Wednesday, May 25, 2011

लुरखुर लोरिक-2

(पिछले अंक से आगे)

वीरगाथा काल की एक अन्य रचना आल्हा की पहुंच हमारे गांव तक थी। सावन के महीने में किसी नट को आल्हा गाते देखने का तजुर्बा यादगार हुआ करता था। लेकिन चनइनी में कोई ऐसी बात थी, जो उसे आल्हा ही नहीं, बाकी किसी भी काव्य से अलग बनाती थी। रामायण, महाभारत से लेकर आल्हा तक सब की सब राजा-रानियों की कहानियां थीं। इनमें आने वाली चीजें हमारे इर्द-गिर्द कम ही पाई जाती थीं। लेकिन चनइनी में गाय-बैल, गोहरउर और मूंज का बना पिटारा भी आता था।

इसके कथाक्रम में पता चलता था कि पलाश के डंठलों से ज्यादा भारी कोई और वनस्पति नहीं होती। खानदानी तौर पर शाकाहारी हमारे जैसे बच्चे भी यह जान लेते थे कि मांस को अगर गोइंठे की आग में भून दिया जाए तो एक अकेला आदमी भी एक पला-पलाया बकरा पूरा का पूरा खा सकता है। लोरिक के अधेड़ सलाहकार संवरू ने यह उक्ति उनकी बारात को बताई थी, जिसे बिना दुलहन के ही वापस लौटा देने के लिए ससुराल वालों (मैना के मायके वालों) ने एक भी पकी मूंछ वाला आदमी बारात में न लाने की हिदायत दे रखी थी।

बहरहाल, चनइनी के मामले में मेरे लिए कथावाचक का सम्मोहन स्वयं कथा से कम नहीं था। बहुत धीमी आवाज में, मन के भीतर बजती हुई किसी धुन की तरह लुरखुर काका चनइनी गाते थे। कभी-कभी परंपरा निभाने के लिए एक कान में उंगली भी डाल लेते थे। बीच-बीच में श्रृंगारिक या मजाकिया जगहों पर हंसते थे, लेकिन बस जरा सा। ज्यादातर पारंपरिक बिरहिए दोनों कानों में उंगली डालकर बिरहा गाते थे। बैलगाड़ियों की लीख पर बोझा गिराकर लौट रहे गाड़ीवानों को अक्सर इस मुद्रा में देखने का मौका मिलता था।

शहर बनारस के बुल्लू ने बिरहे का फिल्मीकरण उस समय तक तकरीबन पूरा कर दिया था और फिर एक से एक भद्दे प्रयोग इसके साथ किए गए। लेकिन बिना किसी साज-बाज के, अक्सर अकेले ही गाया और सुना जाने वाला खड़ा या खड़ी बिरहा ही इस काव्य विधा का शुद्धतम रूप था, जिसे टेप और सीडी वाले मेकेनिकल समय में बचाए रखना किसी के लिए संभव नहीं था।

लुरखुर काका को सुनते-सुनते मेरे मन में पहली महत्वाकांक्षा जगी थी, जो बिरहिया बनने की थी। उनके जैसा नहीं, सभा-सोसाइटी में गाने वाला, परफॉर्मर किस्म का बिरहिया बनने की, हालांकि अपनी कल्पना में भी अपनी भूमिका मैं बिरहा गाने वाले से ज्यादा इसे बिठाने, या लिखने वाले की ही सोच पाता था। परफॉर्मर बनने में कई तकनीकी समस्याएं थीं। एक इनमें जाति की भी थी क्योंकि उस समय तक बिरहा बतौर प्रोफेशन अहीर जाति की इक्सक्लूसिव चीज समझा जाता था।

मैंने अपने पिताजी से एक दिन इसके बारे में बताया। कहा कि यह जो राम, कृष्ण की कहानियां आप लोग सुनाते हैं, वे लोरिक और दयाराम तो क्या, गेनिया अहिरिनिया की कहानी के सामने भी कुछ नहीं हैं। इस पर मुझे डांट पड़ी। पिताजी ने कहा कि ये झूठ-फूठ कहानियां अहीर लोग अपने को खास साबित करने के लिए बनाते हैं, ताकि उनके पास भी अपनी बिरादरी से राम-कृष्ण के सामने खड़ा करने के लिए कोई हो।

मुझे यह समझने में थोड़ा वक्त लगा कि न सिर्फ मेरे पिता के लिए बल्कि समूची बभनौटी के लिए लुरखुर काका की हैसियत किसी आम घसियारे से ज्यादा नहीं थी। लेकिन गांव के बाकी हिस्से में उनकी ताकत, उनकी मर्दानगी और उनके सख्त लंगोट के किस्से कहे जाते थे। इनमें सबसे गुपचुप ढंग से कहा जाने वाला किस्सा यह था कि एक बार गांव की एक चलता-पुर्जा महिला ने उनसे प्रणय निवेदन किया तो उन्होंने बदले में इसके लिए काफी ऊंची रकम मांग ली।

महिला ने कहा कि गांव में ऐसे लोगों की कमी नहीं है जो कंधे पर हाथ भर रखने के लिए उसे मनचाहे पैसे देने को तैयार हैं, लेकिन वह उन्हें मुंह नहीं लगाती। लुरखुर काका ने कहा कि तुम्हारे पास जो है, उसकी कीमत लगाने वाले बैठे हैं लेकिन मेरे पास जो है उसकी कोई कीमत नहीं है- जो कुछ मैंने कहा, वह पैसे के लिए नहीं, सिर्फ तुम्हें समझाने के लिए था, उसे भूल जाओ और अपना काम करो।

समय बीतने के साथ मेरा गाय चराना छूट गया और लुरखुर काका भी कहीं विस्मृति में सिरा गए। अभी दो-तीन साल पहले मैं अपने गांव गया था तो एक सुबह मां को एक साड़ी, कुछ रुपये और सिद्धा-बारी लेकर घर से निकलते देखा। पूछा, कहां जा रही हो तो पता चला कि लुरखुर काका की छोटी बेटी का ब्याह है। लौटकर उसने बताया कि पिछले साल गांव में उनके अकेले बेटे का कत्ल हो गया था, अब पूरा गांव मिलकर उनकी आखिरी बेटी की शादी कर रहा है।

मुझे याद नहीं आता कि कत्ल की कोई वारदात मेरे गांव में इससे पहले कब हुई थी। कभी हुई भी थी या नहीं। यहां चाकू निकलते हैं, गोलियां चलती हैं, बम फटते हैं, लेकिन लड़ाई हर बार बराबरी की ही छूटती है, कोई मरता नहीं। इसके बावजूद यहां लुरखुर काका का जवान लड़का न सिर्फ मारा गया बल्कि इस तरह मारा गया कि उसका जिक्र करने पर आज भी रोंगटे खड़े हो जाते हैं।

रात में पता नहीं कैसे सोते में ही उसे चारपाई सहित उठा लिया गया। अगली सुबह खोजबीन शुरू हुई, कुछ पता नहीं चला। कई दिन बाद दिसा-मैदान गई औरतों को एक अरहर के खेत में जगह-जगह खून के निशान दिखे और आसपास एक बिस्सा से भी ज्यादा दायरे की अरहर टूटी नजर आई। जैसे वहां कोई युद्ध हुआ हो। अगले ही दिन सिवान में एक अंधे कुएं से भयंकर बदबू उठी और वहां जमा बरसाती पानी में बिल्कुल खड़ी तैरती हुई उसकी लाश दिखाई पड़ी। फूलकर कुप्पा। सैकड़ों चाकुओं से गुदी हुई लाश।

यह कत्ल किसने किया, क्यों किया, इसका पता आज तक नहीं चल पाया है। किसी का कहना है कि पड़ोस के पंडित परिवार की किसी लड़की से उसका कुछ चक्कर चल गया था, तो कोई इसके लिए उसी परिवार के जमीन के लालच को जिम्मेदार मानता है- अकेला लड़का है, नहीं रहेगा तो देर-सबेर लुरखुर की जमीन अपने ही खाते में आएगी। मन हुआ चलकर लुरखुर काका से मिलूं, लेकिन पता नहीं क्यों हिम्मत नहीं पड़ी। जिस आदमी ने पहली बार मेरे मन में एक काव्य नायक खड़ा किया, जो खुद मेरे लिए किसी नायक से कम नहीं था, उसे इतने बड़े वक्फे के बाद इस टूटी हुई हालत में क्या देखूं।

2 comments:

ANIL YADAV said...

चनवा का उढार(अपहरण ) की याद दिला दी आपने।
मेरा अब भी मानना है कि चनैनी गाने वाला जब अहे...कह कर अलाप लेता है तो दिशाएं कांपती है और आकाश बहुत धीरे-धीरे डोलने लगता है।

स्वप्नदर्शी said...

अच्छा होता आप अपने अतीत मोह को एक तरफ ठेलकर, लुरखुर काका से एक बार फिर मिल आयें. परती परिकथा के रघु काका की तरह एक बार उनसे फिर गवा लें, कुछ रिकॉर्ड कर लायें और साझा करें. शायद अब इस तरह की कथा कहने वाले भी बहुत नही बचे होंगे.