय के विज्ञान की सबसे चर्चित प्रस्थापना के साथ इसकी कई विचारोत्तेजक समतुल्यताएं सामने ला देना एक बड़ी उपलब्धि है। आश्चर्य है कि मिथकों को देखने की इस हाल्डेन पद्धति को आगे बढ़ाना तो दूर, भारत में इसे ठीक से नोटिस भी नहीं लिया गया। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अवतार अपने देश में उत्तर-उपनिषदिक युग में उपजी एक जटिल दार्शनिक अवधारणा है। कहीं इसे सामान्य जैविक चरित्रों में ईश्वरीय गुणों की अभिव्यक्ति के रूप में लिया गया है तो कहीं साक्षात ईश्वर के पृथ्वी पर उतर आने की तरह। पुराणों में अलग-अलग मान्यताओं के अनुसार ईश्वर के आठ से लेकर उनतीस तक अवतारों की बात है, अलबत्ता आठ अवतार इन सभी में साझा हैं। ये हैं- मत्स्य, कूर्म, वाराह, नृसिंह, वामन, परशुराम, राम और कृष्ण। इनमें पहले पांच का कोई व्यक्तिवाची नाम नहीं है। इनको सिर्फ इनके जैविक नामों से जाना जाता रहा है। मत्स्य यानी मछली, कूर्म यानी कछुआ, वाराह यानी शूकर यानी सुअर, नृसिंह यानी शेर और इंसान का मिला-जुला रूप और वामन यानी बौना। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इनकी भूमिकाएं भी किसी घटना विशेष तक सीमित हैं, लिहाजा इनका पूरा जीवन चरित्र बखानने की कोई जरूरत पुराणकारों को महसूस नहीं हुई। मसलन, प्रलय काल में जब पृथ्वी जल में डूब गई थी तो भगवान विष्णु ने मत्स्य अवतार लिया और मनु द्वारा जुटाए गए सभी जीवों के जोड़ों से भरी नाव को खींच कर हिमालय की एक चोटी के करीब लेते आए, ताकि नए सिरे से सृष्टि की शुरुआत हो सके। या फिर दैत्य राजा बली ने जब पूरी सृष्टि को जीत लिया तो भगवान ने वामन रूप धारण करके उससे तीन पग भूमि की भिक्षा मांग ली। ढाई पग में ही तीनों लोक नाप लिए और बाकी के आधे के लिए राजा बली ने स्वयं अपना शरीर उनके सामने प्रस्तुत कर दिया। सृष्टि को उबारने के बाद मत्स्यावतार का क्या हुआ, या बली को पैदल कर देने के बाद वामनावतार कहां गए, इसका कोई जिक्र नहीं है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन व्यक्ति नाम से चर्चित बाद के तीनों अवतारों के साथ ऐसा नहीं है। राम और कृष्ण भारतीय जनमानस और परंपरा के अभिन्न अंग हैं। इन्हें बाकी सभी अवतारों से अलग करके भी देखा जा सकता है। इनके चरित्रों के इर्दगिर्द बुने हुए दोनों महाकाव्यों रामायण और महाभारत को छोड़कर भारतीय संस्कृति की कल्पना नहीं की जा सकती। सामाजिक भूमिका की दृष्टि से परशुराम की गिनती इन दोनों के साथ करना कठिन है (शायद राजन्य वर्ग के विनाश की बात राजसत्ता के उदय के शुरुआती दौर में ब्राह्मणों के अलावा अन्य लोगों को भी मुक्तिकामी प्रतीत हुई हो। बाई द वे, अवतारों में ब्राह्मण होने का ठप्पा भी अकेले इन्हीं के साथ लगा है), लेकिन एक मामले में वे न सिर्फ इनसे बल्कि बाकी सभी अवतारों से अलग हैं। वह यह कि इनके साथ अमरत्व का गुण जुड़ा है। (अमरत्व उनके अलावा हिंदू माइथॉलजी के कई और पात्रों, मसलन हनुमान और अश्वत्थामा के साथ भी जुड़ा है और यह संबंधित पात्र को अपने समय के बाकी उल्लेखनीय पात्रों की तुलना में किसी भी दृष्टि से सुपीरियर नहीं बनाता। परशुराम के मामले में भी उनका यह गुण नकारात्मक भूमिका ही निभाता जान पड़ता है।)  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हाशिये पर पड़ने वाले एक टेढ़े पात्र के रूप में इनका जिक्र रामायण और महाभारत, दोनों में आता है और दोनों जगह इनका चरित्र कहानी में कुछ ट्विस्ट पैदा करता है। (वे ऐसे अकेले अवतार भी हैं, जिन्हें दो नए अवतारों के सामने अप्रासंगिक बन कर पड़े रहने का मलाल झेलना पड़ा। मेरे ख्याल से धनुष भंग प्रकरण के बाद राम को सार्वजनिक रूप से अवतार बताने का श्रेय भी उन्हीं को जाता है।) दो अलग-अलग युगों की कहानियों में एक साझा पात्र का होना एक अजीब बात है, लेकिन परशुराम के चरित्र के साथ जुड़ा हुआ यह अकेला उलझाव नहीं है। उनसे जुड़ी कई मिथकीय घटनाओं से उनमें ईश्वरीय ओज का आभास जरूर मिलता है, लेकिन ईश्वरीय औदात्य (डिवाइन सबलिमिटी) का लक्षण उनमें कहीं दिखाई नहीं पड़ता। फिर भी उनकी गिनती निर्विवाद अवतारों में होती है, यह क्या कोई कम बड़ी उलझन है? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रवींद्र नाथ टैगोर ने अपने एक लेख &lt;em&gt;भीष्म को क्षमा नहीं किया गया &lt;/em&gt;में हाल्डेन से थोड़ा पहले या शायद उनके साथ ही अवतारों पर विचार-विमर्श किया है। (इसकी जानकारी हजारी प्रसाद द्विवेदी को पढ़ते हुए प्राप्त हुई। खुद गुरुदेव की यह रचना पढ़ने का अवसर अभी तक नहीं मिला है।) इस लेख में अवतार कैसे बनते हैं के बजाय इस सवाल पर ज्यादा सोचा गया है कि कभी-कभी सारी गुणवत्ताएं मौजूद होने के बावजूद कुछ नायक अवतार क्यों नहीं बन पाते। मसलन, भीष्म हर मायने में अवतार जैसे हैं, लेकिन महत्वपूर्ण अवसरों पर उनकी दुविधा उन्हें अवतार नहीं बनने देती। टैगोर की मान्यता यह जान पड़ती है कि जनमानस में किसी पात्र की जगह उसे कालक्रम में अवतार का दर्जा दिलाती है। अवतारों पर सरसरी तौर पर विचार करने से यह भी लगता है कि चिंतन नहीं, क्रिया (ऐक्शन) हर अवतार का मूल गुण है (हालांकि परशुराम की क्रियाशीलता में अपनी मां की हत्या भी शामिल है)। कोई ऐसी क्रिया, जो मनुष्यता की तत्कालीन धारणा के अनुसार इसके लिए बहुत ही महत्वपूर्ण हो और जिसकी अपेक्षा किसी मनुष्योपरि चरित्र से ही की जा सकती हो।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5004531893346374759-330764967745689082?l=pahalu.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://pahalu.blogspot.com/feeds/330764967745689082/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5004531893346374759&amp;postID=330764967745689082' title='12 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5004531893346374759/posts/default/330764967745689082'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5004531893346374759/posts/default/330764967745689082'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://pahalu.blogspot.com/2010/07/blog-post.html' title='कैसे बनते हैं अवतार'/><author><name>चंद्रभूषण</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11191795645421335349</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>12</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5004531893346374759.post-6589523262378635708</id><published>2010-06-28T05:05:00.000-07:00</published><updated>2010-06-28T06:24:00.638-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='चलते-चलते'/><title type='text'>अचके में कुछ छुट्टियां</title><content type='html'>बृहस्पतिवार की रात आठ बजे जब आखिरकार यह कन्फर्म हो गया कि पति-पत्नी दोनों को अपने-अपने दफ्तरों में दो दिन की छुट्टी मिल गई है और तीसरी छुट्टी के रूप में इतवार का आनंद भी उठाया जा सकता है, तो सवाल उठा कि छुट्टियों की इस संपदा का आखिर करें क्या। बेटे की छुट्टियों का यह आखिरी हफ्ता है, सो इस नेमत को हाथ से जाने नहीं दिया जा सकता था। लेकिन बीतते जून की भीषण गर्मी में दिल्ली के आसपास घूमने का कोई मतलब नहीं था और इतने कम समय में दूर जाने की थकान की कल्पना ही मारे डाल रही थी। कहां जाएं, कहां जाएं, नेट पर दुनिया भर की रिसर्च, मित्रों से सलाह-मशविरा, जो कन्फ्यूजन बढ़ाने की कसरत के अलावा और कुछ नहीं था। रात दस बजने तक एक अजीब तनाव घर करने लगा और तय हुआ कि यहीं कहीं घूम टहल कर बेटू को कुछ जगहें दिखा लाएंगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सुबह हुई तो अचानक दिमाग बदला कि चलो मन, थकान की चिंता पर मिट्टी डालकर किसी ठंडी जगह टहल आते हैं। सात बजे तक ड्राइवर की मान-मनुहार के बाद तीन बैग बांध कर निकल पड़े। गाजियाबाद से निकल कर दिन दो बजे के आसपास  देहरादून पहुंचे तो वहां की गर्मी और उमस दिल्ली से भी कुछ बीस ही जान पड़ी। मन था कि यमुना जी की उतरान डाकपत्थर में कहीं ठहर कर कुछ चिड़ियों की चहल-पहल देखेंगे, लेकिन पता चला कि वहां की आबोहवा देहरादून जैसी ही है। हुआ कि चिड़ियों के जलवे बाद में देखे जाएंगे। अभी तो बाहर ही बाहर मसूरी भाग चलो। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रास्ते में सहस्रधारा के साइनबोर्ड दिखे तो गाड़ी उधर मोड़ दी गई। गंधक के सोते हैं, एक बार नहा लो तो त्वचा संबंधी सारी बीमारियां पास न फटकेंगी। वहां बीस रूपये की पार्किंग दी और तीस रुपये पर जांघिए किराये पर लेकर बाप-बेटा निहायत मैले-कुचैले पानी में उतरे, जिसमें सैकड़ों कच्छाधारी मर्द और पूरे कपड़ों वाली महिलाएं पहले से ही डुबकियां मार रही थीं। असाध्य उत्सुकता सोतों को जरा नजदीक से जानने की ओर ले गई तो वहां गंधक के अलावा गंध के और भी कई जीवंत स्रोत नजर आए। पर्यटकों के लिए सहस्रधारा के जनता-जनार्दन की तुच्छ भेंट। गनीमत इतनी ही रही कि त्वचा को नीरोग बनाने की कोई सनक पत्नी के सिर पर सवार नहीं थी और वे किनारे बैठी बाप-बेटे की उत्सुक मूर्खता का आनंद लेती रहीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मसूरी में रहने का ठिकाना नहीं मिलने वाला, इसका अंदाजा पहले से था। धनोल्टी में मिलेगा, ऐसी सूचना थी, लेकिन दिमाग में पता नहीं कैसे यह बात जम गई थी कि धनोल्टी मसूरी के पहले पड़ता है। पहाड़ी सड़कों पर सनसनाते हुए मसूरी से एक-दो किलोमीटर पहले धनोल्टी का रास्ता कुछ लोगों से पूछा तो उन्होंने कहा थोड़ा ऊपर से दाएं कट लेना, करीब पैंतालीस किलोमीटर है- यानी देहरादून से जितना दूर मसूरी, मसूरी से उतना ही दूर धनोल्टी। पहुंचते-पहुंचते सूरज ढलने लगा और बाजार में कमरे की पूछगच्छ शुरू हुई तो पता चला कि यहां नहीं, थोड़ा आगे ऐपल ऑर्चर्ड देख लो। वहां अंग्रेजों वाली टेढ़ी हैट लगाए, हच वाला कुत्ता पकड़े एक सज्जन मिले, जिनके बारे में उनके एक सहायक ने सूचना दी कि ये टिहरी की रॉयल फैमिली के हैं। कमरे का किराया ढाई हजार रुपये रात। इतनी सकत नहीं है का रोना रोया गया तो उन्होंने थोड़ी दूर एक हजार रुपये रात वाले होटल में भेज दिया, जहां कमरे के ठीक ऊपर मरम्मत की ठोंकपीट चल रही थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ग्यारह बजते-बजते रहा नहीं गया। बाहर निकल कर होटल मैनेजमेंट को इतनी गालियां दीं कि गला बैठ गया। किसने सुना, फिर किससे क्या कहा, यह नहीं पता, लेकिन ठक-ठक बंद हो गई। डबल बेड का आधा-आधा हिस्सा पत्नी और बेटे के पास था। अच्छी-खासी ठंड वाली रात में दोनों के हिस्से के आधे-आधे कंबल के बीच से कुड़कते हुए कमरे की खिड़कियां बंद करने उठा, जिन्हें सोने से पहले वहां मौजूद स्थायी सीलन का भभका भगाने के लिए खोल दिया गया था। वहां मुझे धनोल्टी का चांद दिखा। कड़ाही से निकाले गए समोसे जैसा ताजा-ताजा भाप छोड़ता हुआ सा चांद। पहले तो लगा कि शायद होटल वालों ने पिछवाड़े सुरक्षा के लिहाज से बड़ा सा बल्ब जलाकर छोड़ दिया है। फिर आसमान की तरफ नजर गई। जिंदगी में देखे गए दो-चार चांद शायद हर किसी को याद रहते हों। धनोल्टी का चांद मुझे किसी साइकेडेलिक अनुभव की तरह याद रहेगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगली सुबह क्या करें-क्या करें करते हुए थोड़ा आगे कद्दूखाल तक गए। वहां न जाने किस सनक में सुरखंडा देवी के दर्शन के लिए निकल पड़े- यह सोचकर कि यहीं कहीं होंगी आसपास। फिर चढ़ते गए, चढ़ते गए, चढ़ते गए। पत्नी पिछले साल ही स्पाइन सर्जरी से उठी हैं। एक किलोमीटर चढ़ जाने के बाद उनके भीतर का पहाड़ी खून उबाल मारने लगा। चढ़ते-चढ़ते और फोटो खींचते-खींचते आखिरकार चढ़ ही गईं। वहां जाकर पढ़ा ऊंचाई समुद्र तल से दस हजार फीट। तीर्थस्थलों की यात्रा में मेरी तो आस्था यात्रा भर से ही संतृप्त हो जाती है। बेटे को इसके अलावा कुछ कोक-पेप्सी की भी जरूरत पड़ती है लेकिन बेटे की मां नारियल वगैरह फोड़ती हैं और ऐन दर्शन के मौके पर बाकी दोनों लोगों के गायब हो जाने के लिए उनकी भर्त्सना भी करती हैं। यह कर्मकांड संपन्न हो गया तो उतारे का आनंद शुरू हुआ, जो चढ़ाई का चार गुना था। नीचे पहुंचते-पहुंचते सबकी हालत देखने लायक थी। उत्साह की अकेली बात साथ चल रही पास के गांवों की ठेठ पहाड़ी लड़कियां थी जो हाई स्कूल और इंटर बोर्ड में अपने पास हो जाने का जश्न मनाने नंगे पांव यहां आई थीं- हे संगी, हे संगी, तू भी पास, मैं भी पास...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बारह बजे चेकआउट करके दौड़े-भागे मसूरी पहुंचे- बालक को केंपटी फाल दिखाने। एक किलोमीटर चलते ही गाड़ियों की लंबी लाइन दिखी। पूरे सफर में अक्लमंदी का अकेला फैसला लिया कि ड्राइवर को तुरंत गाड़ी बैक करके फरार हो जाने को कहा। अगले दिन अखबार से पता चला कि लगभग सत्रह किलोमीटर लंबी लाइन थी। चार घंटे फंसे रहने के बाद जो बिना फाल देखे लौट आया, वह खुशकिस्मत। पूरे मसूरी शहर में इतनी गाड़ियां भर गईं कि प्रशासन को उन्हें बाहर से ही लौटाने का आदेश जारी करना पड़ा। खुशकिस्मतों में, बल्कि ज्यादा खुशकिस्मतों में एक हम भी थे। वापसी में देहरादून से सीधे करीब चालीस किलोमीटर आगे डाकपत्थर पहुंचे, जहां गढ़वाल मंडल विकास निगम के गेस्ट हाउस में एक कमरा मिल गया। शाम को आसन बराज गए, चिड़ियां देखने। ज्यादातर चिड़ियां जा चुकी थीं। कुछ सारस, गोड़ावन और मुर्गाबियां देखने को मिलीं। फोटो लगाने का शऊर नहीं है, लेकिन किसी से कह कर कल-परसों में यहां लगा देंगे। उत्तराखंड में यह बड़े पुण्य का काम हुआ है, हालांकि बराज के किनारे जो भाई लोग दिन दहाड़े बोतलें खोले बैठे थे, वे यहां चिड़ियों को भी चैन से नहीं रहने देते होंगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगले दिन दो-तीन किस्तों में बहुत सारा आम खरीदते हुए शाम पांच बजे तक घर पहुंच गए। सैर-सपाटे के लिए जो फुरसत चाहिए होती थी, वह तो कहीं है नहीं। इसी तरह छीन-झपट कर कभी-कभी कुछ कर लेना होता है। लेकिन पहाड़ी इलाकों में जिस रफ्तार से और जितनी बड़ी संख्या में दिल्ली की गाड़ियां दौड़ने लगी हैं, उससे शक होता है कि कुमाऊं, गढ़वाल और हिमाचल का सुकून ज्यादा दिन टिकने वाला नहीं है। राज्य सरकारें यहां की पर्यटन संभावनाओं से आखिरी पाई तक निचोड़ लेने के लिए प्रयासरत हैं लेकिन धनोल्टी जैसी जगहों में पानी तक का ठिकाना नहीं है। होटल वाले केंपटी फाल से भरवाकर साढ़े पांच हजार रुपये के टैंकर मंगवाते हैं और कमरे पीछे साढ़े पांच सौ रुपये रोजाना का खर्च सिर्फ पानी का बताते हैं। ये मामले हल हो जाएं तो भी दिल्ली में कई करोड़ मुंहजोर पैसे वालों का जो वर्ग तैयार हो रहा है, वह आने वाले दस-बीस सालों में ही इन पहाड़ों को खा जाएगा, लिहाजा यहां आने वाले पर्यटकों के लिए कुछ सख्त नियम-कानून बनाना भी बहुत जरूरी है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5004531893346374759-6589523262378635708?l=pahalu.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://pahalu.blogspot.com/feeds/6589523262378635708/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5004531893346374759&amp;postID=6589523262378635708' title='9 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5004531893346374759/posts/default/6589523262378635708'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5004531893346374759/posts/default/6589523262378635708'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://pahalu.blogspot.com/2010/06/blog-post_28.html' title='अचके में कुछ छुट्टियां'/><author><name>चंद्रभूषण</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11191795645421335349</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>9</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5004531893346374759.post-7321266238130621278</id><published>2010-06-16T05:42:00.000-07:00</published><updated>2010-06-16T05:49:12.487-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='सभ्यता विमर्श'/><title type='text'>बड़े धर्म और छोटे देवता</title><content type='html'>चर्चित इतिहासकार विलियम डैलरिंपल ने हाल में अमेरिकी पत्रिका नैशनल इंटरेस्ट में प्रकाशित एक लेख में दक्षिण भारत के अपने एक अटपटे अनुभव का उल्लेख किया है। ईसाइयों और हिंदुओं की मिली-जुली आबादी वाले केरल के एक इलाके में वर्जिन मेरी को देवी भगवती की बहन माना जाता रहा है। सदियों से स्थानीय ग्रामीण दोनों की यात्रा एक साथ निकालते थे और दोनों से अपने सुख-समृद्धि की मनौती मानते थे। पिछले दिनों गांव के समर्थ हिंदुओं ने अपने लिए एक नया विष्णु मंदिर बना लिया और स्थानीय चर्च भी अपने अनुयायियों को साझा देवी-यात्राओं में जाने से मना करने लगा। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;डैलरिंपल ने इस बारे में स्थानीय पादरी से बात की तो उन्होंने कहा- &lt;em&gt;वर्जिन मेरी यहूदी परंपरा से आती हैं। वे जोकिम और अन्ना की बेटी हैं, फलस्तीन की रहने वाली हैं, जबकि यहां का देवी मंदिर भारतीय परंपरा की चीज है। वर्जिन मेरी और भगवती के बीच कोई रिश्ता नहीं है। हम इस तरह के विश्वास को बढ़ावा नहीं दे सकते। यह एक मिथक है। बल्कि उससे भी बुरी चीज, यह एक बकवास है। &lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;स्थानीय विश्वासों का एक दूसरा फलक एनसीआर के नए विकसित हो रहे इलाकों में देखने को मिलता है। डीडीए, जीडीए या नोएडा अथॉरिटी गांवों की खेतिहर जमीनों का अधिग्रहण करती है तो ग्राम देवताओं के इर्दगिर्द की जमीन को सार्वजनिक मान कर उस पर कब्जा नहीं लेती। फिर ग्राम प्रधानों, पटवारियों और बिल्डरों की नजर इन जमीनों पर पड़ती है और वे इनकी घेरेबंदी शुरू कर देते हैं। चारों तरफ से घिरते-घिरते ग्राम देवता किसी अदृश्य कोने में सिमटा दिए जाते हैं और इस सिलसिले का अंत एक दिन उनकी संपूर्ण विदाई के साथ होता है। जिस टूटे-फूटे, अनगढ़ देवस्थान पर आप गांव में ब्याह कर आई दुलहन को सीस नवाते देखते हैं, दो-चार साल बाद वहीं आपको शेराटन या डैफोडिल जैसे किसी अंग्रेजी ब्रैंडनेम वाले बिल्डर्स एंड डेवलपर्स का मायामहल नजर आता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;काली माई, शीतला माई, डीह बाबा, सैयद बाबा, लत्ता पीर.... इस तरह के न जाने कितने छोटे-मोटे आस्था केंद्र फसलों की उपज से लेकर शादी-ब्याह, बाल-बच्चों तक किसान जीवन का हिस्सा बने रहते हैं, लेकिन शहरीकरण के क्रम में ये गैरजरूरी होते जाते हैं। जो लोग इन्हें जहालत का प्रतीक नहीं मानते, उन्हें भी इनको बचाने का काम इतना जरूरी नहीं लगता कि इसके लिए भूमाफिया से पंगा लेने जाएं। ग्राम देवताओं की भरपाई के लिए अब लोगों के पास आस्था के कहीं बेहतर स्रोत मौजूद हैं। बिल्कुल संभव है कि पास में ही किसी आस्थावान बिल्डर ने सड़क घेर कर एक भव्य मंदिर बना रखा हो, या शायद अगले ही हफ्ते बगल वाले चौराहे पर किसी फाइव-स्टार बाबा का प्रवचन होने वाला हो। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सामाजिक अध्येता मीरा नंदा अपनी किताब 'द गॉड मार्केट' में हिंदू मंदिरों की बढ़ती तादाद और पंडे-पुजारियों के चढ़ते रुतबे का हवाला देते हुए कहती हैं- &lt;em&gt;ग्लोबलाइजेशन देवताओं के लिए काफी अच्छा साबित हुआ है। &lt;/em&gt;उनकी इस प्रस्थापना में यह जोड़ना जरूरी लगता है कि गांव-जंवार के छोटे देवताओं के लिए तो यह कतई अच्छा नहीं रहा है। छोटी आस्थाओं की विदाई और बड़ी आस्थाओं का विस्तार भारत में ही नहीं, पूरे दक्षिण एशिया में पिछले दो-तीन दशकों की एक महत्वपूर्ण परिघटना है। शहरी सत्ता केंद्रों में निरंतर जारी उथल-पुथल के बीच ग्रामीण समाज ने पिछली कई सदियों से अपना संतुलन इन्हीं छोटी आस्थाओं के सहारे बचाए रखा था, लेकिन अब ये उनका साथ नहीं दे पा रही हैं। राजनीति करने वालों और धर्म को धंधा बनाने वालों के लिए इसके फायदे ही फायदे हैं, लेकिन समाज में जिन जगहों पर कई सारी बड़ी आस्थाएं एक साथ मौजूद हैं, वहां इसके नतीजे भयानक सिद्ध हो रहे हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पिछले दशक में आई सैमुअल हंटिंगटन की किताब 'क्लैश ऑफ सिविलाइजेशंस' से मुहावरे उठाकर कुछ लोग हिंदू धर्म और ईसाइयत के साथ इस्लाम के सभ्यतागत टकराव की बात करते हैं और अल कायदा की मुहिम को इसके सबूत की तरह पेश करते हैं। लेकिन कम ही लोगों को पता है कि इस्लामी कट्टरपंथ ने हाल के वर्षों में सबसे तीखी वैचारिक मुहिम सूफी पंथों के खिलाफ चलाई है। भारत में इस तरह की सिर्फ एक घटना चर्चा में आई है। 1995 में कश्मीर के चरार-ए-शरीफ में आईएसआई के पूर्व डीजी मस्त गुल की देखरेख में शेख नूरुद्दीन नूरानी (जिन्हें नुंद ऋषि के नाम से भी जाना जाता है) की दरगाह उड़ा दी गई थी लेकिन कश्मीरी अवाम का गुस्सा देखते हुए कट्टरपंथियों को इसका श्रेय लेने की हिम्मत नहीं पड़ी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन पड़ोसी देश पाकिस्तान में इसे अपने सबसे भयंकर रूप में देखा जा सकता है। डैलरिंपल ने अपने उसी लेख में पाकिस्तान के सूफी संत रहमान बाबा की दरगाह का हवाला दिया है, जिसकी रातें हाल तक अफगानिस्तान और पाकिस्तान के पश्तो शायरों और संगीतकारों की कला से गुलजार रहती थीं। खैबर दर्रे के पास अपना ठिकाना बनाने वाले रहमान बाबा को पश्तोभाषियों के बीच राष्ट्रकवि का दर्जा हासिल रहा है। करीब दस साल पहले इस दरगाह के पास ही सऊदी मदद से एक वहाबी मदरसे की स्थापना हुई। इस मदरसे में तथाकथित शुद्ध इस्लाम की पढ़ाई करने वाले छात्रों को जल्द ही लगने लगा कि दरगाह की गतिविधियां गैर-इस्लामी हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस दरगाह के खादिम ने 2003 में डैलरिंपल को बताया था कि मदरसे के छात्र उन्हें बहुत तंग करने लगे हैं - &lt;em&gt;वे यहां औरतों को आने नहीं देते। लोगों को गाने नहीं देते। अक्सर झगड़ा होता है। कभी-कभी हाथापाई तक की नौबत आ जाती है। लोगों को वे दरगाह पर आने से और हमें इश्क पर बोलने से मना करते हैं। &lt;/em&gt;पिछले साल 4 मार्च को पाकिस्तानी तालिबान ने इस दरगाह को डाइनामाइट लगाकर उड़ा दिया। मोहमंद इलाके में तो उन्होंने सूफी संत हाजी साहब तूरंगजई की दरगाह पर कब्जा करके इसे अपना हेडक्वार्टर ही बना लिया है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तर्क का रास्ता पकड़ कर चलें तो छोटी आस्थाएं इसका पहला मुकाम ही पार नहीं कर पातीं। कट्टर कर्मकांडी ब्राह्मणों के गांव में सैयद का स्थान कहलाने वाले पीपल के नीचे फागुन में घी के दीये जलाने का भला क्या मतलब हो सकता है? लेकिन तर्क से ऊपर उठकर देखें तो इस प्रथा में अपने से भिन्न आस्था वाले लोगों का सम्मान करने, उनके साथ सामंजस्य बिठाने का आग्रह नजर आता है। दुर्भाग्यवश, ईश्वरीय वचनों और प्रामाणिक ग्रंथों पर आधारित बड़े दायरे की धार्मिक समझ छोटी आस्थाओं को मटियामेट करने में जितनी तेजी दिखाती है, उतनी ही बेरहमी से वह अन्य बड़ी आस्थाओं के प्रति नफरत भी पैदा करती है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5004531893346374759-7321266238130621278?l=pahalu.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://pahalu.blogspot.com/feeds/7321266238130621278/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5004531893346374759&amp;postID=7321266238130621278' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5004531893346374759/posts/default/7321266238130621278'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5004531893346374759/posts/default/7321266238130621278'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://pahalu.blogspot.com/2010/06/blog-post_16.html' title='बड़े धर्म और छोटे देवता'/><author><name>चंद्रभूषण</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11191795645421335349</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5004531893346374759.post-2883548090160341231</id><published>2010-06-11T01:45:00.000-07:00</published><updated>2010-06-11T02:33:13.662-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='पक्षी प्रकरण'/><title type='text'>सुनो, चिड़िया कुछ कहती है</title><content type='html'>चिड़ियां हमारे पर्यावरण की थर्मामीटर जैसी हैं। उनकी सेहत, उनकी खुशी बताती है कि जिस माहौल में हम रह रहे हैं, वह कैसा है। प्रदूषित हवा से होने वाली तेजाबी बारिश का असर हमारी जिंदगी में देर से जाहिर होता है, लेकिन इससे चिड़ियों के अंडे पतले पड़ने लगते हैं और उनकी आबादी घटने लगती है। मोबाइल फोन से निकलने वाली तरंगें इंसान पर क्या प्रभाव छोड़ती हैं, इस पर रिसर्च अभी चल ही रही है। लेकिन गौरैया, श्यामा और अबाबील जैसी छोटी चिडियों को इनसे होने वाले नुकसान पर वैज्ञानिक अपनी मुहर लगा चुके हैं। एक समय था जब चिड़ियां हमारे जीवन का हिस्सा थीं, लेकिन आज वे हमसे काफी दूर चली गई हैं। उनसे दोबारा रिश्ता बनाना हमारी पर्यावरण चेतना का अहम हिस्सा होना चाहिए। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ छोटी-छोटी बातों से शुरू करें। मसलन, किताबों में पढ़ कर यह राय बना ली गई है कि सबेरे सबसे पहले मुर्गा जागता है और उसके बांग देने से बाकी सबकी नींद टूटती है। लेकिन गांवों में सबेरे उठने वाले लोग मुर्गे की नहीं, कौए की आवाज पर उठते हैं। कौओं का घोसला पेड़ पर बाकी सारी चिड़ियों से ऊपर होता है और भोर की रोशनी सबसे पहले उन्हीं तक पहुंचती है। सुबह-सुबह बोलने वाली एक और चिड़िया का नाम भुजंगा है, जिसकी बोली की व्याख्या लोग अपनी-अपनी रुचि के अनुसार करते हैं। कोई कहता है कि वह सी .. त्ताराम बोल रहा है तो किसी को इसमें ठा .. कुरजी सुनाई पड़ता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शहरों में लोगों की नींद न कौओं की कांव-कांव से खुलती है, न मुर्गे की कुकडूं-कूं से। अलबत्ता सुबह घर का दरवाजा खुलते ही कबूतरों के जोड़े खिड़कियों के छज्जों और बालकनी के बारजों पर एक-दूसरे की पांखें खुजाते जरूर नजर आ जाते हैं। गांवों में कबूतरों की आमदरफ्त पता नहीं क्यों आज भी काफी कम है, हालांकि ज्यादातर मामलों में अब शहरों और गांवों के बीच का फर्क मिट चला है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कौओं को पक्षियों में सबसे चालाक माना जाता रहा है। वैज्ञानिकों की राय भी यही है कि परिस्थिति के अनुरूप खुद को ढालने की क्षमता उनमें बाकी सभी चिड़ियों से ज्यादा है। लेकिन तेज शहरीकरण के बीच खुद को बचा ले जाने में कौए कबूतरों से काफी पीछे छूट चुके हैं। उनकी सबसे बड़ी मुश्किल यह है कि कबूतरों की तरह वे इंसानों पर भरोसा नहीं कर पाते। घोसला बनाने में ये दोनों चिड़ियां एक ही जैसी बेतरतीब हैं। दो-चार टहनियां, दस-बीस तिनके, और बन गया घोसला। लेकिन कौए हर हाल में अपने घोसले पेड़ों पर ही बनाते हैं और सबसे ऊपर की जगह पाने की कोशिश में अक्सर चीलों के साथ लड़ते नजर आते हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ साल पहले तक गांवों और शहरों में एक सी नजर आने वाली गौरैया आंगन की चिड़िया मानी जाती थी। कच्चे घरों की भीतरी दीवार के किसी छेद में जैसा-तैसा घोसला और चलते हुए सूप तक से चावल बीन कर खा जाने की ढिठाई। लेकिन वही गौरैया आजकल भारत के संरक्षण योग्य प्राणियों में गिनी जानी लगी है। शहरों में उसकी जाति नष्ट हो जाने का खतरा बताया जा रहा है क्योंकि यहां अब उसे न तो कहीं घोसला बनाने की जगह मिलती है, न ही खाने को कोई दाना। इधर कुछ लोगों ने अपने घरों के बाहर लकड़ी के घोसले ठोंकने शुरू कर दिए हैं, जिसके नतीजे अच्छे आ रहे हैं। छोटी होने के बावजूद गौरैया एक जीवट वाली चिड़िया है और वह अपने बचने का कोई न कोई रास्ता खोज लेगी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;किलहँटी और पंडूक हमारे इर्द-गिर्द हमेशा मौजूद रहने वाली ऐसी चिडि़यां हैं, जिन पर लेखकों की कृपा सबसे कम हुई है। किलहँटी यानी जंगली मैना गर्मियों में अपनी पीली चोंच लगभग पूरी खोले हर कहीं नजर आती है। शाम के वक्त जब किसी घने बरगद के पेड़ पर इनके झुंड जमा होते हैं तो शोर मचा-मचा कर आसमान सिर पर उठा लेते हैं। पंडूक को कुमाऊंनी-गढ़वाली में घुघूती और उर्दू में फाख्ता कहते हैं। गर्मियों की दोपहर के आलस भरे माहौल में स्थिर लय के साथ लगातार चलने वाला इनका एकरस सुर पहाड़ी लोक कवियों को विरहिणी के दुख की याद दिलाता रहा है। इधर-उधर फुदकती रहने वाली झगड़ालू चिडि़या सिर्फ अपने न्यूसेंस वैल्यू के लिए जानी जाती है और इसे आमफहम शब्दावली में अभी तक अपना कोई अलग नाम भी नहीं मिल पाया है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुर्गा-मुर्गी, कुछेक कबूतर और तोता-मैना पालतू चिडि़यों की श्रेणी में आते हैं। जब तक शहरों में मोहल्लेदारी बची थी तब तक छतों पर लगे बांस के अड्डों पर पलने वाले कबूतर अपने मालिकों के बीच होड़ का सबब बने रहते थे। पिंजड़ों में बंद तोते-मैना पड़ोसियों के बीच सौहार्द का जरिया होते थे, और मुर्गे-मुर्गियां अक्सर आपसी कलह के। लेकिन जब से कॉलोनियां शहरों की पहचान बनी हैं और परिवार पति-पत्नी और बच्चों तक सिमट गए हैं तब से समाज में पालतू पक्षियों की जगह काफी कम हो गई है। गांवों में तोतों की पहचान शोर मचाने वाले और झुंड में चलने वाले पक्षियों की है। इनके झुंड को डार कहते हैं- देखो, तोतों की डार उतर रही है। मकई के भुट्टे बर्बाद करने में इनका कोई सानी नहीं है और इनसे अपने आम-अमरूद बचाने में भी खासी मशक्कत करनी पड़ती है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;घर से थोड़ा दूर रहने वाले पक्षियों में मोर, कठफोड़वा, बुलबुल, नीलकंठ, बया, टिटिहरी, बनमुर्गी, बत्तख, बगुला और कौडि़न्ना यानी किंगफिशर का किसान जीवन में काफी दखल है। इनमें पहले पांच का गुजारा खेतों और पेड़ों पर होता है जबकि बाद के चार ताल-पोखरों यानी वेटलैंड्स पर निर्भर करते हैं। बीच में पड़ने वाली टिटिहरी वेटलैंड्स के करीब रहती है लेकिन अंडे सूखी जमीन पर देती है। उल्लू के अलावा यह अकेली चिडि़या है, जिसकी आवाज पूरी रात सुनाई देती है। ज्यादातर शहरी बच्चों का परिचय इनमें सिर्फ मोर से है, वह भी चिड़ियाघरों में। लेकिन मोर देखने का मजा तब है जब उसे बादलों के मौसम में खुले खेत में देखा जाए। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ खास मौसमों में नजर आने वाले प्रवासी पक्षियों को अपने यहां कुछ ज्यादा ही इज्जत हासिल रही है। कोयल और पपीहे जाड़ा बीतने के साथ अचानक दिखने लगते हैं, या पेड़ों से उनका गाना सुनाई देने लगता है, जबकि खंजन, दोयल और श्यामा यानी हमिंग बर्ड जाड़े की शुरुआत में नमूदार होते हैं। बकौल तुलसी- &lt;em&gt;जानि सरद ऋतु खंजन आए। &lt;/em&gt;सारस और जांघिल जैसे विशाल प्रवासी पक्षी भी सुबह-शाम अपने परफेक्ट फॉर्मेशन में जोर-जोर से कें-कें करते हुए अपनी लंबी यात्रा पर निकले दिखाई देते हैं। गहरे तालों में कभी-कभी इन्हें बसेरा करते हुए भी देखा जा सकता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हम नहीं जानते कि इनमें से कौन-कौन से पक्षी किन-किन खतरों का सामना कर रहे हैं और दस-बीस साल बाद इन्हें देखने का मौका भी हमें मिलेगा या नहीं। इसलिए इनसे नजदीकी बनाने का, इनकी मदद करने का एक भी मौका हमें खोना नहीं चाहिए।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5004531893346374759-2883548090160341231?l=pahalu.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://pahalu.blogspot.com/feeds/2883548090160341231/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5004531893346374759&amp;postID=2883548090160341231' title='15 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5004531893346374759/posts/default/2883548090160341231'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5004531893346374759/posts/default/2883548090160341231'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://pahalu.blogspot.com/2010/06/blog-post.html' title='सुनो, चिड़िया कुछ कहती है'/><author><name>चंद्रभूषण</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11191795645421335349</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>15</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5004531893346374759.post-232224523576026916</id><published>2010-05-28T06:07:00.000-07:00</published><updated>2010-05-28T07:15:49.861-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कविताएं'/><title type='text'>युद्ध और उबासियां</title><content type='html'>पीछे उबासियां थीं और आगे युद्ध था&lt;br /&gt;हमने नदी पार करने की सोची ताकि युद्ध में उतर सकें&lt;br /&gt;अंतहीन चौड़ी लगती थी नदी&lt;br /&gt;चांदनी रात में उसकी लहरें ठोस चांदी की तरह चमकती थीं&lt;br /&gt;लेकिन हमें रोक पाता ऐसा उनमें कुछ भी नहीं था&lt;br /&gt;जैसे-तैसे हमने नदी पार की&lt;br /&gt;फिर एक नजर डोंगियों पर डाली कि उन्हें कहीं छुपा दें।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;न जाने कब की एक आकाशवाणी हमारे जेहन पर छाई हुई थी&lt;br /&gt;कि सब नावें जला देनी हैं तोड़ देने हैं सारे पुल&lt;br /&gt;कि इस युद्ध से वापसी की कोई गुंजाइश नहीं छोड़नी है&lt;br /&gt;यह सिर्फ एक आकाशवाणी थी जिसे अनसुना किया जा सकता था&lt;br /&gt;कोई आदेश नहीं था&lt;br /&gt;कि इतने ही आदेश मानने वाले होते तो उस पार न पड़े रहते&lt;br /&gt;यह हमारा चयन था हमारा अपना फैसला&lt;br /&gt;जो सुलगती डोंगियों के धुएं में पक कर और गहरा हो चला था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिर हम उधर बढ़े जिधर से युद्ध की आवाजें आ रही थीं&lt;br /&gt;दरअसल वहां कई युद्ध एक साथ जारी थे&lt;br /&gt;कहीं नगाड़ों की थाप पर मुखौटा बांधे राम-रावण लड़ रहे थे&lt;br /&gt;तो कहीं मुहर्रम के झपताल पर चटकी-डांड़ खेला जा रहा था&lt;br /&gt;हमें लगा शायद गलत जगह आ गए हैं&lt;br /&gt;यही मौका था जब पहली बार तुम मुझसे मुखातिब हुए&lt;br /&gt;तुम्हारी आंखों में पहचानी मैंने वह रौशनी&lt;br /&gt;जो हमें इन कागजी युद्धों के पार ले जा सकती थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सबसे तीखी रौशनी वाला तारा सबसे जल्द मरता है-&lt;br /&gt;तुमने कहा तो मुझे लगा इस तारे में दूब रोप देनी चाहिए&lt;br /&gt;पीली गर्द में वह शाम ढल रही थी और चेहरे धुंधले पड़ रहे थे...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सबकुछ वैसा ही था जैसे आज था तुमसे मिलते समय&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तुम इतने दिन कहां रहे दोस्त&lt;br /&gt;किन-किन युद्धों में शामिल हुए कितनी नदियां पार कीं कितनी बार&lt;br /&gt;आज तुम्हें सड़क पर एक लंबी नाव में आते देखा तो याद आया&lt;br /&gt;ऐसी कितनी नावें जलाकर हम इस पार आए थे&lt;br /&gt;उबासियों भरे इस थके हुए युद्ध में&lt;br /&gt;जहां नदियां सिर्फ बीते दिनों की याद में बहती हैं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5004531893346374759-232224523576026916?l=pahalu.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://pahalu.blogspot.com/feeds/232224523576026916/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5004531893346374759&amp;postID=232224523576026916' title='8 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5004531893346374759/posts/default/232224523576026916'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5004531893346374759/posts/default/232224523576026916'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://pahalu.blogspot.com/2010/05/blog-post_28.html' title='युद्ध और उबासियां'/><author><name>चंद्रभूषण</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11191795645421335349</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>8</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5004531893346374759.post-5689299132388133050</id><published>2010-05-15T06:06:00.000-07:00</published><updated>2010-05-15T06:40:07.843-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='बातचीत'/><title type='text'>नेपाल के माओवादी नेता पार्थ छेत्री से बातचीत</title><content type='html'>छह दिनों के जबर्दस्त तनाव के बाद नेपाल की सड़कों पर दोबारा शांति लौट आई है। प्रधानमंत्री पद से माधव नेपाल की विदाई और माओवादियों के नेतृत्व में नई सरकार के गठन पर सहमति बन जाने की खबर है, लेकिन संतुलन अभी काफी नाजुक किस्म का ही है। विरोध का मुद्दा माओवादी पार्टी के चेयरमैन प्रचंड को प्रधानमंत्री बनाने या न बनाने को लेकर था। फिलहाल वहां गठबंधन सरकार का नेतृत्व कर रही नेकपा (एमाले) किसी भी सूरत में प्रचंड को प्रधानमंत्री न बनाने पर अड़ी हुई थी और माओवादियों का कहना था कि ऐसा वह भारत के दबाव पर कर रही है। समझौते की खबरों से लगता है कि माओवादी हर हाल में प्रचंड को ही प्रधानमंत्री बनाने की अपनी जिद पर झुकने के लिए तैयार हो गए हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;करीब दस साल चले गृहयुद्ध के बाद मई 2008 में वहां संविधान सभा के चुनाव हुए थे, जिसमें एकीकृत नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी। उसने एक गठबंधन सरकार बनाई और फिर कुछ बुनियादी सवालों पर विरोध के चलते सरकार से बाहर भी हुई। नेपाल के बारे में अपने यहां के मीडिया में बिल्कुल जीरो बटे सन्नाटा वाली हालत है। जिद जैसा कोई मामला न तो सेनाध्यक्ष चित्रंगद कटवाल को हटाने का था, न प्रचंड को प्रधानमंत्री बनाने का। गणराज्य की पहली शर्त ही यह होती है कि सेना को निर्वाचित सरकार का हुक्म मानना होता है, जो कटवाल के मामले में लागू नहीं हो पा रहा था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसी तरह प्रचंड को प्रधानमंत्री बनाने के मामले में माओवादियों का कहना था कि किसी संप्रभु देश में कौन प्रधानमंत्री बनेगा और कौन नहीं बनेगा, यह कोई और देश भला क्यों तय करेगा। लेकिन उनकी इस बात में थोड़ा झोल था। कोई और देश तो निश्चय ही तय नहीं करेगा, लेकिन गठबंधन की स्थिति में सभी दलों की सहमति से ही तय होगा कि सरकार का नेतृत्व कौन कर सकता है और कौन नहीं कर सकता। इस मुद्दे पर अगर वे फिलहाल झुकने को राजी हो गए हैं तो ठीक ही किया है। मामला पेचीदा है और समझ बढ़े तो अच्छा ही है, लिहाजा सात-आठ दिन पहले इस पार्टी के पॉलित ब्यूरो सदस्य पार्थ छेत्री से हुई (और अगले ही दिन नवभारत टाइम्स में प्रकाशित) इस बातचीत को अपने ब्लॉग पर लगाना आज भी गैरजरूरी नहीं लगता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;पिछले पांच दिनों से काठमांडू और नेपाल के अन्य शहरों से तनाव की खबरें आ रही हैं। हिंसा की आशंका को देखते हुए संयुक्त राष्ट्र ने भी हड़ताल वापसी की अपील की है। सचाई क्या है? &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमारी पार्टी के आह्वान पर अभी लगभग पांच लाख लोग काठमांडू में जमा हैं और वहां की जनता से संवाद बना रहे हैं। तनाव की खबरें बढ़ी-चढ़ी हैं। दो-एक जगह प्रदर्शनकारियों को उकसाने का प्रयास किया गया है, लेकिन हमारे आंदोलन का पहला लक्ष्य शांति है, जिससे हम डिगने वाले नहीं हैं। आंदोलन के बाकी दोनों लक्ष्य हैं- राष्ट्रीय सहमति की सरकार बनाना और जनपक्षीय संविधान का निर्माण, जिस पर देश की मौजूदा सरकार लगातार टालू रवैया अपना रही है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;सिर्फ दो साल में ऐसी आर-पार की लड़ाई वाली स्थिति क्यों पैदा हो गई? &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;देखिए, नेपाल में धर्मनिरपेक्ष संघीय गणतंत्र का लक्ष्य सिर्फ हमारी पार्टी यूसीपीएन (माओवादी) का ही था। बाकी सारी पार्टियां या तो संवैधानिक राजतंत्र के पुराने ढांचे के पक्ष में थीं, या उसमें थोड़ा-बहुत बदलाव करके काम चलाना चाहती थीं। संविधान सभा के चुनाव से पहले यदि हम राजा को हटाने पर अड़ न जाते तो शायद आज भी काठमांडू में ज्ञानेंद्र राज कर रहे होते। चुनाव में जब हम सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरे और समझौते की शर्तों के मुताबिक राष्ट्रीय सेना को लोकतांत्रिक सत्ता के अधीन काम करने को कहा तो हमारे विरोधी दल सेनाध्यक्ष के पीछे खड़े होकर उनकी मनमानी हरकतों को अपना समर्थन देने लगे। यहां मैं घटनाओं के ब्यौरे में नहीं जाना चाहूंगा। बस इतना कहूंगा कि हमारी प्रतिबद्धता राष्ट्रीय सहमति में तय लक्ष्यों के प्रति है और नेपाल की जनता अब उन्हें हासिल करके रहेगी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;आपकी पार्टी पर आरोप है कि सहमति के दोनों मुख्य बिंदुओं पर वह पीछे हट गई। यानी, न तो अपनी सेना को राष्ट्रीय सेना में समाहित किया, न ही जब्त की हुई जमीनें वापस कीं... &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह आरोप अर्धसत्य पर आधारित है। जनमुक्ति सेना (पीएलए) को राष्ट्रीय सेना में समाहित करने की बात राष्ट्रीय सेना के जनतांत्रिकीकरण के साथ जुड़ी थी। हमारे नेता और तत्कालीन प्रधानमंत्री प्रचंड ने सेनाध्यक्ष रुक्मंगद कटवाल से यही कहा था कि वे दोनों सेनाओं के एकीकरण से पहले कोई नई नियुक्ति न करें। इसे वह मानने को तैयार नहीं हुए। गणतंत्र के प्रति विरोधी दलों की प्रतिबद्धता का हाल यह है कि सेनाध्यक्ष के साथ खड़े होकर प्रधानमंत्री को हटा देना उन्हें बेहतर लगा। ऐसे में पीएलए को राष्ट्रीय सेना में कैसे मिलाया जा सकता था? रहा सवाल जमीनों का, तो जहां भी बटाईदारों ने जमींदारों के कब्जे में पड़ी सरकारी जमीन जब्त की है, वहां हम कुछ नहीं कर सकते। अगर कहीं हमारे कार्यकर्ता ने कोई जमीन कब्जा रखी है तो हम उसे लौटाने को तैयार हैं, लेकिन ऐसा कोई मामला हमारे सामने नहीं आया है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;15 मई को संयुक्त राष्ट्र मिशन का कार्यकाल समाप्त हो रहा है। संविधान इसी 28 मई तक बन जाने की बात थी। बन पाएगा? &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रश्न ही नहीं उठता। जिस राष्ट्रीय सहमति के आधार पर यह बनना है, उसकी तो पहली सीढ़ी ही अभी पार नहीं की जा सकी है। सहमति की विपरीत दिशा में काम कर रही मौजूदा सरकार को बर्खास्त करके ही इस दिशा में पहला कदम बढ़ाया जा सकेगा। आंदोलन के दबाव में राजनीतिक दलों के भीतर ऐसी बहस शुरू हो गई है। यूएमएल का एक धड़ा राष्ट्रीय सहमति की सरकार बनाने के पक्ष में है। क्षेत्रीय पार्टी मधेसी जन अधिकार फोरम का आधा हिस्सा खुलकर हमारे साथ आ गया है। मौजूदा सरकार को हम जब चाहें गिरा सकते हैं, लेकिन संविधान के लिए दो तिहाई बहुमत जुटाने का रास्ता कुछ और होगा। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;भारत के साथ माओवादियों का टकराव एक बार फिर चर्चा में है। अभी इसकी वजह क्या है? &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;टकराव क्या कहें, बस इतना कि नेपाल की किस्मत नेपाल की जनता को ही तय करने दी जाए। दुर्भाग्यवश, भारत की ओर से हमें कई सारी बिन मांगी सलाहें मिलती हैं और कई तरह की पसंद-नापसंद बताई जाती है। प्रधानमंत्री माधव नेपाल ने हाल में थिंपू शिखर सम्मेलन से वापस लौटने के बाद अपनी पार्टी को बताया कि वह इस्तीफा नहीं देंगे क्योंकि भारतीय प्रधानमंत्री उनके साथ हैं। इससे पहले, राष्ट्रीय सहमति की सरकार का नेतृत्व प्रचंड नहीं कर सकते, ऐसी एक राय जताई गई थी। इस तरह की बातों से दोनों देशों के रिश्ते खराब होते हैं, इसलिए इनसे बचा जाना चाहिए।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5004531893346374759-5689299132388133050?l=pahalu.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://pahalu.blogspot.com/feeds/5689299132388133050/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5004531893346374759&amp;postID=5689299132388133050' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5004531893346374759/posts/default/5689299132388133050'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5004531893346374759/posts/default/5689299132388133050'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://pahalu.blogspot.com/2010/05/blog-post.html' title='नेपाल के माओवादी नेता पार्थ छेत्री से बातचीत'/><author><name>चंद्रभूषण</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11191795645421335349</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5004531893346374759.post-8008949781771921141</id><published>2010-04-14T06:37:00.000-07:00</published><updated>2010-04-14T07:33:21.190-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कविताएं'/><title type='text'>यूं ही तो नहीं हुआ होगा</title><content type='html'>यहां तक मेरा आना&lt;br /&gt;इतने सरंजाम सजाना&lt;br /&gt;यूं ही तो नहीं हुआ होगा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;किसी शाम नाकारा जानकर&lt;br /&gt;छोड़ दिया गया होऊंगा&lt;br /&gt;इतने बड़े सिर वाला बानर का बच्चा&lt;br /&gt;जो मां के पेट से चिपक भी नहीं पाता&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ओह, तब भी इतना ही बड़ा था यह सिर&lt;br /&gt;जब शेयर बाजार नहीं बने थे&lt;br /&gt;लाला लोग मीडिया नहीं चलाते थे&lt;br /&gt;और दो-दो चार की जटिलता भी&lt;br /&gt;जब कई हजार साल दूर थी&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इतना ही जटिल हो पाया था जीवन&lt;br /&gt;कि कैसे कुछ तोड़ कर खा लें&lt;br /&gt;और भूख से बेहाल पंजों से&lt;br /&gt;कैसे खुद को बचा लें&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुझे तब किसने बचाया&lt;br /&gt;किस-किस से, किस तरह&lt;br /&gt;और आखिर क्यों&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तुम्हें बारहो मास का ऋतुकाल मिला&lt;br /&gt;ओ मेरी मां&lt;br /&gt;वंश-नाश के खिलाफ सबसे बड़ा बीमा&lt;br /&gt;और थोड़ी-थोड़ी करके मिली इतनी सारी शर्म&lt;br /&gt;जो शायद इस बीमे का प्रीमियम थी&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरे और तुम्हारे सामने&lt;br /&gt;रेडियो पर लगातार बजते&lt;br /&gt;कंडोम और पिल्स के ऐड बताते हैं कि&lt;br /&gt;यह शर्म भी अब जाने-जाने को है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बेशर्मी की दलील लिए मौत &lt;br /&gt;न जाने कब मेरे दर पे दस्तक देगी&lt;br /&gt;जैसे डायनोसोरों के यहां पहुंची थी वह&lt;br /&gt;उल्का और बढ़ती गर्मी और भारी शरीर जैसी&lt;br /&gt;कई सारी अर्जियां लिए हुए एक साथ&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कमजोर बेढंगा अरक्षित &lt;br /&gt;विशाल सिर वाला यह उत्कट बानर&lt;br /&gt;कूदफांद करता यहां तक पहुंच गया है&lt;br /&gt;कि इस ग्रह को गेंद की तरह देखता है-&lt;br /&gt;गुनता हुआ बुनता हुआ&lt;br /&gt;पट से इसे उड़ा देने का रोचक खयाल&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सुबह तड़के जब दुनिया नींद में होती है&lt;br /&gt;और रात के बोझ का मारा मेरा दिल&lt;br /&gt;युकलिप्टस के पेड़ों पर हूप-हूप करता है&lt;br /&gt;तब उड़ती हुई सामने आती है&lt;br /&gt;एक लाख चीजों की शक्लवार लिस्ट&lt;br /&gt;और उनसे जुड़ी दो करोड़ घेरेबंदियां&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जरा सोच कर बताना&lt;br /&gt;क्या ऐसा भी कुछ मुझे दिया गया है&lt;br /&gt;जो इनकी लपेट से मुझे बचा ले जाएगा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्या यह कविता है &lt;br /&gt;हर दिन जिसकी चाहत आधी होती जाती है&lt;br /&gt;अगर नहीं तो क्या कुछ और&lt;br /&gt;जो पागलपन, खुदकुशी और खुशफहमी से&lt;br /&gt;मुझे बचाएगा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इतने हजार-लाख-करोड़ साल&lt;br /&gt;इतना रहम मुझ पर &lt;br /&gt;यूं ही तो नहीं हुआ होगा&lt;br /&gt;ओ मेरी मां&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5004531893346374759-8008949781771921141?l=pahalu.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://pahalu.blogspot.com/feeds/8008949781771921141/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5004531893346374759&amp;postID=8008949781771921141' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5004531893346374759/posts/default/8008949781771921141'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5004531893346374759/posts/default/8008949781771921141'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://pahalu.blogspot.com/2010/04/blog-post_14.html' title='यूं ही तो नहीं हुआ होगा'/><author><name>चंद्रभूषण</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11191795645421335349</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5004531893346374759.post-7203386820716314315</id><published>2010-04-03T04:46:00.000-07:00</published><updated>2010-04-03T06:35:29.727-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कविताएं'/><title type='text'>नफरत का नाश्ता</title><content type='html'>लगता है गलत चुना&lt;br /&gt;पर चुनने को कुछ था नहीं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;होता तो प्यार चुनता&lt;br /&gt;नफरत क्यों चुनता&lt;br /&gt;जो कोलतार की तरह&lt;br /&gt;सदा चिपटी ही रह जाती है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कोई चांस नहीं था&lt;br /&gt;जहां तक दिखा नफरत ही देखी&lt;br /&gt;उसी का कुनबा उसी का गांव &lt;br /&gt;उसी का देश और उसी की दुनिया&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जहां वह कम दिखती थी&lt;br /&gt;लोग उसे प्यार कहते थे&lt;br /&gt;फिर खाली जगह को भर देते थे&lt;br /&gt;उसी से जल्द अज जल्द&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक दिन पता चला&lt;br /&gt;यह तो बड़े काम की चीज है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चुटकी भर मैंसिल और पोटाश&lt;br /&gt;कागज पर बराबर से मिलाया&lt;br /&gt;फिर बट्टे से ठोंका&lt;br /&gt;तो लगा, छत सर पर आ जाएगी&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस तरह नफरत को नई धार मिली&lt;br /&gt;और धीरे-धीरे खून में घुली&lt;br /&gt;यह सपनीली समझ कि&lt;br /&gt;एक दिन इससे सब बदल जाएगा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन एक मुश्किल थी&lt;br /&gt;अपनी नींदों में जब हम अकेले होते थे&lt;br /&gt;नफरत के लिए कोई निशाना नहीं होता था&lt;br /&gt;तब वह हमीं पर चोट करती थी&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;स्वप्नहीन रतजगों में उठकर&lt;br /&gt;खाली घड़े खखोरते हुए कई-कई बार&lt;br /&gt;खुद से पूछते थे-&lt;br /&gt;दुनिया जब तक नहीं बदलती&lt;br /&gt;तब तक इस होने का हम क्या करें&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्या ग्रेनेड और बंदूक की तरह&lt;br /&gt;नफरत को भी टांगने के लिए&lt;br /&gt;दीवार में कोई खूंटी गाड़ दें &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दरअसल, हमें पता नहीं था&lt;br /&gt;खूंटियां तो गड़ चुकी थीं हमारे इर्दगिर्द&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;जिन-जिन चीजों को हम चाहते थे&lt;br /&gt;जो लोग भी हमारे अजीज थे&lt;br /&gt;उन्हीं पर ओवरकोट की तरह&lt;br /&gt;हमारी नफरत टंगने लगी थी&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन हर चीज का वक्त होता है&lt;br /&gt;रूई में रखा ग्रेनेड भी सील जाता है&lt;br /&gt;रोज साफ होने वाली बंदूक का घोड़ा भी&lt;br /&gt;गोली पर टक करके रह जाता है एक रोज&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तुम जान भी नहीं पाते &lt;br /&gt;और नफरत तुम्हारी एक सुबह &lt;br /&gt;बदहवासी में बदल गई होती है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;परेड पर निकले फौजी के जूते में &lt;br /&gt;चुभी लंबी साबुत धारदार कील&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक निश्चित ताल के साथ तुम &lt;br /&gt;गुस्से से फनफना रहे होते हो&lt;br /&gt;और लोग तुम्हें देख कर हंस रहे होते हैं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तुम उनसे छिपने की तरकीबें खोजते हो&lt;br /&gt;कोई कैमॉफ्लॉग कि उन जैसे ही कूल दिखो&lt;br /&gt;कुछ गालों पे डिंपल कुछ बालों में ब्रिलक्रीम&lt;br /&gt;अडंड अंग्रेजी में अढ़ाई सेर ज्ञान&lt;br /&gt;और कोई हिंट कि जेब में कुछ पैसे भी हैं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बट...ओ डियर, यू डोंट बिलांग हियर&lt;br /&gt;बाकी सब मान भी लें तो&lt;br /&gt;खुद को कैसे मनाओगे कि &lt;br /&gt;इतना सब हो जाने के बाद भी&lt;br /&gt;नफरत तुम्हारा नाश्ता नहीं कर पाई है&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5004531893346374759-7203386820716314315?l=pahalu.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://pahalu.blogspot.com/feeds/7203386820716314315/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5004531893346374759&amp;postID=7203386820716314315' title='10 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5004531893346374759/posts/default/7203386820716314315'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5004531893346374759/posts/default/7203386820716314315'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://pahalu.blogspot.com/2010/04/blog-post.html' title='नफरत का नाश्ता'/><author><name>चंद्रभूषण</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11191795645421335349</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>10</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5004531893346374759.post-7849255060522850798</id><published>2010-03-27T02:46:00.000-07:00</published><updated>2010-03-27T03:00:10.861-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='बातचीत'/><title type='text'>आन्या स्मिरनोवा से बातचीत</title><content type='html'>भरतनाट्यम की महत्वपूर्ण नृत्यांगना, यूक्रेन निवासी &lt;strong&gt;आन्या स्मिरनोवा &lt;/strong&gt;पिछले दिनों भारत आई थीं। दिल्ली में और विशेष रूप से तंजौर में उनकी प्रस्तुतियां काफी चर्चित रहीं। यूक्रेन की राजधानी कीव में नक्षत्र नाम से एक भारतीय थिएटर चलाने वाली आन्या उन विरले विदेशियों में हैं, जो अपनी आत्मा से भारतीय हैं। दो संस्कृतियों की गौरवशाली संधि पर खड़ी इस नृत्यांगना से &lt;strong&gt;चंद्रभूषण&lt;/strong&gt; की बातचीत: &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;आन्या, आपकी प्रस्तुति से चकित हूं। सात समुंदर पार रहते हुए इस जटिल नृत्य के ताल-सुर कैसे साधती हैं आप?&lt;/strong&gt; &lt;br /&gt;यह मेरे भीतर बजता है। छह साल भारत में रहकर की गई साधना मुझे कभी इससे दूर नहीं होने देती। अपने थिएटर में शिष्यों को सिखाने के लिए मैं म्यूजिक की सीडी का सहारा लेती हूं, लेकिन खुद अक्सर बिना संगीत के नाचती हूं। नाचते हुए मैं मन ही मन गाती हूं। लय को अपने भीतर महसूस करती हूं। इससे मुझे नृत्य को अपने भीतर से खोजने में मदद मिलती है। इस क्रम में वह थोड़ा इंप्रोवाइज भी होता जाता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;हमारे लिए तो यूक्रेन सिर्फ किताबों में पढ़ा एक नाम है। वहां से भारत तक आपकी अंतर्यात्रा कैसे संभव हुई? &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;हम लोग भी मूल रूप से यूक्रेन के नहीं हैं। मेरे दादा जी उत्तरी रूस के रहने वाले फाइटर पायलट थे। द्वितीय विश्वयुद्ध में उन्हें वार हीरो की प्रतिष्ठा प्राप्त हुई। फिर वे कीव चले आए और यहां की एयर फोर्स अकेडमी में पढ़ाने लगे। इस तरह बहुसंस्कृतिवाद मेरे लिए बाहर से खोजी हुई कोई चीज नहीं बल्कि एक भीतरी बात है। पेरेस्त्रोइका के दौर में सोवियत संघ बिखरने लगा और राष्ट्रीय पहचानों ने जोर पकड़ा तो बाहर से आए हम जैसे लोगों ने पहली बार खुद को असुरक्षित महसूस किया। शायद यह मेरी अंतर्यात्रा का प्रारंभ बिंदु हो। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;लेकिन भारत क्यों? &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;मैं पांच साल की उम्र से डांस कर रही हूं। एक समय ऐसा आता है, जब नृत्य मशीनी लगने लगता है। ऐसा मुझे टीनेज में पहुंचने के साथ ही लगने लगा। मैंने बैले किया, लेकिन उसमें भी आत्मा का जुड़ाव नहीं महसूस होता था। एक बार कल्चरल एक्सचेंज के तहत मैंने भारत के कुछ टेंपल डांस देखे, जो मुझे बिल्कुल अलग से लगे। फिर अरविंदो को पढ़ा, योगानंद और ओशो को पढ़ा और लगा कि जो मैं खोज रही थी, वह यहीं है। अपनी फॉरेन मिनिस्ट्री की एक स्कॉलरशिप के जरिए मुझे भारत आने का मौका मिला। मैं लगातार छह साल यहां रही, कई तरह के डांस सीखे और अंत में भरतनाट्यम पर जाकर रुकी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;यहां तो पश्चिमी नृत्यों के प्रति आकर्षण कहीं ज्यादा है। इसे देखते हुए आपकी यात्रा उलटी जान पड़ती है..... &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;यह तो अपनी-अपनी रुचि की बात है। भारत में हॉलिवुड आदि के प्रभाव में जो पश्चिमी नृत्य मुदाएं प्रचलित हैं, उनका मूल यूरोप के लोकनृत्यों में मौजूद है। लेकिन मुझे यूरोपीय नृत्यों में बैले पसंद है, जो वहां का शास्त्रीय नृत्य है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;बैले हो, कथक हो या भरतनाट्यम, कथा तत्व तो सभी में है। इनमें अंतर क्या है, जो आपने भरतनाट्यम को तरजीह दी? &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;फिलॉसफी के स्तर पर बैले और भारत के मंदिर नृत्य एक-दूसरे से काफी अलग हैं। ईसाई दर्शन में शरीर के प्रति एक किस्म की हिकारत मौजूद है। इसके चलते बैले के मूवमेंट्स उड़ते से हुआ करते हैं। ज्यादातर बैले कथाएं किसी न किसी किस्म की आध्यात्मिक यातना से उपजी हुई हैं, जो ईसाइयत का आधार है। इसके विपरीत भरतनाट्यम और अन्य मंदिर नृत्यों में शरीर के प्रति गहरा लगाव होता है। राधा-कृष्ण और शिव-पार्वती की प्रणय कथाएं ही प्राय: इनका कथा तत्व निर्मित करती हैं, जिनमें यातना के लिए कोई जगह नहीं होती। यहां मूल तत्व आनंद का है, जो संयोग में ही नहीं, वियोग में भी उपस्थित होता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;पश्चिमी नृत्य में हमारे लिए सबसे बड़ा नाम इजाडोरा डंकन का है। ऐसी कोई आध्यात्मिक तड़प उनके यहां क्यों नहीं दिखती? &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;इजाडोरा का नृत्य मैंने देखा नहीं, लेकिन उनका लिखा हुआ काफी पढ़ा है। मेरी ही जैसी एक रुकावट उन्होंने भी अपने भीतर महसूस की थी। इससे निकलने के लिए उन्होंने ग्रीक संस्कृति के करीब जाने की कोशिश की, लेकिन वह तो कब की मर चुकी है। उसे पुनर्जीवित करना असंभव था। उनकी यह खोज अंत में उन्हें प्रकृति के करीब ले गई, जहां से वह अपने नृत्य को नई ऊंचाइयों पर ले गईं। मुझे यकीन है कि यदि उन्हें भारतीय संस्कृति का सान्निध्य प्राप्त हुआ होता तो उनकी यात्रा कुछ और होती। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;आजकल संगीत और नृत्य में फ्यूजन काफी चर्चा में है। ऐसा कोई प्रयोग आपके भी अजेंडा पर है? &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;फ्यूजन से मेरा कोई विरोध नहीं है। इस दिशा में कुछ अच्छा काम भी हुआ है। लेकिन निजी तौर पर मुझे यह ज्यादा पसंद नहीं है। मुझे लगता है कि पूरब और पश्चिम का नृत्य इतना अलग है, खासकर भारत के टेंपल डांसेज अपनी कंसेप्ट में इतने खास हैं कि किसी और चीज के साथ इनका फ्यूजन संभव ही नहीं है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;तो फिर आगे क्या? &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;मैं भरतनाट्यम की बारीकियों में और गहरे उतरना चाहती हूं। अभी के समय में शास्त्रीय नृत्यों और नर्तकों का बचे रहना कठिन है। मेरी यात्रा इन्हें बचाए रखने तक ही सीमित है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5004531893346374759-7849255060522850798?l=pahalu.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://pahalu.blogspot.com/feeds/7849255060522850798/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5004531893346374759&amp;postID=7849255060522850798' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5004531893346374759/posts/default/7849255060522850798'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5004531893346374759/posts/default/7849255060522850798'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://pahalu.blogspot.com/2010/03/blog-post_27.html' title='आन्या स्मिरनोवा से बातचीत'/><author><name>चंद्रभूषण</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11191795645421335349</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5004531893346374759.post-5646423823755640564</id><published>2010-03-24T05:46:00.000-07:00</published><updated>2010-03-24T07:18:26.093-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='वाम से काम'/><title type='text'>क्रांति और खुदकुशी</title><content type='html'>कॉमरेड कानू सान्याल की आत्महत्या की खबर सुनकर मन बहुत दुखी है। हमारे अखबार में यह खबर कवर पर है लेकिन खबर में ही नहीं, खबर के शीर्षक में भी नाम की जगह कनु सान्याल लिखा हुआ है। हाई प्रोफाइल मीडिया के लोग ऐसी गलतियों पर अब पछताते नहीं। टोकने पर हिकारत से देखते हैं और ऐसा जताते हैं जैसे किस जमाने की बात उनसे की जा रही हो। एक समय था जब चारु मजूमदार, कानू सान्याल और जंगल संथाल भारत के रेडिकल नौजवानों के बीच एक साझे नाम की तरह याद किए जाते थे। समय बदल जाता है, लोग बदल जाते हैं लेकिन तकलीफें नहीं बदलतीं, उनकी टीस नहीं बदलती। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कानू सान्याल पिछले तीसेक वर्षों से धीरे-धीरे धुंधले पड़ रहे थे। मतभेद वगैरह जो थे सो थे लेकिन उनका स्वाभाविक रुझान भी बड़े दायरे में काम करने का नहीं था। किरानी से क्रांतिकारी बने थे, जमीनी स्तर पर काम करते थे और अंत तक करते रहे। चाय बागानों में मजदूरों की बदहाली पर एक प्रदर्शन का नेतृत्व उन्होंने पिछले साल ही किया था। हां, 1970 से 77 तक सात साल की जेल उन्होंने जिस गिरफ्तारी के बाद काटी थी, वह उनके कार्यक्षेत्र के आसपास नहीं बल्कि दूर, आंध्र प्रदेश में हुई थी। किसी बैठक के सिलसिले में उधर गए थे और पकड़ लिए गए, हालांकि धाराएं उनके खिलाफ ऐसी-ऐसी लगाई गईं कि पूरा जीवन शायद जेल में ही कट जाता। आपातकाल के खात्मे की एक बड़ी उपलब्धि नक्सली नेताओं की रिहाई भी थी।&lt;br /&gt;  &lt;br /&gt;इधर कुछ सालों से पश्चिम बंगाल में माओवादी सक्रियता बढ़ी, झारखंड से सटे इलाकों में घटनाएं होने लगीं तो मीडिया को कानू सान्याल में अपनी दिलचस्पी के लायक कुछ मसाला मिल गया। कुछ-कुछ अंतर से लगातार ही उनके इंटरव्यू पढ़ने और सुनने को मिलने लगे थे, जिनमें वे अपने जमाने के सशस्त्र किसान आंदोलन को याद करते थे और बारूदी सुरंगों पर निर्भर माओवादी धड़े की आलोचना करते थे। कोलकाता, दिल्ली और मुंबई में बैठे मनोरंजक मीडिया के लिए उनके इंटर्व्यू से कुछ दिलचस्प और उपयोगी चीजें निकल आती थीं- देखिए, जिस बंदे ने नक्सलपंथ की शुरुआत की, वही बोल रहा है, कि माओवादी जो कर रहे हैं, वह सब कितना गलत है। लेकिन कानू सान्याल को कभी यह कहते नहीं सुना गया कि मनमोहन सिंह और बुद्धदेव भट्टाचार्य के नेतृत्व में देश अब बिल्कुल ठीकठाक चल रहा है और क्रांति जैसी किसी चीज की अब यहां कोई जरूरत नहीं है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्रांति और खुदकुशी के बीच कोई साझा बात नहीं है, लेकिन दुनिया का कोई भी क्रांतिकारी आंदोलन ऐसा नहीं रहा, जिसके कार्यकर्ताओं में किसी न किसी दौर में इस तरह का रुझान देखने को न मिला हो। आदमी बहुत कुछ छोड़ कर एक ऐसे आंदोलन से जुड़ता है, जिससे भौतिक अर्थों में कुछ हासिल करने की संभावना दूर-दूर तक नहीं होती। ऐसा आंदोलन जब ठहराव के दौर में चला जाता है, या किसी वजह से व्यक्ति ही उससे अलग-थलग पड़ने लगता है तो इस तनहाई को संभालने की कोशिश मन पर बहुत भारी पड़ने लगती है। लिबरेशन में अपनी सक्रियता के दौरान अपने दिल के करीब रहे लोगों में से दो- गोरख पांडेय और भोजपुर के पासवान जी (पहला नाम याद नहीं) अपने-अपने ठिकानों पर फांसी चढ़े पाए गए। कानू सान्याल से मेरा कोई सीधा परिचय कभी नहीं रहा, देखादेखी भी नहीं हुई थी, लेकिन नक्सली आंदोलन की स्थापना करने वालों में वही अकेले जिंदा बचे थे और इस धारा से जुड़े हर व्यक्ति की तरह मेरे मन में भी उनके प्रति गहरा सम्मान था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं उनकी दृढ़ आस्था और जमीन से उनके गहरे जुड़ाव की कद्र करता था। नक्सलबाड़ी नाम की जगह नक्सल आंदोलन के नक्शे से कब की हट चुकी थी, लेकिन एक नक्सल प्रतीक की तरह उत्तरी बंगाल के नक्सलबाड़ी ब्लॉक से कानू सान्याल का रिश्ता लगातार बना रहा। जब भी उनका जिक्र आता, यह सोचकर खीझ होती कि वे इतने अकेले क्यों हैं, किसी बड़ी वामपंथी धारा का हिस्सा क्यों नहीं बनते। सीपीआई-एमएल लिबरेशन का होलटाइमर रहते हुए यह सवाल अपने सबसे बड़े नेता विनोद मिश्र और नागभूषण पटनायक से भी किया था कि क्या कानू दा को अपने साथ नहीं लाया जा सकता। इसका जवाब किसी की इच्छा या अनिच्छा पर निर्भर नहीं करता था। मन की कोई गांठ इस कदर उलझ गई थी कि विचार उसे सुलझा नहीं पाता था। चीजें खतरनाक दिशा में बढ़ रही थीं। अच्छा होता कि कोई उन्हें रोक लेता, समझा लेता। विचार के स्तर पर आप अल्पमत में पड़ जाएं, अकेले हो जाएं, तो भी आपके पास उसी प्रखरता के साथ जीने को कुछ होना चाहिए। उस नए कुछ को खोजने का कोई जतन ही समय रहते नहीं हो पाया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;देश के सबसे ईमानदार, सबसे प्रतिबद्ध जमीनी आंदोलन के साथ सबसे बड़ी मुश्किल यही है कि इसके तमाम धड़ों में बड़े स्तर के संवाद की संभावना नहीं के बराबर है। कुछ हद तक यह प्रवृत्ति मध्यकालीन योद्धाओं जैसी है। हर धड़े के केंद्र में कोई योद्धा है, जिसे लगता है कि एकमात्र उसका ही विश्लेषण, उसकी ही रणनीति सही है। आंदोलन के कई सत्यों के लिए, उनमें से किसी के पास कोई जगह नहीं है। 1982 में आईपीएफ की स्थापना के कुछ साल इधर और उधर तक लगा था कि शायद देश में एक तीसरी समेकित वाम धारा के लिए कोई स्पेस बन रहा है, लेकिन यह सिलसिला ज्यादा दिन नहीं चला। भारत के गरीब तबकों को खास एक अपनी पार्टी की जरूरत है। वह पार्टी क्रांति करेगी या नहीं, करेगी तो कब करेगी, इससे ज्यादा फर्क नहीं पड़ता। जब भी दिल कचोटने वाली कोई घटना होती है, इस बात को छत पर खड़े होकर जोर-जोर से दोहराने का दिल करता है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5004531893346374759-5646423823755640564?l=pahalu.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://pahalu.blogspot.com/feeds/5646423823755640564/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5004531893346374759&amp;postID=5646423823755640564' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5004531893346374759/posts/default/5646423823755640564'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5004531893346374759/posts/default/5646423823755640564'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://pahalu.blogspot.com/2010/03/blog-post.html' title='क्रांति और खुदकुशी'/><author><name>चंद्रभूषण</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11191795645421335349</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5004531893346374759.post-4101815942640743878</id><published>2010-02-20T05:14:00.000-08:00</published><updated>2010-02-20T06:09:31.926-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कवितायेँ'/><title type='text'>सपनों की बात</title><content type='html'>एक बंद दरवाजा खुलता है&lt;br /&gt;एक गहरा आंगन दिखता है&lt;br /&gt;एक बड़ा पीतल का हंडा&lt;br /&gt;एक चापाकल&lt;br /&gt;एक चीनी की बोरी खुली हुई&lt;br /&gt;नाबदान पर मांजने को&lt;br /&gt;या चढ़ाने से पहले धोने को रखे बर्तन&lt;br /&gt;यहां कोई आयोजन हो चुका है&lt;br /&gt;या शायद होने वाला है&lt;br /&gt;लेकिन मैं यहां क्यों हूं&lt;br /&gt;पता नहीं चलता&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक उखड़े हुए सूखे पेड़ का तना है&lt;br /&gt;कभी मैं उस तने पर होता हूं&lt;br /&gt;कभी उसकी जड़ के करीब&lt;br /&gt;पेड़ की टहनियां गहरे पानी में हैं&lt;br /&gt;किनारा जिसका दूर है&lt;br /&gt;पीछे जैसे कुछ है ही नहीं&lt;br /&gt;उस पार ही मुझे जाना है&lt;br /&gt;टहनियों के सिरे पकड़कर उतरूं&lt;br /&gt;तो भी पानी में ही पहुंचूंगा&lt;br /&gt;किनारे के शायद कुछ करीब&lt;br /&gt;फिर भी पानी में&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अंधियारे से घिरा यह जंडइल बरगद&lt;br /&gt;शायद गांव की काली माई है&lt;br /&gt;इसके नीचे शादी की बात हो रही है&lt;br /&gt;मेरी अपनी शादी की बात&lt;br /&gt;जिसके श्रोताओं में मैं भी शामिल हूं&lt;br /&gt;यह जानता हुआ कि अभी क्या होने वाला है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सफेद थकी अंबेसडर बहुत तेज आती है&lt;br /&gt;रास्ते में उसके बिना जगत का चौड़ा कुआं&lt;br /&gt;और यह पागल उम्मीद कि&lt;br /&gt;एक जोर में उसके पार निकल जाएगी&lt;br /&gt;फिर गर्जना भरी एक उछाल  &lt;br /&gt;अंबेसडर के अगले पहिए कुएं के पार &lt;br /&gt;फिर पिछले और फिर एक-एक कर अगले &lt;br /&gt;कराहती खरोंचती आवाजों के साथ &lt;br /&gt;धीरे-धीरे कुएं में जाते हुए&lt;br /&gt;हिंसक बुलबुले फूटते हुए ऊपर आ-आकर &lt;br /&gt;फिर इन्सानी आवाजों का इंतजार &lt;br /&gt;जो नहीं आतीं नहीं आतीं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसे ही मेरे सपने हैं&lt;br /&gt;ऐसा ही मेरा होना है&lt;br /&gt;ऐसा कोई सपना मैंने कभी नहीं देखा&lt;br /&gt;जिसमें मानवता हंसती हो&lt;br /&gt;न ही कोई ऐसा &lt;br /&gt;जो स्वेट मॉर्डन या शिव खेड़ा की तरह&lt;br /&gt;नींद उड़ा दे, सोने ही न दे &lt;br /&gt;जब तक हाथ न लग जाय&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने चीजों के सपने नहीं देखे&lt;br /&gt;बस जगहों के देखे हैं&lt;br /&gt;भेद भरी, खतरनाक जगहों के सपने&lt;br /&gt;जहां अपना होना ही &lt;br /&gt;सबसे बेतुकी चीज होता है&lt;br /&gt;मैंने ब्रह्मांड फूटने का &lt;br /&gt;समय के वापस शून्य में &lt;br /&gt;लौट जाने का सपना देखा है&lt;br /&gt;फिर लौटा हूं हकीकत में&lt;br /&gt;अकेला...बहुरि अकेला&lt;br /&gt;हर बार पहले से अधिक अकेला&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5004531893346374759-4101815942640743878?l=pahalu.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://pahalu.blogspot.com/feeds/4101815942640743878/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5004531893346374759&amp;postID=4101815942640743878' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5004531893346374759/posts/default/4101815942640743878'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5004531893346374759/posts/default/4101815942640743878'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://pahalu.blogspot.com/2010/02/blog-post_20.html' title='सपनों की बात'/><author><name>चंद्रभूषण</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11191795645421335349</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5004531893346374759.post-4304285331367389914</id><published>2010-02-18T05:06:00.000-08:00</published><updated>2010-02-18T05:54:20.200-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कविताएं'/><title type='text'>सुन्न शिखर का मुसाफिर</title><content type='html'>वहां अब शब्द नहीं हैं&lt;br /&gt;ध्वनियां हैं फकत...और भागती हुई तस्वीरें&lt;br /&gt;कुछ धुंधले अर्थों के गिर्द मंडराती हुई&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खिंचे चेहरे और ऐंठी जीभ से निकला&lt;br /&gt;एक सवाल मुझ तक पहुंचता है&lt;br /&gt;आप क्या वीर है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वीर? कौन? अजी मैं कहां?&lt;br /&gt;एक मुस्कान धूमिल जर्द चेहरे पर दिखती है&lt;br /&gt;निराशा से भरी हुई, बिना किसी तुर्शी के&lt;br /&gt;निहत्था कर देने वाली मुस्कान&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आखिर पूछना क्या चाहते हैं?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लुंज पड़े शरीर के कई इशारों बाद &lt;br /&gt;आप का आज समझ में आता है &lt;br /&gt;और वीर का वार......आज क्या वार है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सामने एक टीवी है&lt;br /&gt;जो जब तक बिजली रहती है, चलता रहता है&lt;br /&gt;फिल्में....फिल्में.....सिर्फ फिल्में&lt;br /&gt;सेक्स और हिंसा के अंतहीन शोरबे में&lt;br /&gt;ढाई-ढाई घंटों के गोते लगातार&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्या दिन है आज....यही पूछना चाहते हैं?&lt;br /&gt;राहत से वह आंख मूंद लेते हैं&lt;br /&gt;जवाब जरूरी नहीं &lt;br /&gt;सवाल का समझा जाना काफी है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आदतन मैं उनका जवाब देता हूं&lt;br /&gt;17 अगस्त 2009, एतवार &lt;br /&gt;दिन के साढ़े तीन बज रहे हैं&lt;br /&gt;धुंआई आंखों और बेजान उंगलियों से&lt;br /&gt;वह इस खबर को टटोलते हैं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्या यह समुद्र में भटके&lt;br /&gt;या कई साल बर्फ में दबे रहे इंसान को&lt;br /&gt;रैखिक समय में वापस खींचने जैसा है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सुन्न जेहन से चेतना में &lt;br /&gt;शाश्वत धुंध से अर्थों में &lt;br /&gt;ध्वनियों से शब्दों के बीच लौटना&lt;br /&gt;कैसा होता है ब्रजेश्वर मदान?&lt;br /&gt;इस सफर के किस्से क्या कभी सुनाओगे?&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5004531893346374759-4304285331367389914?l=pahalu.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://pahalu.blogspot.com/feeds/4304285331367389914/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5004531893346374759&amp;postID=4304285331367389914' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5004531893346374759/posts/default/4304285331367389914'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5004531893346374759/posts/default/4304285331367389914'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://pahalu.blogspot.com/2010/02/blog-post_18.html' title='सुन्न शिखर का मुसाफिर'/><author><name>चंद्रभूषण</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11191795645421335349</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5004531893346374759.post-8040652099123433740</id><published>2010-02-13T05:59:00.000-08:00</published><updated>2010-02-13T06:02:28.297-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कविताएं'/><title type='text'>शादी का घर</title><content type='html'>यह एक सुंदर वैवाहिक दृश्य है&lt;br /&gt;दो शिक्षित, सुरुचि संपन्न ब्राह्मण परिवार&lt;br /&gt;एक आरआई और दूसरा एनआरआई&lt;br /&gt;स्नेह बंधन में बंध रहे हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मोहल्ले के झगड़े की तरह मंत्र धांसता&lt;br /&gt;बनारस का एक चतुर चिबिल्ला पंडित&lt;br /&gt;दोनों तरफ से हजार-हजार के नोट&lt;br /&gt;झींटते हुए ठग मुद्रा में हंस रहा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक अच्छे-भले होटल के लॉन में&lt;br /&gt;घराती और बराती बिना सिर फुटौअल के&lt;br /&gt;रंगबिरंगे मगर शाश्वत स्वादहीन &lt;br /&gt;वैवाहिक खाने के मजे लूट रहे हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन इस आयोजन की कोई अंतर्कथा भी है&lt;br /&gt;जिसे एक-दूसरे को कोंच न पाने से दुखी&lt;br /&gt;सुगंधित अंग्रेजीदां औरतों की &lt;br /&gt;खुसफुस में सुना जा सकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कन्या की बहन के सिवाय&lt;br /&gt;उसका कोई सगा शादी में क्यों नहीं आया&lt;br /&gt;घरातियों में सबके सब ननिहाली हैं,&lt;br /&gt;पर उनमें भी कुछ नजर नहीं आते।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और यल्लो, मां कहां है?&lt;br /&gt;लड़की का बाप नहीं, चलो कोई बात नहीं&lt;br /&gt;लेकिन मां तो है,&lt;br /&gt;वह तो दिखनी चाहिए कहीं, वह कहां है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कन्या के घर पर इस वक्त ताला पड़ा है,&lt;br /&gt;लेकिन घर में कुछ इन्सानी हलचल है&lt;br /&gt;लड़की सी दिखती ढले नक्श वाली एक स्त्री&lt;br /&gt;ग्रिल से बाहर की दुनिया देख रही है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;छूटते ही वह मुझसे पूछती है&lt;br /&gt;क्या ऐसी भी कोई शादी आपने देखी है&lt;br /&gt;जिसमें दुल्हन की मां को ही&lt;br /&gt;शादी देखने की इजाजत न हो?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरी खामोशी उससे कहती है-&lt;br /&gt;कामयाब लोगों की दुनिया है बहन,&lt;br /&gt;देखना-दिखाना क्या, कल को शायद इसमें &lt;br /&gt;जीने की इजाजत भी न मिले।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शादी निपटाकर लोग घर चले आए हैं&lt;br /&gt;शादी के किस्से बताती एक औरत &lt;br /&gt;रात चार बजे उसका सिर सहलाती है&lt;br /&gt;कि जैसे सारी बेहूदगियां इससे ढक जाएगी।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5004531893346374759-8040652099123433740?l=pahalu.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://pahalu.blogspot.com/feeds/8040652099123433740/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5004531893346374759&amp;postID=8040652099123433740' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5004531893346374759/posts/default/8040652099123433740'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5004531893346374759/posts/default/8040652099123433740'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://pahalu.blogspot.com/2010/02/blog-post_13.html' title='शादी का घर'/><author><name>चंद्रभूषण</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11191795645421335349</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5004531893346374759.post-6916515137879522175</id><published>2010-02-08T04:11:00.000-08:00</published><updated>2010-02-08T05:15:49.297-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कवितायेँ'/><title type='text'>दर्द ज्यादा है और मौत करीब</title><content type='html'>दर्द ज्यादा है और मौत करीब&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;धूप-छांह और अकुलाहट भरी उमस के बीच&lt;br /&gt;खुले निचाट में मैं लेटा हुआ हूं&lt;br /&gt;मेरे लोग मुझे देखकर छिप-छिप जाते हैं&lt;br /&gt;जैसे मैं अभी उठूंगा और उन्हें खोज लूंगा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मां मेरी उठकर कहीं दूर चली जाती है&lt;br /&gt;कि जैसे लौटेगी तो भला-चंगा मिलूंगा उसे&lt;br /&gt;मैं भी कुछ देर सो जाना चाहता हूं&lt;br /&gt;ताकि नींद खुले तो चेहरे सारे हंसते हुए दिखें&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरे भाई चीजें ला-लाकर मेरे पास रख रहे हैं&lt;br /&gt;शायद इस उम्मीद में कि &lt;br /&gt;जिंदगी उनसे निकलकर मेरे भीतर आ जाएगी&lt;br /&gt;मैं उन्हें देख सकता हूं,उनका कुछ कर नहीं सकता&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दर्द ज्यादा है और मौत करीब&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;थोड़ी रोशनी मेरी बंद पलकों से छनकर&lt;br /&gt;अब भी मुझ तक पहुंच रही है&lt;br /&gt;लेकिन अंधेरा है कि गहराता जा रहा है&lt;br /&gt;सांय-सांय करता सूना-सुन्न अंधेरा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं चाहता हूं, यह बादलों का अंधेरा हो&lt;br /&gt;हर तरफ से घेरे हुए बादलों का अंधेरा&lt;br /&gt;और कुछ बड़ी-बड़ी बूंदें चुराकर&lt;br /&gt;मैं अपने साथ लिए जाऊं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और ये कुछ आवाजें हैं&lt;br /&gt;लोगों के उठ-उठ कर जाने की आवाजें&lt;br /&gt;क्या इस ठंडे खुलेपन में &lt;br /&gt;अब मैं बिल्कुल अकेला हूं?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरे जाने का वक्त है मेरे लोगों&lt;br /&gt;कुछ देर और मेरे साथ रहो&lt;br /&gt;पता नहीं किन आवाजों में&lt;br /&gt;किससे मैं यह सब कहता हूं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;न जाने किसके लौटने का इंतजार करता हूं&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5004531893346374759-6916515137879522175?l=pahalu.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://pahalu.blogspot.com/feeds/6916515137879522175/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5004531893346374759&amp;postID=6916515137879522175' title='8 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5004531893346374759/posts/default/6916515137879522175'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5004531893346374759/posts/default/6916515137879522175'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://pahalu.blogspot.com/2010/02/blog-post.html' title='दर्द ज्यादा है और मौत करीब'/><author><name>चंद्रभूषण</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11191795645421335349</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>8</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5004531893346374759.post-3258898193598316393</id><published>2010-01-26T05:17:00.000-08:00</published><updated>2010-01-26T05:36:30.273-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='बड़ों की बड़ी बात'/><title type='text'>ठंड काफी है मियां, बाहर निकलो तो कुछ पहन लिया करो</title><content type='html'>पिछले सप्ताह दिवंगत हुए समाजवादी नेता जनेश्वर मिश्र ने करीब चार साल पहले डॉ. राम मनोहर लोहिया से जुड़ा यह किस्सा मुझे सुनाया था। मैं और शशिधर पाठक उस वक्त सहारा समय साप्ताहिक में थे और लोहिया के जन्मदिन पर उनसे कुछ बातचीत करने गए थे। जनेश्वर जी मिठाई के भयंकर रसिया थे और उन्हें लोगों का अपने यहां आना इसलिए भी पसंद था कि उनके जलपान के लिए लाई गई मिठाइयों पर वे खुद भी हाथ साफ कर सकें। डायबिटीज की बीमारी के चलते घर में कोई उन्हें सीधे मिठाई नहीं दे पाता था, लिहाजा अपना शौक पूरा करने के लिए वह यह बाईपास तरीका अपनाते थे। बहरहाल, उस दिन बातचीत के क्रम में आया यह किस्सा यथासंभव उन्हीं के शब्दों में प्रस्तुत है। इस वैधानिक क्षमायाचना के साथ इसमें किसी भी गलती की जिम्मेदारी मेरी है, क्योंकि ऐतराज जताने या इसकी गलतियां सुधारने के लिए जनेश्वर जी अब इस दुनिया में नहीं हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नेहरू जी की मृत्यु के बाद उनके संसदीय क्षेत्र फूलपुर में मेरी पार्टी ने मुझे (जनेश्वर मिश्र को) कांग्रेस के खिलाफ उम्मीदवार बनाया और मैं चुनाव जीत गया। जीत के बाद शपथ ग्रहण के लिए डॉक्टर साहब (डॉ. राम मनोहर लोहिया) के साथ मैंने दिल्ली के लिए जो गाड़ी पकड़ी, उसे रात दस बजे के करीब रामपुर में बदलना पड़ गया। अगली गाड़ी दो बजे आने वाली थी। हमने सोचा, चार घंटा स्टेशन पर पड़े रहने के बजाय बाहर चलकर टहलते हैं। बाहर थोड़ी ही दूर पर कव्वाली हो रही थी। हम वहीं खड़े होकर कव्वाली सुनने लगे। संयोग से वहां कुछ लोग डॉक्टर साहब को पहचानने वाले निकल आए। नेहरू जी की सीट जीतने की वजह से उनमें से कुछ ने मेरा नाम सुन रखा था, तो थोड़ी इज्जत मेरी भी हुई। हमारी अटैची वगैरह रखवाकर लोग कव्वाली सुनने के साथ-साथ हमसे बातें भी करने लगे। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;समय यही जनवरी-फरवरी का था। रात की हवा में ओस थी और ठंड भी ठीकठाक थी। इतने में ठंड से दांत किटकिटा रहे एक अधेड़ मुस्लिम से डॉक्टर साहब ने कहा, मियां ठंड काफी है, बाहर निकलो तो कुछ पहन लिया करो। वह बोले, अरे डॉक्टर साहब, स्वेटर, जर्सी, कोट सब आप जैसों के लिए है, हम जैसे यह सब कहां पाएंगे। डॉक्टर साहब थोड़ी देर के लिए चुप हो गए। फिर बोले, जनेश्वर, मेरी अटैची से एक स्वेटर लाओ। मैंने अटैची खोली तो उसमें दो स्वेटर पड़े थे- एक हल्का, दूसरा भारी और काफी महंगा। मेरे ख्याल से डॉक्टर साहब के किसी जर्मन दोस्त ने उन्हें दिया था। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने हल्का वाला स्वेटर निकाला और लाकर उन्हें थमा दिया। यह गलती मेरे लिए बड़ी महंगी साबित हुई। डॉक्टर साहब ने वहीं सबके सामने मेरी इज्जत उतार दी। गधा, उल्लू, पाजी...क्या-क्या नहीं कहा। फिर खुद उठे और अटैची से महंगा वाला स्वेटर निकाल कर ठंड से कुड़कुड़ा रहे उन सज्जन को थमा दिया। बोले, मियां इसे अभी पहन कर दिखाओ। उन्होंने पहना और कहा, डॉक्टर साहब यह तो बहुत गरम है, लेकिन एक हमारे स्वेटर पहन लेने से देश में लाखों लोगों का जाड़ा तो नहीं जाएगा। लोहिया जी बोले, मियां अभी तो अपना देखो। अगर कभी हमारी सरकार बनी तो अपनी तरफ से पूरी कोशिश करेंगे कि देश में किसी को भी ठंड में ठिठुरना न पड़े। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसके बाद दो घंटे हम वहां और रहे, लेकिन कौन क्या बोला, मुझे कुछ नहीं पता। वापस आकर ट्रेन पकड़ी तो भी डॉक्टर साहब की सामने वाली सीट पर मैं सिर झुकाए, रुआंसा, जुबान सिले बैठा रहा। इस बीच उनका गुस्सा उतर गया और बोले, जनेश्वर कुछ बात क्यों नहीं कर रहे हो। मैंने कहा, डॉक्टर साहब आप जैसे विद्वान से मैं क्या बात करूं। मैं तो गधा हूं, उल्लू हूं, पाजी हूं। वह बोले, जनेश्वर, बच्चों की तरह नाराज होना छोड़ो और समझदार आदमी की तरह कुछ ढंग की बात करो। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने कहा, डॉक्टर साहब, आपने स्वेटर लाने को कहा, मैंने ला दिया। जो स्वेटर मैं लाया था, वह पाकर भी वह आदमी कम खुश नहीं हुआ होता। आप बड़े आदमी हैं, बड़ी चीज देने से ही आपके दिल को राहत मिलती है, लेकिन अपनी समझ से मैंने गलत क्या किया, जो दस आदमियों के बीच में आपने मेरी इज्जत उतार ली? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;डॉक्टर साहब एक बार फिर खामोश हो गए। फिर बोले, गलत हुआ। थोड़ी देर बाद कहा, जनेश्वर, इस बात को मेरी चीज, तेरी चीज, की नजर से मत देखो। ये छोटी बातें हैं। उस आदमी ने हमसे कुछ मांगा तो नहीं था। सिर्फ एक बात कही थी, इस देश की गरीबी के बारे में एक सीधी, खरी बात। मेरे देने-लेने से उस बात का कोई मतलब नहीं। बस, स्वेटर देने का दिल किया, दे दिया। अगर तुम किसी को अपनी मर्जी से कुछ देना चाहते हो तो उसे सबसे अच्छी चीज दो। खराब चीज का देना तो अपना बोझ उतारना हुआ, देना नहीं हुआ।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5004531893346374759-3258898193598316393?l=pahalu.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://pahalu.blogspot.com/feeds/3258898193598316393/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5004531893346374759&amp;postID=3258898193598316393' title='11 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5004531893346374759/posts/default/3258898193598316393'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5004531893346374759/posts/default/3258898193598316393'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://pahalu.blogspot.com/2010/01/blog-post.html' title='ठंड काफी है मियां, बाहर निकलो तो कुछ पहन लिया करो'/><author><name>चंद्रभूषण</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11191795645421335349</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>11</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5004531893346374759.post-6369043475752907421</id><published>2009-12-28T05:49:00.000-08:00</published><updated>2009-12-28T05:50:54.313-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='बहस'/><title type='text'>रोमन हिंदी भी हिंदी है</title><content type='html'>जब हम हिंदी भाषा के विनाश पर दुखी हो रहे होते हैं या उसका स्वर्ण युग दर्ज कर खुशी जता रहे होते हैं तो अनजाने में हमसे एक छोटी सी गलती हो रही होती है। अंग्रेजी, फ्रेंच, जर्मन, स्पेनिश या अरबी, फारसी, चीनी, जापानी की तरह हिंदी कोई यकसार भाषा नहीं है। हिंदी का मतलब कई तरह की हिंदी है। ये हिंदियां इतिहास की अलग-अलग प्रक्रियाओं में उत्पन्न हुई हैं। इनके आगम और संबोधन के दायरे अलग-अलग हैं और एक ही भाषा होने के बावजूद इनके बीच फासले काफी बड़े हैं। गौर से देखें तो इन हिंदियों में कुछ तेजी से फलती-फूलती हुई अपने भविष्य को लेकर अत्यंत आशावान हैं, कुछ सचमुच नष्ट हो रही हैं तो कुछ अपने ऊपर या नीचे जाने को लेकर दुविधा या दिशाभ्रम में हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हिंदी का मतलब अगर बोलचाल की हिंदी है तो पिछले बीस-पचीस सालों में उसका नाटकीय विस्तार हुआ है। सत्तर के दशक तक सिर्फ उत्तर भारतीय शहरों और कुछ हद तक मुंबई-कोलकाता में बोली जाने वाली हिंदी अब न सिर्फ उत्तर भारत के कस्बों-बाजारों में बल्कि गांवों तक में बोली जाने लगी है। इटानगर से मदुरै और गुरदासपुर से सरायकेला तक देश के किसी भी शहर में सिर्फ हिंदी बोलकर आप अपनी सारी बुनियादी जरूरतें पूरी कर सकते हैं। बेंगलूर जैसे शहर में खटाल चलाने वालों से लेकर कंपनियों के डाइरेक्टर तक हिंदी बोलने में न सकुचाते हैं, न इतराते हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बोलचाल के काफी करीब रहने वाली फिल्मों और टीवी की हिंदी का तो अभी स्वर्णयुग चल रहा है। शानदार गीतों और चुटीले संवादों वाली यह भाषा हर साल दसियों हजार करोड़ रुपये का धंधा करके दे रही है। साठ के दशक तक इसका झुकाव अगर उर्दू और लोकभाषाओं की तरफ था तो आज अपनी जरूरत के नए शब्द तलाशने के लिए यह फुटपाथी अंग्रेजी और तमाम भारतीय भाषाओं-बोलियों की मदद लेती है। करन जौहर की फिल्में देखकर तो कई लोगों को लगता है कि अमेरिका और इंग्लैंड की भाषा भी अब शायद हिंदी ही हो चली है। टीवी की मनोरंजन भाषा लगभग फिल्मी ही है लेकिन समाचार भाषा का ढांचा अभी अस्थिर है। जाहिर है कि जड़ता या ढलान टीवी की हिंदी के लिए भी कोई समस्या नहीं है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन हिंदी से अर्थ अगर उस हिंदी का लिया जाता है जो राजभाषा के रूप में दफ्तरी फाइलों या पाठ्यपुस्तकों में विराजती है, या जिसे सचिवालयों, अदालतों और शोध संस्थानों में स्थापित करने के लिए लंबी लड़ाई लड़ी गई थी, तो अस्सी के दशक से शुरू हुई नव-उदारवादी नीतियों ने उस पर घातक चोट की है। सरकारी पैसे से चलने वाले सभी संस्थानों में हिंदी अधिकारी या तो हटा दिए गए हैं या उन्हें ऐरे-गैरे काम पकड़ा दिए गए हैं। कानून, विज्ञान और प्रशासन से जुड़ी तकनीकी हिंदी शब्दावली तैयार करने की कसरत इस कदर ध्वस्त पड़ी है कि उसे जिंदा करने की कोशिश भी बेमानी लगती है। इसका दंड शिक्षा माध्यम के रूप में बरती जाने वाली हिंदी को भुगतना पड़ रहा है। छात्रों के मन में इसे लेकर घोर निराशा है क्योंकि इंटरमीडिएट तक हिंदी में वे जो भी सीख कर आ रहे हैं, उसका इस्तेमाल रोजगार पाने में तो क्या शिक्षा की अगली सीढ़ी चढ़ने में भी नहीं कर पा रहे हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पिछली एक सदी में हिंदी का असली युद्ध साहित्यिक हिंदी ने लड़ा है लेकिन आज सबसे ज्यादा संकट उसी के सामने है। समय इतनी तेजी से बदला है कि अज्ञेय तक की हिंदी आज पढ़ने में अटपटी लगती है। कोई नहीं जानता कि आने वाले समय में यह ठीक-ठीक कैसा रूप लेगी। देश का शहरी मध्यवर्ग जिस तरह अपने बच्चों की शिक्षा के लिए अंग्रेजी माध्यम के पब्लिक स्कूलों पर निर्भर होता जा रहा है, उसे देखते हुए हिंदी साहित्यकारों की यह चिंता बिल्कुल वाजिब है कि उनका लिखा पढ़ने में पता नहीं खुद उनके बच्चों की भी दिलचस्पी होगी या नहीं। इस खतरे का सामना प्रिंट पत्रकारिता की हिंदी को भी करना पड़ा है लेकिन निरंतर बढ़ती पाठक संख्या और कामयाबी के अपने-अपने दावों के साथ यहां बहुत सारे प्रयोग जारी हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस बीच एक नए तरह की हिंदी भी अस्तित्व में आ रही है, लेकिन उसकी लिपि हमारी सुपरिचित देवनागरी नहीं है। इसे आप एसएमएस की हिंदी कह सकते हैं जो रोमन लिपि यानी अंग्रेजी अक्षरों में पंचमेल खिचड़ी वाली शैली में लिखी जाती है। आगे स्मार्टबुक का दौर शुरू होने के साथ यह हाइपरटेक्स्ट की जुबान बन सकती है। हाइपरटेक्स्ट यानी एक ऐसा पाठ जिसमें लिखित सामग्री के अलावा ऑडियो-विडियो क्लिपिंग और इंटरनेट लिंक भी शामिल हों। संवाद के इस उच्चतम रूप में देखना, सुनना, पढ़ना और सोचना, सब कुछ एक साथ चलेगा। रोमन लिपि में लिखी हाइपरटेक्स्ट की हिंदी एक ऐसी भाषा होगी जो न सिर्फ पूरे भारतीय उपमहाद्वीप को बल्कि फिजी से सूरीनाम तक फैले भारतवंशियों और यूरोप-अमेरिका में छाई एनआरआई आबादी को भी एक साझा मंच पर समेटे होगी। इस हिंदी को अंग्रेजी से डरने की कोई जरूरत नहीं होगी क्योंकि अंग्रेजी के सारे हथियार इसके पास पहले से मौजूद होंगे। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसा जब होगा तब हमारी पीढ़ी के लोगों के लिए इसमें खुशी के साथ थोड़ी तकलीफ भी जुड़ी होगी। खुशी यह कि सौ साल के सांप्रदायिक टकरावों को पीछे छोड़ती हुई यह हिंदी खुसरो और कबीर जैसी धंधे-पानी की जुबान होगी। कुछ-कुछ वैसी ही भाषा, जिसे गांधी जी हिंदुस्तानी कहते थे और जिसे लिखने के लिए देवनागरी और नस्तलीक, दोनों लिपियों के इस्तेमाल के हिमायती थे। फर्क सिर्फ इतना होगा कि हाइपरटेक्स्ट तक आते-आते इस सूची में तीसरी लिपि के रूप में रोमन भी शामिल हो चुकी होगी। हिंदी और उर्दू में साहित्यिक लेखन तब भी होता रहेगा, लेकिन इनमें तकनीकी ज्ञान रचने की जिद खत्म हो जाएगी। नौकरी-चाकरी और कारोबार में अंग्रेजी का जोर कुछ और बढ़ जाएगा लेकिन इसके लिए लोगों का पिछली सदी की तरह फूहड़ अंग्रेज बनना जरूरी नहीं होगा। वे अंग्रेजी भाषा को जानने-समझने वाले लोग होंगे। लेकिन ग्लोबल मंच पर उनकी पहचान हिंदी होगी, जीने और मौज करने की जुबान हिंदी होगी।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5004531893346374759-6369043475752907421?l=pahalu.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://pahalu.blogspot.com/feeds/6369043475752907421/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5004531893346374759&amp;postID=6369043475752907421' title='12 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5004531893346374759/posts/default/6369043475752907421'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5004531893346374759/posts/default/6369043475752907421'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://pahalu.blogspot.com/2009/12/blog-post_28.html' title='रोमन हिंदी भी हिंदी है'/><author><name>चंद्रभूषण</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11191795645421335349</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>12</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5004531893346374759.post-2718774513327548721</id><published>2009-12-12T03:48:00.000-08:00</published><updated>2009-12-12T04:11:36.417-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='विज्ञान दर्शन'/><title type='text'>यहां और वहां क्या, तब और अब क्या</title><content type='html'>ईसा से करीब एक हजार साल पहले रचे गए अथर्व वेद में आई एक ऋचा का अर्थ यह है कि अगले दिन तक याद रह जाने वाला कोई सपना अगर आधी रात से पहले देखा गया हो तो उसका प्रतिफल अधिक समय बाद देखने को मिलता है, लेकिन यदि इसे प्रात:काल के आसपास देखा गया हो तो इसका शीघ्र प्रतिफलित होना निश्चित है। यह एक ऐसा सूत्र है, जो आज किसी को भी बेमानी लग सकता है। लेकिन एक दिन फोन की घंटी बजती है और अमेरिका में बैठी एक बेचैन रिश्तेदार आपसे पूछती हैं- आज सपने में मौसी जी को बीमार देखा, बात करा दीजिए- तो लगता है, अथर्व वेद को रचे अभी ज्यादा वक्त नहीं गुजरा है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भविष्य के बारे में व्यवस्थित रूप से सोचना, किसी खास मसले से जुड़ी अनंत संभावनाओं को खारिज करते हुए सिर्फ एक पर उंगली रख देना खुद में एक बड़ा कौशल है। गणित और भौतिकी का तो मूल काम ही यही है। ज्योतिष और सैंपल सर्वे से लेकर सेफोलॉजी तक बहुत सारे अर्ध-वैज्ञानिक शास्त्र इसके व्यक्तिगत और सामाजिक पहलुओं पर काम करते हैं। लेकिन यहां हम जिस चीज के बारे में बात कर रहे हैं, उसका किसी कला, कौशल या विज्ञान से, यहां तक कि किसी अनुशासन या प्रशिक्षण से भी कोई लेना-देना नहीं है। चांद पर जा चुके अंतरिक्षयात्रियों से लेकर अनपढ़ घसियारों तक शायद ही संसार में कोई व्यक्ति ऐसा हो, जिसका कभी न कभी, कोई न कोई वास्ता टेलीपैथी या पूर्वाभास जैसे अनुभवों से न पड़ा हो। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;टेलीपैथी और पूर्वाभास, यानी सपने में या जागते हुए कहीं और घटित हो रही, या घटित होने जा रही घटनाओं का अंदाजा हो जाना, एक ऐसा क्षेत्र है, जिसमें घुसते हुए विज्ञान के पांव थरथराते हैं। किसी घटना के बारे में कोई सूचना प्राप्त करने के लिए उसके साथ किसी न किसी तरह का संपर्क होना जरूरी है- यह चाहे सीधे प्रेक्षण के रूप में हो या किसी माध्यम के जरिए। यह सिलसिला टूटते ही तर्क की बुनियाद दरकने लगती है। समस्या यह है कि विज्ञान के पास अपने खुद के पूर्वाभासों की भी एक श्रृंखला है, जिसका सिर-पैर समझना इतना मुश्किल है कि इस काम के लिए &lt;em&gt;साइंस ऑफ द साइंसेज &lt;/em&gt;नाम के एक अलग शास्त्र की मांग की जाती रही है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अट्ठारहवीं सदी की गणितज्ञ मारिया एग्नेसी रेखागणित की जटिल समस्याओं के हल नींद में खोज लेती थीं और आंख खुलते ही उन्हें कॉपी में उतार देती थीं। पिछली सदी के जीनियस भारतीय गणितज्ञ श्रीनिवास रामानुजन का कहना था कि उनकी कुलदेवी नामगिरि सपने में आकर उनके कठिन सवाल सुलझा जाती हैं। बेंजीन की संरचना पर काम कर रहे फ्रेडरिक केकुले को सपने में एक सांप दिखा जो अपनी पूंछ अपने मुंह में दबाए हुए था और यहीं से एक शास्त्र के रूप में ऑगेर्निक केमिस्ट्री की नींव पड़ गई। अल्बर्ट आइंस्टाइन ने जनरल थ्योरी ऑफ रिलेटिविटी तक पहुंचाने वाला अपना &lt;em&gt;गेडानकेनएक्सपेरिमंट &lt;/em&gt;एक दोपहर में दिवास्वप्न देखते हुए किया था। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इन सारे पूर्वाभासों की एक आम व्याख्या यह की जाती है कि अपने दिलोदिमाग की सारी ताकत झोंक कर यदि आप किसी समस्या पर काम कर रहे हैं तो आपका अवचेतन भी इसमें मददगार बन जाता है। केकुले यदि बेंजीन की संरचना पर जान लड़ाकर काम न कर रहे होते तो अपनी पूंछ मुंह में लिए सांप के सपने का उनके लिए भला क्या अर्थ हो सकता था? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कई लोगों को इस व्याख्या में विज्ञान की अहंमन्यता या दुराग्रह नजर आता है, लेकिन यह उसके साथ ज्यादती है। विज्ञान की पद्धति ऐसे प्रेक्षणों पर ही ध्यान केंद्रित करने की रही है, जो कई लोगों द्वारा कई बार दर्ज किए जा सकें। किसी अकेले व्यक्ति द्वारा सिर्फ एक बार किया गए किसी प्रेक्षण- जैसे स्वप्न, पूर्वाभास, दैवी अनुभूति, इलहाम या यहां तक कि आंख बंद करने पर नजर आने वाली आकृतियों को भी खारिज या नजरअंदाज करने के अलावा इस पद्धति के पास कोई चारा नहीं है। इस बारे में आइंस्टाइन की बात याद करने लायक है कि वे भूत-प्रेत पर भी यकीन करने को तैयार हैं लेकिन सिर्फ तभी, जब कई लोग उसे एक साथ देखें और बार-बार देखें। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;साझा प्रेक्षण की इस सीधी सी पद्धति पर आगे बढ़ कर ही विज्ञान ने अतीत की अतार्किक सत्ताओं को परास्त किया। लेकिन अब विज्ञान एक ऐसे मुकाम पर पहुंच रहा है, जहां वैज्ञानिक प्रेक्षण की यह परिभाषा जब-तब छोटी मालूम पड़ने लगती है। किसी परिघटना के केवल एक प्रेक्षण (जैसे, सुदूर अंतरिक्ष में सिर्फ एक बार दर्ज की जा सकी अरबों साल पुरानी कोई कौंध) या किसी के भी द्वारा कभी न लिए जा सके प्रेक्षण (जैसे, प्राणि जगत में उद्विकास या इवोल्यूशन) को भी उसे वैज्ञानिक प्रेक्षण जैसी मान्यता देनी ही पड़ती है। क्वांटम मेकेनिक्स का तो आधार ही यही है कि किसी कण या तरंग का वस्तुगत प्रेक्षण संभव नहीं है। इस क्रम में विज्ञान के भीतर पूर्वाभास या टैलीपैथी जैसे किसी के साथ साझा न किए जा सकने वाले प्रेक्षणों के लिए भी इधर कुछ स्पेस बनने लगा है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ज्ञान मीमांसा या एपीस्टेमोलॉजी का यह ऐसा मुकाम है, जहां पहुंच कर विज्ञान का सामना पहली बार फिलॉसफी के बुनियादी सवालों से हो रहा है। किसी भी किस्म के संपर्क के बिना घटना की सूचना मिल जाने का अर्थ है देशकाल की अंधेरी, अभेद्य दीवार में क्षण भर के लिए कोई खिड़की खुल जाना। विज्ञान के लिए आखिर इसका अर्थ क्या है? क्या यह कि 'यहां और वहां', या 'तब और अब' जैसी धारणाएं उतनी ठोस, उतनी वास्तविक नहीं हैं, जितनी ये एक नजर में मालूम पड़ती हैं?&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5004531893346374759-2718774513327548721?l=pahalu.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://pahalu.blogspot.com/feeds/2718774513327548721/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5004531893346374759&amp;postID=2718774513327548721' title='6 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5004531893346374759/posts/default/2718774513327548721'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5004531893346374759/posts/default/2718774513327548721'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://pahalu.blogspot.com/2009/12/blog-post.html' title='यहां और वहां क्या, तब और अब क्या'/><author><name>चंद्रभूषण</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11191795645421335349</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5004531893346374759.post-6388142184250610768</id><published>2009-11-24T05:13:00.000-08:00</published><updated>2009-11-24T06:07:39.720-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='सभ्यता विमर्श'/><title type='text'>अंग्रेजी अपनी दिव्यता खो रही है</title><content type='html'>अंग्रेजी से मेरे परिवार की मुठभेड़ गुलाम भारत में शुरू हुई थी। दादा जी संस्कृत के अध्यापक थे। एक बार उनकी बनारस में रहने वाले गांव के ही एक सज्जन से कुछ झड़प हो गई तो उनके अंग्रेजीदां लड़के ने डैम फूल जैसी कोई गाली बक दी। दादा जी इसका मतलब नहीं समझ पाए, लेकिन लड़के के लहजे से स्पष्ट था कि वह उन्हें अंग्रेजी में गाली दे रहा है। तभी उन्होंने तय किया कि चाहे कुछ भी हो जाए, अब तो मेरे बच्चे अंग्रेजी में ही पढ़ेंगे। उस समय, जब संस्कृत मिजाज वाले परिवारों में बच्चों को ईसाई स्कूलों में भेजना विधर्मी कृत्य माना जाता था, उन्होंने मेरे ताऊ, पिता और चाचा का नाम आजमगढ़ शहर के वेस्ली मिशन स्कूल में लिखा दिया। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यहां से मेरे परिवार में एक नए युग की शुरुआत हो सकती थी, लेकिन वह नहीं हुई। अंग्रेजी हमारे यहां प्रतिक्रिया की भाषा ही बनी रही। इसका श्रीगणेश गाली से हुआ था और दो-चार जवाबी गालियां दे लेने के बाद इसका काम पूरा हो गया। अलबत्ता इस बीच परिवार की एक शाखा निखालिस अंग्रेजी की राह पर बढ़ चली। अपने चाचा की आलमारियां मैंने सिर्फ अंग्रेजी उपन्यासों से भरी पाईं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चचेरे भाई-बहनों को भी आपस में और माता-पिता से हमेशा अंग्रेजी में ही बात करते देखा। लेकिन जैसे ही वे घर से निकल कर जिंदगी की राह पर लौटे, वैसे ही ठेठ बनारसी या गोरखपुरिया हो गए। वे पढ़े-लिखे पेशों में हैं लेकिन उनकी रोटी अंग्रेजी से नहीं निकलती। अंग्रेजी उपन्यास उन्हें अब भी पसंद हैं, लेकिन उनके हाथ में मैंने कभी कोई क्लासिक चीज नहीं देखी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चर्चित उपन्यासकार चेतन भगत ने भारत में अंग्रेजी अपनाने वालों की दो किस्में बताई हैं। एक ई-1, यानी वे, जिनके मां-बाप अंग्रेजी बोलते रहे हैं, जिनका बोलने का लहजा अंग्रेजों जैसा हो गया है और जो सोचते भी अंग्रेजी में हैं। दूसरे ई-2, यानी वे, जिन्होंने निजी कोशिशों से अंग्रेजी सीखी है और जिनका अंग्रेजी बोलना या लिखना हमेशा अनुवाद जैसा अटकता हुआ होता है। भगत का कहना है कि वे अपने पाठक ई-1 के बजाय ई-2 में खोजते हैं, और भारत में अंग्रेजी का भविष्य भी इसी वर्ग पर निर्भर करता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अंग्रेजी के साथ भारतीयों के बहुस्तरीय रिश्तों को देखते हुए कोई चाहे तो ई-1, ई-2 के सिलसिले को ई-3 और ई-4 तक फैला सकता है। मसलन, वे लोग जिनका अंग्रेजी में पहली पीढ़ी का दखल भी दहलीज लांघने तक ही सीमित है, या वे, जो बस इतना जान पाए हैं कि अंग्रेजी का अखबार किधर से पकड़ने पर सीधा और किधर से उल्टा होता है। सवाल यह है कि ये सारी श्रेणियां क्या अनिवार्यत: ई-1 की ओर बढ़ रही हैं? या फिर ई-2 जैसी कोई बहुत बड़ी स्थायी श्रेणी ही भारत में अंग्रेजी का प्रतिनिधित्व करेगी? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जो लोग भी अभी ई-1 में शामिल हैं, या होने का दावा करते हैं, उनके पीछे की पीढि़यां कभी न कभी ई-4, ई-3 या ई-2जैसे मुकामों से जरूर गुजरी होंगी, लिहाजा गणितीय तर्क से इस नतीजे तक पहुंचा जा सकता है कि एक दिन भारत के ज्यादातर लोग अंग्रेजी मुहावरे में ही सोचने, बोलने और लिखने लगेंगे। लेकिन तजुर्बे से लगता है कि ई-1 की तुलना में ई-2 का अनुपात तेजी से बढ़ने के साथ ही अंग्रेजी कुलीनता का मिथक कमजोर पड़ने लगता है और एक किस्म के लेवल प्लेइंग फील्ड की शुरुआत हो जाती है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;किसी धौंस, अनुशासन या मजबूरी के तहत नहीं, सहज जीवनचर्या के तहत अंग्रेजी अपना कर उसी में सोचने-समझने और मजे करने वाली कोई पीढ़ी मेरे परिवार में अब तक नहीं आई है। अमेरिका, इंग्लैंड और ऑस्ट्रेलिया में रह रहे सबसे नई पीढ़ी के छह-सात लड़के, लड़कियां और बहुएं अंग्रेजी में लिखते-पढ़ते जरूर हैं, लेकिन इसके लिए मेरे चाचा और उनके बेटे-बेटियों की तरह कई साल तक सचेत ढंग से हिंदी से कटकर अंग्रेज बनने की जरूरत उन्हें कभी नहीं पड़ी। वे इंजीनियर, डॉक्टर या सीए होकर ग्लोबल हुए हैं, अंग्रेज होकर नहीं। उन्हें पता है कि अंग्रेजी का दखल उनकी जिंदगी में कहां शुरू होता है और कहां पहुंच कर खत्म हो जाता है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5004531893346374759-6388142184250610768?l=pahalu.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://pahalu.blogspot.com/feeds/6388142184250610768/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5004531893346374759&amp;postID=6388142184250610768' title='9 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5004531893346374759/posts/default/6388142184250610768'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5004531893346374759/posts/default/6388142184250610768'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://pahalu.blogspot.com/2009/11/blog-post_24.html' title='अंग्रेजी अपनी दिव्यता खो रही है'/><author><name>चंद्रभूषण</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11191795645421335349</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>9</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5004531893346374759.post-7468094718552771823</id><published>2009-11-23T04:58:00.000-08:00</published><updated>2009-11-23T05:52:50.114-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='खोज-बीन'/><title type='text'>जितने नाकारा उतने धर्मधुरीण</title><content type='html'>तांत्रिकों और कथावाचकों का मंत्री बनना, सड़क घेर कर मंदिर और ग्रीन बेल्ट छेंक कर गुरद्वारे खड़े हो जाना, हर रात ही सिर खाते माता के जगराते, नए-नवेले भगवानों और धर्मगुरुओं का बढ़ता दायरा, हर जुमे को सड़कों पर आना-जाना दूभर बनाती नमाजी जमातें, और खुद को जेन-एक्स, वाई या जेड बताने वाले नौजवानों में भी गंडे-ताबीज बांधने का ट्रेंड। क्या इक्कीसवीं सदी के समाज में धार्मिकता बढ़ रही है? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;समय बीतने के साथ लोग उदार और धर्मनिरपेक्ष होते जाएंगे, ऐसी एक राय बीसवीं सदी के सात या आठ दशकों तक मुख्यधारा में थी लेकिन समाजवादी व्यवस्थाओं और उनकी विचारधारा के पतन के साथ ही यह नेपथ्य में चली गई। इसके बाद से धार्मिकता पूरी दुनिया में एक रहस्यमय चीज बनी हुई है। कोई नहीं जानता कि यह घट रही है या बढ़ रही है। सामाजिक विकास के साथ इसका कोई रिश्ता है या नहीं। और किसी समाज में यह आत्मघाती हो चली है तो वहां इसके इलाज की कल्पना भी की जा सकती है या नहीं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;समाज विज्ञानियों के यहां ऐसे सारे सवालों के जवाब अटकलों पर आधारित हैं लेकिन मनोविज्ञान के एक खोजी ने इसका जवाब खोजने में आश्चर्यजनक वैज्ञानिकता आजमाई है। इवोल्यूशनरी साइकॉलजी के पिछले अंक में प्रकाशित ग्रेगरी पॉल के 44पेज लंबे रिसर्च पेपर के निष्कर्षों से भी ज्यादा रोचक है उनकी खोज प्रणाली, उनके पुख्ता मानदंड। आज जब हम चिकित्सा शास्त्र जैसे शुद्ध विज्ञान में भी अधकचरे और बेईमान नतीजों की भरमार देख रहे हैं, तब ग्रेगरी ने समाज विज्ञान के एक उलझे हुए प्रश्न का अकाट्य उत्तर ढूंढ निकाला है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अपनी खोज में ग्रेगरी पॉल ने यह पता लगाने की कोशिश की है कि किसी समाज के धार्मिक होने और सफल होने के बीच का रिश्ता क्या है। न औद्योगिक, न शक्तिशाली, न विकसित। सिर्फ सफल। कोई समाज कितना सफल है, यह जानने के लिए उन्होंने 25 ऐसे मानक चुने हैं, जिन्हें पक्की संख्याओं के रूप में दर्ज किया जा सकता हो और जिनके प्रामाणिक आंकड़े पहले से मौजूद हों। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसके लिए उन्होंने ऐसे 17 देशों को लिया है जो विकास के लगभग एक से स्तर पर हैं और जहां ऐसे रेकॉर्ड रखने की पुरानी व्यवस्था मौजूद है। ये हैं- ऑस्ट्रेलिया, ऑस्ट्रिया, कनाडा, डेनमार्क, इंग्लैंड, फ्रांस, जर्मनी, हॉलैंड, आयरलैंड, इटली, जापान, न्यूजीलैंड, नॉर्वे, स्पेन, स्वीडन, स्विट्जरलैंड और अमेरिका। ग्रेगरी के मुताबिक इस दायरे को बढ़ाने का अर्थ होगा तथ्यों से समझौता करना। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;किसी समाज की सफलता या असफलता को निर्धारित करने के लिए जो मानक उन्होंने चुने हैं, वे हैं - हत्याएं, जेल में बंद लोगों की तादाद, कम उम्र मौतें, जीवनकाल, कम आयु और सभी आयु वर्गों में स्त्री और पुरुष यौन रोग, किशोर वय में प्रसव और गर्भपात, जवानी में और सभी आयु वर्गों में आत्महत्याएं, प्रजनन क्षमता, विवाह, विवाह की अवधि, तलाक, जीवन से संतुष्टि, शराब की खपत, भ्रष्टाचार, आय, आय में अंतर, दरिद्रता, रोजगार, काम के घंटे और संसाधनों के दोहन का आधार, विदेश में जन्मे लोगों का प्रतिशत और सांस्कृतिक विभेद। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इनमें हर एक मानक के पीछे ग्रेगरी पॉल के कुछ पुख्ता तर्क हैं। इस सूची में हत्या के अलावा बाकी हिंसक अपराध शामिल नहीं किए गए हैं क्योंकि हत्या दर्ज करने के लिए लाश की मौजूदगी जरूरी है, जबकि बाकी अपराधों में ढीलापोली की काफी गुंजाइश होती है। इसी तरह ड्रग्स के मामलों को भी छोड़ दिया गया है क्योंकि इनके पक्के आंकड़े किसी भी देश में नहीं रखे जाते।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;धार्मिकता के आकलन के लिए ग्रेगरी ने जो मानक चुने हैं उन्हें भी संख्याओं में व्यक्त किया जा सकता है और नियमित सरकारी सर्वेक्षणों में इनके आंकड़े उपलब्ध हैं। ये हैं- ईश्वर में पूर्ण विश्वास, मूल धर्मग्रंथ के हर शब्द पर पूरा यकीन, महीने में कई बार धार्मिक आयोजनों में शिरकत, हफ्ते में एकाधिक बार उपासना, मृत्यु के बाद जीवन (आफ्टरलाइफ) में पूर्ण विश्वास, संदेहवादी और नास्तिक, और मनुष्य का विकास पशुओं से होने की प्रस्थापना में विश्वास। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सत्रहों देशों में हर साल जारी होने वाले दोनों किस्म के आंकड़ों को ग्रेगरी पॉल ने बड़ी मशक्कत से जुटाया और इनके आधार पर इन समाजों की सफलता और धार्मिकता के अलग-अलग ग्राफ बनाए। ये ग्राफ एक ही नजर में दोनों के अंतर्संबंध को लेकर कुछ ठोस नतीजों तक पहुंचा देते हैं। सीधी समानुपाती रेखाओं द्वारा प्रदर्शित एक नतीजा तो बिल्कुल साफ है कि जो समाज जितने नाकारा, बेचैन और परेशान हैं वहां धार्मिकता का जोर उतना ही ज्यादा है। इसके बरक्स जो समाज जितने सफल, संतुष्ट और प्रसन्न हैं वहां धर्म के प्रति लोगों का नजरिया उतना ही कैजुअल या लापरवाही भरा है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तानाशाही माहौल से धीरे-धीरे बाहर आ रहे पुर्तगाल और संसार के सबसे शक्तिशाली लोकतंत्र अमेरिका में कुछ भी साझा नहीं है लेकिन अपराधों का प्रतिशत और चर्च से जुड़ी कट्टरता दोनों जगह एक जैसी है। उधर इनके पड़ोसी देश फ्रांस और कनाडा शांति और संतुष्टि में ही नहीं, धार्मिकता के मामले में भी एक जैसे हैं। फ्रांस में तो खुद को संदेहवादी या नास्तिक बताने वालों का हिस्सा कुल आबादी का एक तिहाई हो चला है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इन तथ्यों के आधार पर ग्रेगरी पॉल इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि मनुष्य का धार्मिक होना कोई स्वत:सिद्ध बात नहीं है। धार्मिकता सुदूर अतीत में आदिम इंसानों के जोखिम भरे जीवन से उपजी डिफाल्ट मोड जैसी मनःस्थिति है, जहां खुद को असुरक्षित और लाचार पाते ही वे अपने आप लौट आते हैं। इस खोज को कुछ महीन दलीलों के जरिए चुनौती देने की कोशिश की जा सकती है, लेकिन यह बुनियादी सवाल से टकराने के बजाय बीच का रास्ता निकालने जैसा ही होगा। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस तरह की खोज में काम आ सकने वाले भरोसेमंद आंकड़े भारत में मौजूद नहीं हैं, लेकिन यहां जोर मारती धार्मिकता को समाज की बढ़ती नाकामियों से जोड़ कर देखने के लिए शायद इतने गहरे शोध की जरूरत भी नहीं है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5004531893346374759-7468094718552771823?l=pahalu.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://pahalu.blogspot.com/feeds/7468094718552771823/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5004531893346374759&amp;postID=7468094718552771823' title='6 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5004531893346374759/posts/default/7468094718552771823'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5004531893346374759/posts/default/7468094718552771823'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://pahalu.blogspot.com/2009/11/blog-post_23.html' title='जितने नाकारा उतने धर्मधुरीण'/><author><name>चंद्रभूषण</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11191795645421335349</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5004531893346374759.post-1840770617045994815</id><published>2009-11-20T04:41:00.000-08:00</published><updated>2009-11-20T05:56:08.104-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='डील-पैंतरा'/><title type='text'>अठार में लिया बाई में बेक दिया</title><content type='html'>कल तो मैंने नेगी की ले ली- रोहित ने आज सुबह अचानक घोषणा की। रोज मेरे साथ वॉलीबॉल खेलने वाले रोहित पाल ऐसे बहुत सारे लोगों में एक हैं जो यहां अपने लिए बिना किसी काम-धंधे की व्यवस्था किए घर पर बाप की जुगाड़ी संपत्ति से दिल्ली के आसपास एक फ्लैट खरीद कर यहां धूल से रस्सी बटने में जुटे हुए हैं। आज खेल शुरू होने से ठीक पहले उन्होंने गोरखपुरिया रंगबाजी और नए-नए अपनाए गए पछांह लहजे के साथ गुटका संस्करण में अपना नेगी पुराण सुना डाला।... शाम होते ही चढ़ गया साले के घर पे... कहा निकाल दे चार लाख अब तो यहीं के यहीं।  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुझे पता नहीं था कि मेरे मोहल्ले में एक नेगी नाम के जीव भी रहते हैं जो गढ़वाली फिल्में बनाते हैं और मजबूरी आ पड़ने पर इनकी हीरोइनों में से कभी-कभी एकाध को अपनी पत्नी भी बना लेते हैं। इस तरह वैध कही जा सकने वाली उनकी तीन पत्नियों में से एक के साथ वे मेरे घर से थोड़ी ही दूर अपना आशियाना बनाए हुए हैं। फिल्में बनाने जैसा रचनात्मक काम बराबर नहीं किया जा सकता और इससे पैसे निकालने का काम तो कभी-कभी ही हो पाता है। लिहाजा नेगी साहब रेगुलर दाल-रोटी के लिए गुप्त ढंग से कुछ प्रॉपर्टी खरीदने-बेचने का धंधा भी कर लेते हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह बात रोहित को पता नहीं थी। एक दिन नेगी साहब ने उससे कहा कि यार कोई घर दिखा दे ठीकठाक लेकिन सस्ता सा। रोहित और उसके चाचा महेश प्रॉपर्टी समेत ऐसा हर काम करते हैं जिसमें जेब से पैसा न लगाना पड़े लेकिन कमाई एकमुश्त हो जाए। रोहित को लगा कि नेगी के किसी करीबी आदमी को फ्लैट खरीदना होगा। सौदा हो जाएगा तो दो पैसे उसके भी बन जाएंगे। लिहाजा एक मकान उसने नेगी को दिखा दिया। उधर नेगी साहब ने मकान के मालिक से बात करके उससे अट्ठारह लाख में मकान का सौदा कर लिया और अपने दो दोस्तों से मिल कर हफ्ते भर में ही जी टीवी में काम करने वाले एक शरीफ पत्रकार को बाइस लाख में बेच भी दिया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रोहित को पता चला तो उसने मकान मालिक से बात की। उसने कहा कि हां, सौदा हो गया- अठार में मुझसे लिया, बाई में बेक दिया। मकान की कंपाउंडिंग नहीं हुई थी इसलिए मकान मालिक के लिए भी सौदा फायदे का था। कोई समझदार आदमी तो बिना कंपाउंडिंग के कागजात देखे मकान खरीदता नहीं। खरीदता भी तो बहुत सारा मोलभाव करता। लेकिन नेगी की नजर दूर तक थी। उन्हें पता था कि दुनिया को चराने का दावा करने वाले मीडिया वालों को चराने से ज्यादा आसान काम कोई नहीं है। इस तरह वे कई चीलों के साझा घोसले में पड़ा मांस का एक टुकड़ा ले उड़ने में कामयाब रहे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रोहित का कहना है कि मकान उसका ताड़ा हुआ था, बात उससे हुई पड़ी थी, नेगी को मकान तड़ाया उसी ने, फिर साले नेगी की इतनी हिम्मत कि बिना जानकारी के मकान बेच दे और पैसा भी खा जाए। बहरहाल, रोहित की रंगबाजी का मुकाबला करने के लिए नेगी खुद को ऊंचा लगाने वाले एक त्यागी ब्रोकर को पकड़ लाए, जिसने यह कहकर मामला सुलटाने की कोशिश की कि पैसे तो अब खाए जा चुके हैं इसलिए रोहित सबर कर जाए। लेकिन रोहित अगर ऐसे ही सबर करने लगा तब तो उसने दिल्ली में कमा खाया। दो ही रास्ते हैं, या तो यह सौदा रद्द होगा, या फिर नेगी को अपने पेट से निकाल कर रोहित को उसके पैसे लौटाने होंगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस सत्यकथा से नैतिक शिक्षा यह मिलती है कि अगर आपका इरादा दिल्ली के आसपास रहने के लिए कोई फ्लैट खरीदना या किराये पर लेना है तो आप खुद को भेड़ियों के झुंड में पड़े खरगोश जैसा महसूस करते हुए इसकी प्रक्रिया में जाएं। चीज आप तक पहुंचने से पहले कितनी बार खरीदी-बेची जा चुकी होगी, इसका अंदाजा लगाना आपके लिए मुश्किल होगा। मकान सस्ता दिला देने के लिए आप जिस आदमी के तहेदिल से शुक्रगुजार हो रहे होंगे, वह अपने दोस्तों के साथ अच्छा मुर्गा मूंड़ लेने की खुशी में कहीं पार्टी कर रहा होगा...बशर्ते यह करते हुए वह किसी रोहित के हत्थे न चढ़ जाए।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5004531893346374759-1840770617045994815?l=pahalu.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://pahalu.blogspot.com/feeds/1840770617045994815/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5004531893346374759&amp;postID=1840770617045994815' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5004531893346374759/posts/default/1840770617045994815'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5004531893346374759/posts/default/1840770617045994815'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://pahalu.blogspot.com/2009/11/blog-post_20.html' title='अठार में लिया बाई में बेक दिया'/><author><name>चंद्रभूषण</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11191795645421335349</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5004531893346374759.post-6144355183773276144</id><published>2009-11-18T04:33:00.000-08:00</published><updated>2009-11-18T05:37:16.890-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कुछ मुझ से ....'/><title type='text'>दुख क्या इतना बुरा है?</title><content type='html'>किसी बड़े मकसद के लिए बिना किसी से शिकायत किए चुपचाप तकलीफ सहना। कुछ इस तरह जैसे यह किसी ज्यादा गहरी खुशी की तलाश हो। लोग आज भी ऐसा करते हैं, लेकिन इसका कोई मेल आज के आम मिजाज से नहीं बनता। किसी और के लिए तो छोड़िए, अपने शरीर से जुड़ा इंसान का छोटा से छोटा दुख भी अभी अग्राह्य समझा जाता है। उसके समाधान के लिए संसार की सारी शक्तियां तत्पर दिखाई पड़ती है, बशर्ते उसके पास बदले में देने के लिए पर्याप्त पैसे हों। ऐसे में बिना किसी मजबूरी के कष्ट उठाना समाज के लिए एक ऐसी गुत्थी बन जाता है, जिसे किसी अतार्किक कल्ट का हिस्सा भर माना जा सकता है। मीडिया ऐसे लोगों को या तो झोला वाला वगैरह बता कर गरियाता है, या बात पट गई तो देवता बनाकर बाजार में उतार देता है, जहां किसी चूरनफरोश की तरह वे आध्यात्मिक सुख पाने के नुस्खे बेचने लगते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हाल में पढ़े गए एक काफी पुराने उपन्यास पर चर्चा करने का मन है। अज्ञेय के उपन्यास &lt;em&gt;शेखर : एक जीवनी &lt;/em&gt;में जेल में बंद नायक शेखर की मुलाकात बाबा मदन सिंह से होती है। बाबा 22 सालों से तनहाई की कैद काट रहे हैं, विद्या से पूरी तरह वंचित हैं और अपने जीवन और चिंतन से दिन-रात कुछ सूत्र निकालने में जुटे रहते हैं। मदन सिंह से नायक को कई सूत्र प्राप्त होते हैं, जिनमें एक यह है- &lt;em&gt;अभिमान से भी बड़ा एक दर्द होता है, लेकिन दर्द से बड़ा एक विश्वास होता है।&lt;/em&gt; इस अटपटे सूत्र का कोई अर्थ एकबारगी शेखर की समझ में नहीं आता, लेकिन जल्द ही इसके आधे भाग का मतलब वह खुद से सच्चा स्नेह रखने वाली स्वतंत्रचेता मौसेरी बहन शशि के पत्र से समझ जाता है। अपने पत्र में शशि ने विवाह में जरा भी रुचि न होने के बावजूद इसके लिए राजी होने की बात लिखी है, क्योंकि अपनी मान्यताओं का बोझ वह अपनी सद्य: विधवा मां के सिर नहीं डालना चाहती। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बाद में उसी शशि को उसके ससुराल के लोग मार-पीट कर हमेशा के लिए घर से बाहर निकाल देते हैं। इतनी बुरी तरह कि उसका गुर्दा फट चुका है और किसी संयोग से ही वह आगे जीवित रह सकती है। चरित्रहीनता का लांछन उस पर मंढ़ते हुए। इस अपराध में कि वह आत्मघात के लिए निकले अपने मौसेरे भाई शेखर के कमरे में एक बरसाती रात बिता कर आई है। घर से निकाली गई शशि वापस शेखर के ही यहां आती है और अपनी यातना के बारे में कई दिनों तक उसे कुछ नहीं बताती। बाद में डॉक्टर के जरिए जब शेखर को शशि की स्थिति का पता चलता है तो फिर उसके सामने धीरे-धीरे बाबा मदन सिंह के सूत्र के दूसरे हिस्से का अर्थ भी खुलता है- &lt;em&gt;...लेकिन दर्द से बड़ा एक विश्वास होता है।&lt;/em&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सफरिंग- बिना किसी बाध्यता के यातना सहना- ईसाइयत के लिए एक मूलभूत धार्मिक तत्व है। फ्रेडरिक एंगेल्स ने अपनी रचना &lt;em&gt;आदि ईसाई धर्म &lt;/em&gt;के जरिए यह साबित करने का प्रयास किया है कि सफरिंग हकीकत में ईसाइयत का मूल तत्व नहीं, बल्कि चौथी सदी में इसे अपना राजधर्म बनाते वक्त रोमन साम्राज्य द्वारा आरोपित चीज है। उन्होंने बताया है कि शुरू में ईसाइयत जब बढ़इयों और लोहारों का गुप्त धर्म हुआ करती थी, तब इसका मूल तत्व प्रतिशोध का हुआ करता था और रोमन साम्राज्य को पलटने का षड्यंत्र रचना इसकी मूल गतिविधि हुआ करती थी। हकीकत चाहे जो भी हो, लेकिन ईसाई धर्म अगर इंतकाम तक सिमट कर रह जाता, किसी बड़े उद्देश्य के लिए कष्ट सहने की बात इसमें शामिल नहीं होती तो सेंट पॉल और सेंट ऑगस्टिन से लेकर मदर टेरेसा जैसी महान परंपरा उसके पास नहीं होती। तब शायद निर्दयी सत्ताओं के लिए उसे पचा लेना भी बहुत आसान हो जाता। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दुनिया के इतिहास में न कोई ऐसा समय था, न ऐसा समाज था, जिसमें निजी स्वार्थ ने समाज की मुख्य संचालक शक्ति की भूमिका न निभाई हो। लेकिन हर बार लोगों को अपनी खाल से बाहर निकल कर सोचने की प्रेरणा उन्हीं लोगों से मिली, जिन्होंने किसी मजबूरी में नहीं, अपनी इच्छा से किसी बड़े मकसद के लिए कष्ट झेलने का फैसला किया। हिंदू परंपरा में जीते जी अपनी हड्डियां देने वाले महर्षि दधीचि, शरणागत कबूतर को बचाने के लिए खुद को अर्पित करने वाले राजा शिवि और समुद्र मंथन से निकला हलाहल पी जाने वाले भगवान शिव की परिकल्पनाएं सफरिंग को कहीं आगे तक ले जाती हैं, लेकिन हमारे भावजगत में इनके लिए अब कोई जगह नहीं रह गई है। हम सत्य, प्रेम या किसी सामाजिक उद्देश्य के लिए यातना सहने की क्षमता से वंचित हो सकते हैं, लेकिन इसे कल्ट बनाकर इसका निरादर हमें नहीं करना चाहिए।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5004531893346374759-6144355183773276144?l=pahalu.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://pahalu.blogspot.com/feeds/6144355183773276144/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5004531893346374759&amp;postID=6144355183773276144' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5004531893346374759/posts/default/6144355183773276144'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5004531893346374759/posts/default/6144355183773276144'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://pahalu.blogspot.com/2009/11/blog-post_18.html' title='दुख क्या इतना बुरा है?'/><author><name>चंद्रभूषण</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11191795645421335349</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5004531893346374759.post-3618971593222315006</id><published>2009-11-17T01:36:00.000-08:00</published><updated>2009-11-17T01:46:31.821-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='चलते-चलते'/><title type='text'>प्रलय का लोकल ब्रोडकास्ट</title><content type='html'>कोई तीस साल पहले की बात है। जैसे अभी हॉलिवुड की फार्म्युला फिल्म 2012 को लेकर उठे हल्ले ने कई लोगों की हालत खस्ता कर रखी है, कुछ-कुछ वैसा ही हाल हमारे गांव का था। रेडियो में बराबर खबरें आ रही थीं कि स्काईलैब नाम की कोई बड़ी भयानक चीज धरती पर गिरने वाली है। पूरी दुनिया में यह कहीं भी गिर सकती है और जहां भी गिरेगी उसके इर्द-गिर्द सैकड़ों मील का इलाका बंजर-वीरान हो जाएगा। लाखों लोग मारे जाएंगे, कोई पानी देने वाला, दिया जलाने वाला भी नहीं रह जाएगा। पास-पड़ोस के सभी गांवों से रेडियो-ट्रांजिस्टर की संख्या हमारे गांव में ज्यादा थी और खबरें सुनकर गपास्टक करने वाले लोग भी बहुतायत में थे, लिहाजा पूरे इलाके में प्रलय के लोकल ब्रॉडकास्ट का धर्म भी यहीं निभाया जा रहा था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जैसा गांवों में चलन है, अंग्रेजी नामों का व्यवस्थित ढंग से बंटाधार करने का, वैसा ही कुछ स्काईलैब को लेकर भी हुआ। प्राथमिक श्रोताओं ने ही नाम में यथोचित सुधार करके इसे स्काईलैंप बना दिया। सहारनपुर की एक पेपर मिल से रिटायर होकर आए दिवाकर चाचा चिथरू के कुएं की जगत पर बैठे अपने उत्सुक श्रोतावर्ग को समझा रहे थे- वो क्या है कि आसमान में एक बहुत बड़ा लैंप टांगा गया था, जो टूट गया है और अब गिरने वाला है। ये जो साइंटिस्ट होते हैं, दिमाग तो इनके पास होता नहीं। चीजें बना देते हैं लेकिन जब वे तबाही फैलाने लगती हैं तो कंट्रोल नहीं कर पाते। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;श्रोताओं में मौजूद बुद्धिमान लोगों ने, जिनके लिए स्काईलैंप भी काफी अटपटा शब्द था, इसे अपनी सुविधा के मुताबिक तोड़ने-मरोड़ने की कोशिश की। अगले दिन से गांव में सकलंपू नाम की एक चीज का तहलका मचा हुआ था। पड़ोस के गांव में इस नाम के कई संस्करण चर्चा में थे, जिनमें एक बंपूक भी था। संभवत: इसे तीन खतरनाक चीजों बम, बंदूक और सकलंपू को मिलाकर बनाया गया था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जाड़े के दिन थे। एक डूबती हुई बदराई शाम में हम लोग कोल्हू के पास बैठे गुड़ पका रहे थे। तभी कबिराज की मां आईं और भट्ठे के पास बैठ गईं। उनका इरादा आग तापने का नहीं, खुद को मथे जा रही एक चिंता में साझेदारी करने का था। कबिराज गांव से बहुत दूर लुधियाना में मजदूरी करने गए थे और पिछले छह महीनों से उनकी कोई चिट्ठी-पत्री नहीं आई थी। उनकी मां यह सोच-सोच कर परेशान थीं कि यह बंपूक या सकलंपू या जो भी चीज ऊपर से गिरने वाली है, वह कहीं लुधियाना में तो नहीं गिर जाएगी? सवाल सुनकर कड़ाह का भट्ठा झोंक रहे कुछ लोगों का धीरज छूट गया। यहां सबको अपनी जान की पड़ी है और इन्हें लुधियाना की सूझ रही है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बहरहाल, ऐसा भी नहीं था कि सारे लोग स्काईलैब गिरने की खबर से दुखी ही हों। कुछ लोग इससे काफी संतुष्टि भी महसूस कर रहे थे। मसलन, एक थे मिलिटरी चाचा। फौज के रिटायर्ड सूबेदार थे और सरकारी कर्ज लेने में महारत हासिल कर चुके थे। अपनी थोड़ी सी अंग्रेजी के बल पर उन्हें भैंस खरीदने के लिए या मोमबत्ती बनाने के लिए कर्ज मिल जाता था, जिसका इस्तेमाल वे अपनी जीभ के चटखारे के लिए कर डालते थे। महीनों महंगी सब्जियां और पूड़ी-पकवान खा लेने के बाद जब वसूली के लिए अमीन दरवाजे पर दस्तक देता था तो वे कहला देते थे कि कहीं और गए हैं। और जब कुर्की-जब्ती के लिए सिपाही आते थे तो भाग कर ईख या अरहर के खेत में छिप जाते थे। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इन दिनों मिलिटरी चाचा यह सोच कर प्रसन्न चल रहे थे कि एक बार यह चीज गिर जाए, फिर तो वसूली की कोई चिंता ही नहीं रह जाएगी। गांव में जब कुछ बचेगा ही नहीं तो कुर्की वाले आते रहें। जिस रात स्काईलैब गिरने वाला था उस दिन टोले के लोगों ने साथ-साथ जागने का फैसला किया। कुछ लोग ढोलक-हारमोनियम निकाल लाए और गाने- बजाने का कार्यक्रम शुरू हो गया। इस हल्ले में देर रात तक लोगों की चिंता हवा हो गई और तीन बजते-बजते लोग ओसारे में ही लुढ़क गए। जब सुबह हुई तो रेडियो में खबर आई कि स्काईलैब बिना किसी को नुकसान पहुंचाए ऑस्ट्रेलिया के पास समुद्र में गिर गया।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5004531893346374759-3618971593222315006?l=pahalu.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://pahalu.blogspot.com/feeds/3618971593222315006/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5004531893346374759&amp;postID=3618971593222315006' title='6 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5004531893346374759/posts/default/3618971593222315006'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5004531893346374759/posts/default/3618971593222315006'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://pahalu.blogspot.com/2009/11/blog-post_17.html' title='प्रलय का लोकल ब्रोडकास्ट'/><author><name>चंद्रभूषण</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11191795645421335349</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5004531893346374759.post-5973854364349127439</id><published>2009-11-14T04:07:00.000-08:00</published><updated>2009-11-14T04:40:32.002-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='खेलकूद'/><title type='text'>टिनहा सा टीटी</title><content type='html'>ठीक है, ठीक है, ले लेंगे लेकिन टेबल कहां है जो टेबल टेनिस खेलोगे। कई दिन से जान खा रहे बेटे को समझाने की एक और कोशिश मैंने की। टेबल नहीं, बेंच पर खेलेंगे, बेंच पर। कष्ट काटने के लिए मैं एक रैकेट खरीदने दुकान की तरफ रवाना हुआ। वहां ढाई सौ रुपये में एक कामचलाऊ रैकेट मिल रहा था लेकिन पास में कुल 160 रुपये में तीन बॉल और दो रैकेट का एक पैक भी रखा था । बेटे ने कहा, यही ले लो। कोई खेलने को नहीं मिलेगा तो तुम्हारे ही साथ खेल लूंगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;टीटी मैंने थोड़ा सा खेला है। जब जनसत्ता में था तो दोपहर में लोग पिट-पिट करते रहते थे। उन्हीं के पीछे-पीछे मैंने भी कुछ दिन खेला। खेल तो मेरा जैसा-तैसा ही था लेकिन एक मित्र की मेहरबानी से एक बार बायोडाटा बनाने बैठा तो उसमें हॉबी के नाम पर टीटी और बैडमिंटन लिखने में कोई परेशानी नहीं हुई। अगर नौकरी ऐसी हुई जिसमें हॉबी पालने की फुरसत भी मिल जाए तो इसके लिए टीटी ही क्या बुरा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बेंच का टीटी एक अजब ही चीज है। लगभग रोज शाम को अखबार से लौटने के बाद बेटे के पीछे-पीछे मैं भी सामने के पार्क में निकल जाता हूं। वहां बमुश्किल डेढ़ फुट ऊंची सीमेंट की बेंचें लगी हैं। बगल में स्ट्रीट लाइट जलती रहती है और बेंच के बीच में दो ईंटें रख कर चार इंच ऊंचा नेट तैयार हो जाता है। टीटी की टेबल की स्टैंडर्ड हाइट शायद तीन फुट होती है और नेट नौ इंच ऊंचा होता है, लेकिन अगर खेलने का शौक हो तो किसी भी स्थिति में किसी भी शर्त पर खेला जा सकता है। सिर्फ डेढ़ फुट चौड़ी, डेढ़ फुट ऊंची और दोनों तरफ ढाई-ढाई फुट की लंबाई वाली टेबल पर हमारा खेल चल निकला।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक दिन हमारे मित्र खालिद को  हमारा टिनहा टीटी देखकर काफी दया आई और वह हमें अपनी छत पर ले गया। वहां प्लाई वाली फोल्डिंग चारपाई डाल कर और उसके नीचे एक-एक ईंटें लगाकर करीब दो फुट ऊंची मेज तैयार हो गई। बीच में एक करीब नौ इंच ही ऊंचा पटरा लगाकर खेल की नई तरतीब बना ली गई। मेज की ऊंचाई में तो ज्यादा फर्क नहीं था लेकिन इससे सबसे बड़ा फायदा यह हुआ कि बेंच पर गेंद महज डेढ़ फुट की चौड़ाई में मारनी पड़ती थी  जबकि यहां मारने के लिए तीन फुट चौड़ाई मिलने लगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसके अगले चरण की ईजाद महज दो दिन पहले हुई है। आजकल फोल्डिंग चारपाई छत पर ही बेकार पड़े एक कूलर के प्लास्टिक ढांचे पर रखी जाने लगी है, जो करीब तीन फुट ऊंचा है। खेलने में लगता है जैसे सचमुच की टेबल पर खेल रहे हैं, हालांकि सचमुच की टेबल चौड़ाई में चार फुट से ज्यादा ही होती होगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जहां तक सवाल मेरे खेल का है तो यह पहले भी ज्यादा अच्छा नहीं था, हालांकि जब छूटा था तब कुछ शॉट ठीकठाक पड़ने लगे थे। अभी तो शॉट के नाम पर ले देकर थोड़ा स्पिन और बस लॉबिंग, यानी उछाल देना ताकि अगला मारे तो बॉल टेबल पर न पड़ कर बाहर निकल जाए। बेटू का खेल भी अभी कुछ खास नहीं हुआ है लेकिन उसके शॉट बाकायदा पड़ते हैं। शायद ऐसा उसके अच्छे रिफ्लेक्सेज के चलते है। उम्मीद करता हूं एकाध महीने खेल लेने के बाद इतना बैलेंस बना लूंगा कि बेटे से रोज-रोज हारना न पड़े।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5004531893346374759-5973854364349127439?l=pahalu.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://pahalu.blogspot.com/feeds/5973854364349127439/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=5004531893346374759&amp;postID=5973854364349127439' title='6 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5004531893346374759/posts/default/5973854364349127439'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5004531893346374759/posts/default/5973854364349127439'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://pahalu.blogspot.com/2009/11/blog-post.html' title='टिनहा सा टीटी'/><author><name>चंद्रभूषण</name><uri>http://www.blogger.com/profile/11191795645421335349</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5004531893346374759.post-1198113890500756299</id><published>2009-09-16T05:29:00.000-07:00</published><updated>2009-09-16T06:40:14.277-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='चलते-चलते'/><title type='text'>बिल्डर ब्रोकर का कॉमनवेल्थ</title><content type='html'>आलम में इंतखाब दिल्ली शहर धूल और बारिश में बारी-बारी भच-भच करता कॉमनवेल्थ नाम के अगम-अगोचर गोदो का इंतजार कर रहा है। लगभग हर चौराहे पर फ्लाईओवर या तो बन गए हैं या बनने की प्रक्रिया में हैं। सड़कें खुदी हुई हैं। बगल में पड़ा ढेर सारा लोहा सड़ रहा है। बड़े-बड़े क्रेन बीसियों किलो के हिलते-डुलते हुक लटकाए कभी भी कपाल क्रिया कर देने को उतावले हैं। मेट्रो को एनसीआर के चप्पे-चप्पे से जोड़ देने की तैयारी है लेकिन उसके खंभे दरक रहे हैं। पटरियों को रोकने के उपाय छूंछे साबित हो रहे हैं और पता चल रहा है कि मेट्रो का एक सीमेंट सप्लायर न जाने कब से घटिया माल उसके मत्थे मंढ़ रहा था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शहर में अब धीरे-धीरे कॉमनवेल्थ को लेकर एक किस्म का डर व्यापने लगा है। माइकल फेनेल नाम के एक कॉमनवेल्थिया अफसर यहां आकर गहरी चिंता जता गए। यहां तक कहा कि अब तो समय भी इतना कम रह गया है कि खेलों की जगह भी नहीं बदली जा सकती, लेकिन दिल्ली में अभी तैयारियों की जो हालत है, उसमें कोई चमत्कार ही न हो गया तो यहां होने वाले आयोजन से इन खेलों की प्रतिष्ठा पर बुरा असर पड़ सकता है। न कोई स्टेडियम तैयार है, न खिलाड़ियों और अतिथियों के ठहरने की व्यवस्था अगले एक साल में हो पाने के कोई आसार हैं। ऊपर से तुर्रा यह कि आयोजकों की बहुत लंबी सूची में हर कोई अपना-अपना साम्राज्य चलाने में ही मगन है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक ऐसा शहर, जहां पचास लाख के लगभग गाड़ियां चल रही हों और इनकी संख्या में हर रोज ही सैकड़ों का इजाफा हो रहा हो, सचमुच जादू की छड़ी हासिल कर ले तो भी अपने यातायात का स्तर सुधार नहीं सकता। सफाई वगैरह के मामले में यह शहर पहले से ही माशाअल्ला है और शहर भर में खुदाई से जमा मिट्टी ने नालों को ढक कर सड़कें बनाने जैसी इंजीनियरिंग कसरतों के साथ मिलकर यहां की गंदगी को चमत्कारिक ऊंचाइयों तक पहुंचा दिया है। मजे की बात यह कि इस धकापेल को घटाने के बजाय तैयारी निरंतर इसे बढ़ाते जाने की ही चल रही है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पिछले आठ-दस वर्षों में 
